Jalim Hukum Sa - Chapter 2
उनकी आँखों में आज भी वही सख्ती थी।
उन्हें नहीं पता था कि कुछ ही देर बाद जिस लड़की का हाथ उनके हाथ में दिया जाएगा...
वह उनकी बाकी दुनिया से बिल्कुल अलग होगी।
और सौम्या को भी नहीं पता था कि जिस आदमी के नाम से लोग डरते हैं...
वही आदमी आने वाले दिनों में उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सवाल बनने वाला है।
एक तरफ था अथर्व हुकुम सा—जिसके लिए जिंदगी उसके अपने नियमों पर चलती थी।
दूसरी तरफ थी सौम्या राणा—जो अपनों की खुशी के लिए अपनी जिंदगी तक दाँव पर लगा चुकी थी।
एक के लिए यह शादी एक समझौता थी।
दूसरे के लिए एक मजबूरी।
लेकिन किस्मत...
कभी-कभी दो अनजान लोगों को ऐसे रिश्ते में बाँध देती है, जिसकी शुरुआत भले ही सौदे से हो...
मगर अंत उनकी सोच से कहीं ज्यादा खूबसूरत होता है।
आज जयपुर के उस महल में सिर्फ दो लोगों की शादी नहीं होने वाली थी।
आज...
दो बिल्कुल अलग दुनियाएँ पहली बार आमने-सामने आने वाली थीं।
और शायद...
यहीं से शुरू होने वाली थी—
एक जालिम हुकुम सा और एक सुलझी हुई लड़की की ऐसी कहानी, जिसमें सौदा धीरे-धीरे रिश्ते में और रिश्ता... मोहब्बत में बदलने वाला था
कुछ देर बाद महल के विशाल आँगन में शहनाई की धुन और मंत्रोच्चार की आवाज़ एक साथ गूँज उठी।
मंडप फूलों और सुनहरी रोशनियों से सजा हुआ था। चारों ओर बैठे मेहमानों की निगाहें अब मंडप की तरफ टिक चुकी थीं। पंडित जी ने शुभ मुहूर्त का संकेत देते हुए ऊँची आवाज़ में कहा—
“दूल्हे और दुल्हन को मंडप में बुलाइए।”
सबकी नजरें एक साथ महल की सीढ़ियों की तरफ उठ गईं।
एक तरफ से अथर्व हुकुम सा दिखाई दिए।
गोल्डन शेरवानी में उनका शाही व्यक्तित्व और भी निखरकर सामने आ रहा था। चेहरे पर वही गंभीरता, वही सख्त भाव और आँखों में वही ठहराव था। आसपास खड़े लोग उनके लिए रास्ता छोड़ते चले गए।
उनके कदम नपे-तुले थे।
न कोई जल्दबाजी...
न कोई उत्साह।
जैसे वह अपनी शादी में नहीं, बल्कि किसी जरूरी समझौते को पूरा करने जा रहे हों।
वहीं दूसरी तरफ से सौम्या ने महल की सीढ़ियों से नीचे कदम रखा।
उसका चेहरा लाल नेट के घूंघट के पीछे पूरी तरह छिपा हुआ था। घूंघट की महीन जाली के पीछे से उसकी झुकी हुई आँखें ही दिखाई दे रही थीं।
लाल रंग के भारी ब्राइडल लहंगे में वह सचमुच किसी राजकुमारी से कम नहीं लग रही थी।
उसके हर कदम के साथ पायल की हल्की-सी आवाज़ पैदा हो रही थी।
लेकिन उन कदमों में दुल्हन वाली चंचलता नहीं थी।
बस एक अजीब-सी झिझक थी।
एक अनजान भविष्य का डर था।
और दिल में हजारों सवाल थे।
सौम्या धीरे-धीरे मंडप की तरफ बढ़ रही थी।
उसे पता था कि कुछ ही पलों में उसकी जिंदगी हमेशा के लिए बदलने वाली है।
जिस आदमी को उसने कभी करीब से नहीं जाना...
