crowns of shadows Ch. 1

crowns of shadows - Chapter 1

Posted by Ishra Aalam • Aug 25, 2026 11:41 AM

नयी कहानी ---

अब रात के सन्नाटे में शहर की चमचमाती इमारतों के बीच खड़ी F&D Group की गगनचुंबी इमारत किसी विशाल किले से कम नहीं लग रही थी।

कांच के आलीशान झूमरों की रोशनी में नहाया F&D ग्रुप का वो साठ मंज़िला हेड ऑफिस रात के बारह बजे भी एक शांत मगर काम में डूबे हुए विशालकाय ड्रैगन की तरह चमक रहा था।

बाहर ठंडी हवा के झोंके सड़क पर गिरे सूखे पत्तों को उड़ा रहे थे, इमारत की ऊपरी मंजिलों की अधिकांश लाइटें कब की बुझ चुकी थीं, लेकिन सबसे ऊपर की कुछ मंजिलों में अब भी रोशनी जल रही थी।

उनमें से एक मंजिल पर पिछले कई घंटों से लगातार काम चल रहा था। और अब जाकर उस मंजिल की लिफ्ट ने नीचे आकर अपने दरवाजे खोले। लिफ्ट से सबसे पहले एक लड़की बाहर निकली।

काले रंग का बेहतरीन तरीके से सिलवाया हुआ पैंटसूट, हाथ में महंगी घड़ी, दूसरे हाथ में लैपटॉप और चेहरे पर ऐसा भाव जैसे आधी रात को भी दुनिया का सबसे मुश्किल फैसला लेना उसके लिए कोई बड़ी बात न हो। मीरा सावंत। पच्चीस साल की उम्र।

F&D Group की चेयरवुमन। और उस वक्त देश के सबसे तेजी से बढ़ते बिजनेस ग्रुप्स में से एक की पूरी जिम्मेदारी उसके कंधों पर थी। जिसकी एक हल्की सी आहट ही कॉर्पोरेट जगत के बड़े-बड़े दिग्गजों के पसीने छुड़ाने के लिए काफी थी।

उसकी तीन इंच की ऊंची हील्स की टक-टक आवाज उस सन्नाटे को बड़ी खूबसूरती से चीर रही थी। मीरा के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी, ना ही चेहरे पर दिन भर की अठारह घंटे की कड़ी मशक्कत की कोई थकान। उसकी आंखों में वो तीखा आत्मविश्वास और रोब था जो विरासत में नहीं, बल्कि अपनी काबिलियत से हासिल किया जाता है।

उसके कदम तेज थे, लेकिन उनमें जल्दबाजी नहीं थी। उसकी चाल में वह आत्मविश्वास था जो किसी पद या पैसे से नहीं, बल्कि अपनी काबिलियत पर यकीन होने से आता है। उसके पीछे रागिनी चल रही थी।

बत्तीस साल की रागिनी, मीरा की सेक्रेटरी होने के साथ-साथ उन बेहद कम लोगों में से एक थी, जिन पर मीरा बिना दो बार सोचे भरोसा कर सकती थी। समझदार, तेज और जरूरत पड़ने पर मीरा से भी ज्यादा सख्त।

उसके ठीक पीछे अमन था। उम्र अभी कम थी, लेकिन दिमाग इतना तेज कि F&D Group के बड़े-बड़े अधिकारियों को कई बार उससे बात करते हुए अपनी बात दो बार सोचनी पड़ती थी।

और सबसे पीछे मैनेजर मनोज था, जो हाथ में कुछ फाइलें लिए तेज कदमों से उनके साथ चल रहा था। मीरा ने चलते-चलते अपनी बाईं कलाई को थोड़ा सा मोड़कर रोज़-गोल्ड घड़ी में देखा।

सुइयां ठीक बारह बजकर दो मिनट का इशारा कर रही थीं। (12:02 AM) आने वाला नया प्रोजेक्ट F&D ग्रुप को एशिया के सबसे बड़े बिजनेस हाउसेस की कतार में ला खड़ा करने वाला था, और यही वजह थी कि पिछले कई हफ्तों से मीरा के लिए दिन और रात का फर्क मिट चुका था।

