इंतज़ार: वो भूली दास्तां Ch. 2

इंतज़ार: वो भूली दास्तां - Chapter 2

Posted by Archana • Feb 12, 2025 12:56 PM

रॉयल्स बुंदेला

ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज का ऑफिस

न्यूयॉर्क (अमेरिका)

सुबह के 10 बज रहे थे... सभी एंप्लॉय आ चुके थे और पूरी बिल्डिंग में अफरा-तफरी मची हुई थी, जैसे कि कोई इंस्पेक्शन की टीम आने वाली हो। सब तेजी से अपना काम निपटाने पर पड़े थे। सब अपना हंड्रेड परसेंट वर्क कंप्लीट करने पर जुटे थे।

कई टेबल पर वर्कर्स का भी झुंड जमा था। यह वो थे जिनका काम लगभग पूरा हो चुका था। सभी के चेहरे पर खुशी वाले भाव थे। पिछले कई दिन से कंपनी के शेयर के भाव आसमान छू रहे थे। यह जाहिर तौर पर एक अच्छा संकेत था, पर ऑफिस वालों की असली मुश्किल आज उनके बॉस के कड़क और गुस्सैल स्वभाव को लेकर थी, जिसके कारण पूरे ऑफिस में आर्मी रूल फॉलो किया जा रहा था। कहीं भी कोई गलती की गुंजाइश नहीं थी। कोई यह नहीं चाहता था कि उसके एक काम से सर का मूड बिगड़े और पूरे ऑफिस को इस खुशी में मिलने वाले दमदार बोनस का नुकसान हो। इस कारण पूरा ऑफिस एक ग्रुप की तरह काम कर रहा था। जिन लोगों के काम पूरे नहीं हुए थे, दूसरे एम्प्लॉय उसमें उनकी मदद कर रहे थे।

तभी एक चमचमाती हुई ब्लैक ऑडी गाड़ी आकर दफ्तर के सामने लगी।

गाड़ी के दफ्तर के सामने रुकते ही, गार्ड ने तेजी से बढ़ कर दरवाजा खोला और गाड़ी में से करीब चौबीस साल का नवयुवक निकला। 6 फीट से कुछ अधिक हाइट, मस्कुलर बॉडी, थोड़ी हल्की बड़ी हुई सेव और दुनिया भर की कठोरता चेहरे पर थी। सर से पांव तक उसने ब्लैक कलर का ही कॉम्बिनेशन पहन रखा था। बस हाथ में चमचमाती हुई सोने की चेन वाली राडो की लिमिटेड एडिशन वाली घड़ी थी और ब्लैक सूट पर लगाया हुआ सोने का कलम, जिसमें कि हीरे जड़े हुए थे और उन हीरो से ही उस पर R लिखा हुआ था।

युवक ने एक नजर सामने खड़ी दस मंजिला इमारत पर डाली और सीधे ऑफिस गेट से चला गया। ड्राइवर ने गाड़ी ले जाकर पर्सनल पार्किंग में लगा दी।

ऑफिस तक पहुंचने के लिए उस युवक ने पर्सनल लिफ्ट का यूज किया। लिफ्ट में जाते ही उसने अपना हाथ स्कैनर पर रख दिया और दसवें फ्लोर का बटन दबा दिया।

यह है मिस्टर विक्रमसिंह बुंदेला।

अपने माता-पिता को एक रोड एक्सीडेंट में सात साल की उमर में गवाने के बाद, मात्र 16 साल की उम्र में विक्रम ने बिजनेस की दुनिया में अपना पहला कदम रखा था।

फिलहाल में उसके परिवार के नाम पर सिर्फ एक दादी मां सा जीवित है, बाकी उसके परिवार की मृत्यु एक रोड एक्सीडेंट में हो गई है। सारी दुनिया इस रोड एक्सीडेंट को एक हादसा या फिर श्राप समझती है, पर विक्रम को लगता है कि अब कोई हादसा या श्राप नहीं बल्कि सोची समझी साजिश थी।

