Romance Contemporary Romance
प्यार की छनछन । Author - The Lady Book Chanchal
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शर्मा निवास - एक मध्यमवर्गीय घर का लिविंग रूम बाहर काले घने बादल छाए हुए थे, मानो आसमान भी आने वाले तूफान की आहट दे रहा हो। दिल्ली की एक तंग गली के इस पुराने दो मंजिला मकान में आज अजीब सी खामोशी छाई थी, पर यह खामोशी सुकून वाली नहीं, बल्कि दम घोंटने वाली थी...
शर्मा निवास - एक मध्यमवर्गीय घर का लिविंग रूम बाहर काले घने बादल छाए हुए थे, मानो आसमान भी आने वाले तूफान की आहट दे रहा हो। दिल्ली की एक तंग गली के इस पुराने दो मंजिला मकान में आज अजीब सी खामोशी छाई थी, पर यह खामोशी सुकून वाली नहीं, बल्कि दम घोंटने वाली थी। लिविंग रूम के पुराने सोफे पर बैठे सतीश शर्मा के हाथ बुरी तरह कांप रहे थे। उनके माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं, जबकि कूलर की ठंडी हवा कमरे में घूम रही थी। उनके सामने वाले आलीशान सोफे पर, जो शायद इस घर का सबसे सस्ता फर्नीचर लग रहा था, एक शख्स बेहद इत्मीनान से बैठा था। वह था पृथ्वीराज चौहान। पृथ्वीराज का व्यक्तित्व किसी भी इंसान के अंदर डर पैदा करने के लिए काफी था। छह फीट से ज्यादा की लंबाई, चौड़े कंधे और लोहे जैसी सख्त बॉडी। उसने काले रंग की एक महँगी इटालियन शर्ट पहनी थी, जिसकी आस्तीनें उसने कोहनियों तक मोड़ रखी थीं, जिससे उसकी कलाई पर बँधी करोड़ों की घड़ी और हाथ का टैटू साफ दिख रहा था। उसकी आँखों में एक अजीब सा ठंडापन था, जैसे वह इंसान नहीं, कोई पत्थर की मूरत हो। वह अपनी लंबी उंगलियों से सोफे के हत्थे को ताल दे रहा था— ठक... ठक... ठक... "वक्त खत्म हो रहा है शर्मा जी," पृथ्वीराज की आवाज किसी गूँज की तरह कमरे में फैली। उसकी आवाज गहरी थी और उसमें एक ऐसी कमान थी जिसे कोई टाल नहीं सकता था। "साहब... बस कुछ दिनों की मोहलत और। मैं पाई-पाई चुका दूँगा," सतीश गिड़गिड़ाए। तभी, कमरे के कोने में रखे भारी लकड़ी के दरवाजे के पीछे एक हलचल हुई। अवनि—सतीश की बेटी—दरवाजे की ओट से यह सब देख रही थी। अवनि की उम्र मुश्किल से 21 साल रही होगी। सांवला निखार, बड़ी-बड़ी हिरणी जैसी आँखें जो इस वक्त डर से नम थीं, और कमर तक लहराते लंबे काले बाल। उसने एक साधारण सा पीला कुर्ती और सफेद लेगिंग्स पहना था। उसका चेहरा मासूमियत की जीती-जागती मिसाल था। वह डर के मारे अपनी उंगलियों के पोरों को चबा रही थी, जो उसकी घबराहट की पुरानी आदत थी। अचानक, अवनि का पैर पास रखे एक फूलदान से टकरा गया। झंकार... पृथ्वीराज की गर्दन एक झटके में दरवाजे की तरफ घूमी। उसकी चील जैसी पैनी नजरों ने सीधे अवनि की आँखों में झांका। अवनि फ्रीज हो गई। उसे लगा जैसे उसके शरीर का खून जम गया हो। पृथ्वीराज की उंगलियां जो अब तक सोफे पर थपकी दे रही थीं, रुक गईं। उसकी आंखों का ठंडापन अचानक एक अजीब सी चमक, एक जुनून में बदल गया। उसने कभी किसी चीज को इतनी शिद्दत से नहीं देखा था। अवनि की वह मासूमियत, उसका डर, उसकी वह भीगी पलकें—पृथ्वीराज के अंदर कुछ हलचल कर गईं। वह धीरे से सोफे से उठा। उसके उठने का अंदाज इतना रौबदार था कि सतीश शर्मा डर के मारे खड़े हो गए। पृथ्वीराज धीरे-धीरे अवनि की तरफ बढ़ा। अवनि पीछे हटना चाहती थी, पर उसके पैर जैसे जमीन में धँस गए थे।