उसकी भौंहें हल्की-सी सिकुड़ीं। रागिनी ने उसके साथ कदम मिलाते हुए कहा।

“मैम, आप घर जाकर आराम कर लीजिए। बाकी काम हम लोग सुबह देख लेंगे।”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“सुबह तक इंतजार करने की जरूरत नहीं है।”

जब मेन ऑटोमैटिक ग्लास डोर बड़ी खामोशी से दो तरफ सरक गए। और उसी पल वहां से बाहर निकली मीरा।‌ उसके कदम बाहर खड़ी चमचमाती काली लक्जरी सेडान कार की तरफ बढ़ रहे थे। बिना रुके, अपनी सख्त और बुलंद आवाज में मीरा ने रागिनी की तरफ देखे बिना कहा,

"सारे पेपर्स कल तक तैयार करवा देना रागिनी, मैं चाहती हूं जल्द से जल्द इस प्रोजेक्ट पर ज़मीनी काम शुरू हो जाए। किसी भी तरह की देरी मुझे इस डील में बर्दाश्त नहीं होगी।"

रागिनी समझ गई कि इस बातचीत का कोई फायदा नहीं। मीरा की नजरें सामने पार्किंग एरिया में खड़ी अपनी कार पर चली गईं।

उसकी काली लग्जरी कार हमेशा की तरह वहीं खड़ी थी और ड्राइवर उसके आने का इंतजार कर रहा था। मीरा ने चलते-चलते कहा,

“सारे पेपर्स कल तक तैयार करवा कर एक बार चैक कर लेना कोई ग़लती नही होनी चाहिए। मैं चाहती हूं जल्द से जल्द इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो जाए।”

रागिनी ने तुरंत अपनी फाइल को सीने से सटाया और बेहद संजीदगी से जवाब दिया,

"जी मैम, निश्चिंत रहिए, कल सुबह आपकी टेबल पर फाइनल पेपर्स साइन होने के लिए तैयार मिलेंगे।"

मीरा ने बस अपनी गर्दन को हल्का सा एक बार हिलाया और कहा,

"बेहतर।"

इतने में मैनेजर मनोज ने फुर्ती से आगे बढ़कर कार का पिछला दरवाजा पूरी इज्जत के साथ खोल दिया। मीरा बिना एक पल गंवाए कार की पिछली लेदर सीट पर बैठ गई। दरवाजा बंद होते ही बाहर का सारा सन्नाटा और हवा का शोर कार के साउंडप्रूफ केबिन के बाहर ही छूट गया। रागिनी, अमन और मनोज वहीं खड़े उसे जाते हुए देखते रहे।

कार ने धीरे से अपनी रफ्तार पकड़ी और हेड ऑफिस के विशालकाय गेट से बाहर निकलकर शहर की मुख्य सड़क की तरफ बढ़ गई। मीरा ने अपनी आदत के मुताबिक तुरंत अपने हैंडबैग से फोन निकाला और अगले दिन की मीटिंग्स और कुछ पेंडिंग ई-मेल्स को चेक करना शुरू कर दिया।

तीन नए ईमेल। दो जरूरी अप्रूवल। एक विदेशी कंपनी के साथ कॉन्ट्रैक्ट। और उसी नए प्रोजेक्ट से जुड़ी कुछ फाइलें, जिस पर वह पिछले कई दिनों से लगातार काम कर रही थी। कार के अंदर की मद्धम रोशनी में फोन की स्क्रीन का उजाला उसके सख्त चेहरे पर पड़ रहा था।

गाड़ी बहुत ही स्मूथ चल रही थी, कार शहर की सड़कों पर आगे बढ़ रही थी। रात काफी हो चुकी थी, इसलिए सड़कें लगभग खाली थीं। मीरा पूरी तरह अपने फोन में व्यस्त थी।

तभी अचानक उसकी नजर सामने लगी कार की स्क्रीन पर पड़ी।

उसने स्क्रीन से नजर हटाकर ड्राइवर को देखा। सिर्फ एक पल के लिए। लेकिन तभी अचानक कार के गियर बदलने के झटके और स्टीयरिंग व्हील पर घूमती उंगलियों पर मीरा की पैनी नज़र अनायास ही चली गई।

