इश्तियाक! - Chapter 3
बढ़ते है कहानी की ओर---
हंसिका जैसे ही अंदर आई तो लाउंज में ही उसकी मां नैना बैठी हुई थी । उसे देखते ही उनके चेहरे पर राहत की लकीरें उभर आई । जबकि हंसिका रोते हुए सीधा अपनी मां से लिपट गई । नैना पहले तो हैरान हुई , मगर फिर उसकी पीठ को सहलाते हुए आहिस्ते से बोली - " हंसिका ! बेटा , क्या हुआ .. ? "
" मम्मी... वो .. वो बहुत बुरे है मम्मी । उन्होंने कहा कि भाई उनके पास नहीं है .. आपके सामने ही तो उन्होंने कहा था कि अगर मैने उनसे शादी की तो वह भाई को छोड़ देंगे । तो अब वह इंकार क्यों कर रहे है .. और .. और जब मैंने कहा कि आपने मेरे भाई को मार दिया तो वह कुछ नहीं बोले । " वह काफी बुरी तरह से रोए जा रहीं थी । जबकि उसकी बात सुनकर नैना को लगा जैसे उनके सिर पर सारा आसमान आ गिरा था । उन्होंने हंसिका को खुद से दूर किया और उसका चहरा अपनी हथेलियों में भर , बोली - " यह तुम क्या कह रहीं हो हंसिका .. ? क्या .. क्या सच्च में अलंकृत ने ऐसा कहा .. ? "
" ह.. हां .. मम्मी । "
नैना सुन्न हो गई । तो हंसिका उनकी कलाई पकड़कर बोली - " मम्मी .. मुझे पक्का यकीन है कि अलंकृत ने भाई के साथ कुछ तो किया है । या शायद उनकी जान ही ले ली अपनी नफरत में । तभी तो वह अब बहाने बना रहे है । "
नैना के चहरे के भाव सख्त हो गए , वह हंसिका की आंखों में देखती हुई बेहद गुस्से में बोली - " याद रखना हंसिका... अगर उसने तेरे भाई को मारा होगा ना , तो तुम उसे भी जिंदा ना छोड़ना । मार देना उसे । इसमें मैं तुम्हारा पूरा साथ दूंगी बेटा । "
नैना ने उसे अपने सीने से लगा लिया था । जबकि हंसिका का रोना अभी भी ज़ारी था ।
रात का करीब एक बज रहा था और क्लब अभी भी लोगों से भरा हुआ था । अलंकृत ने शराब का आखिरी ग्लास उठाया और एक झटके में उसे अपने मुंह में उड़ेल दिया था । वह शराब उसके गले को चीरती हुई अंदर उतर गई थी । खाली ग्लास को वापस काउंटर पर रखते हुए उसने आहिस्ते से गर्दन घुमा कर देखा , जहां उसके पीछे ही तन्मय चहरे पर चिंता की लकीरें लिए खड़ा था ।
अलंकृत हल्का सा मुस्कुराया और उठने की कोशिश करने लगा , मगर ज़्यादा शराब पीने की वजह से उससे सही से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था । तन्मय उसे सहारा दे कर बाहर गाड़ी तक लाया और फिर उसे पिछली सीट पर आराम से बैठा दिया ।
ड्राइवर को घर चलने का कहकर वह पीछे ही अलंकृत के पास बैठ गया था ताकि उसे सम्हाल सके । कुछ ही देर में उनकी गाड़ी एक बगले के बाहर आकर रुकी थी । ड्राइवर की मदद से तन्मय ने अलंकृत को उसके कमरे में पहुंचाया और दरवाजा बंद कर ख़ुद भी अपने घर जाने लगा कि तभी हॉल में ही आकर उसके कदम ठिठक गए थे । की अलंकृत की मां स्मृति वहां खड़ी थी ।
" क्या यह घर आने का वक्त है तन्मय .. ? " उन्होंने सख्त लहजे में कहा था ।
" मैने सर को मना किया था , मगर वह मेरी कहां सुनते है । आज भी क्लब गए थे । "
" जाओ तुम , मैं सुबह बात करती हूं तुम दोनो से । " स्मृति ने आहिस्ते से कहा । तो जी कहकर तन्मय वहां से फौरन निकल गया जबकि वह सीढ़ियों की तरफ बढ़ गई थी । अलंकृत के कमरे का दरवाज़ा खोल वह अंदर आई तो बिस्तर पर अलंकृत आराम से सो रहा था । उसे अच्छे से कंबल ओढ़ा कर स्मृति के चहरे पर एक नर्मी आ गई । झुक कर उसकी पेशानी चूमते हुए वह वहीं बिस्तर पर बैठ गई ।
नींद में ही अलंकृत ने करवट बदली और स्मृति की गोद में सिर पर लिया । वह वापस सो गया था , यह देख स्मृति ने आहिस्ते - आहिस्ते उसके बालो को सहलाना शुरू कर दिया । उसे इस हाल में देख उन्हें दुःख तो बहुत हो रहा था , मगर कहती क्या उसे की वह तो उनकी कोई बात सुनता ही नहीं था ।
की तभी उनकी नजर अलंकृत के हाथ की पुश्त पर गई , उन्होंने उसके हाथ को पकड़ गौर किया तो नाखूनों की गहरी खरोंचें उसकी जिल्द पर दर्ज थीं और उन्हीं खरोंचों के किनारों से जमा हुआ खून झांक रहा था ।
" क्या अलंकृत किसी लड़की के साथ था .. ? " स्मृति परेशान होकर मन - ही - मन बोली ।
अगली सुबह हैंगओवर की वजह से दुखते सिर के साथ अलंकृत बिस्तर से उठा और सबसे पहले शॉवर लिया । फिर ऑफिस जाने के लिए तैयार होकर वह नीचे आया तो स्मृति डाइनिंग टेबल पर नाश्ता रख रहीं थी । हेड ऑफ द फैमिली की कुर्सी पर इस वक्त उसके दादा यानी सुरजीत रावत बैठे थे ।
वह चुप - चाप अपनी कुर्सी पर आकर बैठा तो स्मृति उसकी प्लेट में नाश्ता परोसती हुई बोली - " आज शाम तुम फ्री हो , अलंकृत .. ? "
" नहीं ! " उसने बगैर अपनी मां की तरफ देखे कहा । और अपना नाश्ता करने लगा । स्मृति ने एक लाचारी से अपने ससुर जी को देखा और फिर वहां से किचन में ही चली गई ।
सुरजीत रावत अपने हाथ में पकड़े चाय के कप को टेबल पर रखते हुए बोले - " अगर फ्री ना हो तो , फ्री हो जाओ । क्योंकि आज शाम तुम टिया के साथ कॉफी डेट पर जा रहे हो । "
" व्हाट .. ? नो वे दादा जी । " अलंकृत ने हैरान होते हुए फ़ौरन इंकार किया था ।
" मैने तुमसे पूछा नहीं है बल्कि बताया है तो तुम्हे जाना ही है । " सुरजीत रावत ने बेहद सख्ती से यह कहा था ।
क्रमशः