Forced Marriage ❤️ Ch. 3

चैप्टर 3

Posted by nikki tha little writer • Sep 29, 2025 08:29 AM

अब आगे...!!

दिल्ली की एक बड़ी सी बिल्डिंग, जहाँ के हेलीपैड पर शिवांश का चॉपर उतरा और वो एक ब्लू बिज़नेस सूट पहने बाहर आया

वो बिल्डिंग इस एरिया की सबसे बेहतरीन और ऊँची बिल्डिंग थी जिसे लोग एस.एस. आर ग्रुप्स के नाम से जानते थे और इसके मालिक थे शिवदत्त सिंह रायज़ादा, जो की शिवांश के दादाजी थे, उनके बाद अगर किसी ने इस बिज़नेस को संभाला और ऊंचाइयों तक पहुँचाया था तो वो था शिवांश सिंह रायज़ादा और आज ये शिवांश की ही मेहनत थी जिसकी वजह से एस. एस. आर ग्रुप्स इंडिया की टॉप टेन कम्पनीज़ में शामिल थी

बिज़नेस की समझ उसे विरासत में ही अपने दादाजी से मिली थी लेकिन उसके काम करने का तरीका उनसे काफी अलग था । जहाँ उसके दादा जी स्वाभाव से शांत थे वहीं शिवांश उनसे बिलकुल अलग था ।

27 साल के शिवांश के चेहरे पर हमेशा सीरियस एक्सप्रेशन रहते थे और गुस्सा तो जैसे उसकी नाक पर ही रहता था, जिसकी झलक आपको आगे आने वाली कहानी में देखने को मिलेगी। शिवांश के ऑफिस में सभी उससे बहुत डरते थे, उसके क़दमों की आहट ही काफी थी लोगों की सांस अटकाने के लिए, और कुछ ऐसा ही आज भी हुआ।

शिवांश लिफ्ट से होते हुए 25 वें फ्लोर पर बने अपने केबिन की तरफ जा रहा था और उसी के पीछे देव भी था जो उसे आज का शैड्यूल बता रहा था। देव शिवांश का बॉडीगार्ड होने के साथ साथ उसके काम को भी मैनेज किया करता था। उस फ्लोर पर इतनी शांति थी की केबिन की तरफ बढ़ते हुए शिवांशके जूतों की आवाज़ भी तेज सुनाई दे रही थी। वहां मौजूद सभी एम्प्लॉएंस की सांसें अटकी हुई थी क्योंकि वो सभी शिवांश के गुस्से को अच्छे से जानते थे। पुरे फ्लोर पर सिर्फ गुड मॉर्निंग विश करने की आवाज़ आ रही थी, और शिवांश सभी को नज़र अंदाज़ करते हुए अपने केबिन के अंदर चला गया ।

उसे अंदर गया देख सभी की जान में जान आयी ।

इधर गौरी ट्रेन में बैठी पीछे छूट रहे शहरों और गाँव को देख रही थी और अपने ख्यालों में खो गयी और याद करने लगी वो समय जब वो 17 साल की थी और बनारस से अपनी माँ और छोटे भाई के साथ दिल्ली आयी थी।

23 साल की गौरी अपने पापा की मौत के बाद अपनी माँ और भाई के साथ 6 साल पहले दिल्ली शहर में आयी थी, यहीं आकर उसने अपनी ग्रेजुएशन की और आज एक छोटी सी कंपनी में जॉब करती है। जिससे महीने के 25000 कमा लेती है वो, और अपने भाई और माँ की ज़िम्मेदारियाँ भी अच्छे से निभाती है

आमदनी भले ही कम थी गौरी की, लेकिन सपने बहुत बड़े थे उसके । वो अपनी माँ और भाई को दुनिया भर की सारी खुशियां देना चाहती थी, वो बात अलग थी की उसकी माँ और भाई के लिए गौरी की मुस्कराहट ही उनकी खुशी थी ।

बस इन्ही सब ख्यालों में गौरी दिल्ली पहुँच गयी ।

स्टेशन से होकर वो अपने घर के लिए रिक्शा करती है, दिल्ली की तंग गलियों में ही उसका भी एक छोटा सा आशियाना था, जहाँ वो अपने भाई और माँ के साथ रहती थी। आयुष अभी 12th में था लेकिन अपनी पढाई के साथ साथ वो और बच्चों को टूशन पढ़ाया करता था ताकि वो अपनी बहन की कुछ मदद कर सके और गौरी की माँ भी सिलाई किया करती थीं कुछ पैसे तो वो भी कमा ही लेती थीं।

गौरी और आयष अपने घर के दरवाजे पर थे और गौरी ने बेल्लबजायी, करीबन 52 साल की महिला ने गेट खोला और गौरी मुस्कुराते हुए उनके गले लग गयी और बोली माँ कैसी हैं आप ?

