हम तुम्हें चाहतें हैं ऐसे - Chapter 1
सिंघानिया मेंशन के स्टडी रूम में हवा भारी थी। खिड़की से छनकर आती शाम की रोशनी कालीन पर पसरी कड़वाहट को छुपा नहीं पा रही थी।
"अलीशा से शादी तुमने अपनी मर्जी से की थी। हमें तो वह कभी पसंद नहीं थी। तुमने जो चाहा किया, मगर हमने तुम्हें कभी नहीं रोका," राजन सिंघानिया की आवाज़ में बरसों का दर्द और थकावट साफ़ झलक रही थी। उन्होंने सामने खड़े अपने ज़िद्दी बेटे जयराज की तरफ़ देखा। "अब तो मान जाओ मेरी बात! दुश्मन नहीं हूँ मैं तुम्हारा। हमेशा अपनी मनमानी करते हो। वह गलती तुमने की थी जय... अगर उस वक्त माँ-बाप की बात मानते तो आज ऐसा कभी नहीं होता।"
जयराज अपनी जगह चुपचाप खड़ा रहा। उसके चेहरे की सख्त रेखाएँ बता रही थीं कि वह अंदर ही अंदर उबल रहा है।
राजन ने अपने स्वर को थोड़ा धीमा किया, पर उसमें पिता का अधिकार और तजुर्बा साफ़ था, "हम माँ-बाप हैं तुम्हारे, दुश्मन नहीं। तुम्हारे लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा, यह तुमसे ज़्यादा हम जानते हैं। मानता हूँ तुम्हें बिज़नेस की गहरी समझ है, पर ज़िंदगी की समझ हमसे ज़्यादा नहीं हो सकती।"
जय से अब और चुप नहीं रहा गया। उसने तीखी और कड़वी आवाज़ में कहा, "क्यों मेरी शादी के पीछे पड़े हैं आप डैड? मुझे नहीं करनी किसी के साथ शादी! क्यों आप मुझे शांति से रहने नहीं देते? युग की फ़िक्र है मुझे, आप समझते क्यों नहीं? जब उसकी अपनी माँ, उसकी माँ नहीं बन सकी... तो अब कौन युग की माँ बनेगा और क्यों? कोई दूसरी औरत मेरी ज़िंदगी में आकर मेरे बेटे के लिए परेशानियाँ खड़ी करे, यह मैं कभी नहीं होने दूँगा।"
राजन का गुस्सा अब बर्दाश्त से बाहर हो रहा था, "युग की फ़िक्र तो तुम छोड़ ही दो! उसके लिए मैं और तुम्हारी माँ हैं। वह हमारा बेटा है, उसकी परवरिश की ज़िम्मेदारी हमारी है, तुम्हारी नहीं। मगर मैं तुम्हें इस तरह अकेले नहीं छोड़ सकता। जैसे युग तुम्हारा बेटा है, वैसे ही तुम भी हमारे बेटे हो। तुम्हारी फ़िक्र करने का हक़ है हमारे पास!"
जब राजन ने देखा कि जयराज अपनी ज़िद से एक इंच भी पीछे हटने को तैयार नहीं है, तो उन्होंने आख़िरी दाँव चला। उनकी आवाज़ में अचानक एक ठंडापन आ गया।
"एक बात याद रखो जय... अगर तुम इस शादी के लिए हाँ नहीं कहोगे, तो मुझे 'डैड' कहने की भी कोई ज़रूरत नहीं है।" राजन मुड़े और जाने लगे, फिर रुककर एक गहरी साँस ली, "बहुत हो गया... मत मानो मेरी बात। अब हम बूढ़े हो गए हैं, और आज के दौर में बूढ़ों की बात सुनता ही कौन है।"
यह इमोशनल वार जयराज के दिल पर सीधा लगा। वह एक पल के लिए थमा और भारी आवाज़ में बोला, "मगर डैड, वह लड़की मुझसे इतने साल छोटी है! सिर्फ़ उन्नीस साल की है वह और मैं बत्तीस का हूँ। एक उन्नीस साल की लड़की कैसे निभाएगी मेरे साथ? आपको सच में लगता है कि मैं एक छोटी बच्ची के साथ एडजस्ट कर पाऊँगा? कम से कम उसकी उम्र तो मेरे बराबर होनी चाहिए थी!"
