Chaand baavdi ki Pyaas - Chapter 3
अगली सुबह
अलार्म पाँच बजे बजा। गर्ल्स हॉस्टल में वीरा सबसे पहले उठी। उसने समीरा को उठाया, “उठ, ट्रेन छूट जाएगी!” समीरा झट से उठ बैठी।
बॉयज़ हॉस्टल में आकाश ने अलार्म बंद किया और कहा, “सोने दे यार।”
“भाई, ट्रेन है!” युवराज बोला। लक्ष्य पहले से तैयार था। आखिरकार सब तैयार हो गए।
रेलवे स्टेशन
बैंगलोर रेलवे स्टेशन सुबह-सुबह भी व्यस्त था—चायवालों की आवाज़ें, कुली की भागदौड़ और अनाउंसमेंट की गूँज।
प्लेटफ़ॉर्म नंबर छह पर पाँचों पहुँचे।
समीरा ने एक छोटा-सा मिनी ट्रॉली बैग खींचकर एक तरफ रखा। उसके बैग में पूरे आठ जोड़ी कपड़े (ड्रेसेज़) थे।
वीरा ने उसे एक नज़र देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा; क्योंकि असली सरप्राइज़ तो उसका खुद का सामान था।
वीरा के पास दो बड़े ट्रॉली बैग थे। इसके अलावा एक अलग मेकअप किट, एक अलग शू बैग (जूतों का बैग) और एक बैकपैक उसके कंधे पर टंगा हुआ था। सब कुछ सलीके से रखा हुआ था, लेकिन मात्रा में कम नहीं था।
तभी आकाश, जो अब तक टिकट संभाल रहा था, अचानक मुड़ा और उसकी नज़र सामान के उस ढेर पर पड़ी।
वह दो सेकंड तक चुप खड़ा रहा।
फिर उसने भौंहें उठाईं और बोला, “यह इतना सारा सामान किसका है?”
वीरा बिल्कुल शांत खड़ी थी। उसने बिना किसी झिझक के जवाब दिया, “मेरा।”
आकाश की आँखें और चौड़ी हो गईं, “मज़ाक कर रही हो न?”
वीरा ने बैकपैक का स्ट्रैप ठीक करते हुए कहा, “नहीं, और यह तो बहुत कम है।”
समीरा हँसी रोकते हुए बोली, “हाँ आकाश, इसे जानता नहीं तू? अगर इसे पूरा मौका मिल जाता, तो एक सूटकेस सिर्फ़ स्किनकेयर का होता।”
आकाश ने सिर पकड़ लिया, “कम है? यह कम है? हम रिसर्च के लिए जा रहे हैं या फैशन शो करने?”
तभी युवराज आगे बढ़ा और हँसते हुए बोला, “भाई, तू लड़कियों की पैकिंग पर सवाल मत कर। यह नेशनल इश्यू बन सकता है!”
वीरा ने उसे घूरा, फिर अचानक सब ज़ोर से हँस पड़े। पास खड़े कुछ लोग भी मुड़कर उन्हें देखने लगे।
उसी वक्त ट्रेन की सीटी बजी और अनाउंसमेंट हुआ — “वंदे भारत एक्सप्रेस कुछ ही पलों में प्लेटफ़ॉर्म पर आने वाली है।”
समीरा ने अपने मिनी ट्रॉली का हैंडल पकड़ा। वीरा ने अपने मेकअप बैग को बैकपैक में एडजस्ट किया। आकाश अब भी सिर हिलाते हुए मुस्कुरा रहा था।
उसने फिर युवराज से धीरे से कहा, “लगता है यह सफ़र रिसर्च से ज़्यादा सामान उठाने में निकलने वाला है।”
फिर उसने वीरा का एक ट्रॉली बैग उठाया, युवराज ने दूसरा, लक्ष्य ने भी कुछ सामान उठाया और वे सब ट्रेन में चढ़ गए।
सबको सीट मिल गई और बैग ऊपर रख दिए गए। ट्रेन चल पड़ी।
खिड़की से आती ठंडी हवा और बाहर बदलते नज़ारे—शहर पीछे छूट रहा था। समीरा खिड़की के पास बैठी थी। “यार, सच में जा रहे हैं हम!”
वीरा मुस्कुराई, “हाँ, और इस बार गंभीरता से।”
आकाश बोला, “और मस्ती भी!”