सामने खड़ी महिला का नाम सुमित्रा महाजन था और वो मुस्कुराते हुए बोलीं- हम बिलकुल ठीक हैं ?

तभी उन्हें पीछे से आवाज़ आयी जो आयुष की थी वो बोला -अरे भाई कोई मुझे भी पूछ लो, की सारा प्यार बस अपनी बेटी पर ही लुटाना है आपको ।

तभी गौरी और सुमित्रा जी हंस दिए और आयुष भी उनके गले आ लगा। गौरी बैग अंदर लाते हुए सामने पड़े सोफे पर बैठ गयी, सुमित्रा जी अपने दोनों बच्चों के लिए पानी लाते हुए बोली- ये लो पानी, थक गए होंगे सफर में गौरी ने पानी पीते हुए कहा हाँ माँ, बहुत ज्यादा सुमित्रा जी उनके पास बैठते हुए बोलीं- तो कैसे रहे महाकाल के दर्शन ?

उनके ऐसे पूछने पर गौरी के आगे शिवांश का चेहरा घूम गया और वो हलके से मुस्कुरा दी और बोली- सब अच्छा था माँ और हम आपके लिए प्रसाद भी लाये हैं और इतना कह कर उसने बैग से एक पैकेट निकाल कर सुमित्रा जी की तरफ बढ़ा दिया ।

थोड़ी ही देर बाद गौरी ने खाना खाया और आराम करने के लिए अपने कमरे में चली गयी ।

वहीं दूसरी तरफ शिवांश अपने ऑफिस में बैठा कुछ फाइल्स चेक कर रहा था की तभी उसके फ़ोन पर किसी का कॉल आया और बिना देखे उसने कॉल पिक करते हुए अपनी कड़क आवाज़ में कहा - हेलो ।

दूसरी तरफ से गुस्से भरी आवाज़ आयी - शिव कहाँ है तू ? तू उज्जैन से कब आया ? और सीधा ऑफिस क्यों चला गया ? शिवांश ने जैसे ही अपनी फ़ोन की स्क्रीन पर देखा तो सक्कु नाम फ़्लैश हो रहा था ये देख शिवांश हलके से मुस्कुराया औरबोला- सक्कु कितना गुस्सा करती हैं आप ?

सामने से वही नाराज़गी भरी आवाज़ आयी नालायक शर्म कर दादी हूँ तेरी और तू मुझे सक्कु बुलाता है, तेरे दादा ने सुन लिया तो तेरे ही कान खीचेंगे ।

शिवांश हाँथ में पकड़ी फाइल टेबल पर रखते हुए बोला - सॉरी दादी, अब ठीक है?

वो बोलीं- नहीं ठीक नहीं है, तुझे मैंने कहा था ना की उज्जैन से सीधा घर आना तो तू ऑफिस क्यों चला गया ?

शिवांश बोला - दादी बहुत ज़रूरी मीटिंग थी मेरी इसलिए नहीं आ पाया लेकिन शाम को जल्दी घर आ जाऊंगा।

इस पर दादी बोलीं- जल्दी आ जा, ये घर वाले मुझे बहुत टॉर्चर करते है, कड़वी दवाई खिला खिला कर ।

इस पर शिवांश उन्हें समझते हुए बोला दादी अगर आप दवाई नहीं खाएंगी तो फिट कैसे रहेंगी। इसलिए जैसे सब कह रहे हैं वैसा ही कीजिये और अभी मुझे बहुत काम है तो मैं आपसे शाम को मिलता हूँ।

इतना कह कर उसने कॉल कट कर दी और वापस अपने काम में लग गया।

वहीं शिवांश को काम करते हुए सुबह से शाम हो गयी। तभी देव उसके केबिन में आते हुए बोला बॉस, कार रेडी है, आप घर जायेंगे या फिर

शिवांश अपनी कुर्सी से उठते हुए बोला फार्म हाउस और इतना

कह कर वो ऑफिस से बाहर निकल गया।

ऑफिस के बाहर 5 गाड़ियां लाइन से खड़ी थीं, उनमे से एक गाड़ी में जाकर शिवांश बैठ गया और दो गाड़ियां उसकी गाड़ी के आगे थी और दो पीछे, सभी लाइन से ही एक ही दिशा मेंबढ़ रही थीं।

शिवांश की कार में सिर्फ 3 लोग मौजूद थे. ड्राइवर, देव और शिवांश ।

देव पैसेंजर सीट पर बैठे हुए बोला बॉस, हमने उस लड़की के बारे में पता किया, वो लड़की उज्जैन की नहीं थी वो कहीं और की है, उज्जैन तो सिर्फ वो दर्शन करने आयी थी। जिस होटल में वो रुकी थी वहां भी हमें बस यही पता चला की उसका नाम गौरी महाजन है वो अपने भाई के साथ यहाँ आयी थी, इसके अलावा हमें उसके बारे में कुछ पता नहीं चला ।

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