Fantasy Magical Realism
सर्पिणी – शाप और प्रतिशोध
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दिल्ली की सर्द रातें शहर की भागदौड़ को एक अजीब-सी ठहराव देती हैं। घड़ी में रात के 2:47 बजे थे। बाहर सड़कों पर धुंध चिपकी हुई थी, और हल्की हवा खिड़की के शीशों पर एक मधुर-सा कंपन पैदा कर रही थी। अन्विता बिस्तर पर लेटी थी, करवटें बदलती, जैसे किसी अदृश्य बेचैनी...
दिल्ली की सर्द रातें शहर की भागदौड़ को एक अजीब-सी ठहराव देती हैं। घड़ी में रात के 2:47 बजे थे। बाहर सड़कों पर धुंध चिपकी हुई थी, और हल्की हवा खिड़की के शीशों पर एक मधुर-सा कंपन पैदा कर रही थी। अन्विता बिस्तर पर लेटी थी, करवटें बदलती, जैसे किसी अदृश्य बेचैनी ने उसकी नींद की डोर पकड़ी हुई हो। दिन भर की थकान के बावजूद उसे नींद नहीं आ रही थी। और जब आती भी, उसे एक ही जगह ले जाती— एक मंदिर। एक टूटा, अंधेरा, प्राचीन सर्पमंदिर। आज भी वही हुआ। उसकी पलकों ने जैसे ही गहरी नींद का स्पर्श महसूस किया— दुनिया बदलने लगी। एक क्षण में वह अपने कमरे में नहीं, बल्कि एक घने, पथरीले, समय से घायल जंगल में खड़ी थी। टहनियों पर मकड़ी के जाले चमक रहे थे, हवा ठंडी और भारी थी, और चारों ओर फैलती नमी में मिट्टी और काई की महक भर गई थी। जगह अनजानी थी… लेकिन भयावह रूप से परिचित। जमीन उसके पैरों के नीचे ठंडी थी, जैसे बरसों से सूरज की रोशनी उसे छू ही न पाई हो। कुछ दूरी पर बहते पानी की आवाज़ थी— छल-छल, धीमी, लेकिन स्पष्ट। और अचानक उस आवाज़ के बीच… फुफ्फ्फ्फ्फ्फ्फ… एक फुफकार। अन्विता ठिठक गई। हवा एक पल को भारी लगने लगी, मानो जंगल ने सांस रोकी हो। उसने धीरे-धीरे आगे कदम बढ़ाया। पत्तियाँ उसके पैरों के नीचे टूटकर चरमराईं, और हर चरमराहट उसके दिल की धड़कन तेज़ कर रही थी। पेड़ों के पीछे— उसे एक टूटा हुआ ढांचा दिखा। वह मंदिर था। मंदिर किसी पुराने, भूले-बिसरे साम्राज्य का अवशेष लगता था। ऊँचे स्तंभ, जिन पर नागों की आकृतियाँ उकेरी थीं— कुछ साफ़, कुछ समय की मार से मिट चुकीं। दीवारों पर काई चढ़ी थी, लिपटी हुई बेलें दीवारों को पूरी तरह निगल रही थीं। मध्य में एक चौड़ी सीढ़ी थी, जो भीतर के गर्भगृह तक जाती थी। जैसे-जैसे अन्विता आगे बढ़ती, मंदिर की ठंडी हवा उसके कानों से टकराती, और वह फुफकार— धीमी… फिर तेज़… फिर गहरी होती चली जाती। मंदिर के ठीक सामने खड़े होकर उसे महसूस हुआ कि यह कोई साधारण स्थान नहीं। उसका सीना अनजाने डर से भर गया। लेकिन उससे भी ज्यादा… एक अजीब-सी खींच उसे आगे खींच रही थी। जैसे यह मंदिर उसे पहचानता हो। गर्भगृह के भीतर एक विशाल मूर्ति थी— आधा स्त्री, आधा सर्प। स्त्री का चेहरा पत्थर पर इतना सुगठित था मानो किसी ने उसे अपनी आत्मा से तराशा हो। उसकी आँखें… खुली थीं। और उनमें पीली चमक थी— गहरी, भयावह, जीवित जैसी। सर्प का शरीर उसके पीछे लिपटकर ऊपर तक फैला था, शल्कों पर उकेरी गई रेखाएँ इतना गहराई से और वास्तविक थीं कि अन्विता को लगा— यह मूर्ति चल भी सकती है। मूर्ति के सामने एक गोल पत्थर की वेदी थी, जिस पर काले धुएँ के कण अभी भी हवा में मंडरा रहे थे— जैसे वहाँ किसी ने अभी-अभी कोई पूजा की हो। अन्विता का दिल गले तक आ गया। वह धीमी आवाज़ में फुसफुसाई— “मैं… यहाँ क्यों हूँ?” और तभी— मूर्ति की आँखों में चमक उभरी। “त्वस्स्स्स्स…”
Chapter
11
Words
13.9K
Updated
2 months ago
Published
Dec 04, 2025
Published Chapters
सर्पिणी – शाप और प्रतिशोध - Chapter 1
Free
**गायब होती नागिन** – बिस्तर पर दिखी हरी नागिन और उसका रहस्यमय गायब होना - Chapter 2
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**अजनबी की सुनहरी आंखें** – कॉलेज में अर्जेय का प्रवेश - Chapter 3
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अर्जेय के आसपास अन्विता को अजीब ऊर्जा महसूस होना - Chapter 4
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दादी की संदूकची** – पुराना संदूक, नागमणि और फुफकारती छाया - Chapter 5
