इंतज़ार: वो भूली दास्तां - Chapter 1
"हे भगवान!! और जाने कितने दूर मुझे चलना होगा?? अब तो एक कदम चलने की भी हिम्मत नहीं हो रही है.... प्यास से गला सूख रहा है। और पानी!! आसपास कहीं नहीं मिलने वाला.... मिस्टर विक्रम सिंह बुंदेला! तुमने यह रास्ता खुद अपने लिए पसंद किया है... तो अब भुगतो। मेरा भी दिमाग खराब हो गया था... जो ड्राइवर को गाड़ी लाने से मना कर दिया। सरप्राइज का शौक चढ़ा था ना !! तो अब खुद ही सरप्राइज हो जाओ। इस सुनसान रास्ते पर अगर गर्मी के मारे जान भी चली जाएगी तो कोई तुम्हें देखने भी नहीं आएगा।" अपने शर्ट का ऊपरी बटन खोलते हुए विक्रम ने मन ही मन सोचा।
उसने एक नजर आग बरसाते हुए सूरज पर डाली.... पर सूरज आज इस तरह से आग बरसा रहा था कि वह किसी को भी अपने से नजरें मिलाने नहीं दे सकता था, इस धूप गर्मी और रेत से भरे रास्ते में विक्रम का हाल बेहाल हो रहा था। पूरा रास्ता सुनसान पड़ा हुआ था। इंसान तो क्या?? एक चिड़िया भी इस धूप में नहीं दिखाई पड़ रही थी... दूर-दूर तक जलती हुई रेत बिछी थी।
उस में भी जब हवा चलती थी.... तो जलती हुई रेत सीधे शरीर पर पड़ती थी। वैसे तो विक्रम ने पूरे बदन के कपड़े पहन रखे थे, लेकिन फिर भी गर्म रेत कपड़ों के अंदर तक शरीर को जलाने की ताकत रखती थी।
इस सुनसान रास्ते में बह रही हवा, कानों में सीटियां बजा रही थी। रह रह कर लू के साथ गर्म रेत का गुबार उठ रहा था और विक्रम को झुलसाते जा रहा था।
जैसे-जैसे विक्रम रास्ते पर आगे बढ़ता जा रहा था, रेत के टीले काफी दूर-दूर तक बिछे हुए नजर आ रहे थे। चलते-चलते विक्रम बुरी तरह से थक गया था लेकिन ऐसा लग रहा था कि ये रेगिस्तान खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था।
"कहीं मैं रास्ता तो नहीं भूल गया। यही रास्ता तो मेरे हवेली तक जाता है, यह तो मुझे पूरे अच्छे तरीके से पता है। पर अब तक तो मुझे इस रेगिस्तान को पार कर लेना चाहिए था। आसपास कोई दिखाई भी तो नहीं पड़ रहा, जिससे मैं कुछ पूछूं??" विक्रम ने किसी आदमी की तलाश में अपनी नजर इधर-उधर दौड़ाते हुए सोचा।
पर अफसोस!! दूर-दूर तक कोई नहीं था।
तभी उसे ऐसा लगा कि किसी ने बर्फ से भी ठंडे हाथ उसके पीठ पर रख दिया है। उसकी छुवन इतनी अधिक ठंडी थी कि इस जल रहे मौसम में भी उस हाथों की ठंडक को विक्रम ने अपनी रीढ़ की हड्डी तक महसूस की थी। उसका पूरा बदन इस ठंड से कांप गया।
विक्रम झटके से पीछे मुड़ा। लेकिन उसके पीछे कोई नहीं था। एक अनजाने डर ने विक्रम के दिल को अपने कब्जे में ले लिया था, हालांकि वह एक 25 साल का स्वस्थ नवयुवक था। पर फिर भी अपने पीछे किसी को ना पाकर, उसके दिल ने डर के मारे तेजी से धड़कना शुरू कर दिया था।
"दिमाग खराब हो गया है मेरा!!" विक्रम ने सर झटका और आगे बढ़ने के लिए कदम बढ़ाए।
तभी उसके कानों में किसी लड़की के खिलखिला कर हंसने की आवाज पड़ी। इसी के साथ बर्फ से भी ठंडी हवा ने विक्रम को छुआ। हवा इतनी अधिक ठंडी थी, जिसने विक्रम की हड्डियों को भी कंपा दिया था। विक्रम को एक झटका सा लगा।
उसने तुरंत अपनी आंख खोलकर फिर से देखने की कोशिश की क्योंकि कुछ देर पहले वह जलते हुए रेगिस्तान में अकेला खड़ा था और इस समय सामने का नजारा बिल्कुल बदल चुका था। चारों ओर बड़े बड़े घने छायादार पेड़ थे, जिन से सूरज की रोशनी भी मुश्किल से जमीन तक उतर कर आ रही थी और ठंडी हवा लगातार बह रही थी।
"यह क्या हो गया?? यह मैं अचानक कहां से कहां पहुंच गया??" वह धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए आगे निकलने की कोशिश कर रहा था। पर जिधर से भी आगे निकलने की कोशिश करता था उसका रास्ता ये पेड़ रोक ले रहे थे। विक्रम ने पेड़ों के बीच से निकलने की कोशिश की। तभी उसके सामने से कुछ उड़ता हुआ आया। विक्रम तेजी से किनारे हटा और पीछे मुड़कर देखा।
