गलत नम्बर से शुरू हुई मोहब्बत् शाम के सात बज रहे थे। हल्की-हल्की बारिश पूरे शहर को भिगो रही थी। सड़क पर दौड़ती गाड़ियों की रोशनी बारिश की बूंदों में चमक रही थी। ऑफिस से थका-हारा आदित्य अपनी बाइक से घर लौट रहा था। तभी उसकी जेब में रखा मोबाइल बज उठा। उसने बाइक सड़क किनारे रोकी और स्क्रीन पर नज़र डाली। एक अनजान नंबर था। उसने कॉल रिसीव की। दूसरी तरफ़ से घबराई हुई लड़की की आवाज़ आई, "हैलो... रोहन, तुम कहाँ हो? मैं पिछले चालीस मिनट से तुम्हारा इंतज़ार कर रही हूँ।" आदित्य कुछ पल चुप रहा, फिर मुस्कुराकर बोला, "माफ़ कीजिए, शायद आपका नंबर गलत लग गया है। मैं रोहन नहीं हूँ।" उधर कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा। फिर लड़की हड़बड़ाकर बोली, "ओह... सॉरी... मुझे लगा मैंने सही नंबर मिलाया है।" आदित्य ने हँसते हुए कहा, "कोई बात नहीं, गलती सबसे होती है।" लड़की ने झेंपते हुए "थैंक यू" कहा और कॉल कट गई। आदित्य घर पहुँच गया, लेकिन न जाने क्यों वह मासूम-सी आवाज़ उसके कानों में गूँजती रही। रात करीब साढ़े दस बजे मोबाइल फिर बजा। वही नंबर था। आदित्य ने सोचा शायद फिर गलती से कॉल आ गई होगी। उसने फोन उठाया। दूसरी तरफ़ से खिलखिलाती हुई वही आवाज़ आई, "इस बार जानबूझकर फोन किया है। सोचा... गलत नंबर वाले इंसान से एक बार ठीक से माफ़ी माँग लूँ।" आदित्य हँस पड़ा। "इतनी औपचारिकता की ज़रूरत नहीं थी।" लड़की बोली, "वैसे मेरा नाम सिया है।" आदित्य ने भी अपना परिचय दिया। दोनों ने कुछ मिनट बातें कीं और फिर शुभरात्रि कहकर फोन रख दिया। अगले दिन सुबह आदित्य ऑफिस पहुँचा ही था कि सिया का एक छोटा-सा संदेश आया—"गुड मॉर्निंग... उम्मीद है आज कोई गलत नंबर आपको परेशान नहीं करेगा।" आदित्य मुस्कुरा दिया। उसने जवाब लिखा—"अगर हर गलत नंबर ऐसा हो, तो शिकायत किस बात की?" बस यहीं से बातों का सिलसिला शुरू हो गया। धीरे-धीरे दोनों रोज़ बात करने लगे। सुबह एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देना, दिन में हालचाल पूछना और रात को घंटों बातें करना उनकी आदत बन गई। आदित्य को पता चला कि सिया एक स्कूल में संगीत सिखाती है। उसे पुराने गीत, बारिश और किताबें बहुत पसंद थीं। दूसरी ओर सिया को मालूम हुआ कि आदित्य एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, जिसे कविताएँ पढ़ना, चाय पीना और देर रात तक आसमान में चाँद देखना अच्छा लगता है। दिन बीतते गए। दोनों ने कभी एक-दूसरे की तस्वीर नहीं माँगी। सिया कहती, "चेहरा देखकर पसंद करना आसान होता है... लेकिन दिल को पहचानना मुश्किल। मैं चाहती हूँ कि हम पहले एक-दूसरे की सोच को जानें।" आदित्य उसकी बात सुनकर मुस्कुरा देता। उसे सिया की यही बात सबसे ज़्यादा पसंद थी। एक रात सिया ने पूछा, "अगर हम कभी मिले... और मैं तुम्हारे सामने खड़ी रहूँ, तो तुम मुझे कैसे पहचानोगे?" आदित्य ने बिना सोचे जवाब दिया, "तुम्हारी आवाज़ से।" सिया हँस पड़ी। "और अगर मैं कुछ बोलूँ ही नहीं?" आदित्य बोला, "फिर तुम्हारी आँखों से... क्योंकि सच्चे लोग अपनी आँखों में झूठ नहीं छिपा सकते।" धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती गहरी होती गई। अब वे एक-दूसरे की छोटी-छोटी खुशियाँ और परेशानियाँ भी साझा करने लगे। अगर किसी दिन सिया का फोन देर से आता, तो आदित्य बेचैन हो जाता। अगर आदित्य ऑफिस में व्यस्त रहता, तो सिया बार-बार घड़ी देखने लगती। दोनों को एहसास होने लगा था कि यह रिश्ता अब सिर्फ़ दोस्ती तक सीमित नहीं रहा। एक रविवार की शाम सिया ने कहा, "आदित्य... क्या तुम्हें नहीं लगता कि हमारी मुलाक़ात सिर्फ़ एक संयोग नहीं थी?" आदित्य कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, "कभी-कभी