Mystery Supernatural Mystery
"कुछ बातें रह जाती हैं"
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"कुछ बातें रह जाती हैं"
Sheetal छोटी थी, लेकिन जिम्मेदारी का बोझ उसके चेहरे पर साफ़ दिखता था।
Rama दीदी उसे हमेशा समझाती थी — "हर चीज़ को इतना सोच मत लिया कर", लेकिन Sheetal को आदत थी — हर चीज़ को महसूस करने की।
उनके पापा Shankar जी, शांत स्वभाव के थ...
Sheetal छोटी थी, लेकिन जिम्मेदारी का बोझ उसके चेहरे पर साफ़ दिखता था।
Rama दीदी उसे हमेशा समझाती थी — "हर चीज़ को इतना सोच मत लिया कर", लेकिन Sheetal को आदत थी — हर चीज़ को महसूस करने की।
उनके पापा Shankar जी, शांत स्वभाव के थ...
"कुछ बातें रह जाती हैं"
Sheetal छोटी थी, लेकिन जिम्मेदारी का बोझ उसके चेहरे पर साफ़ दिखता था।
Rama दीदी उसे हमेशा समझाती थी — "हर चीज़ को इतना सोच मत लिया कर", लेकिन Sheetal को आदत थी — हर चीज़ को महसूस करने की।
उनके पापा Shankar जी, शांत स्वभाव के थे, पर जब Sheetal को कुछ समझाते, तो जैसे पूरी दुनिया रुक जाती।
घर में ज़्यादा कुछ नहीं था — बस ज़रूरी चीज़ें। पर Sheetal की ख्वाहिशें कुछ और थीं। कभी अच्छे कपड़े पहनने की, कभी बस किसी के सामने खुलकर बोलने की।
स्कूल से आती तो दीदी की फाइलें संभालती, मम्मी की तबीयत की दवाइयाँ देखती, और फिर कोने में बैठकर चुपचाप ड्रॉइंग बनाती — कोई पूछे तो कहती, “बस ऐसे ही।”
Rama उसे अक्सर कहती, “तेरे लिए भी जीना ज़रूरी है।”
Sheetal सिर झुका देती — उसे समझ नहीं आता था कि “मेरे लिए जीना” कैसे होता है।
एक दिन, स्कूल से आने के बाद Sheetal चुपचाप बैठी रही। पापा ने पूछा, "क्या हुआ?"
उसने सिर घुमाकर कहा, "कुछ नहीं पापा… बस आज मन नहीं था किसी से बात करने का।"
और पहली बार Shankar जी ने उसे गले लगा लिया — बिना कुछ बोले। शायद उन्होंने भी पहली बार सुना, जो वो बरसों से कह नहीं पा रही थी।
Sheetal ने उस दिन कुछ नहीं कहा, पर उसे लगा जैसे उसके अंदर कोई बात हल्की हो गई हो।
शायद हर बार कहना ज़रूरी नहीं होता… कभी-कभी किसी का समझ जाना ही काफी होता है।
Sheetal छोटी थी, लेकिन जिम्मेदारी का बोझ उसके चेहरे पर साफ़ दिखता था।
Rama दीदी उसे हमेशा समझाती थी — "हर चीज़ को इतना सोच मत लिया कर", लेकिन Sheetal को आदत थी — हर चीज़ को महसूस करने की।
उनके पापा Shankar जी, शांत स्वभाव के थे, पर जब Sheetal को कुछ समझाते, तो जैसे पूरी दुनिया रुक जाती।
घर में ज़्यादा कुछ नहीं था — बस ज़रूरी चीज़ें। पर Sheetal की ख्वाहिशें कुछ और थीं। कभी अच्छे कपड़े पहनने की, कभी बस किसी के सामने खुलकर बोलने की।
स्कूल से आती तो दीदी की फाइलें संभालती, मम्मी की तबीयत की दवाइयाँ देखती, और फिर कोने में बैठकर चुपचाप ड्रॉइंग बनाती — कोई पूछे तो कहती, “बस ऐसे ही।”
Rama उसे अक्सर कहती, “तेरे लिए भी जीना ज़रूरी है।”
Sheetal सिर झुका देती — उसे समझ नहीं आता था कि “मेरे लिए जीना” कैसे होता है।
एक दिन, स्कूल से आने के बाद Sheetal चुपचाप बैठी रही। पापा ने पूछा, "क्या हुआ?"
