H0t Casanova lover - Chapter 3 (आह्ह्हृ .. दबाते रहो)
### **"सुबह का ठहराव… और वो अधूरी प्यास"**
**स्थान: होटल रूम – सुबह 6:40 AM**
खिड़की के पर्दे अब भी आधे खुले थे।
सूरज की हल्की किरणें कमरे की दीवारों को धीरे-धीरे छू रही थीं — जैसे रात के सारे राज़ अब उजाले में आ रहे हों।
बिस्तर की चादरें अब भी थोड़ी उलझी थीं।
और उन चादरों के बीच दो लोग… एक-दूसरे के इतने करीब, जैसे ****** की कोई अलग पहचान ही ना हो**।
नेहा अभी तक आरव की बाँहों में थी।
उसका सिर उसकी छाती पर टिका था, और उंगलियाँ हल्के-हल्के उसकी त्वचा पर कोई नाम लिख रही थीं…
शायद **वो नाम जो वो खुद नहीं रखना चाहती थी।**
आयूष जाग चुका था, लेकिन कुछ कह नहीं रहा था।
बस **नेहा की साँसों की गर्माहट**, और उसके स्पर्श की धीमी चाल को महसूस कर रहा था।
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**"तुम सो रहे हो या सोच रहे हो?"**
नेहा की आवाज़ उसकी छाती से उठती हुई लगी — धीमी, गहरी और भीगी-सी।
**"तुम जो कर रही हो, उसमें सोचने की जगह कहाँ है…"**
आयूष ने धीरे से कहा और अपनी उँगलियाँ उसकी पीठ पर फिराने लगा —
एक रेखा सीखी हुई… **कंधे से कमर तक**… और फिर वापस।
नेहा ने उसकी ओर मुँह किया, उसके बहुत पास…
उनकी आँखें अब भी उनींदी थीं, लेकिन उनमें जो चमक थी, वो सिर्फ रात की नहीं थी —
**वो चाहत थी, जो अभी पूरी नहीं हुई थी।**
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**"कल रात सिर्फ शुरुआत थी न?"**
नेहा ने धीमे से पूछा।
आयूष ने जवाब नहीं दिया…
बस उसके चेहरे को दोनों हथेलियों में लिया और **एक गहरा चुम्बन** उसकी आँखों पर रखा।
फिर उसकी गर्दन पर, और फिर उसके होठों पर…
जहाँ से उसकी साँसें कुछ और तेज़ हो गईं।
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नेहा ने चादर को थोड़ा पीछे किया,
और खुद को उसकी बाँहों में खींचकर उसकी जांघ पर अपनी टाँग रख दी।
आयूष ने उसका चेहरा देखकर मुस्कराया —
**"तुम्हें कुछ नहीं कहना होता… तुम्हारी आँखें सब बोल देती हैं।"**
**"और तुम्हारे होंठ सब कर देते हैं…"**
उसने हल्की मुस्कराहट के साथ कहा और उसे नीचे खींच लिया।
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अब दोनों के बीच कोई रुकावट नहीं थी।
ना कपड़े, ना सवाल, ना सोच।
**बस एक खामोशी थी जो हर हरकत में गूंज रही थी।**
आयूष ने धीरे से उसकी कमर के नीचे हाथ रखा, और खुद को उसके करीब खींचा।
**नेहा की आँखें बंद थीं**, लेकिन उसकी साँसों की लय बताती थी कि **हर छुअन उसे भीतर तक महसूस हो रही है।**
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**"आयूष…"**
उसने एक लंबी साँस लेकर कहा —
**"आज… मुझे खुद से अलग कर दो…"**
**"नहीं…"**
उसने फुसफुसाया —
**"आज… मैं तुम्हें अपने जैसा बना दूँगा…"**
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उसके होठ अब नेहा की गर्दन से नीचे उतरने लगे थे —
धीरे-धीरे, हर हिस्से को छूते हुए,
**जैसे कोई साज़ बज रहा हो**, और हर तार पर उसकी उँगलियाँ चल रही हों।
नेहा ने खुद को उसके ऊपर छोड़ा…
उसकी उँगलियाँ अब उसकी पीठ पर कसने लगीं,
और होंठों से **सिर्फ नाम नहीं, बल्कि वो आहें भी निकल रही थीं जो अब तक रोकी गई थीं।**
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**बेड अब साँसों के साथ-साथ हिल रहा था।**
चादरों की रेखाएँ अब सीधी नहीं थीं,
और उनके बीच एक गर्माहट थी —
**जो सिर्फ ****ों की नहीं, भीतर के तूफ़ानों की थी।**
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कुछ देर बाद…
सभी आवाज़ें धीमी होने लगीं,
साँसें एक जैसी हो गईं,
और शरीर फिर से एक-दूसरे में समा गए।
नेहा आयूष के सीने पर लेटी थी, पसीने से भीगी हुई,
लेकिन उसके चेहरे पर एक सुकून था —
**जैसे कोई भूख थी, जो अब शांत हुई थी…**
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**"अब क्या?"**
नेहा ने आँखें खोले बिना पूछा।
**"अब… हम उठेंगे, कॉफ़ी पिएँगे… और फिर शायद… सब भूल जाएँगे।"**
**"या फिर… हर बार याद करेंगे जब कुछ अधूरा लगेगा…"**
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आयूष ने उसकी हथेली पकड़ी, होंठों तक ले गया…
और बिना कुछ कहे, **बस उसकी हथेली को चूम लिया**।
कमरे में अब सिर्फ उजाला था,
लेकिन दिल में अभी भी वो **रात की नमी और सुबह की आँच** बाकी थी।
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### \*कुछ रिश्ते नाम नहीं माँगते…
बस एक सुबह की खामोश गर्माहट में सब कह जाते हैं।\*
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