Obsessed With My Enemy Ch. 1

Their First Encounter

Posted by Puja Sawarbandhe • Sep 19, 2026 05:04 PM

बिल्कुल सही पकड़ा। दसवीं में मेरिट और स्कॉलरशिप के दम पर निकलना, आज एक कामयाब सिविल/सॉफ्टवेयर इंजीनियर होना और पिता से यह कहना कि 'अब हवेली की नौकरी छोड़ो, मैं कमाती हूँ'—यह उसके किरदार को बहुत मजबूत जमीन देता है।

वीर का तेवर भी बिल्कुल उस खानदानी वारिस जैसा होना चाहिए, जिसे न सुनने की आदत ही नहीं है और जो अपनी एक आवाज पर पूरे गांव को हिलाने का वहम पाले बैठा है।

इन सारे बदलावों के साथ यह रहा चैप्टर 1 का नया और पूरा ड्राफ्ट:

अध्याय 1: तेवर और तकरार

दोपहर की तीखी धूप में धूल उड़ाती हुई सरकारी बस ने जैसे ही गांव के बस स्टैंड पर ब्रेक मारा, चरमराहट की आवाज से वहां बैठे आवारा कुत्ते तक उठकर भाग खड़े हुए। कंडक्टर ने खिड़की से थूकते हुए आवाज लगाई, "रामपुर अड्डा आ गया भई, उतरने वाले जल्दी हाथ-पैर चलाओ!"

बस के पायदान से एक लड़की नीचे उतरी।

गहरे नीले रंग की एंकल-लेंथ जींस, बेज कलर का ढीला-ढाला लिनन कुर्ता, चेहरे पर हल्का सा **** शेड का धूप का चश्मा और पीठ पर एक स्लीक, ब्रांडेड लैपटॉप बैग। हाथ में एक छोटा केबिन ट्रॉली बैग था, जिसे उसने एक झटके में पगडंडी पर खींचा।

सितारा।

दसवीं के बोर्ड इम्तिहान में पूरे जिले में टॉप किया था उसने। सरकारी स्कॉलरशिप मिली तो सीधे शहर के टॉप इंजीनियरिंग कॉलेज का रास्ता खुला था। सात साल की कड़ी मेहनत के बाद आज वह एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर प्रोजेक्ट इंजीनियर बन चुकी थी।

बस स्टैंड पर चाय की दुकान के बाहर बैठे बूढ़े हुक्का गुड़गुड़ाना भूलकर उसे घूरने लगे। कुछ औरतें घूंघट के पीछे से फुसफुसाने लगीं।

सितारा के चेहरे पर एक शांत मुस्कान तैर गई। वह बचपन में भी किसी से दबती नहीं थी, दो चोटियों और स्कूल की नीली सलवार-कमीज में भी जब कोई गलत करता तो आंखें तरेर कर खड़ी हो जाती थी। लेकिन हां, तब उसके पास सिर्फ गुस्सा था, आज शहर के सात सालों ने उसे सलीका, समझ और ऐसा कॉन्फिडेंस दे दिया था जिसे नजरअंदाज करना नामुमकिन था।

उसने किसी की परवाह नहीं की और सीधे अपने घर की ओर कदम बढ़ा दिए।

कच्चे आंगन में नीम के पेड़ के नीचे एक पुरानी खटिया बिछी थी। रसोई से दाल के तड़के की खुशबू आ रही थी।

"बापू! मां!" सितारा ने घर में कदम रखते हुए आवाज दी।

रसोई के ओटले से उसकी मां पार्वती हाथ पोंछते हुए बाहर निकलीं। सितारा को सामने देखते ही उनकी आंखें छलक आईं। "मेरी लाडो... आ गई तू!"

बाड़े से माधव भी अपनी खुरपी पटकते हुए बाहर दौड़े चले आए। सितारा ने ट्रॉली वहीं छोड़ी और सीधे अपने पिता के गले लग गई।

"बापू... फोन पर कहते थे कि सेहत एकदम बढ़िया है, और यहां देखो, कितने कमजोर लग रहे हो!" सितारा ने माधव के चेहरे पर उभरी झुर्रियों को अपनी उंगलियों से छूते हुए डांटने वाले अंदाज में कहा।

माधव हंसे, उनके चेहरे पर वही पुरानी, सीधी-साधी चमक लौट आई। "अरे पगली, अब बूढ़ा हो रहा हूं तो वजन तो घटेगा ही। तू बता, इतनी दूर से आई है, थक गई होगी ना?"

