I Want You Ch. 3

I Want You - Chapter 3

Posted by okenja • Mar 11, 2026 01:40 PM

​अर्चना के घर के पिछले दरवाजे से भागते हुए हेतु के पैर बर्फ की तरह ठंडे पड़ रहे थे। वह पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत भी नहीं कर पा रही थी। उसके कानों में लियोन थॉमसन की वो भारी, मशीनी आवाज़ किसी खौफनाक संगीत की तरह गूँज रही थी और उर्मिश राव का वो पर्सनल नंबर उसके दिमाग की नसों पर हथौड़े बरसा रहा था। वह बदहवास हालत में मुख्य सड़क पर आई, पसीने से तर-बतर चेहरा और आंखों में समाया आतंक उसे किसी और ही दुनिया की मुसाफिर बना रहा था। उसने कांपते हाथों से एक रिक्शा रोका और बिना मोल-भाव किए उसे सीधे अपने घर, राजावत हवेली की ओर चलने को कहा।

​पूरे रास्ते उसे लग रहा था कि हवा की सरसराहट भी उर्मिश का कोई संदेश ले कर आ रही है। जैसे ही रिक्शा बोटाद की शांत गलियों से होता हुआ उसकी हवेली के बरामदे के सामने रुका, हेतु ने राहत की एक लंबी सांस लेनी चाही, पर खौफ अभी खत्म नहीं हुआ था।

​सामने उसका छोटा भाई अपूर्व अपनी पुरानी साइकिल के साथ खेल रहा था। अपूर्व, जो हेतु से महज दो साल छोटा था, अपनी 'हेतु दीदी' का सबसे बड़ा मुरीद था। वह दिखने में भले ही छोटा था, लेकिन उसका हौसला और अपनी दीदी के प्रति लगाव उसे एक नन्हा रक्षक बनाता था।

​"दीदी! आप इतनी जल्दी वापस आ गईं? अर्चना दीदी तो कह रही थीं कि आप दो दिन रुकेंगी!" अपूर्व ने अपनी साइकिल स्टैंड पर खड़ी की और दौड़ते हुए हेतु के पास आया। लेकिन जैसे ही उसने करीब से अपनी दीदी का चेहरा देखा, उसके माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। "दीदी... आप रो क्यों रही हैं? क्या हुआ?"

​हेतु ने जल्दी से अपने दुपट्टे के कोने से आँसू पोंछे। वह नहीं चाहती थी कि उसकी वजह से उसके छोटे भाई के मासूम मन में कोई डर बैठे। उसने एक फीकी मुस्कान लाने की कोशिश की और कहा, "कुछ नहीं अपूर्व, बस... बाहर धूप बहुत तेज थी और शायद लू लग गई है, इसलिए सिर में बहुत दर्द हो रहा है।"

​अपूर्व अपनी दीदी को बहुत अच्छे से जानता था। वह उसकी आँखों में छिपी सच्चाई को भाँप गया। "झूठ! आपकी आँखें लाल हैं और आप काँप रही हैं। क्या अर्चना दीदी ने कुछ कहा? या उस शहर के किसी लड़के ने आपको परेशान किया? आप बस नाम बताइए, मैं अभी जाकर अपनी गुलेल से उसकी खिड़कियाँ तोड़ दूँगा!"

​"नहीं अपूर्व! तू कहीं नहीं जाएगा। बस चुपचाप मेरे साथ अंदर चल," हेतु ने लगभग उसे खींचते हुए घर के भारी दरवाजों के भीतर ले लिया।

​घर के भीतर का सन्नाटा

​अंदर का माहौल हमेशा की तरह शांत था। रसोई से छौंक की खुशबू आ रही थी, जहाँ उनकी मम्मी रीवा राजावत रात के खाने की तैयारी में जुटी थीं। हेतु ने उन्हें बिना कुछ बताए, बिना अपनी आवाज़ निकाले, सीधा सीढ़ियों की ओर दौड़ लगा दी। उसने अपने कमरे में घुसते ही दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और कुंडी चढ़ा दी।

​वह अपने बिस्तर पर गिर पड़ी और तकिये में मुँह छिपाकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसके दिमाग में बार-बार एक ही सवाल उठ रहा था—उर्मिश राव! वो 28 साल का ताकतवर आदमी, जिसके पास शोहरत और दौलत का अंबार था, वह आखिर उसके जैसी 15 साल की स्कूल जाने वाली लड़की के पीछे क्यों हाथ धोकर पड़ा था? उसे वो दिन याद आया जब उर्मिश ने उसे पहली बार देखा था। उसकी आँखों में कोई प्यार नहीं था, बल्कि एक शिकारी की भूख थी।

