Ek Tadap - Chapter 3
Chicago की सर्द सुबह थी। खिड़की के बाहर हल्की बर्फ गिर रही थी। शहर की सड़कों पर सफेद परत जम चुकी थी। रितिका रसोई में खड़ी चाय बना रही थी। अब वो पहले जैसी चुप रहने वाली लड़की नहीं रही थी। उसने खुद को थोड़ा संभाल लिया था। कॉलेज जाना, असाइनमेंट करना, घर के छोटे काम संभालना — वह कोशिश कर रही थी कि अंयाश पर बोझ कम पड़े।
अंयाश ऑफिस जाने की तैयारी कर रहा था, लेकिन उसकी आँखों के नीचे हल्की सूजन थी। वह कई रातों से ठीक से सो नहीं पाया था। रितिका ने उसे देखा और पहली बार गंभीर होकर पूछा, “आप ठीक हो?”
“हाँ,” उसने हमेशा की तरह छोटा-सा जवाब दिया।
लेकिन इस बार रितिका ने बात वहीं खत्म नहीं की। “आप हर बार यही कहते हो… लेकिन आप ठीक नहीं हो।”
अंयाश रुक गया। उसने उसकी तरफ देखा। उसे एहसास हुआ कि रितिका अब सिर्फ संभाले जाने वाली नहीं रही, वो समझने लगी है।
दिन सामान्य ही बीता। शाम को अंयाश देर से लौटा। बाहर ठंडी हवा थी। उसने दरवाज़ा खोला तो घर में अजीब-सी खामोशी थी। रितिका सोफे पर बैठी किताब पढ़ रही थी। उसने मुस्कुराकर कहा, “आज मैंने खुद खाना बनाया है।”
अंयाश हल्का मुस्कुराया, लेकिन उसकी मुस्कान अधूरी थी। खाना खाते समय वह बहुत कम बोला। रितिका समझ रही थी — कुछ अंदर चल रहा है।
रात को अचानक बिजली चली गई। कमरा अंधेरे में डूब गया। बाहर तेज़ हवा चल रही थी। उस अंधेरे और सन्नाटे में अचानक अंयाश के अंदर कुछ टूट गया।
उसे वो रात याद आ गई — प्लेन का झटका, लोगों की चीखें, रितिका का उसका हाथ कसकर पकड़ना, और फिर… अंधेरा।
उसकी सांसें तेज़ हो गईं। वह खड़ा हुआ और बालकनी की तरफ चला गया। ठंडी हवा उसके चेहरे पर लग रही थी, लेकिन उसके अंदर आग जल रही थी।
रितिका पीछे-पीछे आई। “भैया?”
अचानक अंयाश की आवाज़ काँप गई। “मैं उन्हें बचा क्यों नहीं पाया?”
ये शब्द उसके अंदर एक महीने से दबे थे। आज बाहर आ गए।
“मैं बड़ा था… मुझे कुछ करना चाहिए था… पापा… मम्मी… रिया दी… सब चले गए… और मैं कुछ नहीं कर पाया…”
उसकी आँखों से आँसू गिर पड़े। शायद हादसे के बाद पहली बार वह खुलकर रो रहा था।
रितिका कुछ पल उसे देखती रही। उसने पहली बार अपने मजबूत, mature, हमेशा संभालने वाले भैया को टूटते देखा।
वह आगे बढ़ी और उसके सामने खड़ी हो गई। “आप भगवान नहीं थे,” उसने धीमे लेकिन साफ़ शब्दों में कहा। “वो हादसा था। आपकी गलती नहीं।”
अंयाश ने सिर झुका लिया। “लेकिन मैं उन्हें छोड़कर जिंदा हूँ…”
“नहीं,” रितिका ने उसका चेहरा ऊपर उठाया। “आप मुझे लेकर जिंदा हो। अगर आप नहीं होते… तो मैं भी नहीं होती।”
उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज़ मजबूत थी।
“आपने मुझे संभाला। आपने मुझे यहाँ लाकर खड़ा किया। अगर आप टूट जाओगे… तो मैं कैसे खड़ी रहूँगी?”
उसके शब्दों ने अंयाश को झकझोर दिया।
कुछ पल दोनों चुप रहे। बाहर बर्फ गिरती रही।
फिर अंयाश ने धीरे से कहा, “मुझे डर लगता है… तुम्हें खोने से।”
रितिका ने बिना झिझक उसका हाथ पकड़ लिया। “मैं कहीं नहीं जा रही। आप अकेले नहीं हो।”
उस रात दोनों सोफे पर बैठे रहे। बातें करते रहे — मम्मी की आदतें, पापा की डाँट, रिया दी के मज़ाक। पहली बार उन्होंने यादों को रोकर नहीं, मुस्कुराकर याद किया।
रितिका ने कहा, “हम उनका नाम ऐसे जिंदा रखेंगे… कि वो हम पर गर्व करें।”
अंयाश ने उसकी तरफ देखा। उसे महसूस हुआ कि वो छोटी लड़की अब मजबूत हो रही है।
“तुम बदल गई हो,” उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा।
“नहीं,” रितिका बोली, “बस अब मैं आपको भी संभालना चाहती हूँ।”
सुबह जब धूप फिर से कमरे में आई, कुछ बदला हुआ था। दर्द अब भी था, लेकिन अब वो साझा था। अब वो अकेले नहीं लड़ रहे थे।
अंयाश ऑफिस जाने से पहले रुका और बोला, “आज से हम सिर्फ survive नहीं करेंगे… हम जिएँगे।”
रितिका ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ भैया।”
लेकिन उसी समय अंयाश का फोन वाइब्रेट हुआ। एक अनजान नंबर से मैसेज था—
“You survived for a reason.”
उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
रितिका ने पूछा, “किसका मैसेज है?”
अंयाश ने स्क्रीन बंद कर दी। “गलत नंबर होगा।”
लेकिन उसके दिल में फिर वही बेचैनी लौट आई।
क्या हादसा सच में सिर्फ हादसा था?
या कोई वजह थी उनके जिंदा बचने की?
Chicago की सुबह शांत थी…
लेकिन उनकी कहानी अब एक नए मोड़ की तरफ बढ़ रही थी।
Chicago की रात असामान्य रूप से शांत थी, लेकिन शहर के एक ऊँचे, काँच से घिरे पेंटहाउस में सन्नाटा खतरनाक था। अंदर खड़ा था Alex Ventana — ठंडी आँखें, सटीक दिमाग, और चेहरे पर अजीब-सी स्थिरता। वह ऐसा आदमी था जो मुस्कुराते हुए भी किसी की ज़िंदगी खत्म कर सकता था।
उसके सामने टेबल पर कुछ फाइलें खुली थीं। एक फोटो में अंयाश और रितिका थे — Seabrook के पुलिस स्टेशन के बाहर की CCTV तस्वीर।
Alex ने धीमी आवाज़ में कहा, “So… they survived.”
उसके पीछे खड़ा उसका आदमी बोला, “Sir, हमें लगा था कोई नहीं बचेगा।”
Alex ने हल्की हँसी हँसी। “मैं कभी ‘लगने’ पर काम नहीं करता। मैं यकीन करता हूँ।”
सच ये था कि प्लेन क्रैश सिर्फ हादसा नहीं था। Alex ने अपने ही गैंग के एक सदस्य, जैक, को खत्म करने के लिए पूरा प्लान बनाया था। जैक उस पर भारी पड़ने लगा था। उसके पास ऐसी जानकारी थी जो Alex के पूरे नेटवर्क को गिरा सकती थी। इसलिए Alex ने ऐसा रास्ता चुना जहाँ मौत ‘हादसा’ लगे।
फ्लाइट में जैक था।
और उसी फ्लाइट में अंयाश और रितिका भी।
प्लान साफ था — तूफान के बीच तकनीकी खराबी, फिर समुद्र। कोई सबूत नहीं। कोई सवाल नहीं।
लेकिन Alex को एक बात का अंदाज़ा नहीं था — कुछ लोग बच जाएँगे।
क्रैश के बाद उसकी टीम ने मलबे की निगरानी की थी। उसे रिपोर्ट मिली थी कि कुछ लोग जिंदा निकले, लेकिन उन्हें coast guard ने rescue कर लिया और सरकारी सुरक्षा के तहत अलग-अलग जगह भेज दिया गया। कुछ को वापस भारत भेजा गया। कुछ की पहचान बदल दी गई।
लेकिन एक चीज़ Alex को बेचैन कर रही थी — जैक की आखिरी digital key।
जैक के पास एक encrypted data था, जिसे खोलने के लिए दो हिस्सों की ज़रूरत थी। Alex को शक था कि वो आधी key किसी तरह उन दो बचे हुए लोगों तक पहुँच गई है। शायद जैक ने आखिरी पल में कुछ ट्रांसफर किया। शायद उसने किसी को चुन लिया।
और अब Alex को लगा — वो दो लोग अंयाश और रितिका हैं।
“Find everything about them,” Alex ने आदेश दिया।
कुछ ही घंटों में पूरी रिपोर्ट उसके सामने थी।
नाम — Aayansh Virani.
साथ में — Ritika Kashyap.
Current location — Chicago.
Alex की आँखों में चमक आई। “Interesting.”
उधर, Chicago में अंयाश को वही अनजान मैसेज फिर मिला —
“You survived for a reason.”
वह मैसेज उसे चैन से सोने नहीं दे रहा था। उसने रितिका से कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके मन में शक गहरा रहा था।
उसी रात Alex ने अपने एक आदमी को Chicago भेजा।
“उनपर नजर रखो। सीधे मत छूना। पहले यकीन करो कि key उनके पास है।”
अगले कुछ दिन अजीब रहे। अंयाश को बार-बार महसूस होता कि कोई उसका पीछा कर रहा है। ऑफिस से निकलते वक्त, मेट्रो में, यहाँ तक कि अपार्टमेंट के नीचे भी एक काली SUV कई बार दिखाई देती।
रितिका ने एक शाम कहा, “आप इतने चुप क्यों हो गए हो?”
अंयाश ने टाल दिया, “काम का तनाव है।”
लेकिन सच ये था कि उसका instinct उसे चेतावनी दे रहा था।