तीनों आंगन की खटिया पर बैठे। पार्वती ने लोटे में ठंडा पानी और गुड़ लाकर दिया।

बातचीत के बीच ही माधव ने खटिया के पाए से अपनी पुरानी पगड़ी उठाई और माथे पर बांधने लगे। उन्होंने अपनी घिसी हुई चप्पलें पैरों में डालीं।

सितारा ने भौंहें सिकोड़ीं, "बापू, कहां की तैयारी है? मैं अभी-अभी तो आई हूं, बैठो न मेरे पास।"

माधव ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, "अरे बेटा, हवेली जाना है। छोटे ठाकुर साहब शहर से लौटे हैं, कोई वीर सिंह नाम है। उनके नए फार्महाउस और गोदाम का काम देखना है। मुंशी जी ने सुबह ही संदेशा भेजा था कि हाजिरी नहीं लगी तो शाम को ठाकुर साहब नाराज होंगे।"

'ठाकुर... हवेली...'

यह शब्द सुनते ही सितारा के अंदर कुछ सुलग उठा।

उसे अच्छी तरह याद था, जब वह चौदह साल की थी। हवेली के बड़े ठाकुर भवानी सिंह ने उसके पिता को सिर्फ इसलिए भरी चौपाल में बेइज्जत किया था क्योंकि उन्होंने हवेली के मुंशी की एक छोटी सी हेराफेरी पकड़ ली थी। उस दिन उसके सीधे-साधे पिता घुटनों पर हाथ जोड़कर बैठे थे। वह नजारा सितारा के सीने में आज भी किसी कांटे की तरह चुभता था।

उस दिन के बाद माधव ने हवेली की गुलामी को अपनी तकदीर मान लिया था, वे उस अपमान को पीकर चुपचाप जीने लगे थे। लेकिन सितारा नहीं भूली थी।

सितारा ने आगे बढ़कर पिता का हाथ पकड़ लिया। "बापू, अब आप उस हवेली में एक दिन भी काम नहीं करोगे। बहुत हो गया।"

"क्या कह रही है सितारा?" माधव चौंक गए।

"मैं सच कह रही हूं बापू," सितारा की आवाज में पक्का यकीन था, "मैं अब इंजीनियर हूं। अच्छी कंपनी में काम करती हूं, इतना कमा लेती हूं कि आप दोनों को राजा बनाकर रख सकूं। हमें उनकी नौकरी की कोई जरूरत नहीं है। अब आप घर बैठोगे।"

माधव की आंखें भर आईं। उन्होंने प्यार से सितारा के सिर पर हाथ रखा, "मुझे पता है मेरी बच्ची काबिल हो गई है। लेकिन बेटा, हवेली से इस साल के अंत तक का हमारा हिसाब-किताब बंधा हुआ है। बस... बस इस महीने के कुछ दिन और। ये महीना खत्म हो जाए, हिसाब बराबर कर लूं, फिर मैं हमेशा के लिए काम छोड़ दूंगा। फिर तो वैसे भी मुझे अपनी बेटी के साथ ही वक्त बिताना है, कहीं नहीं जाऊंगा।"

सितारा ने एक गहरी सांस ली। पिता की आंखों में अपने उसूलों को लेकर जो संकोच था, वह उसे समझ रही थी।

"ठीक है, सिर्फ इस महीने की आखिरी तारीख तक। उसके बाद मैं आपको हवेली की तरफ कदम भी नहीं रखने दूंगी," सितारा ने कहा।

माधव मुस्कुराए और गमछा कंधे पर डालकर बाहर निकल गए।

वे अभी पगडंडी के मोड़ तक पहुंचे ही होंगे कि सितारा की नजर आंगन के कोने में रखी तिपाई पर पड़ी। माधव की दमे वाली इनहेलर और उनका चश्मा वहीं छूट गया था। इतनी कड़ी धूप और गर्द-गुबार में अगर उन्हें सांस की तकलीफ उठ जाती तो संभालना मुश्किल हो जाता।

"यह भी ना... आधी चीजें घर भूल जाते हैं," सितारा ने बड़बड़ाते हुए दवा उठाई और बिना एक पल गंवाए बाहर की तरफ दौड़ पड़ी।

दोपहर के सन्नाटे में गांव की नहर वाली संकरी सड़क सूनी पड़ी थी। सड़क के दोनों तरफ बबूल की झाड़ियां थीं।

सितारा तेज कदमों से आगे बढ़ रही थी, जब अचानक पीछे से एक भारी, तीखे हॉर्न की गूंज से पूरी सड़क दहल उठी।

पों-पों-पों-पों!

