Three devil's dark desire - Chapter 2
Episode 2 — रात का सफर
रात के करीब ग्यारह बज चुके थे।
मुंबई एयरपोर्ट की चमकती रोशनी के बीच एशाना अपने छोटे से ट्रॉली बैग के साथ तेज कदमों से आगे बढ़ रही थी। उसके चेहरे पर इस बार कोई excitement नहीं थी। दिमाग में सिर्फ दादी का चेहरा घूम रहा था।
मां की रोती हुई आवाज बार-बार उसके कानों में गूंज रही थी—
“बेटा, तेरी दादी तुझे देखना चाहती हैं।”
एशाना ने मन ही मन कहा—
“दादी, मैं आ रही हूं… बस आप मेरा इंतजार करना।”
कुछ देर बाद उसकी फ्लाइट उड़ान भर चुकी थी।
खिड़की के पास बैठी एशाना नीचे चमकते मुंबई शहर को देखती रही। इतनी रोशनी, इतनी भीड़ और इतनी तेज जिंदगी… और अब वह एक ऐसे गांव जा रही थी जहां रात होते ही शायद पूरी दुनिया शांत हो जाती होगी।
उसने फोन निकाला और मां को मैसेज किया—
“मां, फ्लाइट उड़ गई है। सुबह तक पहुंच जाऊंगी। दादी को मेरा इंतजार करने बोलना।”
कुछ ही सेकंड बाद मां का जवाब आया—
“जल्दी आ बेटा… दादी बार-बार तेरा नाम ले रही हैं।”
एशाना की आंखें नम हो गईं।
उसने फोन बंद किया और सीट से सिर टिकाकर आंखें बंद कर लीं।
कई घंटों के सफर के बाद फ्लाइट हिमाचल के एयरपोर्ट पर उतरी।
सुबह की ठंडी हवा ने जैसे ही एशाना को छुआ, उसने अपना जैकेट ठीक किया।
“मुंबई से बिल्कुल अलग…”
एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही उसके पिता का ड्राइवर उसे लेने खड़ा था।
“मैडम, साहब ने गाड़ी भेजी है।”
“पापा खुद नहीं आए?”
“साहब गांव में आपका इंतजार कर रहे हैं। दादी की तबीयत की वजह से घर से निकल नहीं पाए।”
एशाना ने बिना कुछ पूछे गाड़ी में बैठते हुए कहा—
“बस जल्दी चलिए।”
शहर की सड़कें पीछे छूटने लगीं।
कुछ घंटों बाद रास्ता संकरा होने लगा। मोबाइल में पहले चार लाइन नेटवर्क था… फिर दो… फिर एक…
और आखिर में स्क्रीन पर फिर वही लिखा आया—
No Service.
एशाना ने परेशान होकर फोन बैग में रख दिया।
“यहां तो नेटवर्क भी छुट्टी पर
”
सुबह के करीब दस बज रहे थे।
मुंबई की चमकती हुई सड़कों की आदी एशाना अब पहाड़ों के बीच एक ऐसी सड़क पर थी, जहां दूर-दूर तक सिर्फ हरियाली, ऊंचे देवदार के पेड़ और बादलों से ढकी पहाड़ियां दिखाई दे रही थीं।
कार की खिड़की से बाहर देखते हुए उसने लंबी सांस ली।
“मां ने भी क्या जगह चुनी है…”
उसने अपना फोन उठाया और नेटवर्क देखने लगी।
स्क्रीन पर सिर्फ एक शब्द दिखाई दे रहा था—
No Service.
एशाना ने परेशान होकर फोन ऊपर किया।
“Seriously?”
उसने खिड़की के पास फोन ले जाकर देखा।
एक पल के लिए एक लाइन आई।
फिर गायब।
“ये कैसा नेटवर्क है!”
ड्राइवर ने हंसते हुए कहा—
“मैडम, यहां नेटवर्क को ढूंढना पड़ता है।”
एशाना ने उसे घूरकर देखा।
“मुझे लगता है नेटवर्क को नहीं, मुझे यहां से वापस जाने का रास्ता ढूंढना पड़ेगा।”
ड्राइवर हंस पड़ा।
लेकिन कुछ ही मिनट बाद कार अचानक रुक गई।
एशाना आगे झुक गई।
“क्या हुआ?”
ड्राइवर नीचे उतरकर कार देखने लगा।
“मैडम, शायद टायर में प्रॉब्लम है।”
एशाना ने खिड़की से बाहर देखा।
सामने लंबी पहाड़ी सड़क थी।
एक तरफ पहाड़ और दूसरी तरफ गहरी ढलान के पार घना जंगल।
उसने तुरंत फोन निकाला।
फिर वही—
No Network.
