दिलों का अनोखा रिश्ता Ch. 3

बीस साल पुराना राज़ - Chapter 3

Posted by sonu28 • Sep 26, 2026 05:18 PM

पुराने मंदिर में लिखे उन शब्दों को देखकर अनन्या कुछ क्षणों तक बिल्कुल स्थिर खड़ी रही।

“खेल अभी शुरू हुआ है।”

उसकी नजर उन शब्दों से हटकर आदित्य के चेहरे पर गई।

आदित्य की आंखों में पहली बार वह आत्मविश्वास नहीं था, जो उसने पहली मुलाकात में देखा था।

वह भी परेशान था।

“तुमने कहा था कि तुम्हारे परिवार में एक ऐसा इंसान है जिसे बीस साल से मरा हुआ माना जाता है।”

आदित्य ने धीरे से सिर हिलाया।

“हाँ।”

“कौन है वह?”

आदित्य ने जवाब देने से पहले चारों तरफ देखा।

“यहां नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि जिसने हमें यहां बुलाया है, वह अभी भी आसपास हो सकता है।”

अनन्या ने तुरंत मंदिर के अंधेरे हिस्से की तरफ देखा।

“तो फिर चलो।”

दोनों मंदिर से बाहर निकलने लगे।

लेकिन बाहर पहुंचते ही आदित्य अचानक रुक गया।

“एक मिनट।”

“क्या हुआ?”

आदित्य नीचे झुका।

मिट्टी पर किसी के पैरों के निशान थे।

ताजा।

और वे निशान मंदिर के पीछे की तरफ जा रहे थे।

अनन्या ने कहा, “हमें उनका पीछा करना चाहिए।”

आदित्य ने उसका हाथ रोक लिया।

“नहीं।”

अनन्या ने उसकी तरफ देखा।

“क्यों?”

“क्योंकि यही वह चाहता है।”

“कौन?”

“जो भी हमें यहां लेकर आया है।”

अनन्या ने अपना हाथ छुड़ा लिया।

“मैं डरकर वापस जाने वालों में से नहीं हूँ।”

आदित्य ने उसकी आंखों में देखा।

“मुझे पता है।”

दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

फिर आदित्य ने धीमे स्वर में कहा—

“इसीलिए मुझे तुम्हारी चिंता है।”

अनन्या का दिल एक पल के लिए तेजी से धड़कने लगा।

उसने तुरंत नजरें हटा लीं।

“चलो।”

---

हवेली लौटते समय दोनों अलग-अलग रास्ते से गए।

अनन्या अपने कमरे में पहुंची तो उसने दरवाजा बंद कर लिया।

उसके दिमाग में सिर्फ एक सवाल घूम रहा था—

बीस साल पहले आखिर हुआ क्या था?

उसने अपनी अलमारी खोली और पुराने दस्तावेजों के बीच कुछ ढूंढने लगी।

उसे बचपन से पता था कि उसके पिता पुराने कागज और तस्वीरें संभालकर रखते थे।

कुछ मिनट बाद उसे एक पुरानी डायरी मिली।

डायरी के कवर पर उसके पिता के नाम के शुरुआती अक्षर लिखे थे।

V.D.

अनन्या ने डायरी खोली।

पहले कई पन्ने सामान्य व्यापारिक जानकारी से भरे हुए थे।

फिर एक तारीख पर उसकी नजर रुक गई।

17 अगस्त, बीस साल पहले।

उसके नीचे सिर्फ तीन शब्द लिखे थे—

“सब कुछ बदल गया।”

अनन्या ने पन्ना पलटा।

अगले पन्ने पर लिखा था—

“राघवन को मैंने वादा किया है। लेकिन यह वादा एक दिन हमारे बच्चों की जिंदगी बदल देगा।”

अनन्या के हाथ कांपने लगे।

“बच्चों की जिंदगी…”

उसने आगे पढ़ना चाहा।

लेकिन अगले कई पन्ने फाड़े हुए थे।

सिर्फ आखिरी पन्ने पर एक वाक्य बचा था—

“अगर कभी अनन्या को सच पता चला, तो उसे कृष्णन परिवार से दूर रखना।”

अनन्या की सांस अटक गई।

“मुझसे दूर?”

उसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई।

वह घबरा गई।

उसने डायरी तुरंत बंद कर दी।

“कौन?”

“मैं हूँ।”

उसकी मां की आवाज थी।

अनन्या ने डायरी छुपा दी।

माधवी कमरे में आईं।

“इतनी रात तक जाग रही है?”

