बैड बॉयज (लव एडिशन) Ch. 2

बैड बॉयज (लव एडिशन) - Chapter 2

Posted by Sarvam • Jan 16, 2025 04:22 AM

रुशाली के जाने से दीक्षित मेंशन काफी सुना पड़ चुका था।

उस घर में कुछ सुनाई दे रहा था तो बस एक बच्चे के रोने की तेज आवाज।

घर के हॉल में रुशाली की तस्वीर के सामने दिया जल रहा था और ऋषभ वहीं रोहन को गोद में लिए बैठा था।

बच्चा इतना ज्यादा रो रहा था, लेकिन ऋषभ का ध्यान कहीं और ही था। रोने के लिए आंसू भी बचे नहीं थे उनमें अब।

"ऋषभ क्या कर रहे हो? कम से कम बच्चे पर तो ध्यान दो?” मार्क ने हलकी नाराजगी से कहा।

ऋषभ के कानो में जैसे उसकी बात पहुंची ही नही थी।

एक ठंडी साँस छोड़ते हुए मार्क ने रोहन को अपनी गोद में ले लिया और साथ लायी हुई दूध की बोतल से उस बच्चे को दूध पिलाने लगा।

रोहन का रोना एकदम से शांत हो गया तो मार्क को ध्यान आया, "ऋषि कहाँ है?”

फिर उसे ऋषभ की तरफ से जवाब ना मिला तो मार्क गुस्से का घुट पीकर रह गया।

ज्यादा रोने के कारण रोहन दूध पीते हुए ही मार्क की गोद में सो गया। जिसे लेकर मार्क ऊपर एक कमरे में पहुंचा।

रुशाली ने बच्चे के आने की पूरी तैयारी शायद पहले से ही कर रखी थी। पालना तक उसने सजा रखा था।

रोहन को उसी में लिटाकर मार्क बिना कोई आवाज किए हल्का सा पीछे हटकर बोला, “स्वीट ड्रीम्स बेबी।”

रोहन सोते हुए बहुत क्यूट लग रहा था। बिलकुल ऋषभ की ज़ेरॉक्स कॉपी था। जिसे देख मार्क खुद को मुस्कुराने से रोक नहीं पाया।

अचानक ही उसे ऋषि का ख्याल आया तो वो जल्दी से कमरे के बाहर निकला।

उसने नीचे पहुंच कर ऋषि को आवाज लगाते हुए ढूंढना शुरू कर दिया।

इस बीच दो बार वो ऋषभ के पास से गुजरा था, लेकिन ऋषभ ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

मार्क गुस्से में बड़बड़ाया, "ये सही है तुम्हारा। मैं हूँ तो सब मेरे भरोसे डाल दो। अगर मैं ना होता तो क्या करते तुम? कैसे संभालने वाले थे बच्चों को? बस पैदा कर लिया, कोई जिम्मेदारी है की नहीं तुम्हारी?"

वह आस-पास घूमते हुए ही ऋषभ को सुनाई दे रहा इस आवाज में बोल रहा था।

ऋषभ ने धीरे से पलकें झपकाईं और बिना कुछ कहे ही अपनी जगह से उठकर घर के पिछले हिस्से में बनी गेलरी की तरफ जाने लगा।

मार्क की आंखें सिकुड़ गयीं, "क्या? कहाँ जा रहे हो अब?"

ऋषभ ने कोई जवाब नहीं दिया तो मार्क उसके पीछे-पीछे चला गया।

ऋषभ ने देखा, एक बड़े से गमले के पीछे ऋषि सिकुड़कर बैठा हुआ था।

वह जाकर ऋषि के सामने घुटनों के बल बैठ गया "ऋषि!"

आवाज सुनकर ऋषि ने घुटनों में छुपाया हुआ चेहरा बाहर निकाला।

अपने हाथ से उस छोटे से बच्चे ने अपनी माँ को अग्नि दी थी।

आखिर कैसे ना वह दुखी होता? भले ही वो बहुत ज्यादा छोटा था, लेकिन इतना तो उसे समझ आ गया था , उसकी माँ कहीं चली गयी और कभी लौटकर नहीं आएगी।

"मम्मा कहाँ चली गयी डेड?" ऋषि ने एकदम से ऋषभ को गले लगाकर कहा।

ऋषभ ने एक ठंडी साँस छोड़ी और काफी मुश्किल से कहा, "मम्मा भगवान के पास चली गयी है।"

"कभी लौटकर नहीं आएंगी क्या?" ऋषि ने अगला सवाल किया।

लेकिन ऋषभ के पास अब कोई जवाब नहीं था। उसने ऋषु को उठाया और घर के अंदर चला गया।

इस बीच वो मार्क की बगल से गुजरा, लेकिन उसने ऐसे व्यवहार किया जैसे मार्क वहां था ही नहीं।

मार्क के माथे पर बल पड़ गए, "इसे क्या हुआ? किस बात की नाराजगी जता रहा है मुझ पर? बच्चा संभालने को लेकर सुनाया इसलिए?"

अगले ही पल अपने बाल नोचकर वह ऋषभ के पीछे उसे मनाने के लिए चल पड़ा।

अजीब नखरे थे इस लड़के के। कब ठीक हो जाए, कब नाराज, कुछ कह नहीं सकते थे।

मार्क द्वारा बनाया हुआ खाना ऋषभ ने थोड़ा बहुत ऋषि को खिलाया। जो करने में उसे काफी मुश्किल हुई थी। अंत में ऋषभ ने ऋषि को भी उसे कमरे में ले जाकर सुला दिया जहाँ पहले से रोहन सो रहा था।

जैसे ही ऋषभ पीछे पलटा, मार्क उसके सामने था।

"ऋषु नाराज हो क्या?" मार्क को उसकी नाराजगी दूर करना सबसे जरूरी काम लगता था। हमेशा से!