आवाज इतनी तेज और लगातार थी कि किसी के भी कान के पर्दे फट जाएं।

पीछे एक गहरे काले रंग की महिंद्रा थार थी। भारी ऑफ-रोडिंग बंपर, ऊपर लगी रूफ-लाइट्स और गाड़ी से उड़ती हुई धूल का गुबार।

ड्राइविंग सीट पर वीर सिंह राजावत बैठा था।

गहरी ग्रे शर्ट की आस्तीनें कोहनियों तक मुड़ी हुईं, कलाई पर भारी घड़ी, आंखों पर काला एविएटर चश्मा और चेहरे पर ऐसा सख्त, बेरहम एक्सप्रेशन मानो इस सड़क पर चलने वाला हर इंसान उसकी इजाजत से सांस ले रहा हो। शहर से इंटरनेशनल बिजनेस की डिग्री लेकर आया था, लेकिन गांव की सीमा में घुसते ही उसका खून उसे याद दिला देता था कि इस पूरे इलाके का वो बेताज बादशाह है।

बगल वाली सीट पर मंगलू बैठा था, जो हॉर्न बजाने के बावजूद आगे चल रही लड़की को न हटते देख सिटपिटा रहा था।

"भैया, लगता है बहरी है। हट ही नहीं रही," मंगलू ने डरते-डरते कहा।

वीर के जबड़े भिंच गए। उसने स्टेयरिंग पर एक हाथ से ग्रिप बनाई और एक्सीलेटर को पूरा फर्श तक दबा दिया। गाड़ी एक झटके में आगे बढ़ी और सितारा के ठीक आगे जाकर वीर ने हैंडब्रेक खींचते हुए गाड़ी को तिरछा लगा दिया।

टायरों के घिसटने की तीखी आवाज के साथ धूल का एक बवंडर उठा, जो सीधे जाकर सितारा के चेहरे और कपड़ों पर गिरा।

सितारा ने अपनी मुट्ठियां भींच लीं। उसने आस्तीन से अपना चेहरा साफ किया और सीधी खड़ी हो गई।

थार का भारी दरवाजा खुला। वीर गाड़ी से नीचे उतरा।

छह फीट से ज्यादा लंबा कद, रौबदार चाल और चेहरे पर वह खतरनाक घमंड, जिससे इस गांव के लोग नजरें मिलाने से भी कतराते थे। वह सीधा सितारा के सामने आकर रुका। दोनों के बीच बमुश्किल एक हाथ की दूरी थी।

"अंधी हो या दिमाग घर पर गिरवी रखकर निकली हो?" वीर की आवाज भारी, ठंडी और बेहद बदतमीज थी, "हॉर्न की आवाज सुनाई नहीं दे रही थी?"

वीर को लगा था कि वह गांव की बाकी औरतों की तरह थर-थर कांपेगी या घबराकर माफी मांगने लगेगी।

लेकिन सितारा ने अपनी पलकें तक नहीं झपकाईं। उसने अपनी नजरें उठाईं और सीधे वीर की आंखों में ठंडे तेवर से घूरा।

"सुनाई तो ठीक से दे रहा था, लेकिन मुझे नहीं पता था कि गाड़ी के स्टेयरिंग पर कोई जानवर बैठा है जिसे सिर्फ सींग मारना आता है," सितारा का लहजा बिल्कुल बेपरवाह और धारदार था।

मंगलू का मुंह खुला का खुला रह गया। उसकी सांस हलक में अटक गई।

वीर की आंखों में खून उतर आया। आज तक उसके सामने किसी मर्द ने इतनी ऊंची आवाज में सांस लेने की हिम्मत नहीं की थी, और यह लड़की उसके मुंह पर उसे जानवर कह रही थी?

