I Want You Ch. 1

I Want You - Chapter 1

Posted by okenja • Mar 11, 2026 10:50 AM

​अहमदाबाद की चकाचौंध भरी रातों में जहाँ लोग सुकून ढूंढते हैं, वहीं उर्मिश राव के भीतर एक अजीब सी बेचैनी पल रही थी। 28 साल की उम्र में उर्मिश ने वो सब कुछ हासिल कर लिया था जिसे लोग सपना कहते हैं। ऊँचा कद, गठीला बदन, और आँखों में एक ऐसी ठंडी चमक जो किसी को भी झुका दे। माता-पिता के एक एक्सीडेंट में असमय चले जाने के बाद, उसने अपनी छोटी बहन निया को ही अपनी दुनिया माना था, लेकिन हकीकत में उर्मिश का स्वभाव बहुत अलग था। वह एक ऐसा शिकारी था जिसे जो पसंद आता, उसे वह हासिल करके ही दम लेता।

​"मुझे वो लड़की चाहिए... किसी भी कीमत पर!" उर्मिश के भारी स्वर ने कमरे के सन्नाटे को चीर दिया।

​उसके सामने खड़े उसके वफादार बॉडीगार्ड्स ने सिर झुका लिया। उर्मिश के हाथ में शराब का गिलास था, लेकिन उसका ध्यान कहीं और था। उसे याद आ रहा था अपनी बहन निया का वो जन्मदिन, जहाँ उसने उसे पहली बार देखा था।

​भीड़ के बीच, सफ़ेद रंग के अनारकली सूट में लिपटी, मासूमियत की मूरत— हितवंशी राजावत उर्फ हेतु। केवल 15 साल की वह चंचल लड़की, जिसकी मुस्कुराहट में वो सादगी थी जो उर्मिश ने अपनी अंधेरी दुनिया में कभी नहीं देखी थी। हेतु अपनी चचेरी बहन अर्चना के साथ आई थी, जो निया की सहेली थी। अर्चना, हेतु के बड़े पापा की बेटी थी। उर्मिश ने उस दिन बस एक झलक देखी थी, और उसी पल उसने तय कर लिया था कि यह लड़की उसकी होगी।

​राजावत हवेली का सुकून

​दूसरी ओर, बोटाद के पास स्थित अपनी पुश्तैनी हवेली में हेतु पूरी तरह बेखबर थी। वह अपने पिता विजय शंकर राजावत की लाड़ली थी। विजय शंकर इलाके के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे, जिनके लिए उसूल ही सब कुछ थे। घर में हेतु का सबसे बड़ा सहारा उसका भाई अपूर्व राजावत था, जो अपनी छोटी बहन पर जान छिड़कता था।

​"हेतु! फिर से अपनी पेंटिंग की किताबों में खो गई? चल, माँ बुला रही हैं," अपूर्व ने उसके कमरे में दाखिल होते हुए कहा।

​हेतु ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें ऊपर उठाईं और मुस्कुरा दी। "भैया, बस पाँच मिनट! मम्मी को बोलिए मैं आ रही हूँ।"

​नीचे रसोई में उसकी माँ रीवा राजावत खाने की तैयारी कर रही थीं। पूरा परिवार एक सादगी और प्रेम के बंधन में बंधा था। उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि कोई उनकी इस मासूम गुड़िया पर अपनी काली नज़र गड़ाए बैठा है। हेतु अभी बच्ची ही तो थी, उसे दुनिया के छल-कपट और उर्मिश जैसे जुनूनी इंसानों के बारे में कुछ नहीं पता था।

​तलाश और पागलपन

​अहमदाबाद के अपने पेंटहाउस में उर्मिश पागलों की तरह टहल रहा था। उसने अपने टेबल पर रखे सामान को एक झटके में नीचे गिरा दिया।

​"तीन दिन हो गए! मुझे अभी तक उसका पता क्यों नहीं चला?" उर्मिश दहाड़ा।

​तभी उसका एक आदमी अंदर आया, "सर, वो लड़की... उसका नाम हेतु है। हितवंशी राजावत। वो अर्चना मैम की कजिन है और फिलहाल अपने पुश्तैनी गांव में है। उसके पिता विजय शंकर राजावत हैं।"

