"स्याही और जज्बात" Ch. 3

"स्याही और जज्बात" - Chapter 3

Posted by forget me not 🌷✨️ • Jan 07, 2026 03:34 PM

🩷 "प्रतिघात: दिल्ली की वो शाम"​ 🩷

सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए क्या प्यार की बलि देना ज़रूरी है?"

​पर समय का पहिया घूमता है और हिसाब बराबर करने के लिए वापस आता है।

"नागेंद्र के लिए यह किसी सपने से कम न था। वर्षों बाद सुलोचना का यूँ अचानक सामने आ जाना उसकी कल्पना से परे था। वह दौर याद आया जब इंटरव्यू में मिलती असफलताओं ने उसे तोड़ दिया था और एक सुरक्षित भविष्य की खातिर उसने सुलोचना को बिना बताए छोड़कर अपर्णा से विवाह कर लिया था। आज दिल्ली की इस भीड़ में, दस साल बाद सुलोचना का साक्षात् चेहरा देखकर नागेंद्र अवाक रह गया।"

"दिल्ली के सरोजिनी नगर मार्केट में बच्चों के कपड़ों की एक दुकान पर अपने सात साल के बेटे, सोनू के लिए ड्रेस चुनते-चुनते अचानक नागेंद्र के हाथ रुक गए।

​उसने चोरी-छिपे और फिर थोड़ा और गौर से पीछे मुड़कर देखा। सामने वाली दुकान पर एक महिला कपड़े देख रही थी।

नागेंद्र को केवल उसकी पीठ दिखाई दे रही थी, फिर भी पीछे से वह उसे कुछ जानी-पहचानी सी लगी।

​नागेंद्र ने सोचा, शायद दफ्तर की कोई सहकर्मी या किसी दोस्त की पत्नी होगी। उसने अपना ध्यान वहां से हटाया और फिर से भीड़ के बीच कपड़े देखने लगा।"

"नागेंद्र जितनी भी कोशिश करता, उसकी नज़रें बार-बार उस महिला की ओर ही खिंची चली जा रही थीं।

उसने देखा कि वह महिला पूरी एकाग्रता से कपड़े छाँटकर अलग रख रही थी। कत्थई रंग के बॉर्डर वाली सुंदर कांचीपुरम साड़ी में लिपटी वह महिला, यकीनन अपने बच्चे के लिए ही कपड़े खरीदने आई होगी।"

​" 'ओह! मैं अपना काम छोड़ उसे क्यों देख रहा हूँ?' नागेंद्र ने मन ही मन सोचा।

आज अगर अपर्णा साथ होती, तो अब तक यकीनन छोटा-मोटा महाभारत शुरू हो चुका होता।

नागेंद्र लाख कोशिशों के बावजूद खुद को उस महिला की ओर देखने से रोक नहीं पा रहा था।"

"अचानक उस महिला ने अपनी लंबी और घनी चोटी झटकी और सीधी खड़ी हो गई। जब वह दूसरी तरफ मुड़कर कपड़े देखने लगी, तो उस लंबी चोटी और उसके सिर हिलाने के अंदाज़ ने एक पल के लिए नागेंद्र को सुदूर अतीत के गलियारों में पीछे खींच लिया।"

​"उसकी आँखों के सामने किसी की गोरी पीठ, वह सुंदर चेहरा और लंबी चोटी में बंधे घने बाल तैरने लगे... उन बालों में सजा चंपा के फूलों का गजरा! आह! पुरानी यादें ताजे गुलाब के कांटों की तरह नागेंद्र के सीने में चुभ गईं। एक लंबी और गहरी सांस लेने के बाद उसने अपनी आँखें खोलीं, जैसे वह खुद को अतीत के उस भंवर से बाहर निकालने की कोशिश कर रहा हो।"

"वह महिला अब भी कपड़े चुन रही थी। लगभग 10-12 कपड़े पसंद कर उसने काउंटर पर रखे और अपने पर्स से पैसे निकालकर बिल चुकाने लगी। तभी अचानक उसका फोन बज उठा। भीड़ के बीच उसने पर्स से फोन निकालने के लिए हाथ डाला और शायद किसी को बुलाने के लिए इधर-उधर देखने लगी।"

नागेन्द्र की  मुख से अस्पष्ट ही निकला सुलोचना!!!!""

