सौम्य और शक्ति : किन्नर के अस्तित्व की Ch. 3

सौम्य और शक्ति : किन्नर के अस्तित्व की - Chapter 3

Posted by Ishra Aalam • May 05, 2026 04:17 PM

अब आगे ---

चौहान हवेली हमेशा की तरह भव्य और शांत दिखाई दे रही थी, लेकिन उस शाम उसके भीतर एक अजीब-सा तनाव फैला हुआ था। बाहर सूरज ढल चुका था और आकाश में हल्की सांवली रोशनी बची हुई थी। हवेली के विशाल आंगन में लगे फव्वारों की आवाज़ वातावरण की खामोशी को और गहरा बना रही थी।

संगमरमर की सफेद सीढ़ियों पर लगी पीली रोशनियाँ पूरे घर को किसी राजमहल जैसा रूप दे रही थीं। नौकर-चाकर सामान्य दिनों की तरह इधर-उधर काम तो कर रहे थे, मगर उनकी चालों में भी एक असामान्य सावधानी थी, जैसे पूरे घर को पहले से पता हो कि आज कोई जरूरी बात होने वाली है।

मुख्य दरवाजा खुला और सौम्य अंदर आया। मंदिर से लौटने के बाद वह कुछ देर काम में उलझा रहा था और अब सीधा घर आया था। लाल कुर्ते की जगह अब उसने हल्की ऑफ-व्हाइट शर्ट और काले ट्राउज़र पहन रखे थे। उसके हाथ में कुछ फाइलें थीं और चेहरे पर वही स्थिर शांति, जो हमेशा रहती थी।

लेकिन जैसे ही उसने हॉल में कदम रखा, उसकी चाल अनायास धीमी पड़ गई। ऐसा सन्नाटा, जो बाहर से देखने वालों को शांति लगता था, मगर भीतर रहने वालों के लिए वह अनकहे तनावों, दबे हुए स्वार्थों और रिश्तों में घुली कड़वाहट का दूसरा नाम था।

हवेली के बड़े हॉल की पीली रोशनी आज कुछ ज्यादा ही गंभीर लग रही थी। दीवारों पर टंगी पुरानी तस्वीरें, भारी झूमर, महंगे सोफे और चमचमाता संगमरमर, सब कुछ अपनी जगह पर वैसा ही था, लेकिन माहौल में आज एक अजीब-सी प्रतीक्षा थी।

पूरा परिवार एक साथ बैठा था।

रूक्मणी चौहान सोफे के बीचोंबीच शांत चेहरे के साथ बैठी थीं। उनके व्यक्तित्व में आज भी वही रौब था, जिसने इतने सालों से चौहान परिवार को एक साथ बांध रखा था। उनकी आँखों में गहराई थी और चेहरे पर ऐसी गरिमा, जिसे देखकर कोई भी सहज ही सम्मान महसूस करे।

उनके दाईं तरफ रविंद्र चौहान बैठे थे। हरीहर चौहान के छोटे भाई। चेहरे पर बनावटी गंभीरता, आवाज़ में मिठास और आँखों में हमेशा की तरह छिपा हुआ लालच। उनके पास उनकी पत्नी मैत्री बैठी थी, जो ऊपर से जितनी स्नेही बनने की कोशिश करती थी, भीतर से उतनी ही कड़वाहट से भरी हुई थी। सामने की तरफ सौम्य की बुआ, वंदना देवी, हाथ में माला पकड़े बैठी थीं। उनके चेहरे पर चिंता कम और उत्सुकता ज्यादा दिखाई दे रही थी।

सभी को एक साथ बैठा देखकर सौम्य के माथे पर हल्की लकीरें उभर आईं। यह परिवार कभी बिना वजह एक साथ नहीं बैठता था।

सौम्य ने उनकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आया। वह अच्छी तरह जानता था कि इस घर में कौन सच में अपना है और कौन सिर्फ दिखावा करता है। फिर भी अपनी मां की परवरिश के कारण उसने कभी बदतमीजी नहीं की थी।

उसके पीछे ही समीर भी अंदर आया। हाथ में बाइक की चाबी घुमाता हुआ, बिल्कुल बेपरवाह अंदाज में। उसने एक नजर पूरे हॉल पर डाली और तुरंत समझ गया कि फिर कोई “फैमिली मीटिंग” चल रही है। उसके चेहरे पर हल्की-सी ऊब आ गई।

