आर्य और शैतानी तलवार का रहस्य Ch. 1

अध्याय 1: आयशा-1

Posted by Aman Aj • Sep 13, 2026 09:20 AM

1. आयशा-1

अध्याय-1

आयशा

भाग-1

★★★

“आयशा”

“आयशा”

विजेंद्र आयशा को दो बार आवाज लगा चुके थे। मगर आयशा ने एक बार भी जवाब नहीं दिया। 45 साल की उम्र वाले विजेंद्र की दाढ़ी बड़ी और गर्दन तक आने वाली थी। उसके सर के बाल भी बड़े और जुड़ी के रूप में, जो दिखा रहे थे कि वह पंजाबी है। शरीर तंदुरुस्त और किसी पहलवान की तरह लग रहा था। काले पजामे और शर्ट में वह डाइनिंग टेबल के पास बैठकर अपनी बेटी आयशा के आने का इंतजार कर रहे थे।

“आप क्यों फिक्र कर रहे हैं, वह अब छोटी बच्ची तो रही नहीं, आ जाएगी।” आयशा के ठीक सामने बैठी उनकी पत्नी सरिता ने कहा “मुझे ना आपका यह बचपना अच्छा नहीं लगता। एक बच्चे को भी बड़े होकर बड़ा बनने नहीं दे रहे।”

“अरे कमाल है मोहतरमा आप..” विजेंद्र ने सुना तो वह पंजाबी ट्यून में बोला। “मै अपनी बेटी का बाप हूं उसका दुश्मन नहीं जो आप हमें ऐसे ताने मारती रहती है। उसको तो मैं इसलिए बुला रहा था ताकि नीचे आकर खाना खा ले। फिर बाद में खाना ठंडा होगा तो ना तो खाने का मजा आएगा, ना ही उससे पौष्टिक तत्व मिलेंगे।”

“हंजी हंजी, अब बस कीजिए जी। ऐसे लगता है जैसे दुनिया भर के ज्ञान देने का ठेका बस आपने ही खोल रखा है। इतना ही ज्ञान देने का शौक है तो वापिस आश्रम जाकर पढ़ाने क्यों नहीं लग जाते। 20 साल हो गए छोडे़ हुए आश्रम, वहां आश्रम में पंजाबी सिखाते थे, और अब अपना वो सिखाने वाला शौक़ यहां भी नहीं छोड़ रहे।”

विजेंद्र ने अजीब सा मुंह बनाया और कहां “दादे मंगाने, कहां तुमने भी पुरानी बातों को याद कर लिया। वह भी 20 साल पहले की। तुम जानते भी हो उस समय आश्रम के हालात क्या थे। मैं भी भला किस से बात कर रहा हूं, तुम भी तो वहीं थी, देखा नहीं शैतान के बंदे कैसे एक के बाद एक हमला करते जा रहे थे, उस हमले में आश्रम का कोई भी बंदा टिक नहीं पा रहा था। हमलो को देखते ही मैं समझ गया था कि आने वाले दो-तीन सालों में ही शैतान के बंदे एक बड़ी सेना बनाकर हमला करेंगे। फिर आगे हमला हुआ भी। कितना बड़ा हमला था वह जिसने आश्रम को बस मुट्ठी भर लोगों तक सीमित कर दिया।”

“मगर आप यह क्यों भुल रहे जी उसके बाद आश्रम हम जैसे लोगों के लिए सबसे सुरक्षित जगह बन गया। सुरक्षा चक्र बनने के बाद आश्रम के अंदर कभी भी किसी को नुकसान नहीं पहुंच सकता। मुझे तो समझ में नहीं आता अब जब सब ठीक हो गया है तो आप क्यों नहीं वापस जाने के बारे में सोचते।”

विजेंद्र के चेहरे पर हल्की निराशा वाली लकीरे आ गई। “वापिस, अब किस मुंह से वापस जाऊंगा, चला भी गया तो सबसे पहले यही सुनने को मिलेगा कि जब जरूरत थी तब पीठ दिखा कर भाग गया, वह भी तब जब मैं पंजाबी था। मैं तो उनको कभी समझा भी नहीं पाऊंगा कि मेरी भी कुछ मजबूरियां थी। मुझे...” विजेंद्र ने अपने सामने बैठी सरिता को नम भरी आंखों से देखा “मुझे तुमसे शादी करनी थी, और आश्रम में होते हुए कोई भी इस बात के लिए नहीं मानता।”

“शायद मान जाते, अगर आप बात करते। आपने कभी आचार्य वर्धन से हमारी शादी को लेकर बात ही नहीं की। बात नहीं की तो उन्होंने कोई फैसला नहीं सुनाया। बिना फैसला सुनाए ही आपने खुद से बहुत कुछ मान लिया और फिर आश्रम छोड़कर शादी करने की बात कह दी।”