​"किसी तीव्र आवेग में आकर नागेंद्र ने भीड़ के पार देखा, जैसे उसने दुनिया का आठवां अजूबा देख लिया हो। अब उस महिला का चेहरा पूरी तरह नागेंद्र की ओर था। नागेंद्र के मुँह से अनायास ही एक शब्द निकला— 'सुलोचना!!!'"

​"नागेंद्र ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि आज, इतने सालों बाद, अचानक सुलोचना से उसकी मुलाकात होगी।

लगातार नौकरी के इंटरव्यू में विफल होने के बाद, केवल एक पद और सुरक्षित भविष्य के लालच में उसने अपर्णा से शादी कर ली थी। वह सुलोचना को बिना बताए, उसे बीच राह में छोड़कर दूर चला गया था।"

​"पर आज... दिल्ली की इस भीड़ में, दस साल बाद! क्या सुलोचना से यह मिलना महज़ एक संयोग था? नागेंद्र ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि वक्त उसे फिर से वहीं लाकर खड़ा कर देगा, जहाँ से वह भागा था।"

चरित्र परिचय (Character Profiles)

​सुलोचना पटनायक: (पति: देवेंद्र पटनायक, बेटा: गौतम पटनायक)

​नागेंद्र दास: (पत्नी: अपर्णा दास, बेटा: सुमन दास)

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"मार्केट की भीड़ में पास होने के कारण शायद नागेंद्र के मुँह से निकले शब्द उस महिला के कानों तक पहुँच गए थे। शोर के बीच अपना नाम सुनते ही उसने निगाहें उठाकर देखा।

थोड़ी दूर पर नागेंद्र को खड़ा देख वह ठिठक गई और दो कदम पीछे हट गई। सुलोचना की आँखें आंसुओं से भर आईं, पर अगले ही पल उसके चेहरे पर एक घृणा मिश्रित मुस्कान उभर आई।"

​"ठीक उसी समय उसका फोन बजा। सुलोचना अपनी आँखें पोंछते हुए फोन उठाने लगी और तेजी से वहां से दूर सड़क की तरफ चली गई। नागेंद्र सुध-बुध खोकर खड़ा उसे बस देखता ही रह गया।"

​"माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी और माँग में गहरा सिंदूर... सुलोचना नागेंद्र को किसी साक्षात् देवी जैसी प्रतीत हो रही थी। उसकी लंबी चोटी आज भी उतनी ही घनी थी।

गले में सोने का लंबा हार और हाथों में लाल चूड़ियों के साथ सोने के कंगन उस पर खूब जंच रहे थे। सुलोचना पहले से भी ज्यादा सुंदर हो गई थी। उसे देखते हुए नागेंद्र अपनी वर्तमान स्थिति और परिवेश को जैसे पूरी तरह भूल चुका था।"

   नागेंद्र वही khada सब भूल सुलोचना को देख ता रह  गया l

   

प्रतिघात: दिल्ली की वो शाम (समापन)

​कुछ समय बाद, नागेंद्र ने देखा कि देवेंद्र पटनायक हँसते हुए सुलोचना के पास आकर खड़े हो गए।

नागेंद्र चौंक गया—देवेंद्र पटनायक तो उसके ऑफिस के नए 'लोक संपर्क अधिकारी' (PRO/HR) थे! उनके साथ उनका सात साल का बेटा, गौतम भी था।

​"सुलू, आई एम सॉरी! गौतम बहुत जिद्दी हो गया है। रास्ते के उस पार खिलौनों की दुकान पर बड़े से टेडी बियर के लिए अड़ गया था, उसे ही दिलाने में देर हो गई," देवेंद्र ने प्यार से सुलोचना के करीब आते हुए कहा, "क्या तुमने ड्रेस खरीद ली?"