वीर एक कदम और आगे बढ़ा, उसकी परछाई सितारा के ऊपर छा गई। "जुबान बहुत चलती है तुम्हारी। शायद पता नहीं है कि किससे उलझ रही हो। वीर सिंह राजावत नाम है मेरा। यहां जमीन पर पत्ता भी मेरी मर्जी से हिलता है।"

सितारा ने एक इंच भी पीछे हटने से इनकार कर दिया। उसने वीर के चेहरे को ऐसे देखा जैसे कोई बेहद मामूली चीज देख रही हो।

"गाड़ी पर नंबर प्लेट भारत सरकार की लगी है, मिस्टर राजावत," सितारा ने उसकी आंखों में सीधी नजर गड़ाए हुए कहा, "और यह सड़क पब्लिक प्रॉपर्टी है। आपकी कोई खानदानी जागीर नहीं है कि आपको देखकर लोग नालियों में कूद जाएं। शहर से डिग्री लेकर आए हो ना? तो थोड़ा सलीका और कानून भी सीख लेते, तो शायद पता होता कि बीच सड़क पर किसी के ऊपर ऐसे धूल उड़ाना मर्दानगी नहीं, गुंडागर्दी होती है।"

वीर अवाक रह गया। इस लड़की को कैसे पता कि वह शहर से पढ़कर आया है? और यह तेवर... यह लड़की कौन है?

वीर ने गुस्से में अपनी मुट्ठी को इतना कसकर भींचा कि उसकी नसें उभर आईं। "एक लफ्ज और बोला ना, तो इसी सड़क पर तुम्हारा यह सारा घमंड मिट्टी में मिला दूंगा।"

सितारा के होठों पर एक तीखी, बेखौफ हंसी आ गई।

"धमकियां उन लोगों को दिया कीजिए जो आपके नाम से डरते हैं, मिस्टर राजावत। मेरे पास फालतू बकवास सुनने का वक्त नहीं है।"

सितारा ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखी। उसे बापू तक पहुंचना था। उसने वीर को ऐसे नजरअंदाज किया मानो वह हवा हो, और उसके कंधे से थोड़ा सा बचते हुए तेजी से आगे निकल गई।

"ए लड़की! बात खत्म नहीं हुई है मेरी!" वीर पीछे से दहाड़ा। उसकी आवाज में पागल कर देने वाला गुस्सा था।

सितारा ने मुड़कर भी नहीं देखा। बस चलते-चलते ही उसने अपनी उंगली पीछे हवा में उठाई, "मेरे लिए खत्म हो चुकी है। अपने इस राजावत वाले ड्रामे को अपनी हवेली के चार कमरों तक ही रखिए।"

वीर वहीं सड़क के बीचों-बीच खड़ा रह गया। उसका पूरा शरीर गुस्से से जल रहा था। उसके सीने में पहली बार किसी ने ऐसी चिंगारी सुलगाई थी, जिसकी तपन उसके दिमाग तक पहुंच रही थी।

मंगलू गाड़ी से उतरकर सहमे कदमों से उसके पास आया, "भै... भैया, ये... ये कौन थी? गांव की तो नहीं लग रही..."

वीर ने मुड़कर मंगलू की कॉलर पकड़ ली, उसकी आंखें अंगारे जैसी लाल थीं। "शाम तक... सिर्फ आज शाम तक मुझे इस लड़की का नाम, इसका घर और इसका खानदान पता होना चाहिए। समझ आया?"

"जी... जी भैया!" मंगलू थरथरा उठा।

वीर ने कॉलर झटकी और गाड़ी की तरफ बढ़ा। लेकिन गाड़ी में बैठते वक्त भी, उसकी नजरें दूर तक जाती उस लड़की की पीठ पर टिकी थीं।

उधर पगडंडी पर मुड़ते हुए सितारा के चेहरे पर एक सख्त, लेकिन मुकम्मल चमक थी। उसने हाथ में पकड़ी दवा को मजबूती से पकड़ लिया।

'वीर सिंह राजावत... तुम्हारे खानदान ने मेरे बापू का सिर झुकाया था ना? अब देखना, तुम्हारा यह घमंड मैं इसी मिट्टी में कैसे मिलाती हूं।'

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