“नींद नहीं आ रही।”

माधवी ने उसकी तरफ गौर से देखा।

“आज मंदिर गई थी?”

अनन्या का चेहरा बदल गया।

“आपको कैसे पता?”

माधवी कुछ पल चुप रहीं।

फिर बोलीं—

“क्योंकि मैं तुम्हारी मां हूँ।”

“आई, मुझे सच बताइए।”

“कौन-सा सच?”

“देशमुख और कृष्णन परिवार के बीच बीस साल पहले क्या हुआ था?”

माधवी के चेहरे का रंग उड़ गया।

अनन्या ने उनका हाथ पकड़ लिया।

“मुझसे मत छुपाइए।”

माधवी ने धीमे स्वर में कहा—

“कुछ बातें जितनी देर छुपी रहें, उतना ही अच्छा होता है।”

“मेरे लिए या आपके लिए?”

माधवी की आंखों में आंसू आ गए।

“तुम नहीं समझोगी।”

“तो समझाइए।”

माधवी ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला।

लेकिन तभी नीचे से किसी चीज के टूटने की आवाज आई।

दोनों चौंक गईं।

माधवी तुरंत बाहर निकल गईं।

अनन्या भी उनके पीछे दौड़ी।

---

नीचे बैठक में एक खिड़की खुली हुई थी।

टेबल पर रखा एक पुराना फोटो फ्रेम टूट चुका था।

समीर बाहर की तरफ भागा।

“कोई अभी-अभी यहां से गया है!”

अनन्या खिड़की के पास पहुंची।

बाहर अंधेरा था।

लेकिन जमीन पर उसे एक काला कपड़ा दिखाई दिया।

उसने उसे उठाया।

वही सुनहरा अक्षर।

A

अनन्या ने तुरंत आदित्य को याद किया।

लेकिन तभी पीछे से उसके पिता की आवाज आई—

“उसे नीचे रखो।”

अनन्या ने पलटकर देखा।

विक्रम देशमुख वहां खड़े थे।

उनके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

“बाबा…”

विक्रम ने आगे बढ़कर वह कपड़ा उसके हाथ से ले लिया।

“तुम्हें यह कहां मिला?”

“खिड़की के बाहर।”

विक्रम ने कपड़े को देखा।

उनकी उंगलियां कांप रही थीं।

अनन्या ने पहली बार अपने पिता को इस तरह डरा हुआ देखा था।

“आप इसे जानते हैं।”

विक्रम ने कोई जवाब नहीं दिया।

“बाबा!”

वह चुप रहे।

अनन्या की आवाज कठोर हो गई।

“क्या यह वही व्यक्ति है जो बीस साल पहले मरा नहीं था?”

विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

उनकी आंखों में एक ऐसा दर्द था जिसे अनन्या समझ नहीं पा रही थी।

“तुम्हें यह किसने बताया?”

“आदित्य ने।”

विक्रम अचानक गुस्से में बोले—

“आदित्य से दूर रहो!”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

अनन्या ने धीरे से पूछा—

“क्यों?”

विक्रम ने कुछ नहीं कहा।

“आप मुझे हमेशा सच से दूर रखते हैं। लेकिन अब मैं बच्ची नहीं हूँ।”

“अनन्या…”

“नहीं बाबा। आज मुझे जवाब चाहिए।”

विक्रम की आंखों में आंसू आ गए।

“अगर तुम आदित्य के करीब गईं, तो तुम्हारी जिंदगी खतरे में पड़ सकती है।”

अनन्या कुछ पल उन्हें देखती रही।

“क्या आदित्य मुझे नुकसान पहुंचाएगा?”

विक्रम ने नजरें झुका लीं।

“मुझे नहीं पता।”

“तो फिर आप उससे डर क्यों रहे हैं?”

विक्रम के पास कोई जवाब नहीं था।

---

उसी समय शहर के दूसरे हिस्से में कृष्णन हवेली में भी एक अलग तूफान उठ चुका था।

आदित्य अपने पिता राघवन के सामने खड़ा था।

“पिताजी, मुझे सच चाहिए।”

राघवन ने उसकी तरफ देखा।

“किस बारे में?”

“मेरी बुआ के बारे में।”

राघवन का चेहरा गंभीर हो गया।

“तुम्हें यह नाम लेने की जरूरत नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि वह इस परिवार का हिस्सा नहीं रही।”

“लेकिन वह मरी भी नहीं थी।”

राघवन चुप हो गए।

आदित्य ने जोर से कहा—

“मुझे सब पता है!”

