Horror Supernatural Horror
अधूरी सुबह 👌
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अधूरी सुबह 👌सुबह का सूरज धीरे-धीरे खिड़की के पर्दों से झांकने लगा था। हवा में ठंडक थी, पर उसके कमरे में एक अजीब सी खामोशी पसरी थी। दीवार पर लगी घड़ी टिक-टिक कर रही थी, पर वक़्त जैसे ठहर गया था। अंजलि की आँखें अब भी बंद थीं, लेकिन नींद बहुत पहले उड़ चुकी थी...
अधूरी सुबह 👌सुबह का सूरज धीरे-धीरे खिड़की के पर्दों से झांकने लगा था। हवा में ठंडक थी, पर उसके कमरे में एक अजीब सी खामोशी पसरी थी। दीवार पर लगी घड़ी टिक-टिक कर रही थी, पर वक़्त जैसे ठहर गया था। अंजलि की आँखें अब भी बंद थीं, लेकिन नींद बहुत पहले उड़ चुकी थी। वह बस लेटी थी — एक अधूरी सुबह के साथ, जो शायद हर दिन उसके साथ आती थी, पर कभी पूरी नहीं होती थी। --- अधूरा रिश्ता तीन साल पहले की बात है। दिल्ली के एक कॉलेज में अंजलि ने पहली बार आरव को देखा था। वो एक डिबेट प्रतियोगिता का दिन था। अंजलि की आवाज़ में आत्मविश्वास था, और आरव की मुस्कान में सुकून। बहस खत्म होने के बाद दोनों की बात शुरू हुई — पहले कॉलेज की, फिर ज़िंदगी की। धीरे-धीरे वो बातें मुलाक़ातों में बदलीं, और मुलाक़ातें आदत में। आरव की एक बात अंजलि को बहुत भाती थी — “मैं कभी अधूरा काम नहीं छोड़ता।” लेकिन उसे क्या पता था, एक दिन वही आरव उसकी ज़िंदगी को अधूरा छोड़ जाएगा। --- — वो आख़िरी शाम वो जनवरी की ठंडी शाम थी। कॉलेज खत्म हो चुका था और दोनों अपने-अपने रास्ते तय कर रहे थे। अंजलि दिल्ली में रहकर एमबीए करना चाहती थी, जबकि आरव को नौकरी के लिए मुंबई जाना था। दोनों ने कहा — “दूरी सिर्फ़ शहरों की होगी, दिलों की नहीं।” पर दूरी तो वक्त के साथ बढ़ती गई। फ़ोन कॉल्स कम हुए, मैसेज अधूरे रह गए। अंजलि को याद है, आख़िरी बार आरव ने कहा था — “मैं जल्दी लौटूंगा, बस थोड़ा समय देना।” लेकिन वो लौटकर कभी नहीं आया। --- — ख़बर जो ज़िंदगी बदल गई एक शाम, जब आसमान पर हल्की बारिश हो रही थी, अंजलि को एक फ़ोन आया। मुंबई से कोई अनजान नंबर था। फ़ोन उठाते ही आवाज़ आई — “क्या आप आरव को जानती हैं?” अंजलि के हाथ काँप गए, दिल धक से रह गया। उसने बस इतना कहा — “हाँ…” दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई — “आरव का एक्सिडेंट हो गया था… वो अब हमारे बीच नहीं हैं।” वो एक वाक्य था, लेकिन उसने अंजलि की पूरी दुनिया तोड़ दी। उस पल लगा जैसे किसी ने उसके दिल की धड़कनें छीन लीं। वो बस चुप रह गई — रो भी नहीं सकी। --- — ख़ामोशी की ज़िंदगी दिन बीतते गए। लोग कहते रहे — “समय सब ठीक कर देता है।” पर अंजलि के लिए वक़्त ठहर गया था। वो रोज़ वही सुबह देखती — वही पर्दे, वही घड़ी, वही ठंडी हवा — बस आरव नहीं था। कॉफी का मग अब भी वही था, जिसमें कभी आरव ने लिखा था — “अधूरी सुबहें तुम्हारे बिना नहीं कटेंगी।” अब वही मग उसकी मेज़ पर पड़ा था, जिसमें धूल जमी थी। कभी-कभी वो खिड़की खोलकर आसमान को देखती और कहती — “तुम जहाँ भी हो, एक बार लौट आओ… मैं अब भी इंतज़ार कर रही हूँ।” --- एक अनकहा ख़त एक दिन, जब अंजलि
