दिल दहला देने वाली भूतिया कहानियां Ch. 2

टोना टोटका भाग-2

Posted by Mamta Meena • Aug 22, 2026 04:35 PM

अब मेरे और मेरी सास के समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर बात क्या हुई है जो वीर ऐसा बोल रहा है। उस रात किसी ने भी खाना नहीं खाया था। घर में एक तरह का क्लेश जो हो गया था, अपने कमरे में रोते हुए ही मैं सो गई थी। आज वीर मेरे पास कमरे में ना सोकर गेस्ट रूम में सो गया था। यह जो कुछ हो रहा था, इन सब के बारे में सोचते हुए ही मुझे नींद आ गई थी कि तभी आधी रात का वक्त था कि मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे कमरे में बहुत सारे बच्चे भाग रहे हैं। यह महसूस होते ही हड़बड़ाते हुए मेरी नींद खुल गई।

मैंने देखा अब कुछ भी नजर नहीं आ रहा था, लेकिन तभी फिर से आंखें बंद कीं, तो फिर से मुझे किसी औरत की रोने की जोर-जोर से आवाज सुनाई देने लगी। फिर घबराते हुए मैंने आंखें खोलकर देखा, तो मुझे ऐसा लगने लगा कि कोई मेरे कमरे के बाहर घूम रहा है। यह महसूस होते ही मैंने जल्दी से उठकर बाहर जाकर देखा, लेकिन वहां पर भी मुझे कोई नजर नहीं आया। यह देखकर कौन हो सकता है, शायद ऐसे ही मन का भ्रम होगा, यह सोचकर मैं फिर से आकर अपने कमरे में सो गई थी।

तभी मुझे ऐसा लगा जैसे कोई बड़ी ही भयानक आवाज में रो रहा है, जैसे कोई मातम भरी आवाज हो, कोई आदमी था। यह सुनकर हड़बड़ाते हुए फिर से मेरी नींद खुल गई, लेकिन अब कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था। आखिर यह मेरे साथ क्या हो रहा है, मुझे यह अजीब सी आवाजें ही क्यों सुनाई दे रही हैं? शायद मेरे मन का भ्रम है, आज मैं कुछ ज्यादा ही परेशान हूं, इसलिए यह सोचकर मैं इन बातों को नजरअंदाज कर दिया और सो गई।

अगले दिन फिर से वीर का व्यवहार इसी तरह का था। वह ना तो मुझसे ना अपनी मां से किसी तरह की कोई बातें नहीं कर रहा था। शायद वीर किसी प्रॉब्लम में है, जिस वजह से यह सब कुछ कर रहा है, यह सोचकर मैंने उसके दोस्त अनिकेत से भी इस बारे में बातें कीं, जिसे वह अपनी हर बात बताया करता था। वहां से भी ऐसा कुछ पता नहीं चला, जिससे लगे कि वीर किसी प्रॉब्लम में है। शायद ऑफिस के अपने काम की वजह से ज्यादा टेंशन में है, यह सोचकर मैंने वीर के साथ कुछ दिन बाहर जाने के बारे में सोचा। वैसे भी शादी के बाद हम कहीं हनीमून के लिए नहीं गए थे।

घर आकर मैं वीर से इस बारे में बातें कीं, तो वह गुस्से में मुझ पर चिल्लाने लगा, चीखने लगा था। उसकी आवाज सुनकर मेरी सासू मां भी हमारे पास आ गई थी। यह देखकर कुछ सोचकर तभी मेरी सासू मां गुस्से को शांत करवाते हुए बोली, "चलो मंदिर में भगवान जी की पूजा आरती करते हैं।" लेकिन वीर जो हमेशा पूजा-पाठ में ज्यादा ध्यान लगाता था, वह अजीब सी बेचैनी के साथ बोला, "नहीं, मुझे कहीं नहीं जाना।" यह सुनकर मेरी सासू मां बोली, "आखिर भगवान से भी कैसी नाराजगी? चलो ना।"

