Saathi Ch. 2

साथी 2

Posted by Divya Verma • Sep 10, 2026 04:16 PM

ट्रेन

ये सब याद करते हुए एक कतरा आंसू उसकी आँख से बह जाता है। सोचते-सोचते कब उसकी आँख लग जाती है उसे पता ही नहीं चलता। कुछ देर बाद एक मीठी सी बांसुरी की धुन उसके कानों में पड़ने से उसकी नींद खुलती है।

बांसुरी की वो मीठी सी धुन हवा में घुलती चली आई। आरोही की आँखें खुलीं। उसका गला सूख रहा था। धुन अभी भी बज रही थी।

उसने अपने सामने की बर्थ पर एक 25 से 26 साल के लड़के को बैठे हुए देखा। उसका कद 6 फुट 5 इंच, उसके घुंघराले बाल कंधों तक आते थे। त्वचा गहरी साँवली, लेकिन उसमें अजीब-सी आभा थी। और उसकी आँखें... कमल की पंखुड़ियों जैसी काली, गहरी और शांत। पीले रंग का कुरता पहने, जो सूरज की रौशनी में दमक रहा था।

उसके माथे पर चंदन का तिलक था। और वो एक बांसुरी खरीद रहा था, जिसे खरीदते हुए वो उसे एक मीठी धुन में बजा रहा था। वृंदावन सारंग, वही राग जो आरोही के दिल के सबसे गहरे हिस्से को छूता था।

वो बस उसे देखती रह गई। अचानक उस लड़के ने उसकी ओर देखा। उनकी आंखें मिलीं। और एक पल के लिए सब थम गया।

वो मुस्कराया। बहुत हल्की-सी मुस्कान। जैसे वो उसके मन की बातें बिना कहे समझ गया हो। उस व्यक्ति ने आरोही की तरफ पानी की बोतल बढ़ते हुए कहा - "पानी?"

आरोही जानती थी — किसी अनजान से कुछ लेना समझदारी नहीं। लेकिन न जाने क्यों, उस लड़के को देखकर एक अजीब-सा भरोसा हुआ। उसने बिना कुछ पूछे पानी की बोतल ले ली।

लड़का अब भी मुस्कुरा रहा था। बोला -"हमारा नाम केशव है। आपका नाम क्या है?"

पानी पी लेने के बाद ही आरोही को एहसास हुआ कि शायद उसने कोई गलती की है। उसने बोतल तो ले ली, लेकिन नाम? नहीं, वह इतनी जल्दी भरोसा नहीं कर सकती।

उसने हल्की तीखी आवाज़ में कहा - "मैं तुम्हें अपना नाम क्यों बताऊँ? क्या पता तुम अच्छे इंसान न हो। तुम मुझे लूट सकते हो, चोर भी हो सकते हो!"

केशव उसकी मासूमियत भरी बातों पर हँस पड़ा - "तो जब भरोसा नहीं था, तब मुझसे पानी क्यों लिया?"

वो चुप हो गई। बात तो सही थी। थोड़ी देर चुप्पी के बाद उसने सिर झुका कर कहा - "मेरा नाम आरोही है।"

केशव ने फिर से वही मंद मुस्कान बिखेरी और बात बदलते हुए कहा - "आपको पता है, किसी बहुत प्रिय ने मुझे इतने प्रेम से पुकारा... कि आना ही पड़ा। रोज़ बातें करती थी मुझसे, पर कल... कल उसने कुछ ऐसा कहा, कि आज ही मिलने निकल पड़ा।"

उसकी बात सुनते ही एक क्षण को आरोही को लगा कि वो उसी की बात कर रहा है। पता नहीं क्यों... लेकिन उसके पास बैठना सुरक्षित लगा। जैसे कोई बहुत अपना हो। सुबह से जो बेचैनी दिल में थी, अब नहीं रही। अब बस एक शांति-सी थी उसके मन में।

आरोही ने धीमे स्वर में पूछा- "आप बांसुरी बजाते हैं?"

