My unknown billionaire husband Ch. 3

My unknown billionaire husband - Chapter 3

Posted by Aarya Rai • Apr 03, 2025 01:52 PM

अन्विका का दिल जोरों से धड़क उठा। उसने अपने कदम पीछे की ओर घसीटे और अचानक पीछे रखे सोफे पर गिर पड़ी। रुद्रांश के होंठों पर तिरछी मुस्कान फैल गई। अन्विका हड़बड़ाकर उठने लगी, पर रुद्रांश उसके बेहद करीब पहुँच गया था और अचानक उसकी ओर झुक गया। घबराकर अन्विका ने पीछे हटने की कोशिश की, पर नाकामयाब रही क्योंकि रुद्रांश ने उसकी ओर झुकते हुए, उनके बीच की दूरी और कम कर दी थी।

अन्विका ने हिम्मत करके उसे धक्का देने के लिए हाथ बढ़ाना चाहा, पर झिझक और शर्म के कारण ऐसा नहीं कर सकी। अगर वो हाथ बढ़ाती, तो उसकी हथेली रुद्रांश के चौड़े, मजबूत सीने को छू जाती। सोचकर ही उसके दिल में अजीब सी हलचल होने लगी।

रुद्रांश अपनी हथेली सोफे पर टिकाते हुए उसके और करीब आ गया। पीछे होते-होते अन्विका सोफे पर लगभग लेट चुकी थी, और पीछे हटने की कोई जगह नहीं बची थी। उसकी साँस थम सी गई थी। आँखें बड़ी-बड़ी किए, वो सहमी निगाहों से घबराई हुई उसे देख रही थी। उनके बीच इंच भर की दूरी रह गई थी; शुक्र था कि रुद्रांश वहीं रुक गया। उसने उनके बीच की दूरी कम करने की कोशिश नहीं की और गहरी निगाहों से उसे देखने लगा।

बारिश की वजह से अन्विका के कपड़े उसके शरीर से चिपक गए थे, जिससे उसके कोमल शरीर की खूबसूरती और आकर्षक फिगर पूरी तरह से उभर कर सामने आ रहे थे। उसकी हिरनी जैसी आँखें और तितली के पंखुड़ियों जैसे फड़फड़ाती पलकें; डरी-सहमी बार्बी डॉल जैसी क्यूट लग रही थी वो।

रुद्रांश की नज़रें उसके खूबसूरत वजूद पर से फिसलते हुए, उसके कॉलरबोन पर आकर ठहर गईं। वो बर्थ मार्क उसे attract कर रहा था। उसके चेहरे के बदलते भाव और आँखों में झलकते एहसास कुछ अलग से थे, जिन्हें समझना मुश्किल था। जिस अंदाज़ से वो उस बर्थ मार्क को देख रहा था, उससे साफ़ ज़ाहिर था कि उसका मन उसे छूने को मचल रहा है।

रुद्रांश ने अपनी आँखें बंद करते हुए गहरी साँस ली, शायद अपने ज़ज़्बातों को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहा था।

रुद्रांश की निगाहें खुद पर टिके देखकर अन्विका नर्वस होने लगी और अपनी बाँहों को खुद पर लपेटा, जैसे उसकी आगोश में खुद को छुपा लेने को बेताब थी। इन करीबियों से उसका दिल घबराहट के मारे ज़ोरों से धड़कने लगा, दिमाग सुन्न हो गया। इस लम्हे में वो समझ नहीं पा रही थी कि उसे क्या करना चाहिए।

रुद्रांश के होंठों पर शरारती मुस्कान फैल गई। अन्विका को यूँ सताने और परेशान करने में उसे मज़ा आने लगा था। वो अन्विका के थोड़ा और नज़दीक आया, तो अन्विका ने घबराकर अपनी आँखें भींच लीं। उसे लगा जैसे आँखें बंद करने से वो यहाँ से गायब हो जाएगी, या शायद रुद्रांश की नज़रें उसे नर्वस कर रही थीं, इसलिए उसने अपनी आँखें भींच ली थीं ताकि खुद को संभाल सके।

रुद्रांश उसकी इस बचकानी हरकत पर हल्का-सा हँसते हुए सीधे होकर उसके बगल में बैठ गया। पर अन्विका को अब भी इस बात का बिल्कुल एहसास नहीं था। वो यूँ ही साँसें थामे खुद में लिपटी हुई, सहमी हुई सी लेटी रही।