फिर उसकी नजर ड्राइवर के हाथों पर टिक गई। मीरा की आंखें थोड़ी सिकुड़ीं। ये हाथ... उसने फिर गौर से देखा। उंगलियों पर कोई झुर्रियां नहीं थीं। कलाई मजबूत और जवान थी। ड्राइवर के हाथ किसी उम्रदराज आदमी के नहीं थे। उसका असली ड्राइवर लगभग साठ साल का था।

मीरा का ड्राइवर जगन्नाथ पिछले बीस सालों से इस परिवार की गाड़ियां चला रहा था। एक उम्रदराज आदमी जिसके हाथों पर झुर्रियां, ढीली पड़ी चमड़ी और हमेशा सफारी सूट का तयशुदा अंदाज होता था। लेकिन इस वक्त गियर लीवर पर जो हाथ था, वो किसी युवा का था। ये हाथ...

किसी पच्चीस-तीस साल के आदमी के थे।

गठीली उंगलियां, सख्त चमड़ी और कलाई पर बना एक अजीब सा धुंधला टैटू। मीरा की भौंहें तुरंत तन गईं। उसने बहुत ही शांति से अपनी पलकें ऊपर उठाईं और कार के रियर-व्यू मिरर में देखने की कोशिश की, लेकिन ड्राइवर ने चेहरे पर गहरा काला सर्जिकल मास्क लगा रखा था और सर पर बेसबॉल कैप नीचे की तरफ झुका रखी थी, जिससे उसका चेहरा लगभग पूरी तरह छुपा हुआ था।

मीरा के दिमाग के घोड़े बहुत तेजी से दौड़ने लगे। वह समझ गई कि यह कोई मामूली लापरवाही नहीं, बल्कि एक सुनियोजित चाल थी। जगन्नाथ कहां था और यह अजनबी उसकी कार में कैसे आया, इन सवालों से ज्यादा जरूरी इस वक्त अपनी जान बचाना था।

मीरा कुछ सेकंड तक उसे देखती रही।

फिर उसकी नजर खिड़की के बाहर चली गई। सड़क बदल चुकी थी। वह रास्ता उसके घर की तरफ नहीं जा रहा था। उसके चेहरे पर कोई घबराहट नहीं आई। बस उसकी आंखों की चमक बदल गई। कोई उसे अगवा करने की कोशिश कर रहा था।

उसने चेहरे पर शिकन का एक भी भाव नहीं आने दिया। अपने घबराहट को पूरी तरह से दबाते हुए, उसने बेहद खामोशी से फोन पर अपनी उंगलियां चलाईं और रागिनी को अपनी मौजूदा लाइव लोकेशन के साथ एक शॉर्ट इमरजेंसी कोड मैसेज टाइप करके भेज दिया:

'ड्राइवर बदला हुआ है। खतरा है। तुरंत पुलिस और सिक्योरिटी भेजो।'

मैसेज सेंड करने के ठीक बाद मीरा ने शीशे से बाहर देखा। कार उस रास्ते पर नहीं थी जो उसके आलीशान बंगले की तरफ जाता था, बल्कि ड्राइवर ने बहुत ही चालाकी से गाड़ी को हाईवे की तरफ जाने वाले एक सुनसान और निर्माणाधीन रास्ते पर मोड़ दिया था।

शहर की लाइटें अब पीछे छूट रही थीं और चारों तरफ घना अंधेरा पसरने लगा था। ड्राइवर को लगा कि मीरा फोन में व्यस्त है और उसे कुछ पता नहीं चल रहा।

मीरा ने अपना फोन धीरे से वापस अपने लेदर हैंडबैग में डाला, बैग की बेल्ट को अपनी उंगलियों में कसकर जकड़ा और बेहद ठंडे मगर कड़क लहजे में कहा,

"सुनो!"

ड्राइवर ने कोई जवाब नहीं दिया। मीरा ने दोबारा कहा,

“सुनो!”