“अब ना तुम हर चीज का इल्जाम मुझ पर मत लगाओ।” विजेंद्र ने अपने चेहरे को ठीक किया और खाना प्लेट में डालने लगा “बात तो तुम भी कर सकती थी। तुम्हें कौन सा बात करने से किसी ने रोका था। वैसे भी भले ही हमने उनसे बात ना की हो, मगर आचार्य वर्धन के व्यवहार को देखकर कोई भी यह बता सकता था कि वह क्या सोचने वाले हैं। उनके निर्णय हमेशा सख्त और भविष्य को देख कर लिए जाने वाले होते हैं। हमारी शादी की बात पर वह यही कहते, आश्रम में किसी भी एक सदस्य का दूसरे सदस्य से इस तरह के रिश्ते बनाना वर्जित है, अगर ऐसे होने लगा तो आश्रम युद्ध की तरफ ध्यान न देकर खुद के रिश्तो को संभालने की तरफ ध्यान देने लगेगा, यह चीज भावनात्मक कमजोरी को पैदा करेगी जो आश्रम के लिए किसी दीमक से कम नहीं।” विजेंद्र ने लगभग आचार्य वर्धन की तरह नाटक करते हुए कहा था।

सरिता ने यह सुना तो वह हंस पड़ी “आप भी ना, उनकी पूरी पूरी नकल कर लेते हो। आचार्य वर्धन यह देख ले तो उन्हें यह भी पता ना चले असली कौन है नकली कौन है।”

विजेंद्र हंस दिया “हंजी पति भी किसके हैं फिर। सरिता जी के।” इसके बाद उसने ऊपर की तरफ देखा। ऊपर की तरफ देखने के बाद वह सरिता से बोले “लो कमाल है, यह आयशा अभी भी नीचे नहीं आई, उसको अब खाना खाने नहीं आना है तो क्या अगले जन्म आना है।” इसके बाद उन्होंने दोबारा आवाज लगाई “आयशा ... आयशा...”

“आई पापा...” आयशा ने ऊपर से कहा “कितनी बार बोला है मेरे को इतनी बार आवाज मत लगाया करे। मगर आप हो की आवाज लगा लगा कर कानों से बहरा करने जैसे वाली हालत कर देते हो।”

“लो बताओ,” विजेंद्र सरिता की तरफ देखते हूए बोला “एक तो उसको खाने के लिए बुलाओ, एक ऊपर से यह भी सुनो कि मैं बुला बुलाकर उसको कानों से बहरा कर रहा हूं।”

इससे पहले सरिता कुछ कहती सिढियों से कदमों की आवाज आने लगी। कदमों की आवाज आते ही दोनों उस ओर देखने लगे। देखते ही देखते वहां उन्हें आयशा दिखाई दी जो सीढ़ियों से धीरे धीरे नीचे उतर रही थी।

आयशा तकरीबन 19 साल की लड़की थी। पंजाबी लड़कियों जैसी दिखने वाली, गोरी चिट्टी, मोटे गाल, मोटी गहरे रंग की काली आंखें, ठोढ़ी पर काले रंग का तिल। उसने पंजाबी धोती ( सलवार का सेकंड वर्जन) पहन रखी थी जबकि शरीर पर तंग काले रंग की कुड़ती थी। उसके बाल खुले हुए थे, बालों का स्टाइल ऐसा था कि बाल आगे से छोटे दिखाई दे रहे थे जबकि जैसे जैसे वह पीछे हो रहे थे वैसे वैसे बड़े होते जा रहे थे।

“यु नो ना पापा...” आयशा बोली “हाई फ्रिकवेंसी इतना गहरा सदमा दे सकती है की उससे बहरा होने में बस कुछ ही सेकंड लगते हैं। आपने विज्ञान नहीं पढी क्या। अगर नहीं पढ़ी तो आश्रम में विज्ञान का टीचर तो होगा ही, उससे नहीं सुना।”

आयशा ने डाइनिंग टेबल पर कुर्सी खिसकाई और उस पर बैठ गई। बैठते ही उसने टेबल पर मौजूद कटे हुए खीरे में से एक खिरा उठा लिया।

विजेंद्र ने उसकी बात सुनते ही जवाब दिया “सुनी थी बेटा सुनी थी। सिर्फ यह बात नहीं सुनी थी, बल्कि यह भी सुना था कि इंसान को सुबह सूरज के निकलने से पहले ही उठ जाना चाहिए। अब तुम बताओ मैं कौन कौन सी बात का पालन करूं। अगर मैं उस बात का पालन करूंगा तो मेरे परिवार को भी करना पड़ेगा। मेरे परिवार को करना पड़ेगा तो तुम्हें भी करना पड़ेगा। और अगर तुम्हें भी करना पड़ेगा तो तुम कभी भी 6:00 बजे के बाद नहीं उठ सकती।”

