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"एक रोटी का सपना"
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एक रोटी का सपना" –गाँव के एक छोटे से झोंपड़े में रहने वाला सलमान रोज़ाना मेहनत-मज़दूरी करता था। कभी खेतों में, कभी ईंट-भट्ठे पर, तो कभी किसी के घर का सामान ढोकर — बस इतना ही कमा पाता कि दिन का गुज़ारा हो जाए। लेकिन पिछले कुछ दिनों से काम कम था और घर में अना...
एक रोटी का सपना" –गाँव के एक छोटे से झोंपड़े में रहने वाला सलमान रोज़ाना मेहनत-मज़दूरी करता था। कभी खेतों में, कभी ईंट-भट्ठे पर, तो कभी किसी के घर का सामान ढोकर — बस इतना ही कमा पाता कि दिन का गुज़ारा हो जाए। लेकिन पिछले कुछ दिनों से काम कम था और घर में अनाज भी ख़त्म हो चुका था। उसकी छोटी बेटी, आयशा, सुबह उठकर मासूमियत से पूछती — "अब्बू, आज नाश्ते में क्या मिलेगा?" सलमान के पास जवाब नहीं होता, बस मुस्कुरा कर उसका सिर सहला देता। उस रात सलमान ने एक सपना देखा — वो और आयशा दोनों एक थाली में गर्म-गर्म रोटी खा रहे हैं, और आयशा की हँसी में उसकी सारी थकान मिट गई है। सपना इतना सजीव था कि सलमान सुबह उठते ही काम ढूँढने निकल पड़ा। पूरा दिन धूप में पसीना बहाने के बाद उसे बस 10 रुपये मिले। वो पैसे लेकर बाज़ार भागा, आटा खरीदा, और घर लौटकर आयशा के लिए रोटी बनाई। जब आयशा ने पहली कौर लिया, उसकी आँखें चमक उठीं — "अब्बू, ये तो सबसे स्वादिष्ट रोटी है!" सलमान ने महसूस किया कि कभी-कभी इंसान के सबसे बड़े सपने भी बस एक रोटी जितने छोटे और अनमोल होते हैं। एक रोटी का सपना" – अगला पन्ना आयशा की वो चमकती हुई आँखें सलमान के दिल में हमेशा के लिए बस गईं। रोटी खाते-खाते उसने हँसते हुए कहा – "अब्बू, कल हम सबके लिए बनाएँगे, ठीक है?" सलमान ने धीमे से "हाँ" कहा, लेकिन अंदर से सोच रहा था, "कल? पता नहीं कल के लिए आटा होगा या नहीं..." रात को सलमान नींद में भी सोच रहा था – "अगर मैं ज़्यादा मेहनत करूँ, तो शायद सिर्फ हमारे लिए नहीं, गाँव के दूसरे भूखे बच्चों के लिए भी रोटी बना पाऊँ।" अगले दिन वो सुबह से ही खेतों में, फिर बाज़ार में, फिर ईंट-भट्ठे में — जहाँ भी काम मिला, करता रहा। उस दिन उसके हाथ छिल गए, पैर थक कर काँप रहे थे, मगर जेब में 50 रुपये थे। घर लौटते हुए उसने आटा, दाल, और सब्ज़ी खरीदी। उस रात सिर्फ आयशा नहीं, बल्कि पड़ोस के तीन अनाथ बच्चे भी उसके घर आकर बैठे। सभी के सामने गर्म-गर्म रोटियाँ रखीं, और जब सब बच्चों ने एक साथ हँसकर खाना शुरू किया, तो सलमान के मन में शांति "एक रोटी का सपना" – आख़िरी पन्ना उस रात की हँसी और बच्चों के चमकते चेहरे सलमान के दिल में ऐसे उतर गए जैसे किसी ने थके हुए दिल पर ठंडी हवा का हाथ रख दिया हो। अगली सुबह उसने एक नया फ़ैसला किया — "मैं हर दिन थोड़ा-थोड़ा कमाकर, थोड़ा-थोड़ा बचाकर, भूखे पेट सोने वालों के लिए रोटी बनाऊँगा।" धीरे-धीरे पड़ोस के लोग भी जुड़ने लगे। कोई आटा लाता, कोई सब्ज़ी, कोई लकड़ी। देखते ही देखते सलमान का छोटा सा रसोईघर एक "गाँव की रसोई" बन गया। हर शाम वहाँ से दर्जनों बच्चे, बूढ़े और मज़दूर गरम-गरम रोटी और सब्ज़ी खाकर जाते। आयशा ने सलमान से पूछा — "अब्बू, क्या हमारा सपना पूरा हो गया?"