लेकिन उसने कहीं भी जाने से साफ इनकार कर दिया और अपने कमरे में चला गया। अब मैं और मेरी सासू मां दोनों ने ही साथ में आरती की। उस रात मेरी सासू मां और मैंने मिलकर खाना बनाया। वीर को जब उसकी मां ने खाना खाने के लिए बुलाया, तो वह उस खाने को देखकर अजीब तरीके से चिल्लाने लगा और कहने लगा, "मुझे चिकन खाना है।" यह सुनकर हम लोग हैरानी से एक दूसरे की तरफ देखने लगे, क्योंकि जहां तक मुझे पता था वीर वेजिटेरियन था, वह चिकन नहीं खाता था। शायद मुझसे मिलने से पहले खाता होगा, लेकिन उसकी मां भी यह देखकर हैरान थी।

वह बोली, "बेटा, तुम तो वेजिटेरियन हो और तुम्हें तो नॉनवेज के नाम से ही नफरत थी, तो फिर चिकन क्यों?" लेकिन वह गुस्से में था, मैं चिल्लाते हुए भयानक आवाज में बार-बार एक ही बात बोला, "मुझे बस चिकन चाहिए, चिकन चाहिए, चिकन चाहिए।" यह सुनकर हम कुछ बोलते, उससे पहले ही वह घर का जो सामान था, उसे उठाकर फेंकने लगा। सामने जो खाना रखा हुआ था, उसे भी उठाकर उसने फेंक दिया और बोला, "मुझे चिकन खाना है। सुना आप लोगों ने?" उस वक्त उसकी आवाज बड़ी ही डरावनी सी लगने लगी। उस वक्त वीर बिल्कुल पागलों जैसी हरकतें कर रहा था, जिसे देखकर हम लोग काफी ज्यादा परेशान हो गए। तभी मेरी सासू मां बोली, "ठीक है, हम लोग बाहर चलते हैं, किसी रेस्टोरेंट में खाना खाकर आएंगे। तुम्हें जो चाहिए, वहां खा लेना। वैसे भी घर में तो यह सब कुछ है नहीं, ना तो यहां कहां से मिलेगा?" यह कहकर बड़ी मुश्किल से उसके गुस्से को शांत करवाया।

अब हम लोग सीधे ही पास के एक रेस्टोरेंट में चले गए थे, जहां पर जाकर मैंने और मेरी सासू मां ने तो वेजिटेरियन ऑर्डर किया, लेकिन वीर ने अपने लिए नॉनवेज ऑर्डर किया था। कुछ ही देर में चिकन, मटन जैसे ही आया, तो वह एक जानवर की तरह दोनों हाथों से ही खाने लगा। उसके पूरे कपड़े, पूरा चेहरा खराब हो गया था। उसका इस तरह का व्यवहार हमें काफी अजीब लग रहा था। वही रेस्टोरेंट में जितने भी लोग थे, वे गुस्से में वीर की तरफ देख रहे थे, क्योंकि वीर का खाने का तरीका इतना गंदा था कि किसी को भी उल्टी हो जाए। जबकि वीर को साफ-सफाई बहुत ज्यादा पसंद है, उस वक्त वीर की पागलों जैसी हरकतें देखकर हम भी कुछ नहीं खा पा रहे थे। वीर को तो जैसे किसी चीज का कोई होश नहीं था। उसने तुरंत ही अपना खाना खत्म किया और फिर से जोर-जोर से चिल्लाते हुए वेटर से और ज्यादा नॉनवेज लाने के लिए कहने लगा। तो कुछ देर में वेटर फिर से नॉनवेज लेकर आया, तो वह फिर से इस तरह खाने लगा था। यह देखकर मैं और मेरी सासू मां एक दूसरे की तरफ देखते हुए वहां लोगों की तरफ देख रहे थे, जो बस हमारी तरफ ही देखे जा रहे थे।