सौम्य आगे बढ़ा और हमेशा की तरह सबसे पहले रूक्मणी के पैर छुए। फिर उसने चाचा, चाची और बुआ के पैर छुए। उसके व्यवहार में आदर हमेशा रहता था, चाहे सामने वाला उसके लिए क्या सोचता हो। वहीं समीर बिना किसी में दिलचस्पी लिए सीधा सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।

मैत्री ने आवाज लगाई।

“अरे समीर!”

लेकिन समीर बिना मुड़े ही बोला,

“मम्मी मुझे बहुत नींद आ रही है, आप लोग आराम से मीटिंग करो।”

उसके जाते ही मैत्री ने बनावटी मुस्कान के साथ सिर हिलाया, लेकिन अंदर ही अंदर झुंझला गई। उसे हमेशा से यही खटकता था कि उसका बेटा कभी उनकी तरह चालाक नहीं बन पाया। ना उसे संपत्ति में दिलचस्पी थी, ना सौम्य के खिलाफ जहर भरने में।

उधर सौम्य अब भी सबके चेहरों को पढ़ने की कोशिश कर रहा था। मैत्री ने अचानक अपने स्वर में जरूरत से ज्यादा प्यार घोलते हुए कहा,

“सौम्य मेरे बच्चे… यहां आ, मेरे पास बैठ।”

सौम्य कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।

वह जानता था। बहुत अच्छी तरह जानता था कि इस औरत के शब्दों में जितनी मिठास है, दिल में उतना ही ज़हर। मगर उसने कभी किसी के सामने उनके व्यवहार को लेकर कुछ नहीं कहा। शायद इसलिए क्योंकि उसकी माँ ने उसे सिखाया था कि हर लड़ाई शब्दों से नहीं लड़ी जाती।

वह जाकर सोफे पर बैठ गया। कुछ सेकंड तक हॉल में अजीब-सी चुप्पी रही। आखिर रविंद्र ने गला साफ किया।

“सौम्य… दरअसल आज हमें तुमसे एक जरूरी बात करनी थी।”

सौम्य ने शांत लेकिन सतर्क नजरों से उन्हें देखा।

“कौन-सी बात?”

रविंद्र और मैत्री ने एक-दूसरे की तरफ देखा, जैसे तय कर रहे हों शुरुआत कौन करे।

रूक्मणी ने उसकी तरफ देखा। उनकी आँखों में हल्की झिझक थी। जैसे वह बात शुरू करना चाहती थीं, मगर समझ नहीं पा रही थीं कैसे। लेकिन उससे पहले मैत्री बोल उठी,

“बात बहुत अच्छी है बेटा।”

सौम्य ने उसकी तरफ देखा, मगर कुछ कहा नहीं। रविंद्र ने गला साफ किया।

“आज सूर्यवंशी परिवार का फोन आया था।”

सौम्य की उंगलियाँ फाइल पर हल्की कस गईं। उसे सुबह माँ की बात याद आ गई। मैत्री ने मुस्कराते हुए कहा,

“बेटा… सूर्यवंशी परिवार से रिश्ता आया है।”

रविंद्र ने मुस्कुराते हुए कहा,

“और चाहते हैं कि जल्दी शादी की तारीख निकले।”

हॉल में कुछ सेकंड तक सिर्फ घड़ी की टिक-टिक सुनाई देती रही। सौम्य का चेहरा शांत था, मगर उसकी आँखों में ठंडक उतर आई थी। उसने धीरे से कहा,

“माँ, आपने भी…?”

