Mystery Dark Fantasy
बाप की छाया"🩷
10
Views
0
Likes
1
Bookmarks
3
Ratings
"बाप की छाया 🩵" रफीक़ एक साधारण मज़दूर था। रोज़ सुबह सूरज निकलने से पहले उठता और देर रात घर लौटता। उसके कपड़ों पर मिट्टी, पसीना और मेहनत की लकीरें साफ़ दिखती थीं, मगर चेहरे पर हमेशा एक सुकून भरी मुस्कान रहती थी। उसकी सबसे बड़ी दौलत उसका बेटा आरिफ़ था। रफीक़...
"बाप की छाया 🩵" रफीक़ एक साधारण मज़दूर था। रोज़ सुबह सूरज निकलने से पहले उठता और देर रात घर लौटता। उसके कपड़ों पर मिट्टी, पसीना और मेहनत की लकीरें साफ़ दिखती थीं, मगर चेहरे पर हमेशा एक सुकून भरी मुस्कान रहती थी। उसकी सबसे बड़ी दौलत उसका बेटा आरिफ़ था। रफीक़ का सपना था कि उसका बेटा उस छत के नीचे न रहे जहाँ टपकती छतरी और अधूरी ख्वाहिशें हों, बल्कि पढ़-लिखकर एक ऊँचे मकान में, इज़्ज़त की ज़िंदगी जिए। आरिफ़ अक्सर पूछता— “अब्बू, आप इतनी मेहनत क्यों करते हो? आप तो कभी आराम नहीं करते।” रफीक़ हंसकर कह देता— “बेटा, बाप का आराम तो तब है जब उसके बच्चे चैन से जीते हैं। तुम मेरी दुआ भी हो और मेरी मेहनत की वजह भी।” दिन बीतते गए। रफीक़ की हथेलियों में छाले पड़ गए, पीठ झुक गई, मगर उसने कभी शिकायत नहीं की। उसने अपनी इच्छाएँ, अपनी ख्वाहिशें सब कुर्बान कर दीं—बस एक ख्वाब पूरा करने के लिए कि उसका बेटा पढ़-लिखकर काबिल बने। आरिफ़ ने भी अपने अब्बू की उम्मीदों को टूटने नहीं दिया। दिन-रात मेहनत की, पढ़ाई की और आखिरकार एक बड़ी नौकरी पा ली। जिस दिन उसे नौकरी मिली, वह ख़ुशी से दौड़ता हुआ घर आया और बोला— “अब्बू! आपकी मेहनत रंग लाई… आज से आप काम पर नहीं जाएंगे।” रफीक़ की आँखों में आँसू थे। उसने बेटे को सीने से लगाया और धीरे से कहा— “बेटा, आज सच में लग रहा है कि मेरी मेहनत सफल हो गई। अब मुझे आराम नहीं, बल्कि सुकून मिल गया।” उस दिन आरिफ़ ने पहली बार महसूस किया कि सच में बाप की शख्सियत एक पेड़ की तरह होती है—जो खुद धूप सहता है, मगर अपने बच्चों को हमेशा छाया देता है। सीख: बाप का प्यार अक्सर चुप्पी में छिपा होता है। वह अपनी मोहब्बत दिखाता नहीं, मगर उसकी हर सांस, हर मेहनत अपने बच्चों के लिए ही होती है।भाग 2) समय तेज़ी से बीतता गया। अब आरिफ़ बड़ी नौकरी में रम गया था। उसके पास गाड़ी थी, अपना मकान था और दुनिया की हर वो सुविधा, जिसका सपना उसके अब्बू ने कभी देखा था। लेकिन ज़िंदगी की रफ्तार इतनी तेज़ हो गई कि अब्बू और बेटे के बीच पहले जैसी बातें कम होने लगीं। रफीक़ अक्सर दरवाज़े पर बैठा रहता, इस इंतज़ार में कि बेटा ऑफिस से लौटकर उससे थोड़ी बातें कर लेगा। मगर आरिफ़ थकान, काम और दोस्तों की महफ़िल में इतना मशगूल हो गया कि अब्बू की तरफ़ का ध्यान कम होता गया। एक रात जब आरिफ़ घर लौटा, उसने देखा कि अब्बू पुराने बक्से से कुछ पुरानी कॉपियाँ निकालकर देख रहे हैं। उन कॉपियों के पन्नों पर आरिफ़ की बचपन की लिखाई थी। रफीक़ ने बेटे को देखा और मुस्कुराते हुए कहा— “याद है बेटा, जब तुम पहली बार ‘अब्बू’ लिख पाए थे… मैंने उस दिन सोचा था कि मेरा बेटा ज़रूर आगे बढ़ेगा।” आरिफ़ के गले में जैसे कांटा अटक गया। वह सोचने लगा कि आज जिस मुकाम पर वह है, वह सिर्फ़ अपने अब्बू की मेहनत और दुआओं से है।
Chapter
1
Words
1.1K
Updated
28 days ago
Published