उसने सिर घुमाकर कहा, "कुछ नहीं पापा… बस आज मन नहीं था किसी से बात करने का।"
और पहली बार Shankar जी ने उसे गले लगा लिया — बिना कुछ बोले। शायद उन्होंने भी पहली बार सुना, जो वो बरसों से कह नहीं पा रही थी।
Sheetal ने उस दिन कुछ नहीं कहा, पर उसे लगा जैसे उसके अंदर कोई बात हल्की हो गई हो।
शायद हर बार कहना ज़रूरी नहीं होता… कभी-कभी किसी का समझ जाना ही काफी होता है।
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"कुछ बातें रह जाती हैं"
Sheetal छोटी थी, लेकिन जिम्मेदारी का बोझ उसके चेहरे पर साफ़ दिखता था।
Rama दीदी उसे हमेशा समझाती थी — "हर चीज़ को इतना सोच मत लिया कर", लेकिन Sheetal को आदत थी — हर चीज़ को महसूस करने की।
उनके पापा Shankar जी, शांत स्वभाव के थे, पर जब Sheetal को कुछ समझाते, तो जैसे पूरी दुनिया रुक जाती।
घर में ज़्यादा कुछ नहीं था — बस ज़रूरी चीज़ें। पर Sheetal की ख्वाहिशें कुछ और थीं। कभी अच्छे कपड़े पहनने की, कभी बस किसी के सामने खुलकर बोलने की।
स्कूल से आती तो दीदी की फाइलें संभालती, मम्मी की तबीयत की दवाइयाँ देखती, और फिर कोने में बैठकर चुपचाप ड्रॉइंग बनाती — कोई पूछे तो कहती, “बस ऐसे ही।”
Rama उसे अक्सर कहती, “तेरे लिए भी जीना ज़रूरी है।”
Sheetal सिर झुका देती — उसे समझ नहीं आता था कि “मेरे लिए जीना” कैसे होता है।
एक दिन, स्कूल से आने के बाद Sheetal चुपचाप बैठी रही। पापा ने पूछा, "क्या हुआ?"
उसने सिर घुमाकर कहा, "कुछ नहीं पापा… बस आज मन नहीं था किसी से बात करने का।"
और पहली बार Shankar जी ने उसे गले लगा लिया — बिना कुछ बोले। शायद उन्होंने भी पहली बार सुना, जो वो बरसों से कह नहीं पा रही थी।
Sheetal ने उस दिन कुछ नहीं कहा, पर उसे लगा जैसे उसके अंदर कोई बात हल्की हो गई हो।
शायद हर बार कहना ज़रूरी नहीं होता… कभी-कभी किसी का समझ जाना ही काफी होता है।
Sheetal छोटी थी, लेकिन जिम्मेदारी का बोझ उसके चेहरे पर साफ़ दिखता था।
Rama दीदी उसे हमेशा समझाती थी — "हर चीज़ को इतना सोच मत लिया कर", लेकिन Sheetal को आदत थी — हर चीज़ को महसूस करने की।
उनके पापा Shankar जी, शांत स्वभाव के थे, पर जब Sheetal को कुछ समझाते, तो जैसे पूरी दुनिया रुक जाती।
घर में ज़्यादा कुछ नहीं था — बस ज़रूरी चीज़ें। पर Sheetal की ख्वाहिशें कुछ और थीं। कभी अच्छे कपड़े पहनने की, कभी बस किसी के सामने खुलकर बोलने की।
स्कूल से आती तो दीदी की फाइलें संभालती, मम्मी की तबीयत की दवाइयाँ देखती, और फिर कोने में बैठकर चुपचाप ड्रॉइंग बनाती — कोई पूछे तो कहती, “बस ऐसे ही।”
Rama उसे अक्सर कहती, “तेरे लिए भी जीना ज़रूरी है।”
Sheetal सिर झुका देती — उसे समझ नहीं आता था कि “मेरे लिए जीना” कैसे होता है।
एक दिन, स्कूल से आने के बाद Sheetal चुपचाप बैठी रही। पापा ने पूछा, "क्या हुआ?"
उसने सिर घुमाकर कहा, "कुछ नहीं पापा… बस आज मन नहीं था किसी से बात करने का।"
और पहली बार Shankar जी ने उसे गले लगा लिया — बिना कुछ बोले। शायद उन्होंने भी पहली बार सुना, जो वो बरसों से कह नहीं पा रही थी।
Sheetal ने उस दिन कुछ नहीं कहा, पर उसे लगा जैसे उसके अंदर कोई बात हल्की हो गई हो।
शायद हर बार कहना ज़रूरी नहीं होता… कभी-कभी किसी का समझ जाना ही काफी होता है।
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