बेशर्म इश्क़ Ch. 1

बेशर्म इश्क़ - Chapter 1

Posted by S✨ Sood • Jun 11, 2025 12:07 AM

दरवाज़े की हर चरमराहट पर उसकी आँखें उसी ओर उठ जाती थीं। हाथों में दूध का गिलास था — कांपता हुआ, जैसे दिल की बेचैनी उसकी हथेलियों तक उतर आई हो।

अचानक… दरवाज़ा खुला।

वो आया — उसके सपनों का नहीं, उसके नाम का पति। भारी-भारी कदमों से कमरे में दाख़िल हुआ, जैसे इस रिश्ते का बोझ पहले ही उठा चुका हो। बिना एक शब्द कहे, उसने लड़की के हाथ से दूध का गिलास लिया और खुद पीने लगा।

एक पल के लिए लड़की के चेहरे पर एक सुकून-सा उभरा — शायद आज कुछ बदलेगा?

लेकिन नहीं।

अगले ही पल, उसने लड़की की कलाई पकड़ी और जबरदस्ती वही गिलास उसके होठों से लगा दिया।

"पी इसे!" उसकी आवाज़ में न तो प्यार था, न अपनापन — बस हुक्म और नफरत।

लड़की घबरा गई, उसकी आँखें डबडबा गईं। उसने सिर हिलाकर मना किया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। दूध का स्वाद अजीब था… कुछ ऐसा जैसे कड़वाहट अब सीधे उसके सीने में उतर रही हो।

लड़की लड़खड़ाकर पलंग पर गिर गई। उसे लगा जैसे सबकुछ धुंधला हो रहा है।

तभी वो झुका, उसके कानों में ज़हर-सी फुसफुसाहट की तरह बोला —

"तुझे क्या लगा? कि मैंने तुझसे प्यार करके शादी की है?"

"यह शादी मेरी मजबूरी थी… एक सौदा।"

"और एक बात याद रखना… तुझे मैं कभी अपनी पत्नी का दर्जा नहीं दूँगा।"

"तू सिर्फ मेरी नफरत की ज़रूरत है… मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी सज़ा।"

लड़की की आँखें उसके चेहरे को पढ़ने लगीं — शायद कोई झूठ हो, कोई नरमी छिपी हो… लेकिन वहाँ सिर्फ सर्द पत्थर था।

अध्याय : इज़्ज़त का तमाशा

सुबह के सात बज रहे थे। राजवंशी महल में रौनक थी। हर कोना सजा हुआ, जैसे वक़्त भी किसी ख़ास पल का इंतज़ार कर रहा हो। गुलाब की पंखुड़ियाँ फर्श पर बिछी थीं, झूमर की रोशनी उस पर पड़कर सोने जैसी चमक फैला रही थी। आज दादाजी और दादीजी की शादी की पचासवीं सालगिरह थी। पूरा खानदान हँसता, मुस्कराता और एक-दूसरे को गले लगाकर तस्वीरें खिंचवा रहा था।

हॉल में एक दीवार पर बड़ा सा एलईडी टीवी लगा था। ज़्यादातर लोगों का ध्यान उस तरफ़ नहीं था, क्योंकि सब पार्टी में मशगूल थे। मगर तभी, अचानक—

📺 “ब्रेकिंग न्यूज़... ब्रेकिंग न्यूज़...”

तेज़ आवाज़ में टीवी की ओर सबका ध्यान खिंच गया।

“देश के जाने-माने उद्योगपति और राजनेता वीर प्रताप राजवंशी के पोते अखिलेश राजवंशी को एक लड़की के साथ होटल रॉयल गैलेक्सी के कमरे नंबर 709 में रात में संदिग्ध हालत में देखा गया है। दोनों के कुछ बेहद निजी वीडियो फुटेज सामने आए हैं, जिससे ये साफ़ है कि दोनों हमबिस्तर थे…”