ऋषभ ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया। वह फ्रेश होने के लिए जाना चाहता था, लेकिन मार्क ने उसका रास्ता रोक लिया।

ऋषभ ने एक ठंडी साँस छोड़कर कहा, "मार्क, अपने क्लब लौट जाओ। मुझे तुम्हारी कोई जरुरत नहीं है। मेरे लिए कुछ भी करके फिर से मुझ पर कोई एहसान करने की जरुरत नहीं।"

मार्क का चेहरा काला पड़ गया। उसने एकदम से ऋषभ के बाजुओं को कसकर पकड़ लिया, "क्या कहा? तुम्हें मेरी जरुरत नहीं है?"

ऋषभ ने दर्द से आंखे मिच ली तो मार्क ने एकदम से उसे छोड़ दिया।

"कोई एहसान नहीं कर रहा मैं तुम पर। तुम और रुशाली दोनों मेरे बेस्ट फ्रेंड्स हो। मेरी दोस्त ने मुझसे वादा लिया था कि मैं तुम तीनों का ख्याल रखूँगा। इसलिए मैं यहाँ से कहीं नहीं जा रहा।" मार्क ने सीधे शब्दों में उसे अपनी बात समझाई। वो कोई झगड़ा नही चाहता था बस। वरना नाराज होने में वो भी पीछे नहीं था।

"दोस्त? क्यों बदनाम कर रहे हो इस रिश्ते को? तुमने कभी दोस्ती निभाई है अपनी तरफ से? तुम तो त्याग करके महान बनते रहे बस।" ऋषभ ने व्यंग भरी मुस्कान के साथ कहा।

मार्क का गला सूख गया। अगले ही पल उसने ऋषभ का हाथ पकड़ा और बालकनी में ले जाकर छोड़ते हुए दरवाजा बंद कर दिया "तो रुशाली ने तुम्हें सब बता दिया?"

"हाँ, सब बता दिया और अब मुझे समझ आ रहा है कि तुम्हारा बार-बार फ़्लर्ट करना कोई मजाक नहीं होता था। तुम मेरे लिए फिल करते थे। हमेशा से? अनबेलीवेबल!" ऋषभ ने हल्के गुस्से में कहा।

"लिसन रिशु, मुझ पर कोई भी इल्जाम लगाकर मेरा दिमाग खराब करने की कोशिश मत करना। मैं अपनी लिमिट में रहा हूँ। अगर मुझसे रुशाली को कोई प्रॉब्लम होती तो उसने पहले ही उसने मुझे तुमसे दूर रहने के लिए बोल दिया होता। लेकिन उसने ऐसा कभी नही किया। क्योंकि उसे मुझ पर तुमसे ज्यादा विश्वास था।

प्यार पसन्द जो भी है वो मेरी परेशानी है। ना इससे तुम्हे पहले कोई दिक्कत हुई और ना कभी आगे होगी। आज के बाद मैं ध्यान रखूंगा और तुमसे दूर रहूँगा। बस बच्चों के लिए मुझे यहाँ रुकने दो। क्योंकि तुम्हारे भरोसे उन्हें छोड़ दिया तो पता नहीं क्या करोगे।" मार्क ने एक ही साँस में अपनी बातें पूरी की। वो नहीं चाहता था कि ऋषभ उसे गलत समझे या फिर उससे नफरत करे।

तभी ऋषभ ने कहा, "मेरा इतना सब कहने का कोई इरादा नहीं था। मुझे .. मुझे हमारी दोस्ती से कोई परेशानी नहीं। हम आगे भी वैसे ही रह सकते है जैसा पहले थे। लेकिन जो रुशाली ने कहा वो मैं नहीं कर सकता। मैं बस उससे प्यार करता हूँ। तुम मेरे दोस्त हो मार्क। मैं तुमसे वैसी वाली फीलिंग नहीं रखता।"

मार्क ने हाथ दिखाकर उसे रोक दिया, "मुझे बहुत अच्छे से पता है ये बात। सफाई देने की जरूरत नही अब। रुशाली ने जो भी कहा हो उसे भूल जाओ और खुदको मजबूर करने की जरुरत नहीं।

मुझे पता है मेरी फीलिंग्स जानकर तुम कभी पहले की तरह मेरे साथ रह नहीं पाओगे। क्या पता तुम्हें मुझसे घिन भी आ रही हो?"

"नहीं .. नहीं ऐसा बिलकुल नहीं है। तुम प्लीज कुछ भी मत सोचो।" ऋषभ ने उसकी तरफ अपना हाथ बढ़ाया।

लेकिन मार्क एक कदम पीछे हट गया "मुझे फर्क नहीं पड़ता तुम क्या सोचोगे। बस मैं यहाँ से कहीं नहीं जा रहा। जाकर खाना खा लो और नीचे ही सो जाना। मैं बच्चों के पास हूँ।"

मार्क ने कहा और कमरे में लौट कर चला गया। ऋषभ खाली आँखों से उसे देखता रह गया।

आगे जानने के लिए कहानी के साथ बने रहे।

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