Chapter 3 (विवेक अग्निहोत्री!)
अपने सामने बैठे लड़के की बातें सुन कर खुशी ने खाना निगलते हुए कहा, "मुझे?"
उस लड़के ने अपनी भौंहें उठा कर कहा, "हाँ, आपको।"
खुशी ने हिम्मत करके कहा, "क्या करना पड़ेगा?"
उस लड़के ने उससे कुछ कहने के बजाय उस वेटर को कुछ इशारा किया, जो उनका ऑर्डर लेने आया था। उस वेटर ने हाँ में सिर हिला दिया और अंदर चला गया।
दो मिनट बाद वो वेटर अपने हाथ में कुछ पैकेट्स लेकर आया और उन्हें उस लड़के की ओर बढ़ा दिया।
उस लड़के ने वो पैकेट्स खुशी की ओर बढ़ाते हुए कहा, "ये गंदे कपड़े छोड़ कर, ये साफ-सुथरे और अच्छे कपड़े पहनने होंगे और हर रोज स्कूल भी जाना होगा। बोलिए, करेंगी?"
खुशी ने वो पैकेट्स लेते हुए खुश होकर कहा, "हाँ, हाँ! जरूर करूँगी।"
उस लड़के ने अपनी कुर्सी पर पसरते हुए कहा, "फिर तो टेंशन वाली कोई बात ही नहीं है। आप एक काम करिए, शाम को अपने मम्मी और पापा के साथ यहाँ चली आइए। ठीक है?"
खुशी ने हाँ में सिर हिलाते हुए कहा, "हम्म्म!"
तो उस लड़के ने खड़े होते हुए उस रेस्टोरेंट के मालिक से कहा, "भैया, ये जो खाना खाये, इसे खिला दीजिएगा और बाकी का बचा हुआ पैक करके इसे दे दीजिएगा।"
उस आदमी ने मुस्करा कर कहा, "तुम्हें कहने की जरूरत नहीं है, कान्हा। सब हो जाएगा।"
कान्हा ने उनके गाल खींचते हुए कहा, "वो तो मुझे पता ही है, कि मेरे भैया बहुत अच्छे हैं।"
उसकी बातें सुन कर सभी लोग हँसने लगे, और साथ में वो खुद भी। कुछ देर बाद कान्हा ने खुशी की ओर देख कर कहा, "अच्छा तो, खुशी। भैया अभी चलते हैं। शाम को फिर मिलेंगे। ओके?"
खुशी ने खुश होकर कहा, "हम्म्म!"
तो कान्हा ने सबकी ओर देखते हुए कहा, "अब मैं चलता हूँ।"
उसने बाहर जाते हुए सबकी ओर देख कर कहा, "बाय, एवरीवन!"
बाकी सबने भी उसे बाय कहा, तो कान्हा बाहर निकल गया। उसने उस रेस्टोरेंट से निकलते ही फिर से अपने हेडफोन पहन लिए और भावहीन चेहरे के साथ उसी ओर चल दिया, जिधर वो पहले जा रहा था।
कुछ ही देर में वो एक स्कूल के सामने खड़ा था। उस स्कूल के गेट पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ था: सर्वम इंटर कॉलेज, आर्यनगर (काल्पनिक नाम)।
कान्हा ने एक नज़र उस कॉलेज के गेट पर डाली और अंदर की ओर बढ़ गया। उसका ऑरा तो नॉर्मल था, लेकिन उसके चेहरे पर अभी भी कोई भाव नहीं था।
जैसे ही वो अंदर आया, वैसे ही बहुत से लोगों की नज़रें उस पर पड़ीं। उसने स्कूल यूनिफॉर्म ही पहन रखी थी, लेकिन उसके गोरे रंग पर वो यूनिफॉर्म बहुत ही फब रही थी।
तीखे नैन-नक्श, कानों में मैग्नेटिक इयररिंग्स, उसके सिल्की बाल जो उसके माथे पर बिखरे हुए थे, और उस पर भी मास्क... उसे और अट्रैक्टिव लुक दे रहा था। वो जहाँ से गुजरता, वहाँ के लोग अपने कदम रोक कर, अपना दिल थामे उसे ही देखने लगते थे।
लड़कियाँ तो उसे देखते ही खो-सी गई थीं, क्योंकि वो था ही इतना हैंडसम लेकिन उसे इस सबसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। उसकी नज़रें सिर्फ सामने की ओर थीं।
वो चलते हुए सीधा प्रिंसिपल ऑफिस के अंदर चला गया। लगभग पाँच से दस मिनट बाद वो वापस आया, तो उसके हाथ में उसका आइडेंटिटी कार्ड था।
वो वहाँ से निकला और अपनी क्लास की ओर बढ़ गया लेकिन वो कुछ कदम ही आगे बढ़ा था कि इतने में पाँच-छह लड़कों ने उसका रास्ता रोक लिया।
कान्हा ने ठंडी नज़रों से उन सबकी ओर देखा, तो उनमें से एक लड़के ने कहा, "क्या, मुन्ना? बड़ा गुस्सा भरा हुआ है तेरे अंदर, हाँ।"
तभी दूसरे लड़के ने कहा, "घूरता है बे! नज़रें नीचे कर।"
कान्हा ने बिना कोई बहस किए अपनी नज़रें नीचे कर लीं। तो उन लड़कों की तो जैसे मन-माँगी मुराद पूरी हो गई हो। पहले वाले लड़के ने उसका आइडेंटिटी कार्ड पकड़ते हुए कहा, "नाम क्या है बे तेरा?"