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अधूरी सुबह 👌सुबह का सूरज धीरे-धीरे खिड़की के पर्दों से झांकने लगा था। हवा में ठंडक थी, पर उसके कमरे में एक अजीब सी खामोशी पसरी थी। दीवार पर लगी घड़ी टिक-टिक कर रही थी, पर वक़्त जैसे ठहर गया था। अंजलि की आँखें अब भी बंद थीं, लेकिन नींद बहुत पहले उड़ चुकी थी। वह बस लेटी थी — एक अधूरी सुबह के साथ, जो शायद हर दिन उसके साथ आती थी, पर कभी पूरी नहीं होती थी। --- अधूरा रिश्ता तीन साल पहले की बात है। दिल्ली के एक कॉलेज में अंजलि ने पहली बार आरव को देखा था। वो एक डिबेट प्रतियोगिता का दिन था। अंजलि की आवाज़ में आत्मविश्वास था, और आरव की मुस्कान में सुकून। बहस खत्म होने के बाद दोनों की बात शुरू हुई — पहले कॉलेज की, फिर ज़िंदगी की। धीरे-धीरे वो बातें मुलाक़ातों में बदलीं, और मुलाक़ातें आदत में। आरव की एक बात अंजलि को बहुत भाती थी — “मैं कभी अधूरा काम नहीं छोड़ता।” लेकिन उसे क्या पता था, एक दिन वही आरव उसकी ज़िंदगी को अधूरा छोड़ जाएगा। --- — वो आख़िरी शाम वो जनवरी की ठंडी शाम थी। कॉलेज खत्म हो चुका था और दोनों अपने-अपने रास्ते तय कर रहे थे। अंजलि दिल्ली में रहकर एमबीए करना चाहती थी, जबकि आरव को नौकरी के लिए मुंबई जाना था। दोनों ने कहा — “दूरी सिर्फ़ शहरों की होगी, दिलों की नहीं।” पर दूरी तो वक्त के साथ बढ़ती गई। फ़ोन कॉल्स कम हुए, मैसेज अधूरे रह गए। अंजलि को याद है, आख़िरी बार आरव ने कहा था — “मैं जल्दी लौटूंगा, बस थोड़ा समय देना।” लेकिन वो लौटकर कभी नहीं आया। --- — ख़बर जो ज़िंदगी बदल गई एक शाम, जब आसमान पर हल्की बारिश हो रही थी, अंजलि को एक फ़ोन आया। मुंबई से कोई अनजान नंबर था। फ़ोन उठाते ही आवाज़ आई — “क्या आप आरव को जानती हैं?” अंजलि के हाथ काँप गए, दिल धक से रह गया। उसने बस इतना कहा — “हाँ…” दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई — “आरव का एक्सिडेंट हो गया था… वो अब हमारे बीच नहीं हैं।” वो एक वाक्य था, लेकिन उसने अंजलि की पूरी दुनिया तोड़ दी। उस पल लगा जैसे किसी ने उसके दिल की धड़कनें छीन लीं। वो बस चुप रह गई — रो भी नहीं सकी। --- — ख़ामोशी की ज़िंदगी दिन बीतते गए। लोग कहते रहे — “समय सब ठीक कर देता है।” पर अंजलि के लिए वक़्त ठहर गया था। वो रोज़ वही सुबह देखती — वही पर्दे, वही घड़ी, वही ठंडी हवा — बस आरव नहीं था। कॉफी का मग अब भी वही था, जिसमें कभी आरव ने लिखा था — “अधूरी सुबहें तुम्हारे बिना नहीं कटेंगी।” अब वही मग उसकी मेज़ पर पड़ा था, जिसमें धूल जमी थी। कभी-कभी वो खिड़की खोलकर आसमान को देखती और कहती — “तुम जहाँ भी हो, एक बार लौट आओ… मैं अब भी इंतज़ार कर रही हूँ।” --- एक अनकहा ख़त एक दिन, जब अंजलि
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