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नागमणि का ताप – मणि पहनते ही शरीर में उबलती शक्ति - Chapter 6
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जंगल का रहस्य – अर्जेय का अन्विता को पहली बार शहर से दूर ले जाना - Chapter 7
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पुरातन शाप की पहली झलक – अर्जेय का आधा सच बताना - Chapter 8
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स्मृतियों के टुकड़े – सोते हुए अन्विता का पहला पूर्वजन्म दृश्य - Chapter 9
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नागलोक की धुंध – सपने में पहली बार नागों के महल को साफ़ देखना - Chapter 10
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सर्पिणी – शाप और प्रतिशोध - Chapter 11 <br>**गेस्ट लेक्चरर की पहचान** – अर्जेय का वंश: नागवंशी
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दिल्ली की सर्द रातें शहर की भागदौड़ को एक अजीब-सी ठहराव देती हैं। घड़ी में रात के 2:47 बजे थे। बाहर सड़कों पर धुंध चिपकी हुई थी, और हल्की हवा खिड़की के शीशों पर एक मधुर-सा कंपन पैदा कर रही थी। अन्विता बिस्तर पर लेटी थी, करवटें बदलती, जैसे किसी अदृश्य बेचैनी ने उसकी नींद की डोर पकड़ी हुई हो। दिन भर की थकान के बावजूद उसे नींद नहीं आ रही थी। और जब आती भी, उसे एक ही जगह ले जाती— एक मंदिर। एक टूटा, अंधेरा, प्राचीन सर्पमंदिर। आज भी वही हुआ। उसकी पलकों ने जैसे ही गहरी नींद का स्पर्श महसूस किया— दुनिया बदलने लगी। एक क्षण में वह अपने कमरे में नहीं, बल्कि एक घने, पथरीले, समय से घायल जंगल में खड़ी थी। टहनियों पर मकड़ी के जाले चमक रहे थे, हवा ठंडी और भारी थी, और चारों ओर फैलती नमी में मिट्टी और काई की महक भर गई थी। जगह अनजानी थी… लेकिन भयावह रूप से परिचित। जमीन उसके पैरों के नीचे ठंडी थी, जैसे बरसों से सूरज की रोशनी उसे छू ही न पाई हो। कुछ दूरी पर बहते पानी की आवाज़ थी— छल-छल, धीमी, लेकिन स्पष्ट। और अचानक उस आवाज़ के बीच… फुफ्फ्फ्फ्फ्फ्फ… एक फुफकार। अन्विता ठिठक गई। हवा एक पल को भारी लगने लगी, मानो जंगल ने सांस रोकी हो। उसने धीरे-धीरे आगे कदम बढ़ाया। पत्तियाँ उसके पैरों के नीचे टूटकर चरमराईं, और हर चरमराहट उसके दिल की धड़कन तेज़ कर रही थी। पेड़ों के पीछे— उसे एक टूटा हुआ ढांचा दिखा। वह मंदिर था। मंदिर किसी पुराने, भूले-बिसरे साम्राज्य का अवशेष लगता था। ऊँचे स्तंभ, जिन पर नागों की आकृतियाँ उकेरी थीं— कुछ साफ़, कुछ समय की मार से मिट चुकीं। दीवारों पर काई चढ़ी थी, लिपटी हुई बेलें दीवारों को पूरी तरह निगल रही थीं। मध्य में एक चौड़ी सीढ़ी थी, जो भीतर के गर्भगृह तक जाती थी। जैसे-जैसे अन्विता आगे बढ़ती, मंदिर की ठंडी हवा उसके कानों से टकराती, और वह फुफकार— धीमी… फिर तेज़… फिर गहरी होती चली जाती। मंदिर के ठीक सामने खड़े होकर उसे महसूस हुआ कि यह कोई साधारण स्थान नहीं। उसका सीना अनजाने डर से भर गया। लेकिन उससे भी ज्यादा… एक अजीब-सी खींच उसे आगे खींच रही थी। जैसे यह मंदिर उसे पहचानता हो। गर्भगृह के भीतर एक विशाल मूर्ति थी— आधा स्त्री, आधा सर्प। स्त्री का चेहरा पत्थर पर इतना सुगठित था मानो किसी ने उसे अपनी आत्मा से तराशा हो। उसकी आँखें… खुली थीं। और उनमें पीली चमक थी— गहरी, भयावह, जीवित जैसी। सर्प का शरीर उसके पीछे लिपटकर ऊपर तक फैला था, शल्कों पर उकेरी गई रेखाएँ इतना गहराई से और वास्तविक थीं कि अन्विता को लगा— यह मूर्ति चल भी सकती है। मूर्ति के सामने एक गोल पत्थर की वेदी थी, जिस पर काले धुएँ के कण अभी भी हवा में मंडरा रहे थे— जैसे वहाँ किसी ने अभी-अभी कोई पूजा की हो। अन्विता का दिल गले तक आ गया। वह धीमी आवाज़ में फुसफुसाई— “मैं… यहाँ क्यों हूँ?” और तभी— मूर्ति की आँखों में चमक उभरी। “त्वस्स्स्स्स…”
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