आज वही उसका पति बनने वाला था।
वह भी ऐसे रिश्ते में जिसे उसने खुद नहीं चुना था।
फिर भी उसने अपना सिर झुका रखा था।
क्योंकि उसके लिए यह शादी सिर्फ उसकी जिंदगी का फैसला नहीं थी।
यह उसके परिवार की उम्मीद थी।
कुछ ही क्षणों में दोनों अपनी-अपनी दूरी तय करके मंडप तक पहुँच गए।
अथर्व एक तरफ खड़े थे और सौम्या दूसरी तरफ।
पंडित जी ने दोनों को मंडप में बैठने का इशारा किया।
सौम्या धीरे से आकर अथर्व के बराबर बैठ गई।
उसका दिल तेजी से धड़क रहा था।
लेकिन अथर्व...
वह अब भी बिल्कुल शांत थे।
जैसे सामने बैठी लड़की से उनका कोई संबंध ही न हो।
पंडित जी ने सबसे पहले दोनों की जयमाला की रस्म शुरू करवाई।
सौम्या ने घूंघट के भीतर से जयमाला उठाई।
उसकी उँगलियाँ हल्की-सी काँप रही थीं।
उसने जैसे ही अथर्व के गले में वरमाला डाली, आसपास बैठे लोगों के चेहरों पर मुस्कान फैल गई।
तालियों की आवाज़ गूँज उठी।
इसके बाद अथर्व ने भी बिना किसी भाव के वरमाला उठाई और सौम्या के गले में डाल दी।
फिर शादी की विधियाँ आगे बढ़ने लगीं।
मंत्रोच्चार के बीच हवन कुंड की अग्नि प्रज्वलित हुई।
अग्नि की लपटें दोनों के चेहरों पर पड़ रही थीं।
अथर्व की नजरें स्थिर थीं।
वह सामने जलती अग्नि को बिना पलक झपकाए देख रहे थे।
वहीं सौम्या अपनी झुकी हुई आँखों से हवन कुंड को देख रही थी।
पंडित जी जैसे-जैसे मंत्र बोलते जाते, सौम्या वैसे-वैसे उनके निर्देश के अनुसार आहुति देती जाती।
उसके हाथों में हल्की-सी कंपकंपी थी।
लेकिन वह खुद को संभाले हुए थी।
उसे नहीं पता था कि यह शादी उसके लिए क्या लेकर आएगी।
लेकिन एक बात तय थी—
अब पीछे लौटने का रास्ता नहीं था।
कुछ देर बाद पंडित जी ने दोनों को फेरे लेने के लिए खड़े होने को कहा।
अथर्व तुरंत उठ खड़े हुए।
सौम्या ने भी अपना भारी लहंगा संभालते हुए उठने की कोशिश की।
लेकिन लहंगे का वजन और पैरों में बंधी पायल के कारण उसका संतुलन बिगड़ गया।
वह हल्का-सा लड़खड़ा गई।
इससे पहले कि वह गिरती...