ड्राइवर ने जैसे ही मीरा की आवाज सुनकर हल्का सा अपना चेहरा पीछे की तरफ घुमाया, मीरा ने एक सेकंड का भी वक्त नहीं गंवाया। उसने अपनी पूरी ताकत जमा की और अपनी दाहिनी टांग को उठाकर अपनी हील्स का नुकीला कोना सीधे उस आदमी की नाक पर दे मारा। प्रहार इतना अचानक और सटीक था कि हील सीधे मास्क को फाड़ती हुई उसकी नाक की हड्डी से टकराई। एक ज़ोरदार चीख के साथ ड्राइवर का संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया।

उसके हाथों से स्टीयरिंग व्हील छूट गया और कार लहराती हुई सड़क के किनारे बने एक डिवाइडर से टकराते-टकराते बची। घबराहट में उस आदमी ने जोर से इमरजेंसी ब्रेक दबा दिए, जिससे कार एक दर्दनाक चरमराहट के साथ रुक गई।

कार के रुकते ही मीरा ने एक पल की भी देरी किए बिना दरवाजा खोला और बाहर की तरफ छलांग लगा दी। लेकिन वह आदमी भले ही दर्द से कराह रहा था, पर वो बेहद अलर्ट था। जैसे ही मीरा कार से बाहर निकलने लगी, उस आदमी ने पीछे मुड़कर मीरा की कलाई को अपनी लोहे जैसी सख्त ग्रिप में दबोच लिया। वह गुर्राया।

"कमीनी! कहां भाग रही है!"

मीरा ने बिना डरे अपने दूसरे हाथ में पकड़े भारी लेदर हैंडबैग को पूरी ताकत से घुमाकर उस हमलावर के चेहरे पर दे मारा।

“छोड़ो!”

बैग की धातु की ज़िप और उसकी सिलाई सीधे उसके माथे पर लगी, जिससे उसकी पकड़ कुछ ढीली पड़ी।

मीरा ने झटका देकर अपना हाथ छुड़ाया और अंधेरी सड़क की तरफ पूरी ताकत से भाग खड़ी हुई। उसकी तीन इंच की हील्स सुनसान सड़क पर बदहवास खटखटा रही थीं। पीछे से वह आदमी भी कार से निकल आया।

“रुक!”

मीरा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह जितनी तेजी से दौड़ सकती थी, दौड़ती रही।वह अपनी जान बचाने के लिए भाग रही थी, लेकिन पीछे से उस आदमी के गाली बकने और भारी जूतों की तेज आहट साफ सुनाई दे रही थी।

वह आदमी कद-काठी में लंबा और काफी तेज़ था। मीरा का दिल सीने में धौंकनी की तरह धड़क रहा था, हवा उसकी सांसों को उखाड़ रही थी।

लेकिन सामने की सड़क अब पूरी तरह सुनसान थी। न कोई दुकान। न कोई गाड़ी।

न कोई इंसान। उसने पीछे से आती कदमों की आवाज सुनी। वह आदमी करीब आ रहा था। मीरा ने अपनी गति और बढ़ाने की कोशिश की।

तभी एक अनहोनी हुई। सड़क पर पड़े एक छोटे से गड्ढे में मीरा की हील फंसी और मुड़ गई। उसका संतुलन बिगड़ा। एक तीखे दर्द की लहर उसके पैर से उठी और मीरा सीधे पक्की सड़क पर जा गिरी।

“आह!”

उसके घुटने और हथेलियां सड़क की गिट्टियों से छिल गईं। उसने तुरंत पलटने और उठकर खड़े होने की कोशिश की, लेकिन पैर की मोच की वजह से वह दोबारा गिर पड़ी।

कुछ सेकंड के लिए उसकी सांस रुक-सी गई। उसने फिर से तुरंत उठने की कोशिश की। लेकिन टखने में तेज दर्द उठा। वह फिर गिर पड़ी। तभी पीछे से आते कदमों की आवाज रुक गई। वह आदमी उसके सामने खड़ा था। मीरा ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

वह आदमी उसे देखकर मुस्कुरा रहा था।

वह मुस्कान किसी इंसान की नहीं, बल्कि किसी शिकारी की थी जिसने अपने शिकार को आखिरकार पकड़ लिया हो। मीरा पहली बार डरी। बहुत ज्यादा नहीं। लेकिन इतनी कि उसकी सांसें तेज हो गईं।

