The Billionaire's Secret - Chapter 3
Part 3 — तस्वीर में छिपा तीसरा राज़
दरवाजे का हैंडल धीरे-धीरे घूम रहा था।
काव्या की सांसें थम गईं।
उसके हाथ में अभी भी वही तस्वीर थी।
तस्वीर में उसके पिता, आरव के पिता और उसकी मां एक साथ खड़े थे।
ग्यारह साल पहले।
उस रात से पहले, जिसे काव्या की मां हमेशा अपनी जिंदगी का सबसे काला अध्याय कहती आई थीं।
ठक… ठक…
दरवाजे पर फिर दस्तक हुई।
“काव्या…”
बाहर से उसकी मां की आवाज आई।
काव्या ने राहत की सांस ली।
लेकिन अगले ही पल उसे कुछ अजीब लगा।
उसकी मां तो कुछ देर पहले ही बाजार जाने की बात कहकर बाहर गई थीं।
काव्या दरवाजे के पास गई।
“मां?”
“हां बेटा, दरवाजा खोलो।”
काव्या ने दरवाजे के नीचे से देखा।
बाहर किसी के पैर दिखाई नहीं दे रहे थे।
उसका दिल जोर से धड़कने लगा।
“मां, अपना फोन करो।”
बाहर कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर अचानक कदमों की आवाज दूर जाने लगी।
काव्या ने तुरंत फोन निकाला और अपनी मां को कॉल किया।
फोन बंद था।
अब उसे यकीन हो गया—
दरवाजे के बाहर उसकी मां नहीं थी।
काव्या पीछे हट गई।
उसने तुरंत आरव को कॉल किया।
फोन की दूसरी तरफ से आरव ने उठाते ही पूछा,
“क्या हुआ?”
“कोई मेरे घर के बाहर था।”
“दरवाजा मत खोलना।”
“मैंने नहीं खोला।”
“मैं रास्ते में हूं।”
“आरव…”
“हां?”
“मुझे एक तस्वीर मिली है।”
कुछ पल खामोशी रही।
“कैसी तस्वीर?”
“इसमें मेरे पिता हैं… आपके पिता हैं… और मेरी मां।”
आरव की आवाज अचानक गंभीर हो गई।
“तस्वीर मेरे पास रखो। किसी को मत दिखाना।”
“क्यों?”
“क्योंकि अगर वह तस्वीर असली है…”
आरव कुछ पल रुका।
“तो तुम्हारी मां उस रात वहां मौजूद थीं।”
काव्या ने धीरे से पूछा,
“और क्या आपको पता है कि आपके पिता उस रात कहां थे?”
“नहीं।”
“तो फिर हम दोनों के परिवारों के बीच आखिर क्या रिश्ता है?”
आरव ने जवाब नहीं दिया।
काव्या ने कहा,
“आप चुप क्यों हैं?”
“क्योंकि मुझे अभी-अभी कुछ ऐसा पता चला है जो शायद तुम्हें पसंद नहीं आएगा।”
“क्या?”
आरव ने धीरे से कहा,
“तुम्हारे पिता को फंसाने वाली फाइल पर मेरे चाचा के हस्ताक्षर हैं।”
काव्या स्तब्ध रह गई।
“विक्रम राठौड़?”
“हां।”
“तो क्या आपके चाचा ने मेरे पिता को फंसाया?”
“मुझे अभी नहीं पता।”
“लेकिन आपने कहा था कि—”
“काव्या, किसी पर शक करना और उसे दोषी साबित करना अलग बात है।”
“और अगर वह दोषी निकले?”
आरव की आवाज ठंडी हो गई।
“तो चाहे वह मेरा अपना परिवार क्यों न हो… मैं उसे नहीं छोड़ूंगा।”
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उसी समय…
शहर के दूसरे छोर पर एक सुनसान ऑफिस में विक्रम राठौड़ बैठे थे।
उनके सामने एक आदमी खड़ा था।
“वह लड़की अभी भी जिंदा है।”
विक्रम ने गुस्से से कहा,
“मैंने कहा था उसे डराओ, नुकसान मत पहुंचाना।”
आदमी ने ठंडी आवाज में कहा,
“अब मामला आपके हाथ में नहीं है।”
विक्रम ने उसकी तरफ देखा।
“तुम कहना क्या चाहते हो?”
उस आदमी ने एक फाइल टेबल पर रख दी।
“आरव को तस्वीर मिल चुकी है।”
विक्रम का चेहरा उतर गया।
“कौन सी तस्वीर?”
“वही तस्वीर जो ग्यारह साल पहले गायब हो गई थी।”
विक्रम कुछ सेकंड तक चुप रहे।
फिर उन्होंने पूछा,
“उसे तस्वीर किसने दी?”