“ओह...पापा...आप तो मेरी बात को सीरियस ले गए।” आयशा ने अपना रंग बदलते हुए कहा “मैं तो बस मजाक कर रही थी। अब एक बेटी अपने पापा से मजाक भी नहीं कर सकती क्या। क्यों ममा, मैंने सही कहा या नहीं, क्या नहीं कर सकती क्या बेटी मजाक”

सरिता ने यह सुना तो वह दोनों की तरफ देखते हूए बोली “तुम दोनों ना मुझे अपने लफड़े में मत फंसाओ। जो भी है वह खुद सलटो। बातों में तो ऐसा है, ना मेरी बात तुम्हारे पापा मानते, ना तुम मानती”

“ले ममा।” आयशा ने अपना सीना फुला लिया “मैंने आपकी कौन सी बात नहीं मानी। अरे आप जो जो कहती हो वो मानती तो हुं। पता है आपकी वजह से तो मैंने अपनी स्कुली जिंदगी में कभी शरारत भी नहीं की। वरना बच्चे तो अपनी क्लासमेट के टिपन तक चुरा कर खा जाते थे।”

“तो यह बात तो तुम्हारे भले के लिए ही थी।” सरिता ने कहा “तुम्हें पता है ना हम दुनिया में रहने वाले आम इंसानों की तरह नहीं है। तुम्हारे पापा भी आश्रम से थे और मैं भी आश्रम से, वहां आश्रम में हमने जो भी कुछ सीखा उसकी वजह से पता नहीं हमारे शरीर में क्या कुछ हुआ, जिसका प्रभाव तुम पर देखने को मिला। तुम पैदा होते ही वह करने लगी थी जो हम अभी तक नहीं कर पाए।”

“मम्मा उसको डीएनए इवीलूशन कहते हैं। और आप लोग वहां कोई छोटी मोटी चीज नहीं करते थे, जादू करते थे, उसमें भी ब्लू एनर्जी का इस्तेमाल करते थे जिन्होंने शायद आपके डीएनए को इफेक्ट किया होगा। इसके बाद जब मैं आप लोगों के डीएनए की वजह से हुई तब उसका असर मुझ में भी आ गया।” यह कहकर आयशा ने अपने चेहरे पर एक अलग ही तरह की खुशी दिखाई और बोली “वैसे एक तरह से यह बात अच्छी है ना। मुझे आप लोगों की तरह बिना सीखे ही वो करना आता है जो आप लोगों को अभी तक नहीं आता।”

“अरे बस करो अब तुम दोनों।” विजेंद्र उन दोनों को टोकता हुआ बोला “खाना बेचारा पड़ा पड़ा तुम लोगों की बातें सुनकर मरने वाली हालत में पहुंच गया, अब इस पर भी रहम करो और खाओ इसे।”

यह सुनकर आयशा और सरिता दोनों ही शांत हो गए। आयशा ने सफेद रंग की प्लेट उठाई और उसमें खाना डाला। जबकि सरिता पहले ही खाना डाल चुकी थी। आयशा ने खाना डालकर उसका स्वाद चखा तो वह खांसते हुए बोली “ममा... यह आपने नमक इतना कम क्यों डाला है..”

उसके बोलते ही सरिता ने कहा “मैंने नमक कम नहीं डाला तुम्हारे ही टेस्ट करने वाले...वो... तुमने ही नाम लिया था पता नहीं क्या बोला था...”

“अरे मां मैंने बस टेस्ट हार्मोन बोला था। आप लोगों के डीएनए इवीलुशन के साइड इफेक्ट, जिसकी वजह से मैं कुछ चीजों के स्वाद को सेंस नहीं कर पाती। तब तक नहीं जब तक वह ज्यादा ना हो।”

इतना कहकर वह टेबल पर नमक की डब्बी तलाश करने की। इससे पहले वह नमक को ढूंढती सरिता ने कहा “नमक नहीं है यहां, किचन में पड़ा है जा कर ले आओ।”

यह सुनते ही आयशा ने अपने चेहरे को तिरछा किया और मां की तरफ देखने लगी। एक तरह से वह घूर रही थी। वो घुरते हूए बोली “आप लोगों से मिली अनोखी शक्तियों की मालिक होने के वाबजूद आपकी बेटी आयशा उठकर काम करेगी, कभी ना।” सरिता को बोलने के बाद आयशा ने किचन की तरफ देखा और धमकी वाले अंदाज में कहा “ऐ...नमक के डब्बे इधर आ।”

उसके ऐसा कहते ही अचानक किचन में मौजूद छोटे से नमक के डिब्बे में हलचल हुई और वह ऐसी हरकतें करने लगा जैसे वह एक जिंदा शख्सियत हो।

आयशा ने अपनी मां की तरफ देखा और धीमे शब्दों में कहा “आपको पता है ना... मैं किसी भी निर्जीव चीज को जिंदा कर सकती हूं...”

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