मीत ए मीरजा - Chapter 2
वो एक कटाक्ष की तरह बोली …
“ जनाब , इश्क हमेशा खुबसूरती से होता हैं और किसी हुस्न में वो बात नहीं जो नवाब मिर्जा को अपनी बंदिशों में कैद कर सके … आपके मिर्जा साहब बड़े रंगीन मिजाजी हैं और ऐसा कभी होता हैं क्या मियां …. भंवरा कभी एक फूल पर नहीं टिकता हैं जब वह एक फूल पर बैठ जायें तो उसका जी दूसरे फूल के लिए मचलता ही हैं ।
इतना कहते हुए वह जाकर एक जगह बैठ गयी जिसे महिलाओं के बैठने के लिएअलग से सजाया गया था। वहाँ पर्दे की ओट में रहते हुए भी उनकी आवाज़ में तल्ख़ी साफ झलक रही थी लेकिन उनकी बातों को मिर्जा साहब के अलावा कोई ना समझ सका ।
मिर्जा साहब ने हँसी में बात को टालने की कोशिश की, “अरे भई, हमारी बेगम भी क्या खूब ग़ज़ल कहती हैं! अब हमें भँवरा बना दिया, मगर भई, भँवरे की भी तो फितरत होती है, गुलों से मुहब्बत करने की!”
जुबैदा बेगम ने धीरे से मुस्कुराकर कहा, “और गुलों की भी फितरत होती है, मुरझा जाने की, नवाब साहब… बस फर्क यह है कि कुछ फूल मुरझाने से पहले अपनी खुशबू किसी एक के नाम कर जाते हैं, और कुछ हर झोंके के साथ अपनी महक उड़ाते रहते हैं।”
महफ़िल एक बार फिर जम चुकी थी , आज की यह महफ़िल साल में एक बार ही होती थी और वह मौका होता था शब ए बरात , जिस रात की महफ़िल में नवाबों की बैठक में उनकी बेगम को भी आने की आजादी थी बस शर्तें वह इन महफ़िलों का हिस्सा , पर्दे के पीछे से ही होती थी ।
जुबैदा बेगम को शुरू से ही ग़ज़लें लिखने का शौक रहा था और जनाना महल में उनकी भी महफ़िल होती थी और यह बात नवाब साहब अच्छे से जानते थे
नवाब मिर्जा साहब बात का रुख मोड़ने के लहजे में बोले
बेगम जब आप इस महफिल में हैं ही तो कुछ जुमले आप भी अर्ज कीजिए ……..
जिस पर जुबैदा बेगम मुस्कराते हुए बोली , “ अर्ज किया हैं …..”
जिस पर पूरी महफ़िल बोल उठी , “ इरशाद …. इरशाद …”
जुबैदा बेगम आगे बोली ,
"इश्क़ आया था बड़े अदब से दर पे मेरे,
मगर मैं ख़ामोश रहा, कोई वजह तो होगी..."
हवा ने कहकहे लगाए, चाँद ने तंज़ कसा,
कि अब भी दिल में उजाला है, कोई दुआ तो होगी..."
पूरी महफ़िल में वाह वाह गुंज उठी और जुबैदा बेगम ने नया शेर पेश किया था
"ये संगमरमर की दीवारें, ये झूमर, ये रौशनियां,
किसी की क़ैद को महल का नाम दे दिया गया..."
जो हक़ था कभी ख़्वाबों का, वो क़िस्सों में खो गया,
इश्क़ की सदा को भी फ़रमान कर दिया गया..."
