The Billionaire's Secret Ch. 2

The Billionaire's Secret - Chapter 2

Posted by Amit Rajput • Aug 15, 2026 11:38 AM

अरबों का वारिस — The Billionaire's Secret

Part 2 — अंधेरे में छिपा सच

गोदाम के अंदर अचानक छाया अंधेरा इतना गहरा था कि कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

काव्या वहीं खड़ी रह गई।

“आरव…”

उसकी आवाज में घबराहट थी।

आरव ने तुरंत कहा,

“जहां हो, वहीं रहो।”

“लेकिन—”

“मैंने कहा, वहीं रहो।”

आरव ने फोन की फ्लैशलाइट ऑन की।

हल्की रोशनी में गोदाम का पूरा माहौल और भी रहस्यमय लगने लगा।

पुराने लोहे के ड्रम।

टूटी हुई मशीनें।

धूल से भरे लकड़ी के बक्से।

और फर्श पर पड़ी वह फाइल।

आरव ने उसे उठाया।

अचानक उसे बाहर से गाड़ी के इंजन की आवाज सुनाई दी।

वह तेजी से दरवाजे की तरफ बढ़ा।

काव्या भी उसके पीछे चल पड़ी।

“रुकिए!”

आरव ने पीछे मुड़कर देखा।

“क्या?”

“वह आदमी फाइल छोड़कर क्यों भागा?”

आरव ने कुछ नहीं कहा।

काव्या ने फिर पूछा,

“आपको लगता है कि वह हमें यहां बुलाकर कोई जाल बिछा रहा था?”

आरव ने गंभीरता से कहा,

“मुझे लगता है कि जिसने तुम्हें मैसेज किया था, उसका मकसद हमें एक साथ यहां लाना था।”

काव्या चौंक गई।

“हमें?”

“हां।”

“लेकिन क्यों?”

आरव ने उसकी तरफ देखा।

“क्योंकि हमारे परिवारों के बीच जो रिश्ता है, वह हमारी सोच से कहीं ज्यादा गहरा है।”

काव्या कुछ बोल पाती, उससे पहले बाहर एक कार तेजी से वहां से निकल गई।

आरव ने तुरंत दरवाजा खोला।

सड़क लगभग खाली थी।

दूर जाती कार की लाल लाइट कुछ सेकंड दिखाई दी और फिर गायब हो गई।

राघव कुछ ही पल बाद वहां पहुंचा।

“सर!”

आरव उसकी तरफ मुड़ा।

“उस कार का पीछा करो।”

“जी।”

राघव तुरंत बाहर निकल गया।

काव्या ने आरव की तरफ देखा।

“आपको मेरे पिता के बारे में क्या पता है?”

आरव चुप रहा।

“मैंने आपसे सवाल किया है।”

“बहुत कुछ।”

“तो बताइए।”

आरव ने फाइल उसकी तरफ बढ़ाई।

“पहले तुम इसे पढ़ो।”

काव्या ने फाइल खोली।

पहले कुछ पन्नों में कंपनी के पुराने वित्तीय रिकॉर्ड थे।

फिर एक दस्तावेज था।

उस पर उसके पिता के हस्ताक्षर थे।

काव्या ने उसे देखते ही कहा,

“ये मेरे पापा के सिग्नेचर हैं।”

“हां।”

“लेकिन उन्होंने ये दस्तावेज कभी साइन नहीं किया था।”

आरव ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें कैसे पता?”

“क्योंकि मेरे पापा हमेशा अपना नाम पूरा लिखते थे। यहां सिर्फ उनके शुरुआती अक्षर हैं।”

आरव ने दस्तावेज फिर से देखा।

काव्या सही कह रही थी।

“इसका मतलब किसी ने उनके हस्ताक्षर की नकल की।”

“हां।”

आरव ने फाइल बंद कर दी।

“और अगर ये साबित हो गया कि तुम्हारे पिता को फंसाया गया था…”

काव्या ने तुरंत पूछा,

“तो असली अपराधी कौन है?”

आरव ने उसकी आंखों में देखा।

“यही पता करना है।”

---

अगली सुबह

राठौड़ एम्पायर के मुख्यालय में माहौल सामान्य नहीं था।

शेयर बाजार खुलते ही कंपनी के शेयर तेजी से गिरने लगे।

बोर्ड के सदस्यों के फोन लगातार बज रहे थे।

विक्रम राठौड़ अपने ऑफिस में बेचैनी से टहल रहे थे।

तभी दरवाजा खुला।

आरव अंदर आया।

विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

“तुम इतनी सुबह यहां?”

“कुछ सवाल हैं।”

“किस बारे में?”

