Inderwanshi - Chapter 1
यह कहानी है उत्तर भारत के समृद्ध राज्य इंद्रप्रस्थ की, जहाँ के हर इंद्रवंशी के रोम-रोम में जीतने का साहस भरा हुआ है। वहीं आज महाराज अमरेंद्र सिंह ने एक प्रतियोगिता का आयोजन किया है, जिसमें भारत के अनेकों राज्यों के राजकुमार भाग लेने के लिए उपस्थित हुए हैं। वहीं दूसरी ओर तो कईं भारत के बाहर के भी राजकुमार भी प्रतियोगिता में शामिल हुए हैं।
सारे राज्यों के राजकुमारों के शामिल होने का पहला कारण यह है कि इंद्रप्रस्थ एक प्रगतिशील और महान राज्य है, जो कि अपने आप में एक बहुत ही विशाल है, जिस पर आक्रमण करने से पूर्व हर एक राजा सौ बार सोचता है अथवा शांति प्रस्ताव ही रखता है।
यहाँ पर अपना साहस दिखाना अपने आप में बहुत बड़ी बात है, और दूसरा कारण यह है कि इस प्रतियोगिता का पुरस्कार एक अद्भुत श्वेत रंग का अश्व है, जो कि विश्व का सबसे साहसी और तीव्र घोडा है, जो चीते की तरह तेज दौड़ता है और ऊँची-ऊँची छलांग लगाने में पारंगत है।
यह प्रतियोगिता इंद्रप्रस्थ के सबसे बड़े क्षेत्र अजय क्षेत्र में रखी गई है, जहाँ पर उत्तर की ओर महाराज अमरेंद्र सिंह अपने सिंहासन पर विराजमान हैं, जो कि जमीन की सबसे ऊँची सतह पर लगाया गया है। उनकी बाईं ओर महामंत्री शिवराय विराजमान हैं, वहीं उनकी दाईं ओर कुलगुरु विराजमान हैं।
वहीं कुछ दूरी पर सेनापति मानसिंह खड़े हुए हैं और प्रतियोगिता की तैयारी का जायजा ले रहे हैं। वहीं पूर्व की ओर राजवंशी महिलाओं के लिए अलग से बैठने की व्यवस्था की गई है, वहीं दक्षिण की ओर प्रजा विराजमान है और पश्चिम की ओर सारे राजकुमारों की बैठने की व्यवस्था की गई है। प्रतियोगिता यह है कि राजकुमार को घोड़े पर सवार रहते हुए ही सामने लाल झंडे पर निशाना साधना होगा और तीन तीर एक साथ निशाने पर तीन बार लगाने होंगे।
महाराज अमरेंद्र सिंह अपनी रोबदार आवाज में कहते हैं, "हम आप सभी राजकुमारों का हृदय सहित स्वागत करते हैं, आशा करते हैं कि यहाँ उपस्थित हर एक राजकुमार में योग्यता होगी जो इस प्रतियोगिता के चरण को पार कर सके।"
महामंत्री ने शंख बजाकर प्रतियोगिता का आरंभ किया, उसी समय ढोल-नगाड़े बजने लगे।
तो सबसे पहले राजकुमार उदय सिंह, जो कि प्रतापगढ राज्य से हैं, महाराज के आगे आते हैं। उनका अभिवादन करते हैं और पूरे उत्साह के साथ तूणीर में से तीर निकालते हैं और निशाना साधते हैं। किंतु दुर्भाग्य से उनका एक ही बाण झंडे पर लग पाता है और वह यह प्रतियोगिता हार जाते हैं।
फिर राजकुमार जय प्रताप राजसमंद राज्य से, महाराज के सामने आते हैं और अभिवादन करते हैं और अपना निशाना साधते हैं, परंतु दुर्भाग्य से उनका एक भी तीर झंडे को छू भी नहीं पाता है।