एक सेकंड के लिए मानो पूरे हॉल की हवा थम गई।

🎉 पार्टी की रौनक एक पल में बुझ गई।

दादी का हाथ चाय की प्याली पर काँपने लगा।

दादाजी की आँखें एकटक टीवी पर ठहर गईं। उनके माथे की नसें तन गईं थीं।

“क्या बकवास है ये...?” बड़े भाई अर्जुन का ग़ुस्से से गला भर्राया।

“टीवी बंद करो ये सब!” माँ ने चिल्लाकर कहा, पर तब तक तो पूरा न्यूज़ फ्लैश हो चुका था।

वीडियो में अखिलेश के गले में वही काला लॉकेट था जो दादी ने उसे पिछले जन्मदिन पर दिया था। और उसके पास एक लड़की थी – आँखें नींद से भारी, बाल बिखरे हुए, और बदन पर सिर्फ़ एक चादर।

“हे भगवान! ये अखिल ने क्या कर दिया...” बुआ मुँह पर हाथ रखकर फुसफुसाईं।

“अखिल होटल में... वो भी इस हाल में? किसी ने पकड़ लिया क्या?” छोटा भाई राघव ने हैरानी में पूछा।

दादाजी धीरे-धीरे सोफ़े से उठे। उनकी चाल भले ही अब धीमी हो गई हो, मगर आवाज़ अब भी वही पुरानी थी – सीधी रीढ़, सीधा लहजा।

“रामलाल!” उन्होंने नौकर को पुकारा।

“जी मालिक...”

“अखिल कहाँ है?”

“वो... वो कल से घर पर नहीं हैं। शायद शहर से बाहर गए थे, पर लौटे नहीं अभी तक।”

“गाड़ी निकलवाओ। और पता करो कौन ये न्यूज़ फैला रहा है। अपने आदमी भेजो होटल में। CCTV, रिकॉर्ड – सब चाहिए मुझे। समझे?”

“जी मालिक।”

पापा – यशवर्धन राजवंशी – जो अभी तक चुप थे, अब धीरे से बोले, “बाबूजी... ये लड़का दिन-ब-दिन हाथ से निकलता जा रहा है। बहुत सिर चढ़ गया है।”

“अब क्या कहें भईया,” छोटे चाचा ने भी गहरी साँस ली, “नाम तो पूरे खानदान का खराब हुआ है। और ऐसे मौके पर… जब घर में इतने लोग आए हैं...”

मां दीवार की तरफ़ पीठ टिकाकर खड़ी हो गई थीं। उनकी आँखें लाल थीं।

“मैंने बचपन से उसे समझाया था। कभी ऊँची आवाज़ नहीं की। कभी उसकी ज़रूरतें अधूरी नहीं रहने दीं... फिर भी...”

“अब क्या फायदा सब कहने का,” यशवर्धन ने झुंझलाकर कहा, “अब तो न्यूज़ चैनल वाले हमारी हवेली के बाहर जमा हो जाएंगे।”

छोटी भाभी ने धीरे से पूछा, “कहीं वो लड़की उसे फँसा तो नहीं रही?”

“हो भी सकता है,” राघव बोला, “आजकल की लड़कियाँ भी तो... कैमरे का टाइम देखो, वो सब प्लान किया हुआ लग रहा है।”

“चुप हो जा!” दादाजी की आवाज़ गूंजी, “अब भी किसी और को दोष देने बैठे हो? पहले अपने घर के लड़के को सीधा करो!”

टीवी पर अब रिपोर्टर बाहर खड़े होकर लाइव रिपोर्टिंग कर रहा था।

“हम इस वक्त होटल रॉयल गैलेक्सी के बाहर हैं, जहाँ अखिलेश राजवंशी को एक युवती के साथ देखा गया। सूत्रों के अनुसार, दोनों कई घंटे कमरे में रहे और वहाँ से निकलते वक़्त लड़की की हालत नाज़ुक लग रही थी...”