​बाहर खड़ा अपूर्व लगातार दरवाजे पर दस्तक दे रहा था। "दीदी, दरवाजा खोलो। देखो, मैं आपके लिए ठंडा पानी और मम्मी की बनाई हुई शिकंजी लाया हूँ। पी लो, सर का दर्द ठीक हो जाएगा।"

​हेतु ने गहरी सांस ली और खुद को संभाला। उसने दरवाजा खोला। अपूर्व के एक हाथ में पानी का गिलास था और दूसरे में चिंता। हेतु ने उसे कमरे के अंदर बुलाया और दरवाजा फिर से बंद कर लिया। उसने अपूर्व को अपने पास बिठाया और उसके छोटे-छोटे हाथों को अपने हाथों में ले लिया।

​"अपूर्व, मेरी बात ध्यान से सुन। आज से तू वादा कर... तू घर के बाहर अकेला कभी नहीं जाएगा। स्कूल भी जाएगा तो बस पापा के साथ। और अगर कोई भी अजनबी—चाहे वो कितना भी अच्छा क्यों न लगे—मेरा या तेरा नाम पूछे, तो तू बिना जवाब दिए भागकर घर के अंदर आ जाएगा," हेतु की आवाज़ में एक ऐसी दहशत थी जिसे सुनकर अपूर्व का चेहरा गंभीर हो गया।

​अपूर्व ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से दीदी को देखा और धीरे से पूछा, "दीदी, क्या वो काला सूट वाला आदमी आपको परेशान कर रहा है? जो बाहर बड़ी काली गाड़ी में बैठा था?"

​हेतु का खून जैसे जम गया। उसकी धड़कनें रुक सी गईं। "कौन सी गाड़ी, अपूर्व? तूने कब देखा?"

​"जब आप रिक्शे से आईं, उससे थोड़ी देर पहले जब मैं साइकिल चला रहा था... एक बहुत बड़ी और चमकती हुई काली गाड़ी हमारे घर के मोड़ पर खड़ी थी। उसमें एक अंकल बैठे थे, उन्होंने चश्मा पहना था। उन्होंने मुझे देखकर अपनी गाड़ी का शीशा नीचे किया था और मुझे घूर रहे थे। पर मैंने याद रखा कि पापा ने कहा है अजनबियों से बात नहीं करनी, इसलिए मैं भाग आया," अपूर्व ने बड़ी बहादुरी से अपनी बात खत्म की।

​हेतु समझ गई कि उर्मिश का साया उसके घर की दहलीज तक पहुँच चुका है।

​उर्मिश का अगला कदम: एक खौफनाक कॉल

​इधर, अहमदाबाद के एक पॉश इलाके की सबसे ऊँची इमारत के टॉप फ्लोर पर, उर्मिश राव अपने आलीशान केबिन में बैठा था। कमरे में रोशनी मद्धम थी और बाहर शहर की लाइटें किसी बेशकीमती हार की तरह चमक रही थीं। उर्मिश के हाथ में वही विजिटिंग कार्ड था जिस पर उसका पर्सनल नंबर लिखा था।

​तभी लियोन थॉमसन ने केबिन में प्रवेश किया। "सर, हेतु अर्चना के घर से भाग निकली है। वो बहुत ज्यादा डर गई है।"

​उर्मिश के पतले होठों पर एक क्रूर और संतोषजनक मुस्कान तैर गई। उसने अपनी कुर्सी को खिड़की की ओर घुमाया। "डरना जरूरी है, लियोन। जब तक शिकार को अपनी बेबसी का अहसास न हो, तब तक शिकारी को अपनी ताकत का असली मज़ा नहीं आता। वो अपने घर बोटाद भाग गई होगी। उसे लगा होगा कि उसके पापा की हवेली और वो पुरानी दीवारें उसे मुझसे बचा लेंगी।"

​उर्मिश ने अपनी टेबल पर रखा फोन उठाया और एक नंबर डायल किया। यह नंबर विजय शंकर राजावत का था। उर्मिश के लिए किसी का भी डेटा निकलवाना महज चंद मिनटों का खेल था।

​फोन की घंटियाँ बजीं। दूसरी तरफ से एक रौबीली और भारी आवाज़ आई, "हेलो? कौन बोल रहा है?"

​"नमस्ते, विजय शंकर राजावत जी। उम्मीद है आप खैरियत से होंगे। मैं उर्मिश राव बोल रहा हूँ," उर्मिश की आवाज़ में एक रेशमी मखमलीपन था, जो किसी भी इंसान को चौकन्ना कर दे।

​विजय शंकर का नाम सुनते ही उर्मिश का माथा ठनका। उन्होंने उर्मिश राव का नाम बिजनेस की दुनिया में सुना था। "उर्मिश राव? आपको मेरा नंबर कहाँ से मिला? और आप इस वक्त मुझे फोन क्यों कर रहे हैं?"