केशव ने बांसुरी को हाथों में घुमाया और मुस्कराकर कहा- "कभी-कभी... जब मन हो।"

फिर आरोही चुप हो जाती है और खिड़की के बाहर देखने लगती है। जब वो बहुत देर तक कुछ नहीं बोलती, तो केशव धीरे से कहता है,

"आप कुछ परेशान सी लग रही हैं... (फिर मुस्कुराकर समझाते हुए) चिंता मत कीजिए, जो होगा अच्छा ही होगा। आप केवल उस कार्य पर ध्यान दें जो आप करने जा रही हैं... और बाकी सब अपने माधव पर छोड़ दीजिए।"

आरोही को उसकी बात सुनकर बहुत अच्छा लगा, मानो यही सब तो वो सुनना चाहती थी। ये बातें उसके मन को वो शांति पहुँचा रही थीं, जो उसे या तो संगीत से मिलती थी या अपने माधव से बातें करके।

बाकी की पूरी यात्रा में वो दोनों ज़्यादा बात नहीं करते। इंदौर पहुँचते ही केशव मुस्कुराकर विदा लेता है और चला जाता है।

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इंदौर

इंदौर स्टेशन की भीड़ से बाहर निकलते ही आरोही को एक अजीब सन्नाटा महसूस हुआ — जैसे ये शहर भी उसके मन की तरह ही नए रिश्तों को परख रहा हो। सूटकेस का हैंडल थामे हुए वो कुछ देर वहीं खड़ी रही, जैसे खुद को समझा रही हो कि अब से यहीं रहना है।

सुबह-सुबह उसे संगीत शिक्षिका शारदा ताई का मैसेज आया था। आरोही के पापा ने उनसे पहले ही बात कर ली थी कि वो आरोही को संगीत सिखाएँ। जब ताई को उसके मम्मी-पापा की मृत्यु के बारे में पता चला, तबसे ही वो उसे अपने पास बुला रही थीं — ताकि उसका मन थोड़ा भटके और वो उस दुःख से उभर सके। पर उससे पहले ही उसके जीवन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। यह मैसेज मानो माधव का वह संकेत था, जिसकी वो प्रार्थना कर रही थी।

उसने सबसे पहले एक ऑटो लिया और सीधे अपनी शारदा ताई के घर पहुँची, जिनसे वो वर्षों पहले एक वर्कशॉप में मिली थी। ताई ने जब उसका पहला राग सुना था, तब ही कह दिया था, “तेरे गले में माँ सरस्वती का वास है, बच्ची।”

ताई का घर शांत था — पुराने ज़माने की इमारत, अंदर तुलसी का चौका, और दीवारों पर रागों के फ़्रेम किए हुए श्लोक।

“आ गई तू?” ताई ने अपनेपन से कहा और उसे गले लगाकर, उसका सिर अपने कंधे पर टिका लिया।

आरोही की आँखों में एक पल को नमी आई, लेकिन उसने मुस्कुरा दिया। ताई ने चाय बनाई और बैठकर उसकी बातें सुनीं।

ताई: "तू इस अंजान शहर में कहाँ रहेगी? मेरे साथ ही रह ले। वैसे भी तू यहाँ किसी को जानती नहीं है।"

आरोही पिछले दिनों से अकेली रही थी — बड़ों का सहारा छिन चुका था। ऐसे में अब किसी और के घर में सहज रहना उसके लिए कठिन था। ताई का स्नेह उसके लिए माँ जैसा था, लेकिन अब उसे खुद को संभालना सीखना था।

"नहीं ताई," — उसने विनम्रता से कहा — "ऐसे आपके घर रहना मुझे सही नहीं लगेगा। वैसे भी मैं इंदौर सुकून ढूँढने नहीं, कुछ बनने आई हूँ।"