“क्या मतलब है इनका? नाज़ुक हालत?” दादी फटी-फटी आँखों से स्क्रीन देखती रहीं।

“बस अब और नहीं!” पापा उठ खड़े हुए, “मैं PR टीम को कॉल करता हूँ। हमें इस आग को फैलने से पहले बुझाना होगा।”

“इज्जत का तमाशा बना दिया!” दादाजी की आवाज़ भारी पड़ने लगी थी, “हमारे खानदान ने इतने सालों तक मेहनत से नाम कमाया, और ये लड़का एक झटके में सब मिट्टी में मिला रहा है।”

इतने में मोबाइल की घंटियाँ बजने लगीं। रिश्तेदार, बिज़नेस पार्टनर्स, पुराने दोस्त – हर कोई जवाब मांग रहा था।

“ये क्या देख रहे हैं हम टीवी पर?”

“क्या सच है अखिल के बारे में?”

“तुम्हारे घर में सब ठीक है न?”

पापा ने एक के बाद एक कॉल काटे, फिर PR हेड को मेसेज किया:

“Control the media. Now.”

रात 9:00 बजे

हवेली में जैसे सन्नाटा पसर गया था। कोई खाना नहीं खा रहा था। मेज़ पर पकवान वैसे ही रखे थे – ठंडे, बेजान।

तभी दरवाज़ा खुला।

अखिलेश – काले कपड़े, बिखरे बाल, आँखें थकी हुई, और चेहरा सफेद जैसे किसी ने सारा खून निचोड़ लिया हो।

उसके अंदर आते ही सबकी निगाहें उसकी तरफ़ घूमीं।

माँ दौड़कर उसके पास आईं, “अखिल... ये क्या कर बैठे तुम?”

अखिल कुछ नहीं बोला। बस चुपचाप दादाजी की तरफ़ देखा।

दादाजी की आँखें तेज़ थीं।

“बोलो अखिल, क्या सच है?”

“दादाजी...” अखिल की आवाज़ ज़रा कांपी नहीं , “ मैं नहीं जानता । सुबह में मैंने भी उसे पहली बार देखा।

“तो फिर वो कैमरा? वो फुटेज? वो न्यूज़?”

“मैं कुछ नहीं जानता। हो सकता है ये किसी चाल हो”

“क्यों? किसने? नाम बताओ।”

“मैं... मुझे शक है... रनजीत सिंह पर।”

सन्नाटा और गहरा गया।

“रनजीत सिंह?” यशवर्धन चौंके, “वो तो तुम्हारा दोस्त था ना?”

“था। अब नहीं। वो मेरी कंपनी के हिस्सेदार में से एक बनना चाहता था। जब मैंने मना किया, तबसे वो मुझे ब्लैकमेल कर रहा था।”

“तुमने हमसे छुपाया?” पापा चिल्लाए।

“क्योंकि मैं सोच रहा था कि सब ठीक हो जाएगा... लेकिन...”

“ठीक हो गया ना अब? पूरा देश देख रहा है तुम्हारा हाल।”

दादी ने बस धीरे से कहा, “भगवान करे... ये साज़िश ही हो। वरना ये हवेली कभी माफ़ नहीं करेगी तुझे।”

अखिल ने एक लंबी साँस ली... और पहली बार आँखों में गुस्सा छलक आए।

महल की दीवारों पर लगी मखमली सजावट अब एक अजीब सी खामोशी ओढ़ चुकी थी। माहौल में पहले जितनी गर्माहट थी, अब उतनी ही घुटन उतर आई थी।

दादाजी अब भी उसी जगह खड़े थे — सोफ़े के पास, जहां से उन्होंने न्यूज़ चैनल की ख़बर पहली बार देखी थी। उनकी आँखें स्क्रीन पर गड़ी थीं, जैसे उसमें से जवाब खींच लाना चाहते हों।

उधर, यशवर्धन राजवंशी — अखिलेश के पिता — तेज़ क़दमों से हॉल के कोने में रखी अपनी स्टडी टेबल की ओर बढ़े। वहीं दीवार के पास अर्जुन, अखिल का बड़ा भाई पहले से खड़ा था — हाथ में फोन थामे, माथे पर शिकन।

"राघव!" यशवर्धन की आवाज़ तेज़ और हुक्मी थी, "अब तक PR टीम ने कोई स्टेटमेंट जारी किया?"