वह एक सांप था, जो कि उससे सिर्फ 4 कदम की दूरी पर गिरा था। अगर वह जल्दी से किनारे नहीं हटा होता तो निश्चित ये सांप उसे डंस गया रहता। मौत के डर ने विक्रम को एक बार फिर से कपा दिया था।
अभी वह कुछ और सोच या समझ पाता, उसके पहले ही सांप तेजी से उसकी ओर बढ़ने लगा। अपनी जान बचाने के लिए, विक्रम तेजी से भागने लगा। भागते भागते विक्रम की सांसें उखड़ने लगी थी। पर अगर जान बचानी थी तो भागना ही था। जब भी भागते हुए पीछे मुड़कर देखने की कोशिश करता था, तो अब सिर्फ वही एक सांप नहीं, बल्कि उसके साथ कई जहरीले काले सांप पेड़ों की जड़ में अपने बिल से निकल कर, उसके तरफ बढ़ते हुए चले आ रहे थे।
अपनी जान बचाने के लिए विक्रम उन पेड़ों के बीच से होकर भागते जा रहा था।
भागते भागते वह जंगल में बहुत अंदर तक चला आया था। अब उसके पैर भी जवाब दे चुके थे। अपनी बढ़ी हुई धड़कनों और उखड़ी हुई सांसो को कुछ देर के लिए शांत करने के लिए, विक्रम ने अपने घुटनों पर हाथ रखकर एक पल के लिए खुद को सामान्य करने की कोशिश की।
पर ऐसा लग रहा था कि अभी भी वह खुद को संभाले नहीं पा रहा था। मौत का डर उसके अंदर तक बैठ गया था।
तभी उसकी आंखों के सामने एक खूबसूरत सा हाथ आया। विक्रम ने हाथ बढ़ाकर उस हाथ को थामना चाहा, तभी उसकी नजर उस लड़की के चेहरे पर गई। जाने क्यों?? यह चेहरा उसे जाना पहचाना सा लगा। राजस्थानी पोशाक, घाघरा चोली पहने हुए लड़की का चेहरा घूंघट में था, पर झीने घूंघट के अंदर से भी उसका चेहरा झलक रहा था।
"पानी...." उस लड़की के हाथ में लिए हुए सोने के घड़े को देखकर विक्रम को अपने प्यास का एहसास हुआ। पानी शब्द सुनते ही लड़की के होठ रहस्यमई ढंग से मुस्कुराए।
"यह राजस्थान है, कुंवर सा। यहां सबसे ज्यादा कीमती पानी ही होता है। बोलो पानी की कीमत क्या दोगे।" लड़की के होठों से निकला। घुंघट से झलकता हुआ मनमोहक चेहरा, आवाज इतनी मधुर थी जैसे कि कानों में घंटियां बजा रही हो। विक्रम तो जैसे सम्मोहन में फस गया था।
"कुछ भी ले लेना, पर अभी पानी दो.... वरना मेरी जान निकल जाएगी...." बेखुदी में विक्रम ने कहा।
"याद रहेगा ना!!" लड़की ने अपने दोनों हाथों में अपना घड़ा लेते हुए पूछा।
"आजमाइश शर्त हैं, आजमा लेना। ठाकुर हूं, अपनी जुबान से नहीं फिरूंगा।" विक्रम ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा।
लड़की ने घड़े से पानी विक्रम के हाथों के प्याले में गिराना शुरू किया। लड़की के रूप और सौंदर्य में उलझे हुए विक्रम ने पहला ही घूंट पीते, बुरा सा मुंह बनाया। विक्रम को पानी का स्वाद अजीब सा लगा।
उसकी नजर अपने हाथों पर गई.... जहां लड़की अपने घड़े से पानी गिरा रही थी। पर उसके हाथों में घड़े में से निकल रहा पानी नहीं, बल्कि खून भरा था। विक्रम ने तुरंत अपने हाथ खोल दिए। वह घबरा कर, दो कदम पीछे हुआ।
"खून.... कौन है तुम?? यहां क्या कर रही हो??" विक्रम के होठों से निकला।
अचानक से उस लड़की का रूप और आसपास का माहौल पूरी तरह से बदल गया। विक्रम के कानों में एक आवाज गूंजी,
"तुम्हारा इंतजार है....."
विक्रम झटके से उठ कर बैठ गया। उसने अपने आसपास देखा, वह राजस्थान में नहीं बल्कि न्यूयॉर्क में था। वह ना जाने पिछले कितने सालों से यही सपना देखता आ रहा था, और सपने में वह राजस्थान पहुंच जाता था। जबकि वह अपने लग्जरियस बेडरूम में सोया हुआ था और इंडिया से उसे यहां आए हुए, करीब 15 साल हो चुके थे।
फुल स्पीड पर एसी चल रहा था, लेकिन विक्रम का पूरा बदन पसीने से नहाया हुआ था। दिल की धड़कन इतनी तेज स्पीड से भाग रही थी जैसे वह बिना रुके मिलो दौड़कर, ट्रेडमिल पर आया हो। विक्रम ने सामने वॉल क्लॉक पर नजर डाली, सुबह के 5:00 बज रहे थे। उसने अपने सर को दोनों हाथों में थाम कर खुद को शांत करने की कोशिश की। लेकिन अभी भी कानों में वही आवाज गूंज रही थी।
"तुम्हारा इंतजार है....."