नवाब साहब भी उनके इस शेर पर अपना नया जुमला पेश किया था , “
"क़िस्मत की स्याही से तक़दीर लिखी जाती है,
हम ना होते तो कहानी कहीं और जा बसती…
ये जो रौशन हैं दिये, ये जो महफ़िल में रंग हैं,
कभी सोचो, ये उजाले किसके दम से बरक़रार हैं…”
जिस पर पर्दे के पीछे से ही जुबैदा बेगम का नया कटाक्ष आया था ,
"रक़्स करती रही परछाइयाँ शम्स-ओ-कमर में,
पर हक़ीक़त को सदा ही पर्दानशीं कर दिया गया…”
इसी तरह यह महफ़िल चलती रही , महफ़िल अपने चरम पर थी, हर कोई शेर-ओ-शायरी के इस दिलचस्प मुकाबले का लुत्फ़ उठा रहा था, मगर पर्दे के पीछे बैठे जुबैदा बेगम और सामने बैठे नवाब मिर्ज़ा साहब के बीच जो अल्फ़ाज़ की जंग छिड़ी थी, उसे बस वही दोनों महसूस कर सकते थे।
नवाब मिर्ज़ा साहब जुबैदा बेगम के कटाक्ष को हल्के में नहीं ले सकते थे। वह जानते थे कि यह महज़ शेर नहीं, बल्कि उनके जीवन की हकीकत पर किया गया वार था। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई, उन्होंने अपनी अंगूठी से खेलते हुए गहरी आवाज़ में शेर पढ़ा—
"गुलों की चाहत तो सबको होती है,
मगर हर शाख पे गुलाब नहीं खिलता…"
महफ़िल में एक बार फिर वाह-वाह की आवाज़ गूंज उठी, मगर पर्दे के पीछे बैठीं जुबैदा बेगम के होंठों पर हल्की मुस्कान थी, जैसे वह पहले से इस जवाब के लिए तैयार थीं।
उन्होंने नज़ाकत से अपनी उंगलियों में रेशमी दुपट्टा लपेटा और धीरे से कहा—
"जिसे मौसम बदलने की आदत हो,
वो शाख भी तो महकती नहीं देखी…"
महफ़िल में बैठे लोग अब तक इसे महज़ एक गज़ल का हिस्सा समझ रहे थे, मगर नवाब मिर्ज़ा साहब और जुबैदा बेगम दोनों जानते थे कि यह सिर्फ़ शेर नहीं, बल्कि तलवार की एक धार थी, जो बड़े नज़ाकत से चलाई गई थी।
नवाब मिर्ज़ा साहब ने अपनी नफीस शेरवानी की बाजू ऊपर की, जैसे अब यह जंग और दिलचस्प होने वाली थी। उन्होंने गहरे लहज़े में कहा—
"सुनते हैं गुलशन में अब भी बहार बाकी है,
मगर कुछ फूल बेज़ार से नज़र आते हैं…”
यह महफ़िल इसी तरह सजती लेकिन नवाब साहब खड़े होकर बोले , “हमारे सभी मेहमानों का शुक्रिया, कि आज की इस शब-ए-बरात की महफ़िल में आपने हमारे साथ इस बेहतरीन शेर-ओ-शायरी का लुत्फ़ उठाया। यह रात ख़ास है, इबादत की है, और आज की इस ख़ूबसूरत महफ़िल को यहीं खत्म करना बेहतर होगा।"
यह कहकर उन्होंने इशारे से दीवान-ए-ख़ास के सेवकों को संकेत दिया कि अब महफ़िल को समेटा जाए। महफ़िल में बैठे मेहमानों ने थोड़ी मायूसी से एक-दूसरे को देखा क्योंकि अब इस आनंद के लिए उनके हिस्से लम्बा इंतजार था ।
खैर कुछ वक्त में महफिल बिखर गयी लेकिन पर्दे के पीछे जुबैदा बेगम के चेहरे पर एक तंज मुस्कान थी । आखिर शब - ए - बारात के दिन उनको मौका मिलता था यूं पुरुषों की महफ़िल में शरीक होने का लेकिन ऐसा पहली बार हुआ था जब उन्होंने अपने जुमलों में यूं अपने ही शौहर नवाब साहब पर कटाक्ष रचा था और उनके शब्दों के इस खेल को नवाब साहब के सिवा और कोई समझ भी नहीं पाया ।
वह जानती थी आज के दिन ही उसे बोलने की आजादी थी और जिंदगी में बढ़ती घूटन के बीच आज का यह उत्सव उनके दिल को एक ठंडक पहुंचा गया था जो उन्हें कुछ पल का सुकून दे गया ।
वो जनाना महल लौट आयी लेकिन आज एक बात दिलचस्प हुई।
उनकी खास सेविका रुपल , जो लगभग उन्हीं के उम्र की थी वह आयने के सामने बैठी जुबैदा बेगम के गहने उतारते हुए बोली , “ बेगम साहिबा , आज तो आपने बहुत दिलचस्पी से अपने शेर प्रस्तुत किये । आपकी आवाज सच में मन मौह लेती हैं
जिस पर आयने में देख अपने झुमके उतारती जुबैदा बेगम कुछ लफ्ज़ बोल ही उठी ….