"पापा, मैंने बात की थी... पर वो कह रहे हैं कि मीडिया वाले वीडियो के हवाले से दबाव बना रहे हैं, कोई भी स्पष्टीकरण सुनने को तैयार नहीं हैं।"

यशवर्धन ने गहरी सांस ली, फिर राघव के कंधे पर हाथ रखा।

"अब सिर्फ PR से काम नहीं चलेगा। सीधे चैनल के मालिक को फोन लगाओ। कह दो — अगर अभी के अभी ये न्यूज़ नहीं रोकी गई, तो हम उनके न्यूज़ ग्रुप की सारी फंडिंग खींच लेंगे।"

"ठीक है पापा," राघव ने फोन उठाया और नंबर डायल किया, चेहरे पर साफ़ तनाव झलक रहा था।

फोन कुछ ही सेकंड्स में उठ गया।

"हैलो, मिस्टर जोशी? ये राघव राजवंशी बोल रहा हूं। जो न्यूज अभी आपके चैनल पर चल रही है, उसे अभी के अभी हटाइए।"

(कुछ सेकंड की चुप्पी... दूसरी ओर से हल्की-सी सफाई...)

"नहीं मिस्टर जोशी, मैं किसी सफाई में नहीं पड़ना चाहता। आपको हमारी कंपनी का नाम याद है ना? जो इस चैनल के 38% शेयर की फंडिंग करती है? अगर ये ब्रेकिंग न्यूज़ अब से पाँच मिनट बाद भी ऑन-एयर रही, तो आप अपने चैनल का ऑफिस किराये पे देने लायक भी नहीं बचेंगे। समझे आप?"

कुछ देर बाद टीवी स्क्रीन पर ब्रेकिंग न्यूज़ की पट्टी धीमे-धीमे हटने लगी। रिपोर्टर हटाया गया, लाइव बंद हुआ और स्टूडियो से अचानक एक नया विषय ऑन-एयर हो गया — “क्रिकेट कप्तान का बड़ा बयान”।

यश ने फोन रखा, गहरी साँस ली।

"हो गया..." उसने कहा।

यशवर्धन ने बस सिर हिलाया।

“मीडिया को पैसे से नहीं... टाइमिंग से कंट्रोल किया जाता है। और आज तुमने सही टाइमिंग पकड़ ली, यश।”

फिर जैसे उन्हें कुछ याद आया, उन्होंने मुड़कर पूछा —

“अखिल कहाँ है?”

"अपने कमरे में है पापा," यश ने कहा, "लेकिन... अजीब चुप बैठा है। ना सफाई दे रहा है, ना गुस्सा। बस बैठा है।"

“चलो, बात करते हैं उससे।” यशवर्धन ने सधे कदमों से सीढ़ियों की ओर बढ़ते हुए कहा।

राजवंशी हवेली – तीसरी मंज़िल, अखिल का कमरा

दरवाज़ा खुला तो वहाँ कम रोशनी थी। एक कोना हल्की नीली लाइट से चमक रहा था। एक बड़ी खिड़की के पास अखिल बैठा था — कुर्सी की पीठ पर सिर टिकाए, आँखें बंद। उसकी कलाई पर अब भी वही घड़ी थी, जो रणविजय ने उसे MBA पूरा करने पर गिफ्ट की थी।

"अखिल!" यशवर्धन की आवाज़ थोड़ी सख़्त थी।

अखिल ने आँखें खोलीं, लेकिन चेहरा बिना भाव के।

"न्यूज़ देखी?" यश ने सीधा सवाल किया।

"हम्म..." बस इतना ही बोला अखिल।

"कुछ कहोगे?" यशवर्धन पास आकर बोले।

"कहने को कुछ है नहीं, पापा।"

"मतलब?" यशवर्धन की भौंहें तनीं, "तू उस लड़की के साथ होटल में था या नहीं?"