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एक रोटी का सपना" –गाँव के एक छोटे से झोंपड़े में रहने वाला सलमान रोज़ाना मेहनत-मज़दूरी करता था। कभी खेतों में, कभी ईंट-भट्ठे पर, तो कभी किसी के घर का सामान ढोकर — बस इतना ही कमा पाता कि दिन का गुज़ारा हो जाए। लेकिन पिछले कुछ दिनों से काम कम था और घर में अनाज भी ख़त्म हो चुका था। उसकी छोटी बेटी, आयशा, सुबह उठकर मासूमियत से पूछती — "अब्बू, आज नाश्ते में क्या मिलेगा?" सलमान के पास जवाब नहीं होता, बस मुस्कुरा कर उसका सिर सहला देता। उस रात सलमान ने एक सपना देखा — वो और आयशा दोनों एक थाली में गर्म-गर्म रोटी खा रहे हैं, और आयशा की हँसी में उसकी सारी थकान मिट गई है। सपना इतना सजीव था कि सलमान सुबह उठते ही काम ढूँढने निकल पड़ा। पूरा दिन धूप में पसीना बहाने के बाद उसे बस 10 रुपये मिले। वो पैसे लेकर बाज़ार भागा, आटा खरीदा, और घर लौटकर आयशा के लिए रोटी बनाई। जब आयशा ने पहली कौर लिया, उसकी आँखें चमक उठीं — "अब्बू, ये तो सबसे स्वादिष्ट रोटी है!" सलमान ने महसूस किया कि कभी-कभी इंसान के सबसे बड़े सपने भी बस एक रोटी जितने छोटे और अनमोल होते हैं। एक रोटी का सपना" – अगला पन्ना आयशा की वो चमकती हुई आँखें सलमान के दिल में हमेशा के लिए बस गईं। रोटी खाते-खाते उसने हँसते हुए कहा – "अब्बू, कल हम सबके लिए बनाएँगे, ठीक है?" सलमान ने धीमे से "हाँ" कहा, लेकिन अंदर से सोच रहा था, "कल? पता नहीं कल के लिए आटा होगा या नहीं..." रात को सलमान नींद में भी सोच रहा था – "अगर मैं ज़्यादा मेहनत करूँ, तो शायद सिर्फ हमारे लिए नहीं, गाँव के दूसरे भूखे बच्चों के लिए भी रोटी बना पाऊँ।" अगले दिन वो सुबह से ही खेतों में, फिर बाज़ार में, फिर ईंट-भट्ठे में — जहाँ भी काम मिला, करता रहा। उस दिन उसके हाथ छिल गए, पैर थक कर काँप रहे थे, मगर जेब में 50 रुपये थे। घर लौटते हुए उसने आटा, दाल, और सब्ज़ी खरीदी। उस रात सिर्फ आयशा नहीं, बल्कि पड़ोस के तीन अनाथ बच्चे भी उसके घर आकर बैठे। सभी के सामने गर्म-गर्म रोटियाँ रखीं, और जब सब बच्चों ने एक साथ हँसकर खाना शुरू किया, तो सलमान के मन में शांति "एक रोटी का सपना" – आख़िरी पन्ना उस रात की हँसी और बच्चों के चमकते चेहरे सलमान के दिल में ऐसे उतर गए जैसे किसी ने थके हुए दिल पर ठंडी हवा का हाथ रख दिया हो। अगली सुबह उसने एक नया फ़ैसला किया — "मैं हर दिन थोड़ा-थोड़ा कमाकर, थोड़ा-थोड़ा बचाकर, भूखे पेट सोने वालों के लिए रोटी बनाऊँगा।" धीरे-धीरे पड़ोस के लोग भी जुड़ने लगे। कोई आटा लाता, कोई सब्ज़ी, कोई लकड़ी। देखते ही देखते सलमान का छोटा सा रसोईघर एक "गाँव की रसोई" बन गया। हर शाम वहाँ से दर्जनों बच्चे, बूढ़े और मज़दूर गरम-गरम रोटी और सब्ज़ी खाकर जाते। आयशा ने सलमान से पूछा — "अब्बू, क्या हमारा सपना पूरा हो गया?"
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