इश्क़ दी रिवेंज लव Ch. 3

इश्क़ दी रिवेंज लव - Chapter 3 ( मीरा हुई किडनैप )

Posted by S✨ Sood • May 29, 2025 12:20 AM

मीरा राजपूत के लिए यह दिन बेहद खास था। लंदन की चमक छोड़कर वह मुंबई लौट रही थी, अपने पिता से मिलने के लिए। एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही गर्म हवा और भीड़-भाड़ ने उसका स्वागत किया। लंबे सफ़र के बाद भी उसके चेहरे पर वही मासूम मुस्कान और चमक थी।

“मुंबई… आखिरकार मैं आ ही गई,” उसने खुद से कहा और ट्रॉली धकेलते हुए बाहर बढ़ी।

अचानक भीड़ में किसी से उसका हल्का सा टकराव हुआ।

“ओह, सॉरी!” वह कहकर आगे बढ़ने लगी, तभी उसने महसूस किया कि उस अजनबी ने जैसे उसके हाथ को कसकर पकड़ लिया और कुछ दबाया हो।

“अरे, क्या कर रहे हैं आप?” मीरा ने हैरानी से हाथ छुड़ाया।

वो शख्स जल्दी से भीड़ में गायब हो गया।

पहले तो मीरा ने सोचा कि यह बस एक मामूली हादसा था, लेकिन कुछ ही सेकंड बाद उसके हाथ में हल्की जलन और चुभन-सी महसूस हुई। उसने देखा, वहाँ लाल निशान पड़ गया था।

“ये क्या…?” उसने खुद से बुदबुदाते हुए ट्रॉली छोड़ दी और वॉशरूम की ओर बढ़ी।

वॉशरूम के शीशे के सामने खड़े होकर उसने अपनी कलाई देखी। अचानक उसे हल्की चक्कर-सी आने लगी। उसने दोनों हाथों से चेहरा पकड़ लिया।

“मुझे… ये क्या हो रहा है?”

उसकी साँसें तेज़ हो गईं। आँखों के सामने धुंध छाने लगी। वह घबराकर दीवार का सहारा लेने लगी। कुछ ही पलों में उसके पैर लड़खड़ाए और उसका पूरा शरीर ढहकर ज़मीन पर गिर पड़ा।

भीड़भाड़ वाले एयरपोर्ट के उस कोने में सबको लगा शायद कोई थकी हुई यात्री बेहोश हो गई है। लेकिन कोई समझ नहीं पाया कि यह सब योजना का हिस्सा था।

भीड़ के बीच से एक लंबा-चौड़ा, चौड़े कंधों वाला शख्स आया। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था—न घबराहट, न हैरानी। बस ठंडी आँखें और मजबूत इरादे। उसने बिना किसी हिचक के मीरा को अपनी बाँहों में उठाया, जैसे यह सब पहले से तय था।

लोगों को लगा कोई जान-पहचान वाला मदद कर रहा है। किसी ने रोकने की हिम्मत नहीं की।

वह आदमी एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही काली SUV कार की ओर बढ़ा। पिछला दरवाज़ा खोला, और मीरा को आराम से सीट पर लिटा दिया। उसकी साँसें भारी थीं, और आँखें आधी खुली हुईं, जैसे बेहोशी और नींद के बीच झूल रही हो।

कार शहर की भीड़ से निकलकर धीरे-धीरे वीरान रास्तों की ओर बढ़ने लगी। हर स्ट्रीट लाइट के बाद अंधेरा गहराता गया। मीरा का सिर हल्का-हल्का हिल रहा था, जैसे वह कुछ कहना चाहती हो लेकिन बोल नहीं पा रही थी।

करीब एक घंटे बाद कार एक पुराने गेट के सामने रुकी। गेट पर लगी जंग लगी चेन खनकती हुई खुली और SUV अंदर दाख़िल हुई। यह जगह मुंबई का शोरगुल नहीं, बल्कि सन्नाटा समेटे हुए थी।

वह एक हवेली थी—ऊँची दीवारें, टूटी खिड़कियाँ और चारों ओर पसरा अंधेरा। हवेली में कदम रखते ही ऐसा लगता था जैसे वक्त यहाँ कई साल पहले थम गया हो।

शख्स ने कार से उतरकर मीरा को फिर से अपनी बाँहों में उठाया। हवेली के अंदर के बड़े हॉल में धूल जमी थी, लेकिन ऊपर की मंज़िल पर एक कमरा साफ़-सुथरा और तैयार था।

वह उसे सीधा उसी कमरे में ले गया। कमरे के बीचों-बीच एक चौड़ा बिस्तर था। उसने मीरा को वहाँ सावधानी से लिटा दिया। मीरा की कलाई अब भी लाल हो रही थी, और उसकी साँसें नशे से भारी थीं।

शख्स ने कुछ पल उसकी ओर देखा। फिर बिना कुछ कहे कमरे का दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया और भारी ताले में चाबी घुमा दी।

अब हवेली की खामोशी के बीच सिर्फ़ मीरा की धीमी साँसों की आवाज़ गूँज रही थी।

कुछ देर बाद मीरा की आँखें धीरे-धीरे खुलीं। उसने खुद को अनजान कमरे में बिस्तर पर लेटा पाया। घबराकर वह उठी और चारों ओर नज़र दौड़ाई—ऊँची दीवारें, जालीदार खिड़की और बाहर से बंद दरवाज़ा। अचानक वह जोर-जोर से दरवाज़े को पीटने लगी, “मुझे यहाँ से बाहर जाने दो… कोई है?”

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