रूक्मणी ने तुरंत नजरें झुका लीं। उसकी आवाज़ धीमी थी, मगर हर शब्द में दबा हुआ दर्द साफ महसूस हो रहा था। मैत्री तुरंत बोली,

“बेटा, उन्होंने सामने से शादी की बात की है। ये जानने के बाद भी कि तुम किन्नर हो।”

उसके मुँह से “किन्नर” शब्द जिस तरीके से निकला, उसमें सहानुभूति कम और ताना ज्यादा था। रूक्मणी की नजर तुरंत उसकी तरफ उठी। बस एक नजर।

लेकिन इतनी कठोर कि मैत्री का गला सूख गया। रूक्मणी को दुनिया की कोई बात उतनी तकलीफ नहीं देती थी जितनी कोई सौम्य की गरिमा को चोट पहुँचाए।

मैत्री तुरंत सकपका गई।

“मेरा मतलब वो नहीं था दीदी, मैं तो बस…”

रूक्मणी ने शांत मगर सख्त स्वर में कहा।

“तो मत बोलो,”

पूरा हॉल एक पल को ठंडा पड़ गया।

रविंद्र ने जल्दी से बात संभाली।

“अरे भाभी, मैत्री का वो मतलब नहीं था। वो तो बस समझा रही थी कि सूर्यवंशी लोग कितने बड़े दिल वाले हैं।”

उधर सौम्य ने नजरें झुका लीं। चेहरे पर कोई कमजोरी नहीं आने दी, मगर उसकी सांसें थोड़ी भारी हो चुकी थीं। कुछ पल बाद उसने धीमे लेकिन दबे गुस्से में कहा,

“मां… पापा ने वो वचन इसलिए दिया था क्योंकि उन्हें उस ज्योतिष ने कहा था… उन्हें लड़की होगी, ना कि मैं।”

उसकी आवाज में दर्द था। ऐसा दर्द, जो बचपन से लोगों की नजरों में खुद को अलग महसूस करते-करते जमा हो गया था।

सौम्य की आंखों में हल्का-सा बदलाव आया। रूक्मणी अब भी चुप थीं।

मैत्री इस बार बात को घूमा कर आगे बोली,

“उन्होंने सामने से शादी की बात की है… सब कुछ जानने के बाद भी।”

हॉल का माहौल एकदम भारी हो गया।

सौम्य की उंगलियां धीरे-धीरे कस गईं।

वह जानता था मैत्री ने “सब कुछ” कहकर किस तरफ इशारा किया था। “सब कुछ जानने के बाद भी तुम किन्नर हो…”

ये शब्द जितनी सहजता से मैत्री ने कहे थे, उतनी ही गहराई से जाकर वे सौम्य के भीतर चुभे।

रविंद्र ने जल्दी से बात संभाली।

“अरे सौम्य मैत्री का वो मतलब नहीं था। वो तो बस समझा रही थी कि सूर्यवंशी लोग कितने बड़े दिल वाले हैं।”

सौम्य ने धीरे से सिर उठाकर अपने चाचा को देखा। उसकी नजरें इतनी शांत थीं कि सामने वाला खुद असहज हो जाए। उसने धीमे स्वर में दोहराया।

“बड़े दिल वाले?”

रविंद्र थोड़ा अटक गए, फिर मुस्कुराकर बोले,

“बेटा, शक्ति सूर्यवंशी का कितना नाम है। अमेरिका में उसका बिजनेस, उसकी lifestyle… कितनी लड़कियाँ उसके पीछे घूमती हैं।”

सौम्य के जबड़े हल्के भींच गए। उसे अचानक घिन-सी महसूस हुई। जैसे कोई इंसान नहीं… कोई deal discuss हो रही हो। रविंद्र तुरंत बीच में बोले,

“बेटा, सूर्यवंशी कोई छोटे-मोटे लोग नहीं हैं। और सूर्यवंशी परिवार कितना नामी परिवार है, साथ ही वो हरीहर भाई साहब के दोस्त भी थे। ये तो तुम भी जानते हो।”

सौम्य ने उनकी आंखों में देखते हुए कहा।

“तो?”