ज़िंदगी गलत नंबर मिलाकर भी सही इंसान से मिला देती है।" फोन के उस पार सिया की साँसें तेज़ हो गईं। उसने धीरे से कहा, "शायद... मैं भी यही सोचने लगी हूँ..." तभी अचानक सिया के घर से किसी के ज़ोर से पुकारने की आवाज़ आई। उसने घबराकर कहा, "आदित्य... मुझे अभी फोन रखना होगा... मैं बाद में बात करती हूँ..." कॉल कट गई। आदित्य देर रात तक उसके फोन का इंतज़ार करता रहा। लेकिन उस रात... सिया का फोन दोबारा नहीं आया। और उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि अगले दिन उसकी ज़िंदगी एक ऐसे मोड़ पर पहुँचने वाली है, जहाँ से लौटना आसान नहीं होगा... उस रात आदित्य देर तक जागता रहा। हर पाँच-दस मिनट में वह मोबाइल की स्क्रीन देखता, लेकिन सिया का कोई कॉल या संदेश नहीं आया। उसने कई बार उसी नंबर पर फोन मिलाया, पर हर बार फोन स्विच ऑफ़ मिला। सुबह उठते ही उसने फिर कॉल की, लेकिन इस बार भी वही जवाब—"आप जिस नंबर पर कॉल कर रहे हैं, वह फिलहाल बंद है।" पहली बार आदित्य को बेचैनी होने लगी। पूरे दिन ऑफिस में उसका मन नहीं लगा। कंप्यूटर की स्क्रीन सामने थी, लेकिन आँखों के सामने सिर्फ़ सिया का मुस्कुराता चेहरा था, जिसे उसने कभी देखा भी नहीं था। वह सिर्फ़ उसकी आवाज़, उसकी हँसी और उसकी बातों से उसे पहचानता था। तीन दिन बीत गए। न कोई कॉल... न कोई संदेश... आदित्य ने सोचा शायद सिया उससे नाराज़ हो गई है। उसने एक लंबा संदेश लिखा—"अगर मुझसे कोई गलती हुई हो तो माफ़ कर देना। बस इतना बता देना कि तुम ठीक हो।" संदेश भेज दिया गया, लेकिन उसका कोई उत्तर नहीं आया। लगभग एक सप्ताह बाद रात को अचानक उसी नंबर से कॉल आई। आदित्य ने एक ही घंटी में फोन उठा लिया। लेकिन दूसरी तरफ़ सिया नहीं थी। एक वृद्ध महिला की आवाज़ आई— "बेटा... क्या तुम आदित्य बोल रहे हो?" "जी... लेकिन आप कौन?" महिला कुछ क्षण चुप रहीं, फिर बोलीं "मैं सिया की माँ बोल रही हूँ।" आदित्य का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। "आंटी... सिया कैसी है? वह ठीक तो है?" महिला की आवाज़ भर्रा गई। "बेटा... सिया पिछले हफ़्ते स्कूल से लौटते समय सड़क दुर्घटना में घायल हो गई थी। कई दिनों तक अस्पताल में थी। अब ख़तरे से बाहर है, लेकिन डॉक्टरों ने उसे कुछ समय तक मोबाइल और तनाव से दूर रहने की सलाह दी है।" आदित्य ने राहत की साँस ली। उसकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। "बस... वह ठीक है, मेरे लिए यही काफ़ी है।" महिला ने कहा— "जब वह होश में आई थी, तो सबसे पहले तुम्हारा नाम लिया था। उसने मुझे तुम्हारे बारे में सब बताया। उसने कहा था कि अगर मैं तुमसे बात कर सकूँ, तो तुम्हें बता दूँ कि वह वापस ज़रूर आएगी।" फोन कटने के बाद आदित्य की आँखों से आँसू बह निकले। उसे पहली बार एहसास हुआ कि यह रिश्ता अब सिर्फ़ बातों का नहीं रहा था। करीब एक महीने बाद... एक शाम उसका मोबाइल फिर बजा। स्क्रीन पर वही नंबर था। आदित्य ने काँपते हाथों से कॉल उठाई। दूसरी तरफ़ से धीमी-सी आवाज़ आई— "हैलो..." आदित्य की आँखें भर आईं। "सिया..." सिया मुस्कुराई। "हाँ... मैं वापस आ गई।" दोनों कुछ देर तक बिना कुछ बोले सिर्फ़ एक-दूसरे की साँसें सुनते रहे। फिर सिया बोली— "जानते हो... अस्पताल में मुझे सबसे ज़्यादा किस चीज़ की कमी महसूस हुई?" आदित्य ने पूछा "किसकी?" सिया ने धीमे से कहा "तुम्हारी आवाज़ की..." आदित्य की आँखों से फिर आँसू निकल पड़े। उसने पहली बार दिल की बात कह दी "सिया... शायद मुझे तुमसे प्यार हो गया है।" फोन के उस पार कुछ पल की ख़ामोशी छा गई। फिर सिया की धीमी-सी हँसी सुनाई दी। "गलत नंबर से शुरू हुई बात... शायद सही मोहब्बत बन गई