“Great…”
वह कार से बाहर निकल आई।
हवा उसके बालों को उड़ा रही थी।
शहर में जहां हर कुछ कदम पर कोई न कोई दुकान, कैफे या बिल्डिंग दिखाई देती थी, यहां कई किलोमीटर तक इंसान नजर नहीं आ रहा था।
एशाना ने आसपास देखा।
“मां ने मुझे सच में ऐसी जगह भेज दिया…”
वह थोड़ी दूर तक चलकर सड़क के किनारे खड़ी हो गई।
तभी दूर से किसी गाड़ी के इंजन की आवाज सुनाई दी।
पहले आवाज धीमी थी।
फिर धीरे-धीरे तेज होती गई।
कुछ ही सेकंड बाद एक ब्लैक SUV मोड़ काटते हुए सामने आकर रुकी।
गाड़ी के शीशे काले थे।
एशाना ने अनजान गाड़ी को देखकर एक कदम पीछे किया।
SUV का दरवाजा खुला।
और उसमें से एक लंबा, बेहद शांत लेकिन intimidating personality वाला आदमी बाहर आया।
ब्लैक शर्ट, डार्क जैकेट और चेहरे पर ऐसा expression जैसे उसे दुनिया की किसी चीज से फर्क नहीं पड़ता।
वह था—
दानिश।
उसने पहले खराब खड़ी कार को देखा।
फिर उसकी नजर एशाना पर जाकर रुक गई।
कुछ सेकंड के लिए वह बिल्कुल शांत रह गया।
उसने शहर में खूबसूरत लड़कियां बहुत देखी थीं।
लेकिन पहाड़ों के इस सुनसान रास्ते पर खड़ी यह लड़की…
उसके लिए unexpected थी।
एशाना के खुले बाल हवा में उड़ रहे थे और उसकी आंखों में साफ झुंझलाहट दिखाई दे रही थी।
दानिश ने अपनी नजरें हटाईं और ड्राइवर की तरफ देखा।
“Problem?”
ड्राइवर ने कहा—
“सर, टायर पंचर हो गया है।”
दानिश ने सिर हिलाया।
फिर उसकी नजर एशाना पर गई।
“आप यहां अकेली हैं?”
एशाना ने तुरंत जवाब दिया—
“अकेली नहीं हूं। ड्राइवर है।”
दानिश के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
“लेकिन फोन में नेटवर्क नहीं है।”
एशाना ने उसे देखा।
“आपको कैसे पता?”
दानिश ने उसके हाथ में पकड़े फोन की तरफ इशारा किया।
“क्योंकि आप पिछले पांच मिनट से उसे ऐसे देख रही हैं जैसे वो अभी खुद चलकर नेटवर्क ढूंढ लेगा।”
एशाना ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“आप हमेशा अजनबियों से ऐसे बात करते हैं?”
“नहीं।”
“तो?”
“सिर्फ उनसे जो पहाड़ पर आकर नेटवर्क से लड़ रहे हों।”
एशाना चाहकर भी हल्का-सा मुस्कुरा दी।
दानिश ने अपने ड्राइवर को इशारा किया।
“इनकी कार ठीक करवाओ।”
ड्राइवर ने तुरंत कहा—
“Yes, sir.”
एशाना ने उसकी तरफ देखा।
“Thank you, लेकिन इसकी जरूरत नहीं है।”
दानिश ने शांत आवाज में कहा—
“यहां आपकी कार ठीक होने में वक्त लगेगा।”
“मैं इंतजार कर लूंगी।”
एशाना की बात सुनकर दानिश ने कुछ पल उसे देखा, फिर गंभीर आवाज में बोला—
“इतना attitude मत दिखाइए। कम से कम इतना तो बता दीजिए कि आप किस गांव से हैं और आपको जाना कहां है?”
एशाना ने सहजता से जवाब दिया—
“मुझे देवदारघाट गांव जाना है। मेरे पापा समर प्रताप वहीं रहते हैं।”
नाम सुनते ही दानिश का चेहरा अचानक बदल गया।
उसकी आंखों में गुस्सा उतर आया।
हाथ अनजाने में मुट्ठी में बंध गए।
समर प्रताप!
दानिश ने दांत भींचते हुए खुद से कहा—
“तो तुम... समर प्रताप की बेटी हो?”
एशाना उसकी बदली हुई आवाज सुनकर हैरान रह गई।
उसे बिल्कुल समझ नहीं आया कि उसके पिता का नाम सुनते ही दानिश का गुस्सा आसमान पर क्यों पहुंच गया।
“
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