रविंद्र थोड़ा असहज हुए।

“तो मतलब… ऐसा रिश्ता बार-बार नहीं आता।”

सौम्य अचानक हंस पड़ा। लेकिन वो हंसी खुशी की नहीं थी। उसने दाँत भींचते हुए कहा,

“चाचा जी, मैं कोई बोझ नहीं हूँ… जिसे आप उतारना चाहते हैं।”

उसकी आवाज़ ऊँची नहीं थी, लेकिन पूरे हॉल में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे किसी ने सबकी सांसें रोक दी हों। रविंद्र का चेहरा उतर गया।

“चाचा जी… मैं कोई बोझ नहीं हूं, जिसे आप लोग उतारना चाहते हैं।”

उसकी आवाज इस बार तेज थी। लेकिन पूरे हॉल में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे किसी ने सबकी सांसें रोक दी हों। रविंद्र के चेहरे पर एक पल को झेंप आई, मगर भीतर irritation भी उभर गई। उन्हें हमेशा यही परेशानी रहती थी। सौम्य बाकी लोगों की तरह दबता नहीं था। तभी रूक्मणी अचानक उठीं। उनकी आंखें नम थीं।

उन्होंने आगे बढ़कर सौम्य का चेहरा दोनों हाथों में थाम लिया। उनकी आवाज कांप गई,

“क्या मैंने तुझे कभी बोझ समझा है? , बोल… कभी तुझे बोझ समझा है मैंने?”

सौम्य की आंखें तुरंत झुक गईं। उसकी पूरी जिंदगी में अगर किसी ने उसे बिना शर्त स्वीकार किया था, तो वो सिर्फ उसकी मां थीं। जब दुनिया ने सवाल किए, तब रूक्मणी उसके सामने ढाल बनकर खड़ी हुई थीं। जब रिश्तेदार फुसफुसाते थे, तब रूक्मणी ऊंची आवाज में कहती थीं।

“मेरा बेटा किसी से कम नहीं।”

जब वह खुद को टूटता महसूस करता था, तब वही उसे सिखाती थीं।

“जो इंसान खुद की इज्जत नहीं करता, दुनिया भी उसकी इज्जत नहीं करती। पहले खुद को स्वीकार करना सीख।”

सौम्य ने धीरे से कहा,

“मां… मैं ऐसा नहीं कह रहा…”

लेकिन रूक्मणी ने उसकी बात बीच में काट दी। उनकी आंखों में इस बार सिर्फ दर्द नहीं था… शिकायत भी थी। पूरा हॉल शांत हो गया।

“आज तूने मुझे बहुत चोट पहुंचाई है, सौम्य। तेरे पिता की आखिरी इच्छा थी कि उनकी होने वाली संतान की शादी उनके दोस्त के बेटे शक्ति से हो। शायद तेरे लिए उनकी इच्छा कोई मायने नहीं रखती… लेकिन तेरी मां के लिए बहुत रखती है।”

सौम्य एकदम चुप रह गया। उसके चेहरे का सारा गुस्सा जैसे धीरे-धीरे उतर गया।

क्योंकि वह जानता था। रूक्मणी कभी अपने पति का नाम यूं भावुक होकर नहीं लेतीं।

उनके लिए वह वचन सिर्फ एक शादी नहीं था… अपने पति की आखिरी निशानी था।

रूक्मणी ने जल्दी से अपनी आंखों की नमी छिपाई। उन्हें अपनी कमजोरी किसी के सामने दिखाना पसंद नहीं था।

और यही आदत सौम्य ने भी उन्हीं से सीखी थी।

वह मुड़ीं और बिना कुछ कहे अपने कमरे की तरफ चली गईं। उनके जाते ही हॉल में अजीब-सा खालीपन भर गया। मैत्री ने धीरे से लंबी सांस ली, जैसे उसे राहत मिली हो कि असली भावनात्मक वार हो चुका है। रविंद्र चुप बैठे रहे। सौम्य वहीं स्थिर बैठा था। उसकी आंखें अपनी मां के जाते हुए कदमों पर टिकी थीं।

कुछ सेकंड बाद वह अचानक उठा और तेज कदमों से ऊपर चला गया। रूक्मणी के कमरे का दरवाजा आधा खुला था।

अंदर हल्की पीली रोशनी जल रही थी।

रूक्मणी खिड़की के पास खड़ी थीं। उनकी पीठ दरवाजे की तरफ थी। शायद वह खुद को संभालने की कोशिश कर रही थीं। सौम्य धीरे से अंदर आया।

“मां…”

रूक्मणी ने तुरंत अपनी आंखें पोंछ लीं, फिर सामान्य स्वर में बोलीं,

“तू नीचे जा। मुझे अभी अकेला रहने दे।”

लेकिन सौम्य वहीं खड़ा रहा। कुछ पल बाद वह धीरे-धीरे उनके पास आया।

“आप रो रही हैं…”