आदमी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“यही तो समस्या है।”
“क्या?”
“तस्वीर आपके पास थी।”
विक्रम की आंखें फैल गईं।
“तो फिर…”
“कोई ऐसा व्यक्ति है जो पिछले ग्यारह साल से हम सबको देख रहा है।”
विक्रम कुर्सी से उठ गए।
“यह असंभव है।”
“नहीं।”
उस आदमी ने धीरे से कहा,
“असंभव सिर्फ इतना है कि हम अभी तक उसे पहचान नहीं पाए।”
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राठौड़ हवेली
विक्रम तेजी से अपने घर पहुंचे।
उन्होंने पुराने स्टोर रूम का ताला खोला।
कमरे में धूल से भरे दर्जनों बक्से थे।
विक्रम सीधे एक पुराने लकड़ी के संदूक के पास गए।
उन्होंने उसे खोला।
अंदर कुछ पुराने कागज थे।
उन्होंने उन्हें हटाया।
एक छोटा सा खाली स्थान दिखाई दिया।
विक्रम वहीं बैठ गए।
“तस्वीर…”
वह बुदबुदाए।
“यहां थी।”
लेकिन अब वहां कुछ नहीं था।
उसी क्षण पीछे से आवाज आई—
“क्या ढूंढ रहे हैं, चाचा?”
विक्रम का शरीर जैसे जम गया।
उन्होंने धीरे-धीरे पीछे देखा।
दरवाजे पर आरव खड़ा था।
उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
“तुम यहां?”
“हां।”
आरव अंदर आया।
“क्योंकि मैं जानना चाहता हूं कि वह तस्वीर आपके पास क्यों थी।”
विक्रम ने संभलने की कोशिश की।
“कौन सी तस्वीर?”
आरव ने अपनी जेब से फोटो निकाली।
विक्रम के चेहरे का रंग उड़ गया।
आरव ने वह बदलाव देख लिया।
“अब भी कहेंगे कि आप इसे नहीं जानते?”
विक्रम चुप रहे।
“ग्यारह साल पहले मेरे पिता आपसे मिले थे।”
कोई जवाब नहीं।
“उसके बाद उनकी मौत हुई।”
खामोशी।
“उसी रात महेश शर्मा को फंसाया गया।”
विक्रम ने धीरे से कहा,
“आरव, तुम जो सोच रहे हो वह गलत है।”
“तो सही क्या है?”
विक्रम ने नजरें झुका लीं।
“तुम्हारे पिता…”
वह रुक गए।
आरव आगे बढ़ा।
“मेरे पिता के साथ क्या हुआ था?”
विक्रम की आंखों में डर दिखाई दिया।
“उन्होंने उस रात एक ऐसी चीज़ देखी थी, जो उन्हें नहीं देखनी चाहिए थी।”
“क्या?”
“एक सौदा।”
“किसके साथ?”
विक्रम ने जवाब देने के लिए मुंह खोला।
लेकिन तभी बाहर से गोली चलने जैसी तेज आवाज आई।
धड़ाम!
खिड़की का शीशा टूट गया।
आरव तुरंत नीचे झुक गया।
विक्रम भी जमीन पर गिर पड़े।
कुछ सेकंड तक दोनों वहीं रहे।
आरव ने खिड़की की तरफ देखा।
बाहर अंधेरा था।
लेकिन सड़क के उस पार एक काली गाड़ी तेजी से दूर जा रही थी।
आरव ने तुरंत फोन निकाला।
“राघव।”
“जी, सर।”
“हवेली पर सुरक्षा बढ़ाओ।”
“क्या हुआ?”
“किसी ने हमें चुप कराने की कोशिश की है।”
आरव ने फोन काट दिया।
फिर उसने विक्रम की तरफ देखा।
“अब आप सच बताएंगे।”
विक्रम ने थकी हुई आवाज में कहा,
“मैंने तुम्हारे पिता को नहीं मारा।”
आरव की आंखें उन पर टिकी रहीं।
“लेकिन आप जानते हैं कि किसने मारा।”
विक्रम ने कोई जवाब नहीं दिया।
आरव ने पूछा,
“कौन?”
विक्रम ने आंखें बंद कर लीं।
“उसका नाम…”
अचानक उनका फोन बजा।
स्क्रीन पर सिर्फ एक अनजान नंबर था।
विक्रम ने फोन उठाया।
दूसरी तरफ से आवाज आई—
“तुमने उसे सच बताने की कोशिश की?”
विक्रम के हाथ कांपने लगे।
“नहीं…”
आरव ने तुरंत फोन उनकी तरफ से छीन लिया।
“तुम कौन हो?”
कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर वही भारी आवाज आई—
“आरव राठौड़।”
“नाम बताओ।”
“तुम मुझे जल्द पहचान जाओगे।”
“मेरे पिता को किसने मारा?”
दूसरी तरफ हल्की हंसी सुनाई दी।
“तुम्हारे पिता की मौत का जवाब तुम्हारे घर में है।”
कॉल कट गया।
आरव ने धीरे से फोन नीचे किया।
“घर में…”
उसने हवेली की तरफ देखा।
फिर अचानक उसकी नजर एक पुराने चित्र पर पड़ी।
वह चित्र उसके दादा का था।
चित्र के नीचे एक छोटी धातु की प्लेट लगी थी।
उस पर परिवार का पुराना निशान बना था।
वही निशान…
जो काव्या की तस्वीर के पीछे बना था।
आरव धीरे-धीरे चित्र के पास गया।
उसने फ्रेम को हटाया।
पीछे दीवार में एक छोटा सा ताला लगा था।
विक्रम ने उसे देखते ही कहा,
“नहीं।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“यहां क्या है?”
“आरव, इसे मत खोलो।”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम्हारे पिता ने इसे बंद करवाया था।”
आरव कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला,
“तो यही वह जगह है जहां ग्यारह साल से सच छिपा है।”
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दूसरी तरफ — काव्या
काव्या अपनी मां का इंतजार कर रही थी।
रात काफी हो चुकी थी।
अचानक दरवाजा खुला।
उसकी मां अंदर आईं।
काव्या दौड़कर उनके पास गई।
“मां! आप कहां थीं?”
मां ने जवाब नहीं दिया।
काव्या ने तस्वीर उनके सामने रख दी।
“यह क्या है?”
मां का चेहरा देखते ही बदल गया।
वह कुछ बोल नहीं पाईं।
“मां?”
काव्या की आवाज धीमी थी।
“आप इस तस्वीर में क्यों हैं?”
मां की आंखों में आंसू आ गए।
“तुम्हें यह तस्वीर कहां मिली?”
“किसी ने मेरे दरवाजे के नीचे डाली।”
मां ने तस्वीर हाथ में ली।
उनकी उंगलियां कांप रही थीं।
“ग्यारह साल…”
उन्होंने धीमे से कहा।
“मैंने सोचा था यह तस्वीर हमेशा के लिए खो गई।”
काव्या स्तब्ध रह गई।
“आप इसे जानती हैं?”
मां ने सिर झुका लिया।
“हां।”
“आप उस रात वहां थीं?”
कोई जवाब नहीं।
“मां!”
मां ने आखिरकार कहा,
“मैं वहां थी।”
काव्या की आंखें भर आईं।
“तो पापा भी वहां थे?”
“हां।”
“और आरव के पिता?”
“हां।”
“फिर क्या हुआ?”
मां ने कुछ कहने की कोशिश की।
लेकिन उनकी आंखों में अचानक डर आ गया।
“काव्या, तुम्हें यह सब जानने की जरूरत नहीं है।”
“मुझे जरूरत है!”
“नहीं!”
“क्यों?”
मां ने उसकी तरफ देखा।
“क्योंकि जिस सच को तुम खोज रही हो…”
वह कुछ पल रुकीं।
“उसकी कीमत तुम्हारी जिंदगी हो सकती है।”
काव्या चुप हो गई।
तभी उसकी नजर मां के हाथ पर गई।
वह वही छोटी सी अंगूठी पहने थीं जो तस्वीर में भी थी।
काव्या ने पूछा,
“यह अंगूठी आपको किसने दी?”
मां ने तुरंत हाथ पीछे कर लिया।
“पुरानी बात है।”
“किसने दी?”
मां ने जवाब नहीं दिया।
काव्या ने तस्वीर फिर से देखी।
उसे अचानक तस्वीर में एक और चीज दिखाई दी।
उसके पिता की जेब से आधा बाहर निकला एक कागज।
काव्या ने तस्वीर को फोन से बड़ा करके देखा।
कागज पर कुछ लिखा था।
“Vault 17.”
काव्या ने तुरंत आरव को कॉल किया।
आरव ने फोन उठाया।
“क्या हुआ?”
“मुझे जगह मिल गई।”
“कौन सी?”
“जहां आपके पिता का राज़ छिपा है।”
“कहां?”
काव्या ने कहा—
“Vault 17.”
आरव कुछ सेकंड तक चुप रहा।
फिर उसने पूछा,
“तुम्हें यह नाम कहां मिला?”
