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टूटा रिश्ता, जुड़ी यादें"🩷
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कहानी का शीर्षक: "टूटा रिश्ता, जुड़ी यादें" --- कहानी: बरसों बाद अपने पुराने शहर लौटी थी सिमी। सब कुछ बदल गया था — वो गलियाँ, वो रास्ते, वो पेड़ जिनके नीचे खड़े होकर कभी घंटों बातें होती थीं। लेकिन एक चीज़ अब भी वैसी ही थी — उसका दिल, जो अब भी आरव की यादों ...
कहानी का शीर्षक: "टूटा रिश्ता, जुड़ी यादें" --- कहानी: बरसों बाद अपने पुराने शहर लौटी थी सिमी। सब कुछ बदल गया था — वो गलियाँ, वो रास्ते, वो पेड़ जिनके नीचे खड़े होकर कभी घंटों बातें होती थीं। लेकिन एक चीज़ अब भी वैसी ही थी — उसका दिल, जो अब भी आरव की यादों से भरा था। कभी आरव और सिमी का रिश्ता ऐसा था जिसे सब मिसाल कहते थे। कॉलेज में साथ पढ़े, एक-दूसरे की हर खुशी-दुख का हिस्सा बने। प्यार भी गहराता गया, लेकिन ज़िन्दगी ने जैसे ही असल मोड़ लिया, रास्ते जुदा हो गए। आरव की ज़िम्मेदारियाँ और सिमी के सपने — दोनों के रास्ते अलग थे। और फिर एक दिन, बिना किसी शोर के, उनका रिश्ता टूट गया। न कोई झगड़ा, न कोई इल्जाम... बस खामोशी से खत्म हो गया। पर यादें? वो कहाँ जाती हैं। आज जब सिमी उसी कैफे में बैठी थी, जहाँ कभी उनकी पहली मुलाक़ात हुई थी, तो उसकी आंखों के सामने वही लम्हे तैरने लगे — आरव की मुस्कान, उसका "फालतू बातें करना बंद करो, सिमी", और उसका यूं चुपचाप उसे देखना। वो रिश्ता टूट चुका था, पर वो यादें आज भी जुड़ी थीं — जिंदा थीं, सहेजी हुई थीं। आरव अब किसी और की ज़िन्दगी में था, और सिमी भी अपने सफर पर आगे बढ़ गई थी। लेकिन कभी-कभी, कुछ रिश्ते सिर्फ लोगों के साथ नहीं रहते, वो हमारी यादों में बस जाते हैं। और शायद, वहीं सबसे ज़्यादा सच्चे होते हैं। कहानी का अगला पाट: “टूटा रिश्ता, जुड़ी यादें” – भाग 2 --- कैफ़े से बाहर निकलते वक्त सिमी ने एक गहरी साँस ली। हवा में कुछ जाना-पहचाना सा एहसास था। वो अपने मन को समझा चुकी थी कि अब सब अतीत है, लेकिन दिल… वो कहाँ मानता है। जैसे ही वो सड़क पार कर रही थी, पीछे से किसी ने आवाज़ दी — "सिमी?" उसने पलटकर देखा — आरव। वो वहीं खड़ा था, हल्की सी मुस्कान लिए, आँखों में वही पुराना अपनापन। कुछ पल को वक्त जैसे थम सा गया। न कोई भीड़ दिखी, न कोई शोर… बस वही दो चेहरे और उनके बीच जमी पुरानी यादों की परतें। सिमी (हैरानी से): "आरव… तुम?" आरव: "हाँ… काम से आया था शहर। और तुम?" सिमी: "कुछ अधूरे पन्ने पलटने…" दोनों थोड़ी देर चुप रहे। शब्दों से ज़्यादा उनकी खामोशियाँ बोल रही थीं। फिर पास के पार्क में साथ चलने लगे, जैसे बरसों की दूरी बस कुछ कदमों में मिट गई हो। बैठते ही आरव ने पूछा — "खुश हो?" सिमी ने हल्की सी मुस्कान दी — "खुश रहना सीख लिया है। तुम?" आरव: "मैंने भी… लेकिन कुछ यादें अब भी पीछा नहीं छोड़तीं।" सिमी (धीरे से): "क्योंकि वो सिर्फ यादें नहीं, हमारे होने का हिस्सा हैं।" उन दोनों के बीच अब कोई शिकायत नहीं थी, कोई सवाल नहीं। जो भी था, सिर्फ एहसास था — साफ़, गहरा और सच्चा। शाम ढलने लगी थी। आरव उठा और सिमी की तरफ देखा — "शायद हम फिर नहीं मिलेंगे…" सिमी ने उसकी आँखों में देखा और कहा —