​"मैं आपसे कुछ खास नहीं चाहता, विजय जी। मैं बस आपकी प्यारी बेटी, हेतु की खैरियत पूछना चाहता था। सुना है आज वो अपनी बहन के घर से बहुत घबराकर भागी है। शायद बड़े शहरों की चकाचौंध और रसूखदार लोगों की मौजूदगी उसे रास नहीं आई। छोटे शहरों की मासूम लड़कियां अक्सर बड़े शहरों की चमक से डर जाती हैं, है ना?" उर्मिश की आवाज़ में एक साफ़ चुनौती और धमकी छिपी थी।

​विजय शंकर का खून खौल उठा। एक अनजान आदमी उनकी 15 साल की बेटी का नाम इतनी बेबाकी से ले रहा था। "मेरी बेटी के बारे में बात करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? तुम कौन होते हो उसकी खैरियत पूछने वाले? खबरदार जो दोबारा मेरे परिवार की ओर आँख उठा कर भी देखा! पुलिस में तुम्हारी रिपोर्ट करते मुझे देर नहीं लगेगी!"

​उर्मिश ने बिना कोई जवाब दिए फोन काट दिया और अँधेरे कमरे में जोर से हँसा। "पुलिस? रिपोर्ट? गुस्सा... मुझे राजावत खानदान का ये पुराना और बेअसर गुस्सा बहुत पसंद आया। अब इस खेल में असली मज़ा आएगा।"

​डर का साया गहराता हुआ

​बोटाद की उस शांत हवेली में अब बेचैनी का धुआं फैल गया था। विजय शंकर ने फोन रखते ही तुरंत हेतु को नीचे हॉल में बुलाया। हेतु के साथ-साथ छोटा अपूर्व भी अपनी दीदी का हाथ थामे पीछे-पीछे आया।

​"हेतु, आज अर्चना के घर असल में क्या हुआ था? क्या कोई तुमसे मिलने आया था या किसी ने तुम्हारा पीछा किया?" पापा की आवाज़ में वो फिक्र थी जो हेतु ने पहले कभी नहीं देखी थी।

​हेतु अब और नहीं छिप सकती थी। उसने कांपती आवाज़ में सारी बात सच-सच बता दी। लियोन थॉमसन का अर्चना के घर आना, उसकी तस्वीर दिखाना, उर्मिश का उसे 'पागलों की तरह' ढूंढना और वो खतरनाक कार्ड। यह सब सुनकर रीवा राजावत के हाथ से खाने की थाली छूटकर गिर गई।

​"हे भगवान! वो दरिंदा हमारी मासूम बच्ची के पीछे हाथ धोकर पड़ गया है? हमने किसी का क्या बिगाड़ा है?" रीवा की आँखों से आंसू बहने लगे।

​विजय शंकर की मुट्ठियाँ भिंच गईं। उन्हें पता था कि उर्मिश राव कोई साधारण अपराधी नहीं है, बल्कि एक ऐसा तूफान है जिसके पास कानून को खरीदने और जिंदगियों को तबाह करने की ताकत है।

​छोटा अपूर्व, जो अब तक खामोशी से सब सुन रहा था, आगे बढ़ा। उसने अपनी दीदी के हाथ को मजबूती से पकड़ा। "पापा, आप चिंता मत करो। मैं दीदी को कहीं अकेला नहीं जाने दूंगा। और अगर वो गंदा आदमी यहाँ आया, तो मैं अपनी क्रिकेट बैट से उसका सिर फोड़ दूँगा! मैं दीदी का छोटा रक्षक हूँ ना?"

​विजय शंकर ने भरे मन से अपूर्व को गले लगा लिया। उन्होंने अपने आदमियों को हवेली के मुख्य गेट पर तैनात रहने को कहा। उस रात, राजावत हवेली के भारी गेटों पर ताले जड़ दिए गए। घर के अंदर सब जाग रहे थे।

​देर रात, हेतु ने अपने कमरे की खिड़की का पर्दा थोड़ा सा सरकाया। दूर, हवेली की बाउंड्री वॉल के पास वाली सड़क के मोड़ पर, दो हेडलाइट्स अँधेरे में चमक रही थीं। वह काली गाड़ी अभी भी वहीं थी। उर्मिश राव की नजरें अभी भी उस पर गड़ी थीं। हेतु को अहसास हुआ कि यह सिर्फ एक शुरुआत थी—एक ऐसे अंत की ओर, जो शायद सब कुछ बदल देने वाला था

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