हालांकि जैसे-जैसे समय बीत रहा था, विक्रम को कुछ परछाइयां परेशान कर रही थीं। अधिकतर विक्रम को डरावने सपने आते थे, पर फिर भी वह इन सब चीजों को मानने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था। अपने मन के डर को अपने अंदर ही दबाते हुए विक्रम ने अपने चेहरे पर गंभीरता का नकाब पहन रखा था। वह डरना नहीं चाहता था, बल्कि अपने व्यक्तित्व से लोगों को डराने में यकीन रखता था।

9 साल की उम्र में जब विक्रम के साथ यह हादसा हुआ था, तब उसके पापा के ममेरे भाई समर्थ सिंह ने और एक खास वफादार पुष्कर सिंह ने आगे बढ़कर रॉयल्स बुंदेला की पूरी जिम्मेवारी उठाई। विक्रम को इस लायक बनाया कि वह समय आने पर पूरे रॉयल्स बुंदेला एंपायर का भार उठा सके। विक्रम ने भी अपने आप को साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

3-4 साल की कड़ी मेहनत के बाद ही, मात्र 20 साल की उम्र में ही उसने अपने आप को दुनिया के सबसे सफलतम बिज़नेस मैन की लिस्ट में शामिल कर लिया था। इसके बाद के बाकी 5 सालों में उसने इतनी मेहनत की थी जिसके बदौलत आज उसकी कंपनी दुनिया की टॉप फाइव कंपनियों में एक है। माइनिंग से लेकर कंस्ट्रक्शन तक, होटल चेन, शॉपिंग मॉल से लेकर इंटरटेनमेंट और गेमिंग तक में इनकी कंपनी ने वर्ल्ड मार्केट में अपनी अच्छी पकड़ बनाई थी।

पिछले एक सप्ताह से वह अपने वर्ल्ड टूर पर निकला हुआ था और इसी दौरान उन्होंने करीब 4 कंपनियों को ओवरटेक किया था और कई कंपनियों के साथ अच्छे बिजनेस कॉन्ट्रैक्ट साइन किए थे, जिससे इस पूरे बुंदेला ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज को काफी फायदा होने वाला था। इस कारण इस टाइम मार्केट में इनकी कंपनी के शेयर इतनी तेजी से उछले थे कि इन्होंने पिछले 20 साल से लगातार शीर्ष स्थान पर रहने वाली कंपनी को भी पीछे छोड़ दिया था।

इनकी यह पर्सनल लिफ्ट केवल इन्ही के स्कैनिंग से काम करती थी। इनके अलावा किसी को भी इस लिफ्ट को यूज करने की परमिशन नहीं थी। यह इनकी अच्छी आदत कह लो या बुरी, इन्हें अपनी पर्सनल लिफ्ट भी किसी के साथ शेयर करना पसंद नहीं।

दसवें फ्लोर पर इनका ऑफिस है। लिफ्ट सीधे जाकर दसवें फ्लोर पर रुकी। गेट के ओपन होते ही दरवाजे के ठीक सामने इनकी सेक्रेटरी मिस सोफिया, उम्र इक्कीस साल, खड़ी थी।

"गुड मॉर्निंग सर" सोफिया ने सर झुका कर गुड मॉर्निंग विश किया। जवाब में विक्रम ने अपने सर को हल्का सा हिलाया और आगे बढ़ने लगा।

"यहां ऑफिस में और सब कुछ कैसा चल रहा है, मिस सोफिया?" विक्रम ने सोफिया से पूछा।

"सब कुछ बढ़िया है सर, कांग्रेचुलेशन, हमारी कंपनी वर्ल्ड की टॉप कंपनी में आ गई है। सारे इंप्लाइज इस चीज को लेकर बहुत उत्साहित हैं और आपको कांग्रेचुलेशन करना चाहते हैं।" सोफिया तेजी से बोली।