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कहानी का शीर्षक: "टूटा रिश्ता, जुड़ी यादें" --- कहानी: बरसों बाद अपने पुराने शहर लौटी थी सिमी। सब कुछ बदल गया था — वो गलियाँ, वो रास्ते, वो पेड़ जिनके नीचे खड़े होकर कभी घंटों बातें होती थीं। लेकिन एक चीज़ अब भी वैसी ही थी — उसका दिल, जो अब भी आरव की यादों से भरा था। कभी आरव और सिमी का रिश्ता ऐसा था जिसे सब मिसाल कहते थे। कॉलेज में साथ पढ़े, एक-दूसरे की हर खुशी-दुख का हिस्सा बने। प्यार भी गहराता गया, लेकिन ज़िन्दगी ने जैसे ही असल मोड़ लिया, रास्ते जुदा हो गए। आरव की ज़िम्मेदारियाँ और सिमी के सपने — दोनों के रास्ते अलग थे। और फिर एक दिन, बिना किसी शोर के, उनका रिश्ता टूट गया। न कोई झगड़ा, न कोई इल्जाम... बस खामोशी से खत्म हो गया। पर यादें? वो कहाँ जाती हैं। आज जब सिमी उसी कैफे में बैठी थी, जहाँ कभी उनकी पहली मुलाक़ात हुई थी, तो उसकी आंखों के सामने वही लम्हे तैरने लगे — आरव की मुस्कान, उसका "फालतू बातें करना बंद करो, सिमी", और उसका यूं चुपचाप उसे देखना। वो रिश्ता टूट चुका था, पर वो यादें आज भी जुड़ी थीं — जिंदा थीं, सहेजी हुई थीं। आरव अब किसी और की ज़िन्दगी में था, और सिमी भी अपने सफर पर आगे बढ़ गई थी। लेकिन कभी-कभी, कुछ रिश्ते सिर्फ लोगों के साथ नहीं रहते, वो हमारी यादों में बस जाते हैं। और शायद, वहीं सबसे ज़्यादा सच्चे होते हैं। कहानी का अगला पाट: “टूटा रिश्ता, जुड़ी यादें” – भाग 2 --- कैफ़े से बाहर निकलते वक्त सिमी ने एक गहरी साँस ली। हवा में कुछ जाना-पहचाना सा एहसास था। वो अपने मन को समझा चुकी थी कि अब सब अतीत है, लेकिन दिल… वो कहाँ मानता है। जैसे ही वो सड़क पार कर रही थी, पीछे से किसी ने आवाज़ दी — "सिमी?" उसने पलटकर देखा — आरव। वो वहीं खड़ा था, हल्की सी मुस्कान लिए, आँखों में वही पुराना अपनापन। कुछ पल को वक्त जैसे थम सा गया। न कोई भीड़ दिखी, न कोई शोर… बस वही दो चेहरे और उनके बीच जमी पुरानी यादों की परतें। सिमी (हैरानी से): "आरव… तुम?" आरव: "हाँ… काम से आया था शहर। और तुम?" सिमी: "कुछ अधूरे पन्ने पलटने…" दोनों थोड़ी देर चुप रहे। शब्दों से ज़्यादा उनकी खामोशियाँ बोल रही थीं। फिर पास के पार्क में साथ चलने लगे, जैसे बरसों की दूरी बस कुछ कदमों में मिट गई हो। बैठते ही आरव ने पूछा — "खुश हो?" सिमी ने हल्की सी मुस्कान दी — "खुश रहना सीख लिया है। तुम?" आरव: "मैंने भी… लेकिन कुछ यादें अब भी पीछा नहीं छोड़तीं।" सिमी (धीरे से): "क्योंकि वो सिर्फ यादें नहीं, हमारे होने का हिस्सा हैं।" उन दोनों के बीच अब कोई शिकायत नहीं थी, कोई सवाल नहीं। जो भी था, सिर्फ एहसास था — साफ़, गहरा और सच्चा। शाम ढलने लगी थी। आरव उठा और सिमी की तरफ देखा — "शायद हम फिर नहीं मिलेंगे…" सिमी ने उसकी आँखों में देखा और कहा —
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