आरव ने टेबल पर वही पुरानी फाइल रख दी।

विक्रम का चेहरा देखते ही बदल गया।

कुछ सेकंड तक वह फाइल को घूरते रहे।

आरव ने तुरंत पकड़ लिया।

“आप इसे पहचानते हैं।”

“नहीं।”

“झूठ।”

विक्रम चुप रहे।

आरव आगे बढ़ा।

“ग्यारह साल पहले मेरे पिता की मौत हुई।”

विक्रम ने नजरें झुका लीं।

“और उसी समय महेश शर्मा पर कंपनी से पैसे चोरी करने का आरोप लगा।”

कोई जवाब नहीं।

“लेकिन अब मेरे पास ऐसे दस्तावेज हैं जिनसे पता चलता है कि महेश शर्मा को फंसाया गया था।”

विक्रम ने धीरे से कहा,

“आरव, कुछ बातें जितनी पुरानी होती हैं, उतना ही बेहतर होता है कि उन्हें वहीं रहने दिया जाए।”

आरव की आंखें सख्त हो गईं।

“मेरे पिता की मौत की सच्चाई को दफन रखने की सलाह दे रहे हैं?”

“मैं तुम्हारी सुरक्षा की बात कर रहा हूं।”

“या अपनी?”

कमरे में खामोशी छा गई।

विक्रम ने पहली बार आरव की आंखों में सीधा देखा।

“तुम नहीं जानते कि तुम किससे टकरा रहे हो।”

आरव हल्का सा मुस्कुराया।

“मैं राठौड़ हूं।”

“यही तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी है।”

आरव कुछ पल चुप रहा।

“क्यों?”

विक्रम ने कहा,

“क्योंकि तुम्हें लगता है कि तुम्हारे परिवार के लोग हमेशा तुम्हारे साथ हैं।”

आरव के कदम रुक गए।

विक्रम ने तुरंत बात बदल दी।

“बोर्ड मीटिंग दस बजे है।”

आरव ने दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाए।

फिर रुककर बोला,

“चाचा…”

विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

“अगर मुझे पता चला कि आपने मुझसे कुछ छिपाया है…”

आरव की आवाज बेहद शांत थी।

“तो मैं आपको भी अपने दुश्मनों की सूची में डाल दूंगा।”

आरव बाहर चला गया।

विक्रम कुर्सी पर बैठ गए।

उनके हाथ कांप रहे थे।

उन्होंने तुरंत एक नंबर मिलाया।

“आरव को फाइल मिल गई है।”

दूसरी तरफ से सवाल आया।

विक्रम ने आंखें बंद कर लीं।

“हां।”

कुछ पल बाद आवाज आई—

“अब अगला कदम उठाना होगा।”

विक्रम ने पूछा,

“क्या?”

दूसरी तरफ से सिर्फ एक जवाब आया—

“काव्या शर्मा को खत्म करो।”

विक्रम का चेहरा सफेद पड़ गया।

“नहीं!”

फोन कट चुका था।

---

दूसरी तरफ…

काव्या अपने पिता से मिलने जेल पहुंची।

वह कांच के दूसरी तरफ बैठी थी।

महेश शर्मा पहले से ही उसका इंतजार कर रहे थे।

काव्या ने उन्हें देखते ही कहा,

“पापा, मुझे कुछ मिला है।”

महेश के चेहरे पर चिंता आ गई।

“क्या?”

“पुरानी कंपनी की फाइल।”

महेश अचानक खड़े हो गए।

“वह फाइल तुम्हें किसने दी?”

“किसी ने मुझे वहां बुलाया था।”

“काव्या, तुम वहां दोबारा नहीं जाओगी।”

“क्यों?”

“क्योंकि जो लोग उस फाइल के पीछे हैं, वे बहुत खतरनाक हैं।”

काव्या ने धीमे स्वर में पूछा,

“क्या आप जानते हैं कि मेरे साथ क्या हो रहा है?”

महेश चुप रहे।

“पापा, सच बताइए।”

उनकी आंखें भर आईं।

“मैंने चोरी नहीं की थी।”

काव्या ने उनका हाथ कांच पर रखा।

“मुझे पता है।”

“नहीं, काव्या।”

महेश ने सिर हिलाया।

“तुम्हें सिर्फ इतना पता है कि मैं निर्दोष हूं।”

वह कुछ पल रुके।

“तुम्हें यह नहीं पता कि तुम्हारे पिता ने उस रात क्या देखा था।”

काव्या की धड़कन तेज हो गई।

“क्या देखा था?”

महेश ने चारों तरफ देखा।

फिर बहुत धीमी आवाज में कहा,

“तुम्हारे पिता की मौत वाली रात…”

वह रुक गए।

काव्या की आंखें फैल गईं।

“मेरे पिता?”

महेश ने सिर हिलाया।

“आरव के पिता अकेले नहीं थे।”

काव्या कुछ समझ नहीं पाई।

“कौन था उनके साथ?”

महेश ने जवाब देने के बजाय अपनी जेब से एक छोटी सी चाबी निकाली।

उन्होंने चाबी कांच के नीचे रख दी।

“इसे संभालकर रखना।”

“इससे क्या खुलेगा?”

“वही चीज़…”

महेश की आंखों में डर था।

“…जो तुम्हें बताएगी कि तुम्हारे पिता की मौत के पीछे कौन था।”

काव्या ने चाबी उठा ली।

तभी जेल का अधिकारी आ गया।

“समय खत्म।”

काव्या उठी।

“पापा!”

