MISTER AMEERZADA Ch. 1

MISTER AMEERZADA - Chapter 1

Posted by Shayna choudhary • Feb 22, 2025 07:24 PM

शहर के बाहर एक कंस्ट्रक्शन साइट पर कुछ मज़दूर काम कर रहे थे। तभी, अचानक एक मज़दूर दौड़ता हुआ राघव के पास आया। राघव एक नौजवान मज़दूर था जो अपनी गरीबी के कारण सीमेंट और पत्थर उठाने का काम कर रहा था।

जैसे ही राघव ने एक मज़दूर को अपनी ओर भागते हुए देखा, वह हैरान हो गया और कहने लगा, "क्या हुआ है भाई? इतना तेज़ दौड़ क्यों लगा रहे हो?"

तब उस मज़दूर ने राघव से कहा, "राघव भैया, तुम एक काम क्यों नहीं कर लेते हो? अपने इस डब्बा फ़ोन के लिए एक चार्जर क्यों नहीं खरीद लेते हो, यार? तुम तो हमारे चार्जर पर फ़ोन लगवाकर आ गए। और तुम्हारी बीवी एक बार कॉल करती है तो बस करती ही रहती है। तुम कह रहे हो न, दौड़ क्यों लगा रहे हो? तुम्हारी बीवी जब-जब कॉल करती है, हमें इसी तरह से दौड़ लगवा देती है। क्या बताएँ तुम्हें हम?"

यह सुनकर राघव थोड़ा परेशान और डर गया, क्योंकि उसे अपनी बीवी से बहुत डर लगता था। उसकी बीवी उसे ज़्यादा टॉर्चर करती थी और उसकी गरीबी का मज़ाक उड़ाया करती थी।

वह मज़दूर फ़ोन लेकर आया और राघव ने डरते-डरते फ़ोन कान से लगा लिया। जल्दी ही उसकी बीवी सरिता की आवाज़ सुनाई दी। सरिता राघव पर चिल्ला रही थी, "कहाँ मर जाते हो तुम? एक बार में फ़ोन क्यों नहीं उठाते हो? इतना टाइम थोड़ा ना मेरे पास है कि मैं तेरे पास बार-बार फ़ोन करके फ़ालतू टाइम वेस्ट करती रहूँ। अब तू जिस भी हालत में, जहाँ पर है, फ़टाफ़ट से घर आ। और हाँ, आते वक़्त समोसे-कचोरियाँ लेकर आना और साथ ही साथ जलेबी लाना मत भूलना।"

सरिता की खरी-खोटी और समोसे, कचोरी, जलेबी लाने के फ़रमान से राघव परेशान हो गया। वह डरते हुए कहने लगा, "लेकिन सरिता, मैं समोसे-कचोरियाँ कहाँ से लेकर आऊँगा? मेरे जेब में तो कल ₹200 पड़े हैं, और उसमें समोसे-कचोरियाँ और जलेबी नहीं आएंगी।"

राघव के डरते हुए जवाब पर सरिता और ज़ोरों से चीखने-चिल्लाने लगी, "है भगवान! मेरी फ़ूटी किस्मत! ऐसा ग़रीब और मज़दूर पति मिला है जिसके पास फ़ूटी कौड़ी तक नहीं रहती। मेरे ही टुकड़ों पर पलता है। मुझे तो पूरी ज़िन्दगी ऐसे ही ग़रीबी में सड़-सड़कर गुज़ारनी होगी। अरे फ़टीचर आदमी! मुझे पता था तेरे पास पैसे नहीं होंगे, इसीलिए मैंने पहले ही एक मोहल्ले के बच्चे को ₹500 का नोट थमाकर गली के बाहर भेजा है। फ़टाफ़ट से वह पैसे ले, साइकिल उठा अपनी, और मैंने जो भी सामान तुझे कहा है, वह सारा सामान लेकर आ।"

सरिता हमेशा राघव से तू-तड़ाक से बात करती थी। राघव को नहीं पता था इज़्ज़त क्या होती है या बीवी का असली सुख क्या होता है। राघव भले ही हट्टा-कट्टा था, लेकिन उसकी हालत बहुत बुरी थी। न घर में उसकी इज़्ज़त थी, न बाहर। सभी उसे ग़रीब, गुज़रा, नाकारा समझते थे। कोई उसे एक पैसे का आदमी नहीं समझता था। लेकिन राघव को किसी चीज़ से कोई फ़र्क नहीं पड़ता था; उसे कुछ नहीं पता था इज़्ज़त क्या होती है, क्या नहीं। वह बिना इज़्ज़त, बिना पैसे के, अपनी ज़िन्दगी जी रहा था।