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शर्मा निवास - एक मध्यमवर्गीय घर का लिविंग रूम बाहर काले घने बादल छाए हुए थे, मानो आसमान भी आने वाले तूफान की आहट दे रहा हो। दिल्ली की एक तंग गली के इस पुराने दो मंजिला मकान में आज अजीब सी खामोशी छाई थी, पर यह खामोशी सुकून वाली नहीं, बल्कि दम घोंटने वाली थी। लिविंग रूम के पुराने सोफे पर बैठे सतीश शर्मा के हाथ बुरी तरह कांप रहे थे। उनके माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं, जबकि कूलर की ठंडी हवा कमरे में घूम रही थी। उनके सामने वाले आलीशान सोफे पर, जो शायद इस घर का सबसे सस्ता फर्नीचर लग रहा था, एक शख्स बेहद इत्मीनान से बैठा था। वह था पृथ्वीराज चौहान। पृथ्वीराज का व्यक्तित्व किसी भी इंसान के अंदर डर पैदा करने के लिए काफी था। छह फीट से ज्यादा की लंबाई, चौड़े कंधे और लोहे जैसी सख्त बॉडी। उसने काले रंग की एक महँगी इटालियन शर्ट पहनी थी, जिसकी आस्तीनें उसने कोहनियों तक मोड़ रखी थीं, जिससे उसकी कलाई पर बँधी करोड़ों की घड़ी और हाथ का टैटू साफ दिख रहा था। उसकी आँखों में एक अजीब सा ठंडापन था, जैसे वह इंसान नहीं, कोई पत्थर की मूरत हो। वह अपनी लंबी उंगलियों से सोफे के हत्थे को ताल दे रहा था— ठक... ठक... ठक... "वक्त खत्म हो रहा है शर्मा जी," पृथ्वीराज की आवाज किसी गूँज की तरह कमरे में फैली। उसकी आवाज गहरी थी और उसमें एक ऐसी कमान थी जिसे कोई टाल नहीं सकता था। "साहब... बस कुछ दिनों की मोहलत और। मैं पाई-पाई चुका दूँगा," सतीश गिड़गिड़ाए। तभी, कमरे के कोने में रखे भारी लकड़ी के दरवाजे के पीछे एक हलचल हुई। अवनि—सतीश की बेटी—दरवाजे की ओट से यह सब देख रही थी। अवनि की उम्र मुश्किल से 21 साल रही होगी। सांवला निखार, बड़ी-बड़ी हिरणी जैसी आँखें जो इस वक्त डर से नम थीं, और कमर तक लहराते लंबे काले बाल। उसने एक साधारण सा पीला कुर्ती और सफेद लेगिंग्स पहना था। उसका चेहरा मासूमियत की जीती-जागती मिसाल था। वह डर के मारे अपनी उंगलियों के पोरों को चबा रही थी, जो उसकी घबराहट की पुरानी आदत थी। अचानक, अवनि का पैर पास रखे एक फूलदान से टकरा गया। झंकार... पृथ्वीराज की गर्दन एक झटके में दरवाजे की तरफ घूमी। उसकी चील जैसी पैनी नजरों ने सीधे अवनि की आँखों में झांका। अवनि फ्रीज हो गई। उसे लगा जैसे उसके शरीर का खून जम गया हो। पृथ्वीराज की उंगलियां जो अब तक सोफे पर थपकी दे रही थीं, रुक गईं। उसकी आंखों का ठंडापन अचानक एक अजीब सी चमक, एक जुनून में बदल गया। उसने कभी किसी चीज को इतनी शिद्दत से नहीं देखा था। अवनि की वह मासूमियत, उसका डर, उसकी वह भीगी पलकें—पृथ्वीराज के अंदर कुछ हलचल कर गईं। वह धीरे से सोफे से उठा। उसके उठने का अंदाज इतना रौबदार था कि सतीश शर्मा डर के मारे खड़े हो गए। पृथ्वीराज धीरे-धीरे अवनि की तरफ बढ़ा। अवनि पीछे हटना चाहती थी, पर उसके पैर जैसे जमीन में धँस गए थे।
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