राजन के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान आई, "पता है मुझे सब। तुम्हारी माँ भी मुझसे नौ साल छोटी है, भूल रहे हो तुम? और देखो, हमने पूरी ज़िंदगी कितनी खूबसूरती से बिताई। उम्र का फ़र्क़ मायने नहीं रखता जय, इन सब बातों की फ़िक्र तुम मत करो... मैं हूँ न सब देखने के लिए।"
जय ने हार मानते हुए एक ठंडी साँस भरी। उसे समझ आ गया था कि उसके माँ-बाप अब उसका पीछा नहीं छोड़ने वाले।
"पिछले एक महीने से आप मुझसे इसी टॉपिक पर बात कर रहे हैं," जय ने सिर झुकाकर कहा, "चलिए, मान ली मैंने आपकी बात। जैसा आप चाहते हैं, वैसा ही होगा।"
राजन की आँखों में चमक आ गई, "तो ठीक है, शाम को हम लड़की से मिलने चलेंगे।"
"नहीं, मुझे नहीं जाना लड़की से मिलने," जय ने तुरंत काटते हुए सख्त लहजे में कहा, "जिस दिन शादी हो, सीधे बता दीजिएगा... पहुँच जाऊँगा मैं। लेकिन याद रखिएगा डैड, शादी के बाद मुझे किसी बात के लिए टोका नहीं जाएगा। जो मेरी मर्जी होगी, मैं वही करूँगा। कल को अगर कुछ गलत हुआ, तो मुझे ब्लेम करने की ज़रूरत नहीं है। आप मुझे किसी बात के लिए कंपेल नहीं कर सकते।"
इतना कहकर जयराज लंबे-लंबे कदम भरता हुआ गुस्से में कमरे से बाहर निकल गया।
कमरे के दरवाज़े पर खड़ी जया—जय की माँ—आहिस्ते से राजन के पास आई। उसकी आँखों में चिंता के बादल थे, "राजन... क्या यह सही होगा? जय इतना गुस्से वाला है, इतना ज़िद्दी है... क्या वह मासूम लड़की इसके साथ खुश रह पाएगी? आप एक बार फिर सोच लीजिए। पिछली बार भी उसने अपनी मर्जी से शादी की थी, और नतीजा हम देख चुके हैं।"
राजन ने जया के काँपते हाथों को अपने हाथों में लिया और इत्मीनान से मुस्कुराए, "मैंने बहुत सोच-समझकर यह फ़ैसला लिया है जया। मैं उस लड़की को बचपन से जानता हूँ। जय जैसे सख्त और ज़िद्दी इंसान को सँभालने के लिए वैसी ही सुलझी हुई और मजबूत लड़की चाहिए... और उसे भी जय जैसा साथी चाहिए, जो दिल का भले ही कठोर दिखता हो, पर सच्चा हो।"
"क्या होता है जब अतीत का लगा एक ज़ख्म, इंसान का प्यार पर से हमेशा के लिए भरोसा उठा देता है?
यह कहानी है जयराज सिंघानिया की... 32 साल का एक बेहद कामयाब, सख्त और ज़िद्दी बिजनेसमैन। ज़िंदगी ने उसे एक कड़वा अतीत और 5 साल के मासूम बेटे, युग की ज़िम्मेदारी दी है। जयराज ने अपने दिल के चारों तरफ़ नफ़रत और खामोशी की एक ऐसी ऊँची दीवार खींच ली है, जहाँ किसी के लिए कोई जगह नहीं... यहाँ तक कि दोबारा प्यार या शादी के लिए भी नहीं!
मगर दूसरी तरफ़ है जानवी... सिर्फ़ 19 साल की एक मासूम, अनाथ लड़की। दुनिया की ठोकरें खाने के बावजूद उसकी आँखों में एक अजीब सा ठहराव और समझदारी है।
जब माँ-बाप की ज़िद के आगे झुककर जयराज को न चाहते हुए भी 19 साल की जानवी से शादी करनी पड़ती है, तो टकराती हैं दो अलग-अलग दुनिया!
एक तरफ़ बत्तीस साल का गुस्सा, ज़िद और नफ़रत... तो दूसरी तरफ़ उन्नीस साल का सब्र, मासूमियत और सच्चाई।
क्या जानवी जयराज के सीने में जमी बर्फ़ को पिघला पाएगी? क्या वो 5 साल के नन्हे युग की माँ बनकर उस टूटे हुए घर को समेट पाएगी? या जयराज का ठंडा व्यवहार तोड़ देगा जानवी के दिल को?
जानिए इस अनोखी और दिल छू लेने वाली लव स्टोरी में...
'हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे'!
बने रहिए हमारे साथ और सुनिए इस खूबसूरत सफ़र की पहली किश्त..."