सरिता ने उसे काम दिया था, तो राघव को मानना ही था। उसके पास कोई और रास्ता नहीं था। उसने जल्दी ही अपनी साइकिल उठा ली और घर के लिए दौड़ लगा दी। राघव सारा दिन मज़दूरी करके थक चुका था, लेकिन वह साइकिल बड़ी ही स्पीड से चला रहा था, क्योंकि वह जानता था कि अगर उसे देर हो गई, तो सरिता उसे क्या-क्या खरी-खोटी सुनाएगी। और हो सकता है कि उसे शाम को खाना भी ना मिले; उसे फिर से भूखा सोना पड़े।

यह सोचते हुए, राघव जल्दी ही अपनी गली के बाहर पहुँच गया, जहाँ पर एक लड़का पहले से ही ₹500 लेकर उसका इंतज़ार कर रहा था। राघव ने बच्चे से ₹500 लिए और सीधा समोसे-कचोरी और जलेबी की दुकान पर पहुँच गया। वहाँ से उसने कुछ समोसे-कचोरी और जलेबी खरीदी और फ़ुर्ती से घर की ओर रवाना हो गया।

वहाँ पर सरिता, उसकी बीवी और उसकी सास उसका इंतज़ार कर रही थीं। राघव घर जमाई था क्योंकि वह अनाथ था। सरिता की माँ ने राघव को घर जमाई बनाकर रखा हुआ था, और वह अकेली औरत थी; उसका पति काफ़ी समय पहले एक लंबी बीमारी के चलते गुज़र चुका था। हालाँकि उनके पास पैसों की कमी नहीं थी; सरिता के पिता एक गवर्नमेंट ऑफ़िसर थे; उनके मरने के बाद भी उनकी पेंशन आती रहती थी।

सरिता अपनी माँ का इकलौता सहारा थी, लेकिन वह अपनी जवान बेटी को घर पर बैठाकर नहीं रख सकती थी। तो इसीलिए उन्होंने राघव को चुना था, और सरिता को भी राघव पसंद आ गया था, क्योंकि राघव का हट्टा-कट्टा शरीर उसे आकर्षक लगता था, और वह जानती थी कि राघव फ़टीचर हालत में है। इसीलिए दोनों माँ-बेटी ने अपने फ़ायदे के लिए उसे अपने घर पर रख लिया था। समाज की नज़रों में सरिता की शादी राघव से हो गई थी, और सरिता को इससे यह फ़ायदा हुआ कि राघव उसे रोक-टोक नहीं करेगा। इसीलिए उसने ग़रीब, फ़टीचर राघव को चुना था।

वह लोग राघव को घर जमाई कम, अपना पालतू नौकर ज़्यादा समझते थे। दोनों माँ-बेटी ने अपना फ़ायदा देखते हुए राघव को अपना मोहरा बनाया था। क्योंकि सरिता तेज़-तर्रार लड़की थी और हमेशा पैसों, पार्टी, मौज-मस्ती में ज़्यादा रहा करती थी। इसलिए उसने राघव से शादी की थी ताकि वह जैसा कहेगी, राघव वैसा ही करेगा।

जल्दी ही राघव कचोरी, समोसे और जलेबी के साथ अपने ससुराल में मौजूद था। जैसे ही वह अंदर गया, सरिता उसे देखकर जोरों से चीखी, "कितना टाइम तुमने लगा दिया? कहाँ मर गए थे तुम? क्या तुम टाइम से नहीं आ सकते थे?"

राघव उसकी ओर देखकर कहने लगा, "मैं तो तुम्हारा फ़ोन आते ही निकल गया था और कहीं रुका भी नहीं। बस सीधा साइकिल चलाकर यहाँ आ रहा हूँ।" राघव ने थोड़ा कंपकपाते लहजे में कहा।

सरिता बोली, "अच्छा-अच्छा! अब ज़्यादा बोलने की ज़रूरत नहीं है। ठीक है, अब जल्दी करो; मेहमान कब से इंतज़ार कर रहे हैं।" सरिता ने उसके हाथ से कचोरी, जलेबी और समोसे ले लिए, और राघव केवल उसकी ओर देखता रहा।

राघव ने काफ़ी तेज़ साइकिल चलाई थी, जिससे उसे बहुत प्यास लगी थी। उसने सोचा कि पहले पानी पी लिया जाए। वह जल्दी से किचन में गया। वहाँ पर गरमा-गरम चाय के साथ-साथ सारा नाश्ता परोसा जा रहा था। साथ-साथ बिस्कुट, एक-दो मिठाइयाँ भी रखी हुई थीं। राघव हैरान हो गया, क्योंकि राघव की शादी सरिता से हुए पूरे 2 साल होने को आए थे, लेकिन आज तक कोई ऐसा मेहमान नहीं आया था जिसकी इतनी ख़ातिरदारी की जा रही हो। राघव ने सोचा कि चलो उनसे मिल लिया जाए।

जैसे ही सरिता ने राघव को ड्राइंग रूम में जाते देखा, वह उसे रोककर कहने लगी, "तू कहाँ चल दिया मुँह उठाकर?"