महेश ने उसे आखिरी बार देखा।

“काव्या…”

“जी?”

“अगर आरव राठौड़ तुम्हारी मदद करना चाहे…”

वह कुछ पल चुप रहे।

“तो उस पर तुरंत भरोसा मत करना।”

काव्या चौंक गई।

“क्यों?”

महेश ने कहा,

“क्योंकि राठौड़ परिवार में हर कोई वह नहीं है, जो दिखाई देता है।”

---

उसी रात

आरव अपने ऑफिस में बैठा था।

उसके सामने शहर की रोशनी थी।

टेबल पर काव्या की तस्वीर पड़ी थी।

वह उसे देख रहा था।

तभी राघव अंदर आया।

“सर।”

“मिली वह कार?”

“नहीं।”

“नंबर?”

“नकली था।”

आरव ने कुछ नहीं कहा।

राघव ने एक और फाइल आगे बढ़ाई।

“लेकिन कुछ और मिला है।”

आरव ने फाइल खोली।

उसमें एक पुरानी होटल की तस्वीर थी।

तस्वीर में उसके पिता किसी व्यक्ति से मिल रहे थे।

आरव ने फोटो को करीब से देखा।

उसकी सांस रुक गई।

वह आदमी कोई अनजान व्यक्ति नहीं था।

वह था—

विक्रम राठौड़।

आरव के चाचा।

और तस्वीर की तारीख वही थी…

जिस दिन उसके पिता की मौत हुई थी।

आरव कुर्सी से उठा।

“राघव।”

“जी?”

“इस तस्वीर की असली कॉपी कहां है?”

“एक पुराने रिकॉर्ड रूम में।”

“उसे तुरंत लेकर आओ।”

राघव जाने लगा।

तभी आरव ने कहा,

“और किसी को मत बताना कि यह तस्वीर मेरे पास है।”

“जी, सर।”

दरवाजा बंद हुआ।

आरव ने तस्वीर फिर से देखी।

उसके पिता कुछ कह रहे थे।

विक्रम उन्हें ध्यान से सुन रहे थे।

लेकिन तस्वीर के पीछे कुछ और था।

एक कांच की दीवार।

और उसके प्रतिबिंब में एक तीसरा व्यक्ति दिखाई दे रहा था।

चेहरा साफ नहीं था।

आरव ने तस्वीर को रोशनी के सामने किया।

फिर अचानक उसकी नजर उस व्यक्ति की कलाई पर गई।

वह व्यक्ति एक खास तरह की घड़ी पहने हुए था।

आरव उस घड़ी को पहचानता था।

वही घड़ी उसके घर में उसके पिता की पुरानी चीजों के साथ रखी थी।

आरव का चेहरा बदल गया।

“तो तुम…”

उसने तस्वीर कसकर पकड़ ली।

उसी वक्त उसके फोन पर काव्या का कॉल आया।

आरव ने तुरंत उठाया।

“काव्या?”

दूसरी तरफ उसकी घबराई आवाज थी।

“आरव… मुझे लगता है कोई मेरा पीछा कर रहा है।”

आरव तुरंत खड़ा हो गया।

“तुम कहां हो?”

“घर के बाहर।”

“अंदर जाओ। दरवाजा लॉक करो।”

“लेकिन—”

“काव्या, अभी!”

फोन कट गया।

आरव ने राघव को कॉल किया।

“काव्या के घर जाओ।”

“जी।”

“और सुनो…”

आरव की आवाज में पहली बार घबराहट थी।

“उसे कुछ नहीं होना चाहिए।”

राघव ने तुरंत गाड़ी निकाली।

आरव भी अपने ऑफिस से निकल गया।

उसे नहीं पता था कि वह काव्या की सुरक्षा के लिए जा रहा है…

या उस रहस्य के पीछे भाग रहा है जो उसके पूरे परिवार को तबाह कर सकता था।

---

काव्या ने दरवाजा बंद कर दिया।

बाहर सड़क पर कोई दिखाई नहीं दे रहा था।

फिर अचानक—

ठक… ठक… ठक…

दरवाजे पर दस्तक हुई।

काव्या पीछे हट गई।

“कौन?”

कोई जवाब नहीं आया।

फिर दरवाजे के नीचे से एक लिफाफा अंदर सरका।

काव्या ने कांपते हाथों से उसे उठाया।

अंदर सिर्फ एक तस्वीर थी।

तस्वीर देखकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

उसमें उसके पिता थे।

उनके साथ आरव के पिता।

और उनके पीछे…

काव्या की मां।

तस्वीर के पीछे एक लाइन लिखी थी—

“अब अपनी मां से पूछो कि ग्यारह साल पहले उस रात वह वहां क्यों थी।”

काव्या की आंखें दरवाजे पर टिक गईं।

उसी समय बाहर किसी के कदमों की आवाज आई।

और फिर…

दरवाजे का हैंडल धीरे-धीरे घूमने लगा।

जारी रहेगा…

भाग - 2 समाप्त।

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