अथर्व का हाथ तेजी से आगे बढ़ा।
उन्होंने उसकी बाँह थामकर उसे संभाल लिया।
सौम्या एक पल के लिए बिल्कुल स्थिर रह गई।
घूंघट के भीतर उसकी आँखें अचानक उठीं।
पहली बार उसकी नजर सीधे अथर्व पर पड़ी।
अथर्व ने उसकी तरफ देखा तक नहीं।
उन्होंने बस उसका हाथ पकड़ लिया।
मजबूती से।
इतनी मजबूती से कि सौम्या को अपनी उँगलियों में हल्का-सा दर्द महसूस हुआ।
वह धीरे से अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करने लगी।
लेकिन अथर्व की पकड़ ढीली नहीं हुई।
सौम्या ने फिर कोशिश की।
इस बार भी असफल रही।
उसका छोटा और नाजुक हाथ अथर्व के बड़े हाथ में पूरी तरह समा गया था।
अथर्व ने धीमी आवाज़ में कहा—
“संभलकर चलिए हुकुम रानी सा।”
सौम्या ने कुछ नहीं कहा।
बस उसकी नज़र अथर्व पर टिक गई और चुपचाप उनके साथ चलने लगी।
सात कदम।
सात वचन।
सात फेरे।
हर फेरे के साथ जैसे उनकी जिंदगी एक-दूसरे से और बंधती जा रही थी।
सौम्या का हाथ अब भी अथर्व की पकड़ में था।
वह बीच-बीच में उसे छुड़ाने की कोशिश करती, लेकिन अथर्व हर बार उसकी गति के साथ कदम मिलाते हुए आगे बढ़ते रहे।
शायद उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि उनकी मजबूत पकड़ सौम्या के लिए कितनी असहज थी।
और शायद सौम्या को भी अभी नहीं पता था कि यही हाथ आने वाले समय में कभी उसके लिए सबसे सुरक्षित जगह बनने वाला है।
कुछ ही देर में सातों फेरे पूरे हो गए।
पंडित जी ने अगली रस्म के लिए कहा—
“अब दूल्हा दुल्हन की मांग में सिंदूर भरेगा।”
सौम्या का दिल एक बार फिर तेजी से धड़क उठा।
पंडित जी ने उसे घूंघट थोड़ा उठाने का इशारा किया।
लेकिन इससे पहले कि वह अपना हाथ बढ़ाती...
अथर्व ने हाथ आगे कर दिया।
“घूंघट रहने दीजिए।”
पंडित जी एक पल के लिए उन्हें देखने लगे।
अथर्व ने बिना कोई और बात कहे सिंदूर उठाया।
घूंघट के भीतर से सौम्या की मांग ढूँढ़ते हुए उन्होंने सिंदूर भर दिया।
सौम्या की पलकें उसी पल बंद हो गईं।
उसकी साँस अटक-सी गई।
यह वह पल था जब उसकी जिंदगी का एक अध्याय हमेशा के लिए खत्म हो रहा था।
और दूसरा...
शुरू।
इसके बाद अथर्व ने मंगलसूत्र उठाया और सौम्या के गले में पहना दिया।
मंगलसूत्र उसके गले में पड़ते ही पंडित जी ने विवाह संपन्न होने की घोषणा कर दी।
चारों तरफ तालियों की आवाज़ गूँज उठी।
किसी ने खुशी में फूल बरसाए।
किसी ने दोनों को आशीर्वाद दिया।
लेकिन उस शोर के बीच भी सौम्या के भीतर अजीब-सी खामोशी थी।
वह अब अथर्व हुकुम सा की पत्नी थी।
अथर्व सबसे पहले उठे।
उन्होंने अपने माता-पिता के चरण छुए।
फिर अपनी बुआ जी के सामने झुककर उनका आशीर्वाद लिया।
उनके चेहरे पर अब भी वही गंभीरता थी।
इसके बाद सौम्या अपने माता-पिता की तरफ बढ़ी।
वह अभी कुछ ही कदम चली थी कि अचानक अथर्व ने पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया।
सौम्या रुक गई।
उसने धीरे से पीछे मुड़कर देखा।
घूंघट के कारण उसका चेहरा अब भी छिपा हुआ था।
अथर्व ने उसकी तरफ देखते हुए बेहद शांत लेकिन सख्त आवाज़ में कहा—
“अब आपके अपने ये है इसलिए अपनों के अलावा... किसी के सामने सिर मत झुकाइए।”
सौम्या की आँखें घूंघट के भीतर से पहली बार पूरी तरह अथर्व की आँखों से मिलीं।
वह कुछ कह नहीं पाई।
उसने बस उन्हें देखा।
जिस आदमी के बारे में उसने सुना था कि वह बेहद कठोर है...
जिस आदमी के नाम से लोग डरते हैं...
उसी आदमी की बातों ने आज उसके अपनो को पराया बता दिया।
अथर्व ने उसका हाथ अब भी पकड़ा हुआ था।
और सौम्या...
पहली बार सोच रही थी—
क्या यह शादी सिर्फ एक सौदा है?
या फिर इस रिश्ते के पीछे कोई ऐसी कहानी छिपी है...
जिसे अभी दोनों ही नहीं जानते?
To be continue...