Beauty of Bride - Chapter 1
जयपुर की रात आज कुछ अलग थी. ऐसा लग रहा था जैसे पूरा शहर किसी बडे जश्न में डूबा हो. गलियों में लटकती रंग- बिरंगी झालरें, रोशनी से चमकती हवेलियां, हवा में घुली रजनीगंधा और गुलाब की खुशबू, और दूर कहीं बजती शहनाई—सब मिलकर इस रात को खास बना रहे थे. एक पुरानी हवेली, जो बाहर से भले ही साधारण दिखती थी, आज अंदर से दुल्हन की तरह सजी हुई थी. आंगन में एक छोटा सा मंडप बनाया गया था, जिसके चारों खंभों पर गेंदे और गुलाब के फूल लिपटे हुए थे. ऊपर से रंगीन कपडे लहराते हुए उसे और खूबसूरत बना रहे थे. मेहमानों की भीड थी—कोई हंस रहा था, कोई फुसफुसा रहा था, कोई इस रिश्ते की तारीफ कर रहा था, तो कोई अपनी नजरों से ही सवाल पूछ रहा था. लेकिन इस पूरे शोर और रोशनी के बीच एक अजीब सी बेचैनी थी, जो सिर्फ महसूस की जा सकती थी. देखी नहीं जा सकती थी घर के अंदर, एक छोटे से कमरे में, एक लडकी खडी थी—पाखी. लाल जोडे में सजी पाखी सच में बहुत सुंदर लग रही थी. उसके गोल चेहरे पर हल्का सा मेकअप, बडी- बडी आंखों में गाढा काजल, माथे पर सजी बिंदी, और होंठों पर मासूम सी मुस्कान. लेकिन उस मुस्कान में वो समझदारी नहीं थी, जो एक दुल्हन में होती है. उसमें बचपन की मासूमियत थी. उसके हाथों में गुडियां थीं—पुरानी, थोडी टूटी हुई, लेकिन उसके लिए दुनिया की सबसे कीमती चीज. वो उन्हें ऐसे सीने से लगाए खडी थी जैसे कोई बच्चा अपने खिलौनों को छोडने से डरता है. तभी दरवाजे पर कदमों की आहट हुई. पाखी बेटा. बाहर चलो, पंडित जी बुला रहे हैं. ये आवाज थी सुशीला की—उसकी मामी. पाखी ने धीरे से अपनी आंखें उठाईं, सुशीला को देखा, फिर अपनी गुडियों को और कसकर पकड लिया. नहीं मामी जी. मैं नहीं जाऊंगी. उसकी आवाज में जिद कम, डर ज्यादा था. क्यों बेटा? सुशीला ने बनावटी प्यार से पूछा. जब तक भैया नहीं आएंगे. मैं नहीं जाऊंगी. उसकी आंखों में एक भरोसा था—जैसे उसका पूरा संसार उसी“ भैया” पर टिका हो. सुशीला ने एक पल के लिए आंखें बंद कीं, खुद को शांत किया, फिर बोली अरे पाखी. करण का फोन आया था. वो रास्ते में है. थोडी देर में पहुंच जाएगा. तुम चलो ना. नहीं. पाखी यहीं बैठेगी. भैया आएंगे तो ही जाएगी. इतना कहकर वो धीरे से नीचे बैठ गई, अपना लहंगा फैलाकर, और अपनी गुडियों को गोद में रख लिया. अब सुशीला के चेहरे से नकली प्यार उतर चुका था. उसकी आंखों में चिढ और गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था. आज तो किसी भी हालत में इससे छुटकारा पाना ही है. उसने धीरे से खुद से कहा. फिर उसने तुरंत अपना फोन निकाला और किसी को Call लगाया“ जरा कमरे में आइए. आपकी लाडली भांजी फिर से नखरे दिखा रही है. कुछ ही देर में कमरे का दरवाजा फिर खुला. अंदर आए विनोद त्रिपाठी—पाखी के मामा. करीब पचास साल के, सलीके से पहना हुआ क्रीम रंग का कोट, सिर पर साफा, आंखों में चश्मा. लेकिन चेहरे पर एक अजीब सी घबराहट थी. क्या हुआ? उन्होंने धीमी आवाज में पूछा. सुशीला ने झुंझलाकर कहा“ क्या होगा? वही. ये मंडप में जाने से मना कर रही है! विनोद ने हाथ उठाकर उसे शांत किया तुम रहने दो. मैं बात करता हूं. वो धीरे- धीरे पाखी के पास गए. कुछ पल तक बस उसे देखते रहे. उसकी मासूमियत. उसकी दुनिया. जो अभी भी बचपन में अटकी हुई थी. एक पल के लिए उनके चेहरे पर अपराधबोध झलका, लेकिन अगले ही पल उन्होंने खुद को संभाल लिया. पाखी बेटा. उन्होंने नरमी से कहा. पाखी ने सिर उठाकर उन्हें देखा मामा जी. तुम तो चाहती थी ना कि तुम्हारी शादी हो? पाखी ने