फिर अवंतीपुर के राजकुमार राघव सिंह प्रतियोगिता क्षेत्र में आते हैं और महाराज के सामने सिर झुकाकर अभिवादन करते हैं और निशाना साधते हैं पर दुर्भाग्य से उनके केवल दो निशाने सही लग पाते हैं और एक तीर गलत दिशा में चला जाता है।
ऐसे करते-करते कई राजकुमार अपना साहस दिखाते हैं, पर एक भी प्रतियोगिता को पार नहीं कर पाता। दिन का तीसरा पहर शुरू होने वाला था, पर प्रतियोगिता को किसी ने भी पार नहीं किया था।
अब बारी थी राजकुमार वीरेंद्र की, जो कि स्वयं महाराज के पुत्र हैं। महाराज के सामने आते हैं। उम्र चौबीस साल, लंबाई सात फुट है, तीखे नैन-नक्श, गेहुंआ रंग, दिखने में किसी देवता से कम नहीं हैं।
वह प्रतियोगिता में भाग लेने की अनुमति लेते हैं और वहीं दूर से अपनी माँ यानी महारानी सुनैना को प्रणाम करते हैं। फिर वह अपना निशाना साधते हैं और उनके तीनों बाण सटीक निशाने पर लगते हैं, जिसके कारण प्रजा में रोमांच उमड़ आता है और महाराज गर्व से भर जाते हैं। वहीं महारानी सुनैना अपने पुत्र की दूर से ही बलाईयां लेती हैं, तभी राजकुमार वीरेंद्र अपना दूसरा निशाना लगाते हैं और सटीक निशाना लगता है। अब तो महाराज को भी लगने लगा था कि राजकुमार वीरेंद्र ही प्रतियोगिता जीतेंगे। परंतु जब राजकुमार वीरेंद्र तीसरी बार निशाना लगाते हैं तब तीर झंडे के बगल से निकल जाते हैं। जिसके कारण राजकुमार वीरेंद्र प्रतियोगिता हार जाते हैं।
उनके अंदर प्रतियोगिता हार जाने का क्रोध पल्लवित हो जाता है और वह हार और पश्चाताप के मिले-जुले भावों को लेकर अपने स्थान पर बैठ जाते हैं। फिर राजकुमार विक्रमादित्य, जो कि महाराज के छोटे भाई महेंद्र सिंह के पुत्र हैं और राजकुमार वीरेंद्र से बड़े हैं, आयु पच्चीस साल, लंबाई सात फुट, एक बार अगर कोई ने देख ले तो इन पर पहली बार में ही मोहित हो जाए, गहरी काली आँखें, तीखी नाक, सांवला रंग, इनको देखकर तो कामदेव भी शरमा जाए। वह महाराज के सामने आते हैं और प्रतियोगिता में भाग लेने की अनुमति लेते हैं। कुल गुरु, महारानी सुनैना और अपने पिता को भी दूर से प्रणाम करते हैं, और भगवान भोलेनाथ को अपने मन में प्रणाम करते हैं और आशीर्वाद लेते हैं। भगवान भोलेनाथ को ध्यान में रखते हुए वह अपना पहला निशाना साधते हैं और उनका निशाना इतना तीव्र और सटीक था कि एक बार को तो सभी को समझ ही नहीं आया कि क्या हो गया, पर फिर सब ने देखा कि तीनों तीर झंडे पर हैं, तो प्रजा ने तालियों की बौछार कर दी और राजकुमार विक्रमादित्य के नारे लगने लगे। महाराज और महारानी भी, जो राजकुमार वीरेंद्र के हारने के कारण दुखी हो चुके थे, वह भी अब बहुत प्रसन्न लग रहे थे।
जैसे ही राजकुमार विक्रमादित्य प्रतियोगिता जीतते हैं तो ढोल-नगाड़े बजने लगते हैं और नारे लगने लगते हैं: "राजकुमार विक्रमादित्य की जय हो! राजकुमार विक्रमादित्य की जय हो!"