राघवन ने आंखें बंद कर लीं।

कुछ पल बाद उन्होंने कहा—

“तुम्हारी बुआ देविका ने बीस साल पहले इस परिवार को छोड़ दिया था।”

“क्यों?”

“क्योंकि उसने एक ऐसी गलती की थी जिसने दो परिवारों को हमेशा के लिए अलग कर दिया।”

“कौन-सी गलती?”

राघवन ने जवाब नहीं दिया।

आदित्य ने मेज पर हाथ रखा।

“क्या उस घटना का संबंध अनन्या के परिवार से है?”

राघवन ने उसकी तरफ देखा।

उनकी खामोशी ही जवाब थी।

आदित्य पीछे हट गया।

“तो यह सच है।”

राघवन ने कहा—

“आदित्य, उस लड़की से दूर रहो।”

“क्यों?”

“क्योंकि अगर तुम उसके करीब गए तो पुरानी दुश्मनी फिर से जाग जाएगी।”

आदित्य ने शांत लेकिन दृढ़ आवाज में कहा—

“मैं किसी दुश्मनी का हिस्सा नहीं बनना चाहता।”

“तुम समझ नहीं रहे।”

“तो मुझे समझाइए।”

राघवन की आंखों में दर्द था।

“बीस साल पहले जो हुआ था, उसमें तुम्हारी मां और अनन्या के पिता दोनों शामिल थे।”

आदित्य स्तब्ध रह गया।

“मेरी मां?”

राघवन ने सिर झुका लिया।

“हाँ।”

---

अगली सुबह अनन्या अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी थी।

रातभर उसे नींद नहीं आई थी।

उसे अपने पिता की बातें याद आ रही थीं।

“आदित्य से दूर रहो।”

लेकिन क्यों?

तभी उसके फोन पर एक संदेश आया।

अज्ञात नंबर से।

“अगर सच जानना है, तो आज शाम पुराने घाट पर आओ।”

अनन्या ने संदेश पढ़ा।

कुछ सेकंड बाद दूसरा संदेश आया—

“इस बार अकेली मत आना। जिसे तुम सबसे ज्यादा शक की नजर से देखती हो, उसी पर सबसे ज्यादा भरोसा करना।”

अनन्या का दिल तेज धड़कने लगा।

उसे तुरंत समझ आया—

आदित्य।

वह उसे फोन करने ही वाली थी कि दरवाजे पर दस्तक हुई।

दरवाजा खुला।

आदित्य सामने खड़ा था।

अनन्या ने उसे देखा।

दोनों कुछ क्षण चुप रहे।

आदित्य ने कहा—

“हमें बात करनी होगी।”

“मुझे भी।”

“तुम्हें भी कोई संदेश मिला?”

अनन्या की आंखें फैल गईं।

“हाँ।”

आदित्य ने धीरे से कहा—

“मुझे भी।”

“क्या लिखा है?”

आदित्य ने फोन उसकी तरफ बढ़ाया।

स्क्रीन पर सिर्फ एक लाइन थी—

“आज शाम घाट पर आओ। बीस साल पुराने वादे का आखिरी गवाह तुम्हारा इंतजार कर रहा है।”

अनन्या ने उसकी तरफ देखा।

“हमें वहां जाना होगा।”

आदित्य ने सिर हिलाया।

“लेकिन इस बार…”

“हाँ?”

“हम दोनों साथ जाएंगे।”

अनन्या के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

“पहली बार तुमने मेरी बात मानी।”

आदित्य भी मुस्कुराया।

“पहली बार शायद तुम्हारी बात सही है।”

दोनों को नहीं पता था कि उसी समय हवेली से कुछ दूरी पर एक कार में बैठा कोई व्यक्ति उनकी तस्वीर देख रहा था।

उसने फोन पर सिर्फ इतना कहा—

“दोनों साथ जा रहे हैं।”

दूसरी तरफ से आवाज आई—

“तो फिर अब समय आ गया है।”

उसने तस्वीर को मोड़ा।

तस्वीर में अनन्या और आदित्य साथ खड़े थे।

और तस्वीर के पीछे लिखा था—

“इन दोनों का मिलना ही हमारी सबसे बड़ी हार है।”

शाम होने वाली थी।

और पुराने घाट पर उनका इंतजार कर रहा था—

बीस साल पुराने रहस्य का पहला गवाह।

जारी रहेगा…

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