अखिल उठा, और सीधे पापा की आँखों में देख कर बोला:

"मैं उस लड़की को जानता तक नहीं। ना नाम पता है, ना चेहरा पहचाना। और जो वीडियो तुमने देखा वो... मुझे यकीन है, बनाया गया है।"

"तो तू वहां गया था?" यश ने संदेह से पूछा।

"हां, मैं होटल में गया था। लेकिन मीटिंग थी, किसी क्लाइंट के साथ। 706 नंबर रूम मेरा नहीं था। किसी ने जान-बूझकर मेरा नाम वहाँ से जोड़ दिया। और जो लड़की वीडियो में दिख रही है... मैं उसे कभी मिला भी नहीं।"

यशवर्धन की आँखों में गुस्सा और उलझन का तूफान था।

"अखिल, इस वक़्त सिर्फ़ सच्चाई काम आएगी। अगर सच में तू इसमें फँसाया गया है तो हमें कानूनी रास्ता लेना होगा। और अगर झूठ बोल रहा है..."

"पापा, दुनिया जो देख रही है, वो सब कुछ भी नहीं है।" अखिल ने बात काटते हुए कहा।

"लेकिन इज्ज़त का सवाल है, अखिल।" यशवर्धन का स्वर ऊँचा हुआ।

"और मेरी भी एक पहचान है अर्जुन भैया," अखिल अब थोड़ा सीधा खड़ा हुआ, "मैं भी आपके साथ बिजनेस संभालता हूं। मैं भी नाम कमाता हूं। लेकिन जब न्यूज़ चैनल में कोई लड़की के साथ मेरा नाम जोड़कर फुटेज चलाता है, तो कोई ये नहीं पूछता कि सच्चाई क्या है। सबको तमाशा देखना है।"

"ये तमाशा तुम्हारे बर्ताव से खड़ा हुआ है!" अर्जुन ग़ुस्से से बोला।

"नहीं, भैया। ये किसी और की साज़िश है। जिस क्लाइंट से मीटिंग थी, उसकी कंपनी का नाम आज मेरे कॉम्पिटीटर से जुड़ा मिला है।"

यशवर्धन कुछ पल चुप रहे। फिर बोले, "इसका मतलब...?"

"मतलब ये कि मैं निशाना था। लड़की भी, होटल का कमरा भी, कैमरा भी — सब सेट किया गया था। और अगर हमने सही तरीके से ये प्रूव नहीं किया, तो ये सिर्फ मेरी नहीं, आपकी और दादाजी की भी बेइज़्ज़ती बनेगी।"

यश थोड़ी देर चुप रहा।

"तू चाहता क्या है अभी?"

"सिर्फ दो दिन। मैं सब प्रूव करके दिखाऊंगा।"

"और अगर न कर सका?" यशवर्धन ने सीधा पूछा।

"तो मैं खुद मीडिया के सामने जाऊगा। लेकिन उससे पहले... किसी को मुझे दोषी ठहराने का हक़ नहीं है।"

कमरे में खामोशी पसर गई।

यशवर्धन ने एक गहरी साँस लेकर कहा, "ठीक है। दो दिन। लेकिन एक बात याद रख अखिल, तू अगर झूठ बोल रहा है ना... तो इस खानदान का नाम तू कभी दोबारा इस्तेमाल नहीं कर पाएगा।"

अखिल ने सिर आंखों में आंखे डाल कहा।

“सच क्या है ये तो बाहर आकर ही रहेगा, पापा।”

कमरे से बाहर निकलते हुए यशवर्धन ने अर्जुन की ओर देखा।

"अगर वो सच कह रहा है तो किसी ने हमारी जड़ें हिलाने की साज़िश की है। और अगर वो झूठ बोल रहा है — तो उससे बड़ा दुश्मन कोई नहीं।”

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