ताई ने उसकी आँखों में देखा और समझ गईं — उसे इतना बड़ा धोखा मिला है कि अब किसी पर भरोसा करना उसके लिए आसान नहीं रह गया है। उन्होंने ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया। फिर एक कागज़ पर एक नाम और पता लिखते हुए बोलीं -"ये मेरी एक पुरानी छात्रा है, प्रीति। आजकल पास के मोहल्ले में रहती है। उसी के फ्लैट में एक कमरा खाली है । नीचे के फ़्लोर पर एक बुज़ुर्ग महिला रहती हैं, वही देखरेख करती हैं। तू वहीं रह ले कुछ दिन। संगीत के साथ-साथ लोग भी जान जाएगी।”

आरोही थोड़ा हिचकिचाते हुए बोली - “पर ताई, प्रीति... मतलब वो मुझे जानती भी नहीं...”

“हर इंसान को तो तू नहीं जान सकती न पहले से,” ताई ने प्यार से मुस्कुराते हुए कहा — "कभी न कभी तो किसी से पहली बार मिलना ही होता है। और रही बात प्रीति की, तो उससे मैं बात कर लूँगी।"

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अपार्टमेंट

घर पहुँचना मुश्किल नहीं था, लेकिन अंजान रास्ते उसे थोड़े अजनबी लग रहे थे। थर्ड फ्लोर पर एक सफेद दरवाज़ा था — उस पर छोटा सा नेमप्लेट: "Preeti G."

नर्वस होकर उसने बेल बजाई।

दरवाज़ा खुला — सामने खड़ी थी एक लड़की, कंधे तक आते बाल, गहरी आँखें, और सादी टीशर्ट में थोड़ी थकी हुई सी। उसने आरोही को ऊपर से नीचे तक देखा, फिर बिना कुछ बोले एक तरफ हट गई।

आरोही: "ताई ने भेजा है... मैं आरोही हूँ..."

प्रीति (थोड़े सपाट स्वर में): "पता है," — फिर कमरे की ओर इशारा किया — "सामान अंदर रख दो। बाथरूम उधर है। बेसिक चीज़ें वहाँ हैं। मैं ज़्यादा बात करना पसंद नहीं करती।"

आरोही थोड़ी चौंकी, लेकिन मुस्कुरा दी। प्रीति पहली बार उसे देखकर थोड़ी रुकी, लेकिन बिना कुछ कहे रसोई की ओर चली गई।

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कमरा सादा था — दीवार पर कोई सजावट नहीं, एक पुराना सा वुडन स्टडी टेबल, एक सिंगल बेड, और एक खिड़की जो बाहर एक अमरूद के पेड़ की ओर खुलती थी।

आरोही ने अपनी छोटी सी राधाकृष्ण की मूर्ति खिड़की के पास रख दी। एक हल्की सी हवा अंदर आई, जैसे उसका स्वागत कर रही हो।

उसने धीरे से बेड पर बैठकर आँखें बंद कीं — और कुछ नहीं सोचा, बस सुनती रही उस खामोशी को, जो अब तक उसे काटती थी, लेकिन आज थोड़ी अपनी सी लग रही थी।

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रात को, जब प्रीति रसोई में दाल पका रही थी, तो आरोही ने धीरे से कहा, “काफ़ी सलीके से रसोई रखी है तुमने। मेरी मम्मी भी सब कुछ बहुत सलीके से रखा करती थीं।”

प्रीति कुछ देर चुप रही। फिर धीमे से बोली, "यहाँ सब खुद करना पड़ता है, तो धीरे-धीरे आदत हो गई।"

उसने फिर से ध्यान अपने खाना बनाने पर लगा लिया। आरोही ने भी ज़्यादा बात न करते हुए उसकी हेल्प कर दी। दोनों ने साथ में खाना खाया और फिर अपने-अपने कमरे में जाकर सो गईं।

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कौन है केशव, जो आरोही को इतना सुकून दे गया?

अब क्या करेगी आरोही इस अंजान शहर में?

क्या प्रीति का ये रूखा व्यवहार कभी बदलेगा आरोही के लिए?

जानने के लिए पढ़ते रहिए ✨ साथी✨।

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