"लफ्ज़ों में छुपा लिया था जो हाल-ए-दिल,
हर कोई वाह-वाह कर गुज़र गया...
हम समझे थे कोई पढ़ेगा हमें,
पर हर शख़्स बस सफ़्हा पलट गया…”
रुपल ने उनकी यह ग़ज़ल सुनी, तो उसकी आंखों में हल्की नमी तैर गई। वह जुबैदा बेगम को बरसों से जानती थी, उनकी खामोशियां पढ़ना सीख चुकी थी, लेकिन आज पहली बार बेगम ने अपने दिल की बात खुद कह दी थी।
उसने हल्की आवाज़ में कहा, "बेगम साहिबा, आप हमेशा अपने जज़्बात इन सफ़्हों में ही क़ैद रखेंगी क्या?"
जुबैदा बेगम ने खुद को शीशे में देखते हुए अपनी बिंदी ठीक की, फिर मुस्कुरा कर बोली, "कुछ क़ैदें उम्र भर साथ रहती हैं, रुपल। नवाब साहब की महफ़िलों में जितनी चमक होती है, हमारी दुनिया उतनी ही स्याह है। औरतों को अपने ग़म सजाने की इजाज़त होती है, मिटाने की नहीं।"
रुपल ने धीरे से उनके हाथ पर अपना हाथ रखा, "पर बेगम साहिबा, क्या यह महज़ एक शेर-ओ-शायरी का खेल था, या आज सच में आपने नवाब साहब से हिसाब बराबर किया?"
जुबैदा बेगम ने अपने लंबे नाखूनों से ज़रदोज़ी वाले दुपट्टे का किनारा छूते हुए गहरी सांस ली। "आज पहली बार नवाब साहब को अहसास हुआ होगा कि गुलशन में एक फूल ऐसा भी है, जो अपनी मर्ज़ी से नहीं महकता... जिसे जबरदस्ती एक दीवार के पीछे रख दिया गया है।"
रुपल ने हल्की मुस्कान के साथ सिर झुका लिया, "आपका आज का हर लफ्ज़, हर कटाक्ष, हर शेर... ये सब नवाब साहब ने महसूस किए होंगे, बेगम साहिबा। पहली बार वो सोच रहे होंगे कि वो भंवरा नहीं, शायद एक बंदी हैं।"
जुबैदा बेगम हल्के से हंसी, लेकिन उनकी हंसी में दर्द का एक साया था। "अगर वो सच में महसूस कर पाते, तो शायद इस महफ़िल के बाद वो हमें रोकते, हमारी तरफ एक बार देखते। मगर देखो, हम जनाना महल लौट आए हैं, और वो अपनी महफ़िल में तन्हा बैठे होंगे, फिर किसी और ग़ज़ल की तलाश में।"
रुपल ने धीरे से कहा, "शायद पहली बार नवाब साहब को यह समझ आया होगा कि जुबैदा मिर्ज़ा सिर्फ़ उनकी बेगम नहीं, एक शायरा भी हैं, जिनकी महफ़िल में अब तल्ख़ी आने लगी है।"
जुबैदा बेगम ने अपना झुमका उतारते हुए हल्की आवाज़ में कहा—
"ग़ुलाम थे, सो ग़ुलामी का शौक़ भी रख लिया,
मगर हमारी बग़ावत भी लाजवाब निकली..."
रुपल ने मुस्कुराकर कहा, "वाह, बेगम साहिबा!"
लेकिन जुबैदा बेगम की आंखों में अब कोई शेर नहीं था, बस एक गहरी सोच थी, जो शायद नवाब मिर्ज़ा के दिल तक पहुंच गई थी ।
जारी हैं ......
स्टोरी को कंटिन्यू जरुर पढियेगा । जहां प्रेम के अलग ही मायने आपको देखने को मिलेगे