फिर उसने खुद ही कान्हा का असली नाम पढ़ कर कहा, "विवेक अग्निहोत्री।"
तो विवेक ने कहा, "जी!"
तभी दूसरे लड़के ने पहले लड़के के कंधों पर हाथ रख कर कहा, "अबे, जब ये कॉलेज के अंदर आया था, तो मुझे लगा कि इस बंदे में दम होगा।"
फिर उसने विवेक की ओर देख कर उसका मज़ाक बनाते हुए कहा, "पर ये तो पानी-कम चाय निकला।" और इसी के साथ वो सभी हँसने लगे।
वो सभी हँस रहे थे और गर्दन झुकाए हुए विवेक के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे।
उसने धीरे से कहा, "अब मैं जाऊँ, सर?"
पहले लड़के ने कहा, "हाँ, चले जाना। पर उससे पहले हमारा एक काम करना होगा।"
विवेक ने धीरे से कहा, "क्या, सर?"
उस लड़के ने अपना हाथ विवेक के गर्दन में लपेट कर मेन गेट की ओर इशारा करके कहा, "अभी इस गेट से जो भी सबसे पहले अंदर आएगा, उसे तुझे गुलाब का फूल देकर प्रपोज करना होगा।"
ये सुन कर विवेक की आँखें बड़ी हो गईं। उसने पहले मेन गेट की ओर देखा और फिर उस लड़के की तरफ। उसने हकलाते हुए उस लड़के से कहा, "सर, पर मैं कैसे...?"
उस लड़के ने विवेक की बात काटते हुए कहा, "देख, करना तो तुझे होगा ही। अब तू खुद कर ले तो ठीक, वरना हम जबरदस्ती भी करवा सकते हैं।"
उसने इतना ही कहा था कि इतने में एक लड़का गेट से अंदर आया। उसकी उम्र कोई 25-26 साल रही होगी। उसने काले रंग के फॉर्मल पैंट के साथ सफेद रंग का प्लेन शर्ट पहना हुआ था।
उसके बाएँ हाथ में एक चेन वाली घड़ी थी और दाएँ हाथ में कलावा बँधा हुआ था। उसके पैरों में काले फॉर्मल जूते थे। उसके बाल सलीके से सेट थे और उसके चेहरे पर हल्की दाढ़ी थी।
विवेक की नज़र जैसे ही उस पर पड़ी, उसकी आँखें डर और हैरानी से बड़ी हो गईं। उसने अपने मन में खुद से ही कहा, "ये... ये यहाँ क्या कर रहे हैं? अगर इन्होंने हमें पहचान लिया तो...! नहीं, नहीं! हम... हम इनके सामने नहीं आ सकते। बिल्कुल नहीं आ सकते।"
अपने मन में ये सब बोलकर वो दूसरी ओर मुड़ने लगा लेकिन इतने में उन दोनों लड़कों ने उसे पकड़ लिया।
विवेक ने रोनी-सी शक्ल बनाकर कहा, "सर, मैं खुद एक लड़का हूँ। मैं किसी लड़के को प्रपोज कैसे कर सकता हूँ!"
जारी है...