Ek Tadap Ch. 2

Ek Tadap - Chapter 2

Posted by okenja • Feb 28, 2026 04:02 PM

Episode 2 — नई शुरुआत, नई जिम्मेदारी

Seabrook के उस छोटे-से तटीय शहर में तीन दिन बीत चुके थे। समुद्र अब शांत था, जैसे कुछ हुआ ही न हो, लेकिन अंयाश और रितिका की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल चुकी थी। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद वे एक साधारण-से मोटल में ठहरे हुए थे। कमरे में हल्की-सी दवा की गंध अब भी रितिका को हादसे की याद दिला देती थी। वह रात को कई बार उठ जाती, घबराकर अंयाश को पुकारती, और अंयाश हर बार तुरंत उसके पास आकर बैठ जाता।

अंयाश समझ चुका था कि यहाँ रुकना सही नहीं। यह शहर उन्हें सुरक्षा नहीं दे सकता था, न जवाब। जिस फ्लाइट में उनके परिवार थे, उसकी खबर तक साफ़ नहीं मिल रही थी। जैसे वह हादसा दुनिया की नजरों से गायब हो गया हो। एक शाम उसने खिड़की से बाहर देखते हुए फैसला किया।

“रितिका, हमें यहाँ से जाना होगा,” उसने शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा।

रितिका ने चौंककर उसकी तरफ देखा। “कहाँ?”

“Chicago। बड़ा शहर है, मौके हैं। यहाँ हम बस यादों में अटके रहेंगे।”

उसकी आवाज़ में थकान थी, पर डर नहीं। वह खुद अंदर से टूटा हुआ था, लेकिन रितिका के सामने वह कभी कमजोर नहीं पड़ता। उसने तय कर लिया था कि अब वह सिर्फ बड़ा भाई नहीं, बल्कि सहारा बनेगा।

दो दिन बाद वे बस में बैठे थे। लंबा सफर था। रास्ते में फैले हाईवे, दूर-दूर तक खेत, छोटे कस्बे—सब पीछे छूटते जा रहे थे। रितिका चुप थी। वह खिड़की से बाहर देख रही थी, पर उसकी आँखें कहीं और थीं।

“आपने इंडिया वापस जाने के बारे में सोचा भी नहीं?” उसने धीमे से पूछा।

अंयाश कुछ देर चुप रहा। उसके मन में माँ की मुस्कान, पापा की आवाज़, रिया दी की हँसी गूंज उठी। “सोचा था,” उसने धीरे से कहा, “लेकिन अगर मैं वहाँ गया तो हर दिन टूट जाऊँगा। वहाँ हर कोना उनकी याद दिलाएगा। यहाँ कम से कम मैं तुम्हारे लिए मजबूत रह सकता हूँ।”

रितिका ने पहली बार महसूस किया कि उसका भैया कितना बड़ा दर्द छिपाए बैठा है। उसने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया। उस स्पर्श में भरोसा था, और एक अनकहा वादा भी।

Chicago पहुँचते ही उन्हें शहर की रफ्तार ने घेर लिया। ऊँची-ऊँची इमारतें, तेज़ ट्रैफिक, अनजान चेहरे—सब कुछ नया था। रितिका हल्का-सा घबरा गई। उसने अंयाश के करीब आकर कहा, “हम सच में यहाँ रह पाएंगे?”

अंयाश ने बिना झिझक जवाब दिया, “हाँ। क्योंकि अब हमारे पास पीछे लौटने का रास्ता नहीं, सिर्फ आगे बढ़ने का है।”

उन्होंने एक छोटे-से अपार्टमेंट में कमरा किराए पर लिया। जगह साधारण थी—एक कमरा, छोटी-सी रसोई, और खिड़की से दिखती शहर की रोशनी। मकान मालिक ने फॉर्म भरते समय पूछा, “Relationship?”

अंयाश ने तुरंत कहा, “She is my younger sister.”

रितिका ने उसकी तरफ देखा। उसके शब्दों में सुरक्षा थी। वह समझ गई कि यह सिर्फ एक जवाब नहीं, बल्कि एक निर्णय था। वह उसे दुनिया के सामने अपनी जिम्मेदारी मान चुका था।

अगले ही दिन से अंयाश नौकरी की तलाश में निकल पड़ा। रिज़्यूमे हाथ में लेकर वह ऑफिस-ऑफिस घूमता। हर जगह नई उम्मीद, हर जगह इंतज़ार। कई बार उसे सीधे मना कर दिया गया। कुछ जगहों पर कहा गया, “We’ll get back to you,” लेकिन जवाब नहीं आया।

शाम को वह थका हुआ लौटता, लेकिन दरवाज़ा खुलते ही मुस्कुरा देता। रितिका पूछती, “कुछ मिला?” और वह हर बार कहता, “मिलेगा। अभी शुरुआत है।”

असल में उसके भीतर डर था। पैसे सीमित थे। किराया देना था। खाने का खर्च था। रितिका की पढ़ाई का सवाल था। लेकिन उसने तय किया था कि वह डर को चेहरे पर नहीं आने देगा।

एक रात रितिका ने कहा, “अगर हम इंडिया चले जाते तो…?”