एक नौकर तुरंत आया और तौलिए से उसके बाल सुखाने लगा। रुद्रांश ने आँखें दिखाकर उसे रोक दिया। उसने उससे तौलिया लेकर उसे जाने का इशारा किया, और वो तुरंत ही सर झुकाता हुआ वहाँ से चला गया। रुद्रांश ने तौलिए से अपने भीगे चेहरे और गर्दन को पोंछा, फिर बाल पोंछते हुए अचानक ही उसके मन में एक शरारत ने जन्म लिया। उसने बेपरवाही से भीगे तौलिए को फेंका, जो सीधे अन्विका के मुँह पर जाकर गिरा। अन्विका ने एकदम से चौंकते हुए अपनी आँखें खोल दीं।

आँखों के आगे कुछ सफ़ेद-सफ़ेद सा आया। उसने हाथ बढ़ाकर मुँह पर से तौलिया हटाया, तो खुद के ऊपर से रुद्रांश को गायब पाया। अन्विका हड़बड़ाकर उठकर बैठने लगी, तो नज़र बगल में बैठे रुद्रांश पर गई, जो होंठों पर मंद मुस्कान सजाए, बड़ी ही दिलचस्पी से उसे देख रहा था।

अन्विका कुछ देर पहले की अपनी हरकत पर हैरान थी, वहीं रुद्रांश की हरकतों से बेचैन भी थी। उससे नज़रें चुराते हुए वो सोफे के दूसरे कोने से चिपक गई और नर्वसनेस में अपनी उंगलियों को आपस में उलझाने लगी।

"तुम मेरी कार के सामने से हट क्यों नहीं रही थी और इतना रो क्यों रही थी?" रुद्रांश ने अचानक ही सवाल किया। इसे सुनकर अन्विका ने चौंकते हुए नज़रें घुमाकर उसे देखा।

रुद्रांश चेहरे पर गंभीर भाव लिए, आँखें चढ़ाए, सवालिया निगाहों से उसे देख रहा था। अन्विका को वो लम्हा याद आ गया जब उसे सम्यक के बारे में खबर मिली थी और वो अपने होश खो बैठी थी। एक बार फिर वो भावनाओं में बहने लगी, पर जल्दी ही उसने खुद को संभाला।

रुद्रांश उसके लिए अंजान था, तो अपनी ज़िंदगी से जुड़ी पर्सनल बातें उसे बताकर न तो वो उसकी सहानुभूति चाहती थी और न ही उसे कुछ बताने का कोई फ़ायदा था।

"टेल मी… तुम इस तरह बीच रोड पर खड़ी होकर रो क्यों रही थी और जब सामने से आती कार तुम्हें नज़र आ रही थी, तो हट क्यों नहीं रही थी?"

रुद्रांश ने एक बार फिर सवाल किया। अन्विका के चेहरे पर कुछ अजीब से भाव उभरे। क्या बताती उसे कि किस्मत ने उससे जीने की वजह ही छीन ली इसलिए मरना चाहती थी वो? नहीं, वो ऐसे अपनी पर्सनल लाइफ़ अपने क्लाइंट के सामने नहीं ला सकती थी।

अन्विका ने गहरी साँस ली और बिना किसी भाव के जवाब दिया, "मैं जल्दी ही आपको आपकी शर्ट का पूरा कॉम्पेन्सेशन पे कर दूंगी… मेरी इतनी हेल्प करने के लिए थैंक यू… थैंक यू सो मच। अब मुझे यहाँ से जाना चाहिए।"

इस वक़्त उसके दिल की जो हालत थी और जितनी तकलीफ में वो थी, वो किसी से ये शेयर करना चाहती थी, लेकिन वो ये खतरनाक और रहस्यमय शख्स तो बिल्कुल नहीं था, जिसे वो ठीक से जानती तक नहीं थी। उस वक़्त वो कमज़ोर पड़ गई थी, पता नहीं क्या हुआ था उसे कि उसके सामने ऐसे रो पड़ी, पर अब उसने खुद को संभाल लिया था।