रूक्मणी ने तुरंत कहा,

“मैं नहीं रो रही, और अगर रो भी रही हूं तो उसका कारण तू नहीं समझेगा।”

सौम्य का सीना जैसे भारी हो गया।

“मैं समझता हूं मां…”

रूक्मणी उसकी तरफ मुड़ीं।

“नहीं समझता तू। अगर समझता, तो आज अपने पिता की आखिरी इच्छा पर सवाल नहीं उठाता।”

सौम्य चुप हो गया। कमरे में कुछ सेकंड तक सिर्फ घड़ी की टिक-टिक सुनाई देती रही। फिर उसने धीमे स्वर में कहा,

“मुझे शादी से डर लगता है मां।”

रूक्मणी की आंखें हल्की-सी बदलीं।

सौम्य पहली बार इतना खुलकर बोल रहा था।

“मैं लोगों की नजरें समझता हूं… उनके सवाल समझता हूं। सामने से कोई कुछ नहीं कहता, लेकिन पीछे सब कहते हैं। मैं नहीं चाहता कोई मेरी वजह से मजबूरी में जिंदगी बिताए।”

उसकी आवाज भर्रा गई।

“मैं नहीं चाहता कि कोई मुझे अपनाकर एहसान महसूस करे।”

रूक्मणी उसे देखती रहीं। उनका दिल अपने बेटे के लिए दर्द से भर उठा।

दुनिया ने उसे बाहर से जितना मजबूत देखा था, भीतर से वह उतना ही अकेला था। रूक्मणी धीरे से उसके पास आईं।

“हर रिश्ता दया पर नहीं बनता, सौम्य।”

सौम्य उनकी आंखों में देखते हुए बोला,

“लेकिन लोग मुझे सामान्य नहीं मानते।”

रूक्मणी ने दृढ़ स्वर में कहा,

“लोगों को भूल जा। मैंने तुझे हमेशा क्या सिखाया?”

सौम्य ने नजरें झुका लीं।

“कि खुद की इज्जत करना सीखो…”

वो उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोलीं,

“फिर आज तू खुद को इतना छोटा क्यों समझ रहा है?”

सौम्य के पास कोई जवाब नहीं था।

रूक्मणी ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

“तेरे पिता अगर आज जिंदा होते… तो उन्हें तुझ पर गर्व होता। तू उनकी सबसे बड़ी ताकत था, कमजोरी नहीं।”

सौम्य की आंखें भर आईं। वह धीरे से नीचे बैठ गया और अपना सिर रूक्मणी की गोद में रख दिया। बचपन के बाद शायद पहली बार। रूक्मणी की उंगलियां उसके बालों में चलने लगीं।

कमरे में एक लंबी चुप्पी फैल गई… मगर वह चुप्पी भारी नहीं थी।‌ उसमें मां और बेटे के बीच का वो रिश्ता था, जिसमें शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती। कुछ देर बाद सौम्य ने आंखें बंद किए हुए ही धीमे स्वर में कहा,

“अगर मैं हां कह दूं… तो आप खुश रहेंगी?”

रूक्मणी की उंगलियां एक पल को रुक गईं। उन्होंने नीचे देखा। उनका बेटा अब भी आंखें बंद किए उनकी गोद में सिर रखे था। लेकिन उसके चेहरे पर हार थी।

एक ऐसी हार, जो उसने अपनी मां की खुशी के आगे खुद से खाई थी।

रूक्मणी की आंखें फिर नम हो गईं।

उन्होंने धीरे से कहा,

“मुझे तेरी खुशी चाहिए, मजबूरी नहीं।”

सौम्य हल्का-सा मुस्कराया।

“मेरी खुशी आपसे अलग थोड़ी है मां…”

उसके शब्द सुनकर रूक्मणी का दिल भर आया। उन्होंने झुककर उसके माथे को चूम लिया। कमरे के बाहर खड़ी मैत्री और रविंद्र एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।

उनके चेहरों पर संतोष था।‌ क्योंकि उन्हें पता चल चुका था, सौम्य मान गया है।

आगे जानने के लिए बने रहीए ✨ 🙂

By ishra zafar aalam....

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