मिस्टर बुंदेला ने उनके बधाई का जवाब भी देना जरूरी नहीं समझा और तेजी से आगे अपने केबिन की तरफ बढ़ चले। सोफिया उनके पीछे दौड़ती भागती हुई उनसे आज के शेड्यूल के बारे में जा रही थी। केबिन पर के दरवाजे पर पहुंचकर मिस्टर बुंदेला ने सोफिया की तरफ देखा, जिसका साफ तौर पर इशारा था कि विक्रम अब स्ट्रांग ब्लैक कॉफी पीना चाहता है। सोफिया उनकी आंखों के इशारे को समझ गई और उसने तेजी से सिर हिला कर कहा, "ओके सर, मैं लाती हूं।"

सोफिया तेजी से बाहर निकल गई।

विक्रम ने अपने केबिन का दरवाजा खोला। वाइट और ब्लैक के कांबिनेशन में उसका केबिन शीशे की तरह साफ और सजा हुआ था। उसके केबिन का इंटीरियर डेकोरेशन और साज-सज्जा विक्रम के टेस्ट को बता रही थी। विक्रम ने एक गहरी सांस छोड़ी और अपना पहला ही कदम आगे अंदर की ओर बढ़ाया। तभी उसे अचानक ऐसा लगा कि उसके पैरों ने के नीचे कुछ रखा हुआ था, जो कि उसके पैरों से ठोकर पाते ही गिर गया है।

विक्रम ने भी हैरानी के साथ नीचे देखा। नीचे फर्श पर एक सोने का लोटे की आकार का छोटा सा कलश औंधे मुंह गिरा पड़ा था। विक्रम ने गुस्से में सोफिया को आवाज देना चाहा, लेकिन अचानक से उसे ऐसा लगा जैसे उसने इस स्वर्ण कलश को पहले भी देख रखा है। अभी विक्रम अपने दिमाग पर जोर डालकर उस स्वर्ण कलश को याद करने की कोशिश कर रहा था कि तभी जो नजारा उसके आंखों के सामने आया, उसने विक्रम के रौंगटे खड़े कर दिए।

उस कलश से निकलकर सैकड़ों छोटे-बड़े सांप, बिच्छू उसके पूरे केबिन में रेंग रहे थे। एक अनजाने डर ने फिर से विक्रम को अपने गिरफ्त मे ले लिया। वह चीखना और चिल्लाना चाहता था, लेकिन उसकी आवाज उसके अंदर ही घुट कर रह गई। डर के मारे विक्रम पसीने पसीने होने लगा।

अर्जुन, पीछे मुड़कर अपने केबिन से बाहर निकलना चाहता था, लेकिन आश्चर्य की बात थी कि वह पहले ही कदम में अपने केबिन के बिल्कुल बीचो-बीच पहुंच चुका था और चारों तरफ से सांप और बिच्छू उसे घेरे हुए थे। सब अब विक्रम की तरफ ही बढ़े आ रहे थे। विक्रम ने भागने के लिए बाहर की ओर लेना चाहा, तभी एक सांप उसके पैरों से लिपट गया। विक्रम ने जोर से अपना पैर जमीन पर पटका, फिर भी कोई फायदा नहीं हुआ, बल्कि उस सांप ने और जोर से उसके पैरों को जकड़ लिया था। इसके साथ बाद कई सांप लगातार उसके शरीर पर चढ़ने लगे थे। विक्रम की हालत डर से खराब होने लगी। तभी एक सांप हवा में उड़ता हुआ उसकी तरफ आया और बिल्कुल उसके कानों के पास से होकर गुजर गया। विक्रम झटके से किनारे हटा और तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

ऐसा लग रहा था कि कानों के पास हवा में एक आवाज गूंज रही थी।

"तुम्हारा इंतजार है...."

विक्रम को एक जबरदस्त झटका सा लगा। तभी उसके कंधे पर किसी ने हाथ रखा।

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