उसने चारों तरफ देखा। वहां कोई नहीं था।

उसने पीछे हटने की कोशिश की। लेकिन वह आदमी उसके करीब आता गया।

“बहुत भाग लिया।”

उसने अपना हाथ उठाया। मीरा ने जमीन पर हाथ टिकाकर खुद को पीछे खींचा। लेकिन पीछे जाने की कोई जगह नहीं थी।

तब तक वो हमलावर उसके बिल्कुल करीब पहुंच चुका था। उसकी नाक से खून बह रहा था और उसकी आंखों में वहशीपन भरा गुस्सा था।

"बहुत भागने का शौक है न तुझे? आज तेरा सारा घमंड और तेरी ये चेयरवूमन गिरी को, यही इसी सड़क पर गाड़ दूंगा!"

वह अपनी भद्दी, घिनौनी मुस्कान के साथ मीरा की तरफ बढ़ा। मीरा अपनी छिली हुई हथेलियों के बल पीछे खिसकने लगी। आसपास दूर-दूर तक सिर्फ अंधेरा और सन्नाटा था। कोई गाड़ी, कोई इंसान, दूर-दूर तक मदद की कोई उम्मीद नहीं थी।

मीरा के दिमाग में पहली बार मौत का एक खौफनाक साया लहराया। उस आदमी ने अपनी कमर से एक धारदार चाकू निकाला और मीरा के सीने पर हमला करने के लिए अपना हाथ पूरा ऊपर उठाया। मीरा के पास अब बचने का कोई रास्ता नहीं बचा था।

मजबूरी और बेबसी में उसने अपनी आंखें कसकर बंद कर लीं और अपनी आने वाली मौत का इंतजार करने लगी।

लेकिन हवा में गूंजने वाली उस चीख या वार के बजाय, एक खामोश सन्नाटा छा गया।

जब दो सेकंड तक कुछ नहीं हुआ, तो मीरा ने बहुत धीरे से अपनी पलकें उठाईं। सामने का नज़ारा देखकर उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं।

हमलावर का उठा हुआ हाथ हवा में ही जमा हुआ था, और उसकी कलाई को एक मजबूत, चौड़े हाथ ने इतनी सख्ती से जकड़ रखा था कि उस गुंडे की उंगलियों से चाकू अपने आप छूटकर ज़मीन पर जा गिरा।

और फिर एक ही पल में, उस अजनबी ने बिना कोई खास ताकत लगाए, बस एक मामूली से झटके के साथ उस नब्बे किलो के भारी-भरकम गुंडे को हवा में उछाला और ज़मीन पर इस तरह दे पटका जैसे कोई गंदा कपड़ा पटकता है।

एक हड्डियों के टूटने की भयानक आवाज आई और वह हमलावर ज़मीन पर पड़ा दर्द से बिलबिलाने लगा। मीरा ने हैरान होकर ऊपर देखा। उसकी रक्षा करने वाला वह आदमी बड़े आराम से, अपने दोनों हाथ अपनी कार्गो पैंट की जेबों में डाले खड़ा था।

उसके चेहरे पर अजीब-सी बेफिक्री थी।

जैसे उसने अभी किसी इंसान को उठाकर सड़क पर नहीं पटका हो, बल्कि रास्ते से कोई बेकार सामान हटाया हो।

हल्की चांदनी में मीरा को उसका प्रोफाइल दिख रहा था। एक लंबा, चौड़ा, बेहद एथलेटिक शरीर वाला इंसान, जिसके चेहरे पर कोई खौफ नहीं था। उसने बड़े कूल अंदाज में ज़मीन पर तड़पते हुए उस गुंडे को देखा, जैसे उसने अभी-अभी कोई बहुत ही मामूली सा काम निपटाया हो।

वह आदमी कोई और नहीं, बल्कि अपनी ही धुन में रहने वाला, बेफिक्र आर्मी अफसर, मोक्ष अग्निहोत्री था।

आगे जानने के लिए बने रहीए ✨ 🙂

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By ishra zafar aalam....

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