​उर्मिश के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान दौड़ गई। "राजावत... नाम तो सुना है। पर उर्मिश राव को इससे फर्क नहीं पड़ता कि वो किसकी बेटी है। जो मुझे पसंद आ गया, वो मेरा है। यही मेरा नियम है।"

​उसकी छोटी बहन निया उसके पास आई। वह अपने भाई के इस रूप से वाकिफ थी, पर कभी कुछ कह नहीं पाती थी। "भाई, आप फिर से वही कर रहे हैं? वो अभी बहुत छोटी है, अर्चना बता रही थी कि वो अभी स्कूल में है।"

​उर्मिश ने निया की तरफ देखा, उसकी आँखों में कोई पछतावा नहीं था। "निया, तू जानती है मुझे मना सुनना पसंद नहीं है। मैंने उसे देखा, मुझे वो पसंद आई, बात खत्म। अब उसे मेरे पास होना चाहिए।"

​बढ़ती नजदीकियां और खतरे की आहट

​अगले कुछ दिनों में उर्मिश ने अपनी पूरी ताकत हेतु का पता लगाने और उसके परिवार की जानकारी निकालने में लगा दी। उसने अर्चना के जरिए हेतु के घर तक पहुँचने का रास्ता बनाना शुरू किया। उर्मिश का पागलपन इस हद तक था कि उसने हेतु की चोरी-छिपे खींची गई तस्वीरों से अपना कमरा भर लिया था।

​वो हेतु की मासूमियत का कायल था, लेकिन उसकी नीयत पाक नहीं थी। वह उसे प्यार नहीं करना चाहता था, वह उसे 'हासिल' करना चाहता था।

​इधर, हेतु अपनी पढ़ाई और सहेलियों के साथ व्यस्त थी। एक दिन जब वह अर्चना के साथ बाज़ार गई थी, उसे महसूस हुआ कि कोई उसका पीछा कर रहा है।

​"दीदी, मुझे डर लग रहा है। ऐसा लग रहा है कोई हमें देख रहा है," हेतु ने अर्चना का हाथ पकड़ते हुए कहा।

​अर्चना ने आसपास देखा, "अरे पगली, यहाँ कौन होगा? तू बस ज्यादा सोच रही है।"

​लेकिन हेतु गलत नहीं थी। कुछ दूरी पर एक काली कांच वाली गाड़ी खड़ी थी, जिसके अंदर बैठा उर्मिश उसे एकटक निहार रहा था। उसने अपने फोन में हेतु की एक ताज़ा तस्वीर कैद की और बुदबुदाया, "जल्द ही तुम इस हवेली से निकलकर मेरे पिंजरे में होगी, हेतु।"

​टकराव की भूमिका

​कहानी अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ी थी जहाँ एक तरफ सादगी और संस्कारों से भरा राजावत परिवार था, और दूसरी तरफ उर्मिश राव का काला साया। विजय शंकर राजावत अपनी बेटी के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे, और अपूर्व अपनी बहन की ढाल था।

​लेकिन उर्मिश राव को हारना नहीं आता था। उसे बस ये पता था कि उसे 'वो कद' की लड़की चाहिए, जो उस दिन उस सफ़ेद सूट में किसी अप्सरा जैसी लग रही थी।

​उस रात, उर्मिश ने अपनी डायरी में लिखा— 'हितवंशी... तुम अभी 15 की हो या 25 की, इससे मुझे फर्क नहीं पड़ता। फर्क सिर्फ इससे पड़ता है कि तुम उर्मिश राव की पसंद हो। और मेरी पसंद को छीनने की हिम्मत विधाता में भी नहीं है।'

​खतरा अब हेतु के दरवाजे तक पहुँच चुका था। क्या विजय शंकर और अपूर्व अपनी लाड़ली को इस शिकारी से बचा पाएंगे? या उर्मिश का ये पागलपन इस मासूम परिवार को तबाह कर देगा?

​अगले एपिसोड में: उर्मिश का हेतु के घर में एक मेहमान बनकर दाखिल होना और अपूर्व का उस पर शक करना। क्या हेतु समझ पाएगी उर्मिश के इरादे?

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