Aug 20, 2025
Published Chapters
बाप की छाया"🩷 - Chapter 1
Free
"बाप की छाया 🩵" रफीक़ एक साधारण मज़दूर था। रोज़ सुबह सूरज निकलने से पहले उठता और देर रात घर लौटता। उसके कपड़ों पर मिट्टी, पसीना और मेहनत की लकीरें साफ़ दिखती थीं, मगर चेहरे पर हमेशा एक सुकून भरी मुस्कान रहती थी। उसकी सबसे बड़ी दौलत उसका बेटा आरिफ़ था। रफीक़ का सपना था कि उसका बेटा उस छत के नीचे न रहे जहाँ टपकती छतरी और अधूरी ख्वाहिशें हों, बल्कि पढ़-लिखकर एक ऊँचे मकान में, इज़्ज़त की ज़िंदगी जिए। आरिफ़ अक्सर पूछता— “अब्बू, आप इतनी मेहनत क्यों करते हो? आप तो कभी आराम नहीं करते।” रफीक़ हंसकर कह देता— “बेटा, बाप का आराम तो तब है जब उसके बच्चे चैन से जीते हैं। तुम मेरी दुआ भी हो और मेरी मेहनत की वजह भी।” दिन बीतते गए। रफीक़ की हथेलियों में छाले पड़ गए, पीठ झुक गई, मगर उसने कभी शिकायत नहीं की। उसने अपनी इच्छाएँ, अपनी ख्वाहिशें सब कुर्बान कर दीं—बस एक ख्वाब पूरा करने के लिए कि उसका बेटा पढ़-लिखकर काबिल बने। आरिफ़ ने भी अपने अब्बू की उम्मीदों को टूटने नहीं दिया। दिन-रात मेहनत की, पढ़ाई की और आखिरकार एक बड़ी नौकरी पा ली। जिस दिन उसे नौकरी मिली, वह ख़ुशी से दौड़ता हुआ घर आया और बोला— “अब्बू! आपकी मेहनत रंग लाई… आज से आप काम पर नहीं जाएंगे।” रफीक़ की आँखों में आँसू थे। उसने बेटे को सीने से लगाया और धीरे से कहा— “बेटा, आज सच में लग रहा है कि मेरी मेहनत सफल हो गई। अब मुझे आराम नहीं, बल्कि सुकून मिल गया।” उस दिन आरिफ़ ने पहली बार महसूस किया कि सच में बाप की शख्सियत एक पेड़ की तरह होती है—जो खुद धूप सहता है, मगर अपने बच्चों को हमेशा छाया देता है। सीख: बाप का प्यार अक्सर चुप्पी में छिपा होता है। वह अपनी मोहब्बत दिखाता नहीं, मगर उसकी हर सांस, हर मेहनत अपने बच्चों के लिए ही होती है।भाग 2) समय तेज़ी से बीतता गया। अब आरिफ़ बड़ी नौकरी में रम गया था। उसके पास गाड़ी थी, अपना मकान था और दुनिया की हर वो सुविधा, जिसका सपना उसके अब्बू ने कभी देखा था। लेकिन ज़िंदगी की रफ्तार इतनी तेज़ हो गई कि अब्बू और बेटे के बीच पहले जैसी बातें कम होने लगीं। रफीक़ अक्सर दरवाज़े पर बैठा रहता, इस इंतज़ार में कि बेटा ऑफिस से लौटकर उससे थोड़ी बातें कर लेगा। मगर आरिफ़ थकान, काम और दोस्तों की महफ़िल में इतना मशगूल हो गया कि अब्बू की तरफ़ का ध्यान कम होता गया। एक रात जब आरिफ़ घर लौटा, उसने देखा कि अब्बू पुराने बक्से से कुछ पुरानी कॉपियाँ निकालकर देख रहे हैं। उन कॉपियों के पन्नों पर आरिफ़ की बचपन की लिखाई थी। रफीक़ ने बेटे को देखा और मुस्कुराते हुए कहा— “याद है बेटा, जब तुम पहली बार ‘अब्बू’ लिख पाए थे… मैंने उस दिन सोचा था कि मेरा बेटा ज़रूर आगे बढ़ेगा।” आरिफ़ के गले में जैसे कांटा अटक गया। वह सोचने लगा कि आज जिस मुकाम पर वह है, वह सिर्फ़ अपने अब्बू की मेहनत और दुआओं से है।
Sadia khanam
बाप की छाया"🩷 - Chapter 1 • 5 months ago
Fk Khan
बाप की छाया"🩷 - Chapter 1 • 7 months ago
Sk Cooking
बाप की छाया"🩷 - Chapter 1 • 10 months ago
Sk Cooking
10 months ago
👎
0 likes • बाप की छाया"🩷 - Chapter 1No fan art available for this story yet.
Every chapter keeps getting better! 🌟
0 likes • बाप की छाया"🩷 - Chapter 1