राजकुमार विक्रमादित्य ने मन ही मन भगवान भोलेनाथ का धन्यवाद किया।
महाराज अमरेंद्र सिंह, "हम राजकुमार विक्रमादित्य की तीव्रता और प्रतियोगिता से बहुत खुश हैं। हम राजकुमार विक्रमादित्य को प्रतियोगिता जीतने की बधाई देते हैं।"
राजकुमार विक्रमादित्य महाराज के चरण स्पर्श करते हैं, महाराज उनके सिर पर हाथ रखते हैं और आशीर्वाद देते हैं, "सदा चेतना से भरपूर रहो।"
फिर राजकुमार विक्रमादित्य कुलगुरु के चरण स्पर्श करते हैं, तो कुलगुरु उन्हें आशीर्वाद देते हैं, "आयुष्मान।"
फिर महारानी सुनैना के चरण स्पर्श करते हैं। महारानी सुनैना उनके गालों पर अपने दोनों हाथ रखती है और कहती है- "पुत्र, हमें तुम पर बहुत गर्व है। तुमने हमारे पूरे राज्य को गौरवान्वित किया है। मातारानी हमेशा तुम्हारे ऊपर कृपा बरसाती रहे।"
राजकुमार वीरेंद्र नाखुश थे अपनी हार से और राजकुमार विक्रमादित्य की जीत जाने से, तो वह जल्दी से प्रतियोगिता स्थल से चले जाते हैं।
कुछ समय बाद राजकुमार विक्रमादित्य, राजकुमार वीरेंद्र को तलाशते हैं पर उन्हें वह कहीं दिखाई नहीं देते।
फिर राजकुमार विक्रमादित्य को इनाम दिया जाता है, जो कि एक श्वेत रंग का घोड़ा था, पर इस घोड़े की खास बात थी कि यह अपने स्वामी को खुद चुनता था और आसानी से किसी के काबू में नहीं आता था। जैसे ही राजकुमार विक्रमादित्य घोड़े के पास जाते हैं तो जोर से हिनहिनाता है और ऊँची-ऊँची छलांगें लगाने लगता है। एक बार को तो विक्रमादित्य भी आश्चर्यचकित हो जाते हैं कि कोई घोड़ा भी इतनी ऊँची छलांगें लगा सकता है। अब तो राजकुमार विक्रमादित्य को भी घोड़े को देखकर धुन सवार हो चुकी थी, कि वह इस घोड़े को काबू में करके ही रहेंगे। वह बड़ी तीव्रता से घोड़े के ऊपर चढ़ जाते हैं, जब घोड़े को एहसास होता है कि उसके ऊपर कोई चढ़ चुका है तो वह बहुत तेज दौड़ने लगता है और बेकाबू हो जाता है। अचानक हुए इस हादसे से घोड़ा अपनी दिशा बदल देता है और राजसी महारानियों के हिस्से में चल जाता है। अचानक राजकुमार घोड़े की लगाम खींचते हैं और घोड़े को दूसरी तरफ कर लेते हैं। घोड़ा बहुत ऊँची-ऊँची छलांगें लगाता है ताकि राजकुमार उसके ऊपर से हट जाए पर राजकुमार टस से मस नहीं होते, अब तो थक कर घोड़ा भी अब अपनी रफ्तार कम कर लेता है। जैसे ही राजकुमार को लगता है कि घोड़ा थक चुका है तो वह राजकुमार के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हैं। तो घोड़ा अपना सिर झुका लेता है, मतलब वह कहना चाहता है कि राजकुमार विक्रमादित्य को उसने अपना मालिक मान लिया है।
राजकुमार विक्रमादित्य: घोड़े को प्यार से कहते हैं कि तुम आसमांन को छूने की चाह रखते हो, इसलिए तो तुम इतनी ऊँची-ऊँची छलांगें लगाते हो। इसलिए आज से तुम्हारा नाम अंबर है। घोड़ा नाम सुनकर खुशी से हिनहिनाता है। जब सबको यह लगता है कि घोड़े को राजकुमार ने काबू कर लिया है तो सब की जान में जान आई है और महाराज प्रतियोगिता समाप्त करने का आदेश देते हैं।
महामंत्री कुछ सैनिकों को, जो घोड़े ने तबाही मचाई थी, उसको वापस व्यवस्थित करने के लिए कहते हैं।
महारानी सुनैना राजकुमार वीरेंद्र को ढूंढ रही थीं, तभी राजकुमार विक्रमादित्य आते हैं और महारानी से घोड़े के साथ सैर पर जाने की आज्ञा मांगते हैं।
तो चलिए देखते हैं आगे क्या होगा? कहाँ गए हैं राजकुमार वीरेंद्र? क्या राजकुमार वीरेंद्र का क्रोध शांत हो पाएगा?
जानने के लिए पढ़ते रहिए हमारी नोवेल "इंद्रवंशी" "स्टोरी मेनिया पर"। जिसे लिखा है A R writer ने और संपादन (edit) Divya Verma ने ही किया है।
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रुद्रिका रॉय 22वीं सदी से एक सीक्रेट मिशन लेकर समय की सीमाओं को पार करके अतीत में आती है। उसका टारगेट बिल्कुल क्लियर है—उसे एक ऐसे इंसान तक पहुँचना है, जो उसके मिशन की key है। शुरुआत में सब कुछ उसके प्लान के अनुसार smoothly चलता है, लेकिन तभी उसकी ज़िंदगी में नील अरोरा की एंट्री होती है—एक रहस्यमयी और पावरफुल बिज़नेस टायकून। धीरे-धीरे उनकी दुनियाएँ टकराने लगती हैं, और रुद्रिका को एहसास होता है कि नील सिर्फ एक आम इंसान नहीं है, बल्कि उसके मिशन का सबसे अहम हिस्सा है। लेकिन इस पूरे खेल के पीछे छुपा सच अभी भी अंधेरे में है।