अब वीर की मां वीर की तरफ देखते हुए बोली, "बेटा, यह किस तरह खा रहे हो तुम? देखो, लोग हमारी ही तरफ देख रहे हैं।" यह सुनकर वीर गुस्से में घूरकर हमारी तरफ देखने लगा, जिसकी वजह से हमने उससे ज्यादा कुछ भी नहीं बोला। अब जब घर आने के लिए हम वापस गाड़ी में आने लगे, तो वीर की हालत तो ऐसी नहीं थी कि वह गाड़ी चला सके। इसलिए मैं ही ड्राइविंग करने लगी थी। तभी मैं गाड़ी में ही रेडियो चला दिया, जिसमें कोई भजन-कीर्तन आने लगा था। जिसे सुनकर वीर जोर-जोर से चिल्लाते हुए गुस्से में बोला, "बंद करो इसे, बंद करो।" यह देखकर हड़बड़ाते हुए मैंने बंद कर दिया। मैंने और उसकी मां ने उसकी तरफ देखा, वह अजीब तरीके से खिड़की से बाहर की तरफ देख रहा था। उसे देखकर कोई कह ही नहीं सकता था कि वह एक नॉर्मल इंसान है। वही उस भजन-कीर्तन को सुनकर उसकी इतनी ज्यादा बेचैनी और गुस्से को देखकर मैं सोच रही थी कि वह तो ऐसे रेडियो पर भजन आ रहा था, मुझे क्या पता था कि उसे सुनकर वीर इतना गुस्सा हो जाएगा। लेकिन इसमें गुस्से होने की क्या बात थी, यह सोचकर मैं कुछ समझ नहीं पा रही थी। उसके बाद हम लोग वापस घर आ गए थे। वीर की ऐसी हालत देखकर मैं और मेरी सासू मां दोनों ही बहुत परेशान थे।

तभी वीर गुस्से में कमरे में चला गया था। उसे इस तरह जाते देखकर अब मेरी सासू मां परेशान होकर बोली, "मुझे तो कुछ ठीक नहीं लगता है। कुछ ना कुछ तो गड़बड़ है। कहीं यह किसी बुरी शक्ति के साये में तो नहीं आ गया?" यह सुनकर मैं हैरानी से बोली, "मतलब?" तो मेरी सासू मां बोली, "किसी बुरी शक्ति, भूत-प्रेत के चक्कर में आ गया हो। क्योंकि मेरा बेटा ऐसी अजीब सी हरकत कभी नहीं कर सकता।" यह सुनकर मैं बोली, "आप भी कैसी बातें करती हो मम्मी जी। यह भूत-प्रेत सब कुछ नहीं होता, सब मन का भ्रम और बेफिजूल की बातें होती हैं। शायद काम की वजह से वीर बहुत ज्यादा परेशान है। मुझे तो लगता है कि हमें किसी साइकोलॉजिस्ट को दिखाना चाहिए।" यह सुनकर मेरी सासू मां बोली, "लेकिन मुझे कुछ और लगता है। पर बेटा पहले किसी साइकोलॉजिस्ट को ही दिखा लेते हैं।"

वही वीर अब भी अलग कमरे में ही सो गया था। मैं अपने कमरे में थी, यही सब सोचते ही जा रही थी। वीर की ऐसी हालत देखकर मुझे बहुत ज्यादा तकलीफ हो रही थी। तभी मुझे ऐसा लगा कि जैसे बाथरूम में बहुत सारे लोग एक साथ में खड़े होकर बातें कर रहे हैं। किसी के बड़बड़ाने की धीमी-धीमी आवाज मुझे सुनाई दे रही थी। ऐसे में मैं थोड़ा डर भी गई कि बाथरूम में कौन हो सकता है? भला अभी कुछ देर पहले तो मैं आई थी, तब तो कोई भी नहीं था। और वैसे भी यह मेरा और वीर का पर्सनल बाथरूम था। घर में भी हम ज्यादा लोग नहीं थे, तो फिर कौन हो सकता है? शायद बगल वाले फ्लैट से आवाज आ रही होगी। लेकिन जब आवाज तेज आने लगी, तो घबराते हुए मैं उठकर वहां पर गई, देखा तो कोई भी नहीं था। शायद ऐसे ही मेरे मन को भ्रम हो रहा होगा। यह सोचकर मैंने इस बात को नजरअंदाज कर दिया।

उसके बाद मैं अपनी एक फ्रेंड से बातें करने लग गई। उसे इस बारे में बताया तो उसने कहा कि हमें एक बार वीर को साइकोलॉजिस्ट को दिखा लेना चाहिए। हम लोग इसी बारे में बातें कर रहे थे कि अचानक मुझे एक बड़े ही भयानक रूप से चिल्लाने की आवाज अपने कानों में सुनाई देने लगी, जैसे कोई बहुत तेज चिल्लाया हो। यह सुनकर हड़बड़ाते हुए मैं बोली, "एक मिनट," और मैं कॉल काट दिया।

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