तभी युवराज ने लूडो निकाल लिया।
“चलो भाई, अब असली मुकाबला होगा!” उसने मुस्कुराते हुए कहा। फिर क्या था—हँसी, शोर और तकरार से पूरा डिब्बा उनकी आवाज़ों से गूँजने लगा। आस-पास बैठे लोग भी मुस्कुरा रहे थे।
पता ही नहीं चला कि कब घंटे बीत गए। मस्ती और मज़ाक के बीच सफ़र का लंबा रास्ता जैसे छोटा पड़ गया।
ट्रेन की रफ्तार बढ़ती गई, लेकिन उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि यह सफ़र सिर्फ़ एक असाइनमेंट या ट्रिप नहीं था। राजस्थान की रेत में दबी कुछ कहानियाँ ऐसी भी थीं, जिनका सामना अब इन्हें करना था। उनकी हँसी, उनकी मस्ती, उनका उत्साह—सब धीरे-धीरे एक ऐसे अँधेरे की ओर बढ़ रहे थे, जहाँ से लौटना आसान नहीं होगा। आने वाले दिनों में वे सिर्फ़ पुराने जलाशयों की गहराई नहीं नापेंगे, बल्कि अपने डर की गहराई भी देखेंगे। यह सफ़र उनकी ज़िंदगी का सबसे भयानक वक्त लेकर आने वाला था—एक ऐसा सच, जो शायद उन्हें हमेशा के लिए बदल देगा।
अगले दिन, जयपुर पहुँचते-पहुँचते शाम की धूप हल्की सुनहरी हो चुकी थी। ट्रेन जैसे ही प्लेटफ़ॉर्म पर रुकी, पाँचों ने एक-दूसरे को देखा—“आ गए!”
स्टेशन पर उतरते ही गुलाबी शहर की खुशबू जैसे हवा में घुली हुई थी। कहीं से कचौरी तलने की महक आ रही थी, तो कहीं से केसरिया दूध की खुशबू; और लोगों की बोली में वह मीठा-सा राजस्थानी लहज़ा—“पधारो सा!”
आकाश ने गर्दन घुमाते हुए कहा, “भाई, यह वाइब ही अलग है!”
युवराज हल्का-सा मुस्कुराया, “राम-राम सा, पधारो म्हारे देस!”
सबने हँसते हुए उसे देखा, “ओहो, अब तो पूरा राजस्थानी मोड ऑन हो गया!”
स्टेशन से बाहर निकलकर वे सिटी बस में बैठे। बस की खिड़की से जयपुर का रंग धीरे-धीरे खिलता जा रहा था—गुलाबी रंग की इमारतें, मेहराबदार खिड़कियाँ और पगड़ी बाँधे बुजुर्ग दिखाई दे रहे थे।
समीरा खिड़की से बाहर देखते हुए बोली, “सच में, यह शहर किसी पेंटिंग जैसा है।”
युवराज ने गर्व से कहा, “यह तो बस शुरुआत है।”
वीरा और लक्ष्य भी बाहर के नज़ारों को देख रहे थे।
करीब तीस मिनट बाद बस एक शांत जगह पहुँची। वहाँ चौड़ी सड़कें थीं, दोनों तरफ कतार में खड़े पेड़ थे और बड़े-बड़े हवेलीनुमा घर थे।
युवराज ने सामने इशारा किया, “लो, म्हारो घर!”
सबकी नज़र सामने उठी—एक बड़ा, राजस्थानी शैली का आलीशान घर। बाहर ऊँचा लोहे का गेट था, जिस पर सुनहरी नक्काशी बनी थी। गेट के ऊपर पत्थर में पारिवारिक नाम उकेरा हुआ था। अंदर झाँकते ही एक बड़ा आँगन दिख रहा था।
वीरा ने धीरे से पूछा, “यह... तुम्हारा घर है?”
युवराज मुस्कुराया, “हाँ, घबराओ मत, अंदर आओ।”
गेट खुला। जैसे ही वे अंदर आए, सामने एक विशाल चौकोर आँगन था। बीच में संगमरमर का फ़र्श था और बीचो-बीच तुलसी का एक चौरा था। घर चारों तरफ से कमरों से घिरा हुआ था—ऊपर की मंज़िल पर जालीदार बालकनी और मेहराबदार झरोखे थे।
दीवारों पर हल्का गुलाबी और पीला रंग था, जिन पर पारंपरिक राजस्थानी पेंटिंग्स बनी थीं—घूमर करती महिलाएँ, ऊँट, किले और लोकगीतों के दृश्य।
लक्ष्य ने धीरे से आकाश के कान में कहा, “भाई, यह तो पूरा शाही सेटअप है!”
तभी अंदर से एक मधुर आवाज़ आई—“आ गयो, बेटा?”
युवराज तुरंत सीधा खड़ा हुआ। उसके चेहरे पर अचानक सम्मान और अपनापन उतर आया। दरवाज़े से उसकी माँ बाहर आईं—लाल और हरे रंग की बाँधनी की साड़ी, माथे पर बड़ी गोल बिंदी, हाथों में लाख की चूड़ियाँ और चेहरे पर शांति।
उनके पीछे उसके पिता आए—साफ़-सुथरा कुर्ता-पाजामा, कंधे पर हल्का-सा अंगोछा और आँखों में गरिमा।