अन्विका ने उसे थैंक्स कहा और उठकर चली गई। रुद्रांश ने उसे रोकने की कोशिश भी नहीं की। जाती हुई अन्विका की पीठ को देखते हुए, रुद्रांश की आँखों में कुछ अजीब से भाव नज़र आ रहे थे, जिन्हें समझना मुश्किल था। उसने टेबल पर रखे मोबाइल को उठाकर किसी को फोन पर ऑर्डर दिया और जैसे ही अन्विका ने गेट से बाहर क़दम रखा, एक नई चमचमाती कार उसके सामने आकर खड़ी हो गई।

"बारिश अब भी काफ़ी तेज हो रही है और मुझे तुम पर कोई भरोसा नहीं, कहीं फिर से किसी चलती कार के सामने जाकर न खड़ी हो जाओ। बैठ जाओ अंदर, ड्राइवर तुम्हें छोड़ देगा।"

अन्विका जो सामने खड़ी कार को हैरानी से घूर रही थी, अचानक आई रुद्रांश की आवाज़ सुनकर उसने चौंकते हुए मुड़कर देखा। उससे कुछ क़दमों की दूरी पर रुद्रांश खड़ा था; चेहरे पर गंभीर भाव, दोनों हाथ जेब में डाले, माथे पर बिखरे भीगे बाल; अपनी आकर्षक पर्सनैलिटी के साथ रहस्यमय आँखों से उसे ही घूर रहा था।

रुद्रांश ने आँखें घुमाकर अन्विका को कार में बैठने का इशारा किया। पहले तो झिझक के कारण अन्विका उलझन में पड़ गई, फिर कुछ सोचते हुए वो अंदर बैठ गई और रुद्रांश तब तक वहीं खड़ा रहा जब तक कि वो कार मेन गेट से बाहर न निकल गई, फिर अपने भीगे बालों में उंगलियाँ घुमाते हुए वो अंदर आ गया। उसके होंठों पर अजीब सी मुस्कान फैली थी और उसके शैतानी दिमाग में इस वक़्त क्या चल रहा था, ये बस वही जानता था।

कार अन्विका के घर के बाहर आकर रुकी। ड्राइवर को थैंक्यू कहते हुए वो बोझिल कदमों से अंदर जाने लगी। बारिश अब भी पूरे ज़ोर पर थी और चंद मिनटों में अन्विका को पूरी तरह से भीगा चुकी थी।

अन्विका के कदम घर के गेट पर ही ठिठक गए। उसने गहरी साँस ली, खुद को संभाला, दिल को अपनी ज़िंदगी की सबसे कड़वी हकीकत का सामना करने के लिए मजबूत किया और जैसे ही अंदर क़दम रखा, एक साथ कई निगाहें उस पर जम गईं। इन्हें नज़रअंदाज़ करते हुए उसने अभी कुछ कदम बढ़ाए ही थे कि एक सख्त, रौबदार आवाज़ उसके कानों से टकराई और उसके आगे बढ़ते कदम ठिठक गए। चेहरे का रंग उड़ गया और घबराहट के मारे माथे पर पसीने की बूँदे झिलमिलाने लगीं।

To be continued…

you must read my novel "destined to be mine"

"प्यार... एक ऐसा शब्द जो अद्वय राठौड़ के लिए किसी मज़ाक से कम नहीं था।"

Successful, charming और dangerously handsome — लड़कियाँ उसकी एक मुस्कान पर फिदा थीं, मगर शादी? उससे तो वो ऐसे भागता था जैसे आग से।

लेकिन किस्मत ने जब उसकी टक्कर आध्या से कराई, तो कहानी ने मोड़ ले लिया।

आध्या — एक खूबसूरत, बोल्ड और खुद्दार सिंगल मदर।

जिसकी ज़िंदगी उसकी नन्हीं सी दुनिया मिष्टि के इर्द-गिर्द घूमती थी।

उसका अतीत ऐसा था कि मर्दों पर भरोसा करना उसने छोड़ दिया था। प्यार, शादी, मोहब्बत — सब बकवास लगता था उसे।

पर अद्वय... वो तो कुछ और ही निकला।

वो उसका अतीत नहीं, किस्मत बनकर आया था।

और इस मोहब्बत की सबसे खूबसूरत शुरुआत बनी — मिष्टि।

ये कहानी है एक ऐसे इश्क़ की... जो तकरार से शुरू होकर तक़दीर में बदल गया।

एक ऐसे जुनून की... जिसने एक टूटी हुई औरत को फिर से मोहब्बत पर यकीन करना सिखाया।

"He never believed in love... until she belonged to him."

100%