अंयाश ने उसकी बात बीच में ही रोक दी। “अभी नहीं। जब तक मैं खुद को संभाल नहीं लेता, तब तक नहीं। मैं वहाँ जाकर कमजोर नहीं पड़ सकता।”

उसकी आँखें हल्की-सी नम थीं, लेकिन आवाज़ स्थिर। उसने माँ-पापा को खो दिया था। अब वह रितिका को असुरक्षित महसूस नहीं होने देना चाहता था।

कुछ दिनों बाद उसे एक इंटरव्यू कॉल आया। एक मध्यम आकार की कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर की पोस्ट थी। इंटरव्यू के दिन उसने साधारण-सा शर्ट पहना, बाल ठीक किए और आईने में खुद को देखा। उसे लगा जैसे वह सिर्फ नौकरी के लिए नहीं, बल्कि अपनी नई जिंदगी के लिए लड़ रहा है।

इंटरव्यू लंबा चला। उससे उसके अनुभव, उसकी पढ़ाई, उसके पिछले काम के बारे में पूछा गया। उसने पूरे आत्मविश्वास से जवाब दिया। जब वह बाहर निकला तो पहली बार उसे लगा कि शायद यह मौका मिल सकता है।

दो दिन बाद फोन आया। उसे नौकरी मिल गई थी।

वह घर लौटा तो रितिका रसोई में खड़ी थी। “क्या हुआ?” उसने उत्सुकता से पूछा।

अंयाश ने मुस्कुराकर कहा, “तैयार हो जाओ, तुम्हारे भैया की नौकरी लग गई।”

रितिका की आँखों में आँसू आ गए। उसने बिना सोचे उसे गले लगा लिया। उस गले लगाने में राहत थी, सुरक्षा थी, और एक नया विश्वास था।

पहली सैलरी मिलने पर अंयाश ने बहुत सोच-समझकर खर्च तय किया। उसने आधा पैसा बचत में डाला और आधा घर के खर्च के लिए रखा। उसने साफ कहा, “रितिका, तुम अपनी पढ़ाई जारी रखोगी। यह शहर तुम्हारे सपनों को रोकेगा नहीं।”

“लेकिन आपकी?” उसने पूछा।

अंयाश हल्का-सा मुस्कुराया। “मेरे सपने अभी तुम हो।”

रितिका चुप हो गई। वह समझ नहीं पा रही थी कि उसका भैया कितना त्याग कर रहा है।

धीरे-धीरे उनकी दिनचर्या बन गई। सुबह अंयाश ऑफिस जाता, रितिका कॉलेज की तैयारी करती। शाम को दोनों साथ खाना बनाते। कभी-कभी वे खिड़की के पास बैठकर शहर की रोशनी देखते और चुपचाप बातें करते।

हर नई जगह पर अंयाश उसे अपनी छोटी बहन कहकर मिलवाता। “Meet my sister, Ritika.” उसकी आवाज़ में गर्व होता। रितिका हर बार मुस्कुरा देती, लेकिन उसके दिल में हल्की-सी कसक भी उठती जिसे वह खुद समझ नहीं पाती।

एक रात जब शहर सो चुका था, अंयाश बालकनी में खड़ा आसमान देख रहा था। उसे अपने माँ-पापा की याद आई। उसने मन ही मन कहा, “मैं वादा करता हूँ, मैं उसे सुरक्षित रखूँगा।”

उसने भारत वापस न जाने का फैसला सिर्फ अपने दर्द से भागने के लिए नहीं किया था। उसने यह फैसला इसलिए किया था ताकि वह रितिका के लिए मजबूत रह सके। वह जानता था कि अतीत उसे कभी-कभी तोड़ेगा, लेकिन अब उसके पास जीने की वजह थी।

Chicago की चमकती रोशनी के बीच दो लोग अपनी टूटी दुनिया को जोड़ने की कोशिश कर रहे थे। दर्द अब भी था, लेकिन उसके साथ उम्मीद भी थी। और अंयाश ने ठान लिया था कि चाहे कुछ भी हो, वह रितिका की जिम्मेदारी निभाएगा—हर हाल में।

100%