राघव कहने लगा, "वह मेहमान आए हैं, तो मैं उनसे मिल लेता हूँ।"

सरिता दाँत भींचकर आई और कहने लगी, "अपनी शक्ल देखी है तूने? अरे, अपनी शक्ल तो देख! तूने क्या हाल बना रखा है अपना? अरे, तेरे अंदर से मज़दूर वाली बदबू आ रही है। जा, जाकर अपनी मज़दूरी कर; कोई ज़रूरत नहीं है तुझे मेहमानों से मिलने की। जा, जाकर अपनी मज़दूरी कर; चल, भाग यहाँ से।"

सरिता ने राघव को वहाँ से जाने के लिए कह दिया, और राघव अपना मन मसोसकर रह गया। लेकिन उसके पास जाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था। सरिता ने साफ़ मना कर दिया था कि वह अपने मेहमानों से उसे नहीं मिलवाएगी। राघव जैसा आया था, उल्टे पाँव वैसे ही जाने लगा।

लेकिन उसके मन में बार-बार यह इच्छा हो रही थी कि आखिरकार ऐसा कौन मेहमान आया है। देखने के लिए वह थोड़ा सा रुक गया और घर से बाहर जाकर, डाइनिंग रूम की खिड़की के पास चला गया। वह यह देखना चाहता था कि कौन मेहमान आया है जिसकी इतनी ख़ास तवज्जो हो रही है और जिसे उससे मिलने तक नहीं जा रहा है।

जैसे ही राघव पीछे गया और उसने खिड़की में से देखा, वहाँ पर राहुल बैठा हुआ था। राहुल सरिता का एक्स-बॉयफ़्रेंड था। राहुल के साथ उसके एक-दो दोस्त और भी थे, जिनके लिए सरिता ने इतना सारा नाश्ता मँगवाया था और वह अपने हाथों से उन सबको नाश्ता परोस रही थी।

राहुल को देखकर राघव के अंदर आग लग गई, लेकिन वह उन्हें देखने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता था। राघव ने देखा कि उसकी सास ने जानबूझकर सरिता को राहुल के ठीक बराबर में बिठाया था। राघव की सास शुरू से ही राहुल को अपनी बेटी सरिता के लिए पसंद किया करती थी, लेकिन सरिता को लगता था कि राहुल कभी उसके मन मुताबिक नहीं चलेगा और उसे हर चीज़ के लिए रोका-टोकी करेगा। सरिता को बाहर घूमना-फिरना, मौज-मस्ती करना ज़्यादा पसंद था, वह बिना रोक-टोक की ज़िन्दगी चाहती थी; इसीलिए उसने राहुल को छोड़कर राघव से शादी की थी। लेकिन अब फिर से उसने राहुल के साथ नज़दीकियाँ बढ़ानी शुरू कर दी थीं। सरिता की माँ जानती थी कि राहुल एक बिल्डर था और वह शहर के अमीरों में से एक था, और उसके पास पैसों की कोई कमी नहीं थी।

इसलिए उनका ख़्वाब था कि कुछ भी हो जाए, ग़रीब, फ़टीचर राघव से सरिता का पीछा छूट जाए और किसी न किसी तरह से राहुल उसकी ज़िन्दगी में आ जाए। आखिर कब तक वह सरिता के पिता की पेंशन से गुज़ारा करेगी, और राघव तो किसी काम का था ही नहीं। यह सपना लिए वह सरिता को राहुल पर फ़ोर्स करने की कोशिश किया करती थी।

राहुल तो सरिता को पहले से ही पसंद करता था, क्योंकि सरिता बहुत ख़ूबसूरत थी। उसका दूध सा गोरा और छरहरा बदन था। उसकी लंबी हाइट और पतली कमर उसे और भी ज़्यादा ख़ूबसूरत बनाती थी; कोई भी लड़का आसानी से उसकी ओर आकर्षित हो जाता था, और राहुल इसीलिए सरिता पर मर-मिटा था और हर हाल में उसे अपना बनाना चाहता था।

जैसे ही सरिता राहुल के पास आकर बैठ गई, उसने उसका हाथ दो-तीन बार टच कर दिया। खिड़की पर खड़े राघव ने यह देख लिया और उसकी आँखों के किनारे भीग गए।

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