हल्का सा सिर हिलाया—“ हां. तो देखो. आज तुम्हारी शादी है. सब इंतजार कर रहे हैं. पाखी ने फिर वही जवाब दिया“ भैया आएंगे. तब जाऊंगी. सुशीला अब अपना सब्र खोने लगी थी. आप उससे यूं ही बात करते रहेंगे या कुछ करेंगे भी? उसने तेज आवाज में कहा. फिर बोली“ करण से बात करवाइए. तभी मानेगी. विनोद ने तुरंत फोन निकाला और करण का नंबर मिलाया. कुछ सेकंड बाद उन्होंने फोन पाखी को पकडा दिया. हेलो पाखी. दूसरी तरफ से आवाज आई. पाखी की आंखें चमक उठीं“ भैया! आप कहां हो? मैं रास्ते में हूं. बस थोडा समय लगेगा. तुम मामी जी की बात मान लो. आप आएंगे ना? पाखी ने डरते हुए पूछा. हां. मैं आ जाऊंगा. तुम बस मंडप में जाओ. ठीक है भैया. उसने धीरे से कहा. फोन cut गया. अब पाखी उठ खडी हुई. जैसे ही वो बाहर जाने लगी, सुशीला ने उसका हाथ पकड लिया“ रुको. दुल्हन ऐसे नहीं जाती. और ये जूस पी लो. पाखी ने बिना कुछ सोचे गिलास ले लिया और एक ही सांस में पी गई. सुशीला के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई अब कोई परेशानी नहीं होगी. पाखी के चेहरे पर घूंघट डाल दिया गया. मामी जी. मुझे दिखाई नहीं दे रहा. पाखी ने मासूमियत से कहा. बस मेरे साथ चलो. और चुप रहो. सुशीला ने सख्ती से कहा. पाखी ने तुरंत अपने होंठों पर उंगली रख ली. मंडप में दूल्हा पहले से बैठा था. पाखी को उसके पास बैठा दिया गया. चारों तरफ फुसफुसाहट शुरू हो गई“ किस्मत देखो लडकी की. इतने बडे घर में शादी. दूल्हा उम्र में बहुत बडा है. पैसा सब कुछ होता है. पंडित जी ने मंत्र पढना शुरू किया. फेरे शुरू हुए. पहला फेरा. दूसरा. तीसरा. अचानक पाखी लडखडा गई. उसकी पकड ढीली पड गई, जैसे उसकी ताकत खत्म हो रही हो. वो गिरने लगी लेकिन तभी दूल्हे ने उसे पकड लिया. और फिर बिना रुके. उसे अपनी बाहों में उठाकर बाकी फेरे पूरे करने लगा. सब लोग हैरान थे. किसी ने ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा था. शादी सम्पन्न हुई. अब आप दोनों पति- पत्नी हैं. पंडित जी ने घोषणा की इतने में विनोद का फोन बजा. उन्होंने Call उठाई. क्या. उनका चेहरा सफेद पड गया. धोखा हुआ है! वो जोर से चिल्लाए. ये दूल्हा नहीं है! पूरा माहौल एकदम से बदल गया. सुशीला दौडी. और दूल्हे का सेहरा हटाया. चेहरा देखते ही वो पीछे हट गई“ ये. ये कौन है? तभी कुछ हथियारबंद लोग अंदर घुस आए. उनके हाथों में बंदूकें थीं. शादी इसकी हुई है. लेकिन दुल्हन हम लेकर जाएंगे. पूरा आंगन सन्नाटे में डूब गया. वो लडका आगे बढा. करीब छह फीट लंबा, मजबूत कद- काठी, आंखों में अजीब सा आत्मविश्वास. अब नहीं पूछोगे मैं कौन हूं? उसने शांत लेकिन भारी आवाज में कहा. फिर खुद ही बोला“ नाम है. वीर प्रताप सिंह. वो पाखी को उठाकर बाहर खडी काली गाडी में ले गया. उसे पीछे की सीट पर लिटाया. फिर वापस आया और विनोद के सामने खडा हो गया. चिंता मत कीजिए. उसने ठंडी आवाज में कहा, आपकी बेटी अब हमारे महल में रहेगी. गाडी तेजी से निकल गई. हुकुम सा. कहां जाना है? ड्राइवर ने पूछा. फार्महाउस. वीर ने आंखें बंद करते हुए कहा. करीब आधे घंटे बाद गाडी अचानक रुक गई. झटका लगा, लेकिन वीर ने आंखें नहीं खोलीं. क्या हुआ? उसने पूछा. हुकुम सा सामने. अब वीर ने धीरे से आंखें खोलीं. सामने सडक पर कुछ गाडियां खडी थीं. कुछ लोग रास्ता रोककर खडे थे. वीर ने हल्की मुस्कान दी—“ ये लोग ऐसे नहीं मानेंगे. उसने धीरे से पूछा—“ गाडी में पटाखे हैं. ड्राइवर ने घबराकर सिर हिलाया—“ हां. वीर की आंखों में खतरनाक चमक उभरी. जैसे अब खेल शुरू होने वाला हो.