है।" लेकिन उसी रात... सिया ने आदित्य को एक ऐसा सच बताया... जिसने उनकी मोहब्बत को सबसे कठिन परीक्षा के सामने खड़ा कर दिया सिया की बात सुनकर आदित्य के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी, लेकिन अगले ही पल सिया की आवाज़ गंभीर हो गई। उसने धीमे से कहा, "आदित्य... एक सच है, जो मैंने तुमसे अब तक छिपाया है। मैं तुम्हें धोखे में नहीं रखना चाहती।" आदित्य का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। "क्या बात है, सिया?" सिया ने गहरी साँस ली और बोली, "दो साल पहले पापा ने मेरी सगाई अपने सबसे करीबी दोस्त के बेटे से कर दी थी। उस समय मैंने विरोध नहीं किया, क्योंकि मुझे लगा था कि मैं कभी किसी से प्यार नहीं करूँगी। लेकिन फिर... एक गलत नंबर ने मेरी पूरी ज़िंदगी बदल दी।" आदित्य कुछ पल तक बिल्कुल चुप रहा। उसके पास शब्द नहीं थे। सिया फिर बोली, "मैंने कई बार सोचा कि तुम्हें यह बात पहले ही बता दूँ, लेकिन हर बार डर गई। मुझे लगा... कहीं तुम्हें खो न दूँ।" आदित्य ने आँखें बंद कर लीं। उसके मन में हज़ारों सवाल थे, लेकिन उसने खुद को संभालते हुए पूछा, "क्या... तुम खुश हो उस रिश्ते से?" सिया ने बिना रुके जवाब दिया— "अगर खुश होती... तो शायद आज यह सब कहने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।" उस रात दोनों देर तक बात करते रहे। उन्होंने तय किया कि वे किसी जल्दबाज़ी में कोई फैसला नहीं करेंगे। पहले सिया अपने परिवार से खुलकर बात करेगी। अगले कुछ दिनों तक सिया ने अपने माता-पिता को आदित्य के बारे में बताया। पहले तो वे बहुत नाराज़ हुए। उन्हें लगा कि बेटी किसी अनजान लड़के के बहकावे में आ गई है। लेकिन जब उन्होंने देखा कि आदित्य ने कभी कोई गलत बात नहीं की, कभी मिलने का दबाव नहीं बनाया और हमेशा सम्मान के साथ बात की, तो उनका गुस्सा थोड़ा कम हुआ। इधर आदित्य भी अपने माता-पिता को सब कुछ बता चुका था। उन्होंने सिर्फ़ एक बात कही— "अगर रिश्ता सच्चा है, तो उसे सम्मान के साथ निभाना। किसी का घर तोड़कर अपना घर मत बसाना।" कुछ दिनों बाद सिया के मंगेतर रोहन ने खुद उससे बात की। उसने शांत स्वर में कहा, "अगर तुम्हारा दिल कहीं और है, तो मैं ज़बरदस्ती तुम्हें अपने साथ नहीं रख सकता। रिश्ता भरोसे से बनता है, मजबूरी से नहीं।" सिया की आँखें भर आईं। उसने रोहन से माफ़ी माँगी। रोहन ने मुस्कुराकर कहा, "तुम्हें अपनी खुशी चुनने का पूरा अधिकार है।" कुछ महीनों बाद दोनों परिवार मिले। शुरुआत में माहौल थोड़ा असहज था, लेकिन धीरे-धीरे बातचीत ने सारी दूरियाँ कम कर दीं। अंततः दोनों परिवार इस रिश्ते के लिए तैयार हो गए। जिस दिन आदित्य और सिया पहली बार आमने-सामने मिले, दोनों कुछ देर तक सिर्फ़ एक-दूसरे को देखते रहे। आदित्य मुस्कुराकर बोला "तो... यही हो तुम?" सिया हँस पड़ी— "और तुम बिल्कुल वैसे ही निकले... जैसे तुम्हारी आवाज़ थी।" दोनों हँस पड़े। कुछ महीनों बाद उनकी शादी पूरे परिवार की मौजूदगी में सादगी से संपन्न हुई। शादी के बाद जब किसी ने उनसे पूछा, "आप दोनों की मुलाक़ात कैसे हुई थी?" आदित्य मुस्कुराया और बोला "एक गलत नंबर से..." सिया ने उसकी बात पूरी की "...और सही इंसान से।" दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराए। उन्हें अब भी विश्वास नहीं होता था कि एक साधारण-सी फोन कॉल ने उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी। शिक्षा: कभी-कभी जीवन की सबसे सुंदर शुरुआत योजनाओं से नहीं, बल्कि संयोगों से होती है। सच्चा रिश्ता विश्वास, सम्मान और ईमानदारी पर टिकता है—और यही उसे मंज़िल तक पहुँचाता है। सुनीता गुप्ता
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