“उस तस्वीर में।”
आरव की सांस रुक गई।
क्योंकि उसने कुछ देर पहले अपने परिवार के पुराने रिकॉर्ड में वही नाम देखा था।
Vault 17 — राठौड़ हवेली का बंद तहखाना।
आरव ने तुरंत कहा,
“काव्या, मेरी बात ध्यान से सुनो।”
“हां।”
“आज रात तुम कहीं नहीं जाओगी।”
“लेकिन—”
“Vault 17 में क्या है, यह मैं खुद पता करूंगा।”
“और अगर वहां मेरे पिता से जुड़ा सच मिला तो?”
आरव ने कुछ पल सोचा।
“तो हम दोनों साथ पढ़ेंगे।”
काव्या पहली बार कुछ शांत हुई।
“आप मुझ पर भरोसा करते हैं?”
आरव ने बिना झिझक कहा,
“अभी नहीं।”
काव्या चुप हो गई।
फिर आरव ने कहा,
“लेकिन मैं तुम पर भरोसा करना चाहता हूं।”
कॉल कट गया।
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आधी रात
राठौड़ हवेली में सब कुछ शांत था।
आरव अकेला उस पुराने कमरे में खड़ा था।
उसके सामने वही बंद ताला था।
विक्रम दरवाजे पर खड़े थे।
“आरव, आखिरी बार कह रहा हूं।”
“मैं रुकने वाला नहीं हूं।”
आरव ने ताला खोला।
दीवार धीरे-धीरे खुली।
अंदर एक संकरी सीढ़ी नीचे जा रही थी।
आरव ने टॉर्च ऑन की।
विक्रम पीछे से बोले,
“तुम्हारे पिता ने कहा था कि अगर यह दरवाजा कभी खुले…”
आरव रुका।
“तो?”
विक्रम की आवाज कांप रही थी।
“तो राठौड़ परिवार का सबसे बड़ा राज़ दुनिया के सामने आ जाएगा।”
आरव नीचे उतरने लगा।
सीढ़ियों के अंत में लोहे का एक दरवाजा था।
उस पर लिखा था—
VAULT 17
आरव ने हाथ बढ़ाकर दरवाजा खोला।
अंदर एक छोटा कमरा था।
एक मेज।
एक पुराना कंप्यूटर।
कई फाइलें।
और दीवार पर लगी दर्जनों तस्वीरें।
आरव धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
उसने पहली तस्वीर उठाई।
उसके पिता।
दूसरी तस्वीर—
महेश शर्मा।
तीसरी—
काव्या की मां।
चौथी—
विक्रम राठौड़।
और पांचवीं तस्वीर देखकर आरव के हाथ से फोटो लगभग गिर गई।
वह तस्वीर थी—
काव्या की।
लेकिन वह तस्वीर आज की नहीं थी।
उसमें काव्या सिर्फ पांच-छह साल की थी।
और उसके पास खड़ा था…
आरव का पिता।
आरव की सांसें रुक गईं।
“यह कैसे संभव है?”
उसने तस्वीर पलटी।
पीछे लिखा था—
“जिसे तुम आज पहली बार देख रहे हो, वह तुम्हारे पिता से बचपन से जुड़ी हुई है।”
आरव ने अगली फाइल खोली।
उसके पहले पन्ने पर लिखा था—
PROJECT: K-17
और उसके नीचे एक नाम था—
काव्या शर्मा।
आरव की आंखें फैल गईं।
तभी पीछे से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।
धड़ाम!
आरव पलटा।
विक्रम गायब थे।
कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।
फिर कंप्यूटर स्क्रीन अपने आप जल उठी।
स्क्रीन पर सिर्फ एक संदेश था—
“स्वागत है, आरव। अब तुम्हें अपनी असली कहानी पता चलेगी।”
और उसके नीचे एक वीडियो चलने लगा।
वीडियो में आरव के पिता दिखाई दिए।
वह कैमरे की तरफ देखकर कह रहे थे—
“अगर तुम यह वीडियो देख रहे हो, तो इसका मतलब है कि मैं मर चुका हूं… और मेरी मौत का सबसे बड़ा राज़ तुम्हारे सबसे करीब मौजूद है।”
वीडियो अचानक रुक गया।
स्क्रीन काली हो गई।
आरव ने धीरे से फुसफुसाया—
“सबसे करीब…”
उसी क्षण उसके फोन पर एक संदेश आया।
काव्या:
“आरव… मेरी मां गायब हो गई हैं।”
आरव की आंखों में चिंता उतर आई।
और उसी पल उसे एहसास हुआ—
जिस खेल की शुरुआत ग्यारह साल पहले हुई थी, उसमें अब वह और काव्या दोनों मोहरे नहीं… बल्कि असली निशाना बन चुके थे।
जारी रहेगा…