​सुलोचना के चेहरे पर एक सच्ची और प्यारी मुस्कान खिल उठी। वह मुस्कान नागेंद्र के सीने में किसी खंजर की तरह उतरी।

​तभी देवेंद्र की नजर पीछे खड़े नागेंद्र पर पड़ी। वे उत्साह से नागेंद्र की ओर बढ़े और उसके कंधे पर हाथ रखकर बोले, "अरे नागेंद्र! तुम यहाँ? बच्चों के लिए शॉपिंग करने आए हो क्या?" अपने बड़े अधिकारी का ऐसा दोस्ताना व्यवहार देखकर नागेंद्र दिखावे के लिए मुस्कुराया, पर अंदर से वह काँप रहा था।

​पटनायक बाबू ने गर्व से परिचय कराया, "सुलू, इनसे मिलो, ये नागेंद्र हैं, मेरे सहकर्मी। और नागेंद्र, ये मेरी पत्नी सुलोचना और मेरा बेटा गौतम।" फिर मुस्कुराते हुए बोले, "तुम्हें पता है सुलू, नागेंद्र भी ओडिशा से ही हैं।"

​नागेंद्र ने एक झूठी मुस्कान के साथ हाथ जोड़कर सुलोचना को नमस्ते किया और गौतम के सिर पर हाथ फेरा। सुलोचना ने भी एक अजनबी की तरह प्रति-नमस्कार किया; उसके चेहरे के भाव पूरी तरह शून्य थे, जैसे वह नागेंद्र को जानती तक न हो। नागेंद्र ने शर्म और अपराध बोध से अपनी आँखें नीचे कर लीं।

​देवेंद्र औपचारिकता में पूछते रहे, "और बताओ! कैसे हो? कब से दिल्ली में हो? बच्चे कितने हैं?" उन्होंने आगे कहा, "हम लोग वसंत कुंज के एक अपार्टमेंट में रहते हैं। कभी समय निकालकर रविवार को घर आना। सुलू बहुत बढ़िया ओड़िया खाना बनाती है, बिल्कुल शुद्ध ओड़ियानी है मेरी सुलू!"

​देवेंद्र की आँखों में चमक थी जब वे कह रहे थे, "मेरी नौकरी की वजह से हम सालों से मेट्रो शहरों में रहे, पर सुलू ने अपना ओड़ियापन कभी नहीं छोड़ा। तुम्हें तो पता है हमारी जॉब में कितना प्रेशर है, पर सुलू सब कुछ कितनी बखूबी संभाल लेती है—हमारा घर, संसार और गौतम को भी।

I'm so lucky to have her in my life!"♥️♥️

​देवेंद्र के चेहरे का सुकून और सुलोचना की गरिमा देख नागेंद्र समझ चुका था कि उनका संसार कितना सुखी है। वह सफलता, जिसके लिए उसने सुलोचना को ठुकराया था, आज उसे सुलोचना की इस खुशहाल जिंदगी के सामने बहुत छोटी और फीकी लगने लगी।

​सुलोचना के सुखी संसार को देखकर वह खुश था या दुखी... वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था। बस एक कचोट थी जो उसे ताउम्र सताने वाली थी।

    

                         ll समाप्त ll

लेखक की कलम से:✍️✨️

"समय का चक्र बहुत अजीब है; यह हमें वहीं लाकर खड़ा कर देता है जहाँ से हम भागने की कोशिश करते हैं। 'प्रतिघात' केवल बदले की कहानी नहीं है, बल्कि यह अहसास की कहानी है। सुलोचना ने नागेंद्र से कोई बदला नहीं लिया, बल्कि एक अजनबी की तरह उसे देखकर यह साबित कर दिया कि अब उसकी जिंदगी में नागेंद्र की यादों के लिए भी कोई जगह नहीं है। कभी-कभी किसी को पूरी तरह भूल जाना ही सबसे बड़ी सजा होती है।"

 

​शीर्षक: प्रतिघात: दिल्ली की वो शाम

​विषय: प्रेम, त्याग और पश्चाताप

​प्रेरणा: जीवन के अधूरे फैसले

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