THE ROYAL C.M - Chapter 3
लॉ गर्ल्स हॉस्टल
सुबह के सात बज रहे थे, हॉस्टल के कमरे में खिड़की से हल्की धूप छन कर आ रही थी। बाहर आँगन में चिड़ियों की चहचहाहट के साथ किसी के गुनगुनाने की धीमी आवाज़ भी घुल रही थी।
कमरे में एक लड़की लाइट ग्रीन कलर का नाईट ड्रेस पहने हुऐ बालो मे मैसी बन बनया हुऐ थी बार-बार अलमारी के नीचे झाँक रही थी, फिर तकिया उठा कर देखती, फिर बेड के नीचे कभी किताबी के अगल कर के तो कभी कॉलेज के बैग को ऊपर नीचे कर के । बेड पर बैठी एक लड़की उसे देख रही थी, माथे पर हल्की सिकुड़न लिए।
भौंहें सिकोड़ते हुए, हाथ में तकिया थामे दूर हाथ को अपने गाल के पास रखे ये नजारा देखा रही थी कुछ देर बाद बोली "धनी, क्या हुआ यार? क्यों परेशान हो रही है?"
पहेली लड़की ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा, आँखों में हल्की झुंझलाहट।
होंठ भींचते हुए, हाथ कमर पर
श्रीधा:"श्रुति, तुम से कितनी बार बोला है। मेरा नाम श्रीधा है, धनी नहीं। क्यों मेरा अच्छा-खासा नाम बिगाड़ती रहती है?"
श्रुति:[हल्का मुस्कुराते हुए, कंधे उचका कर] "हाँ हाँ, जो भी है। पर तू बता, क्यों परेशान है? दस दिन से रोज़ यही काम कर रही है तू।"
श्रीधा धीरे से बेड पर आ कर बैठ गई, नज़रें अपने पैरों पर टिक गईं।
नज़रें नीचे झुकाए, आपमें पेरो को देखते हुऐ, एक हाथ से बेड की चदर की मुट्ठी मे भींच कर आवाज़ में हल्का भारीपन के आवाज मे बोली
श्रीधा:"हाँ... तू सही कह रही है। पर क़्या करी दिल नहीं मानता झूठ जानती है न की मेरी एक पायल मिल नहीं रही। तुझे पता है ना, वो मेरी माँ की आख़िरी निशानी थी।"
श्रुति:धीरे से उसका हाथ थामते हुए "हाँ, पता है मुझे। पर अब क्या करें? दस दिन से ढूँढ रही है, नहीं मिली तो क्या करें मिलन होता तो मिल जाती। मुझे तो लगता है, वो उसी दिन कॉलेज में कॉम्पिटिशन वाले दिन कहीं गिर गई होगी।"
श्रीधा: खोये हुऐ "हम्म्म्म ... उसी दिन से नहीं मिल रही।"
ये कहते-कहते श्रीधा की आँखों के सामने अचानक वो स्टेज घूम गई राम का हाथ बढ़ाना, ट्रॉफी थमाना, और वो हैंडशेक। दिल की धड़कन एक पल को जैसे ठहर सी गई थी। एक अजीब से आकर्षण था या कोई चुंबक थी जो उसे राम की ओर सम्मोहित कर रही थी...
आँखें दूर कहीं खोई गई थी , होंठों पर हल्की सी अनजानी मुस्कान आ गई
वो पल जैसे फिर से जी उठी राम की वो आँखें, वो रोब, वो हाथ। उस के आसपास की दुनिया जैसे धुंधली हो गई थी।
श्रुति:*उसे हिलाते हुए "क्या हुआ? कहाँ खो गई? चल, निकलना है ना हमें। तुझे पता है ना आज उसके घर जाना है।"
श्रीधा जैसे नींद से जागी।
श्रीधा:"हाँ हाँ, मे अभी नहान कर आती हूँ । "
श्रुति हाँ... जल्दी कर लेट हो रहा है।"
ठाकुर हवेली, सुबह
हवेली के मंदिर में घंटियों की मधुर आवाज़ गूँज रही थी, धूप-अगरबत्ती की खुशबू पूरे आँगन में फैली हुई थी। सूरज की पहली किरणें संगमरमर के फर्श पर सुनहरी लकीरें बना रही थीं।
जिम से लौट कर, नहा कर धोती पहन ऊपर दुपट्टा लिया वो कामदेव से काम नहीं लग रहा था। राम सीधा मंदिर पहुँचा। शिवलिंग पर जल चढ़ाते हुए उस की आँखें बंद थीं, चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता, ओर मन अशांत था।
आँखें बंद, हाथ जोड़े, माथे पर हल्की सिलवटें
राम: "हे महादेव... आज मुझे उस लड़की से मिला दीजिए। उस छम-छम से। नहीं तो शायद बहुत कुछ बदल जाएगा... शायद पूरे यूपी में ही तबाही आ जाए। और वो मैं नहीं चाहता।"
हाथ जोड़ कर उसने आँखें खोलीं, एक गहरी साँस ली, और कमरे की तरफ बढ़ गया।
कुछ ही देर में वो तैयार होकर बाहर आया सफेद कुर्ता, उस पर काली जैकेट, काली जींस, एक हाथ में घड़ी, दूसरे में रुद्राक्ष के तीन-चार ब्रेसलेट जिनमें त्रिशूल और डमरू झूल रहे थे। कंधों तक झूलते बाल सँवारे हुए, चेहरे पर वही रोबीला आत्मविश्वास।गले के एक चेन जिस मे तुपुण्ड का पेडल लटक रहा था।
बाहर आँगन में अम्मा पूजा की थाली लिए खड़ी थीं।
थाली थामे, माथे पर स्नेह भरी मुस्कान
अम्मा ने राम को तिलक किया। राम ने झुक कर उनके पैर छुए, अम्मा ने विजय भव का आशीर्वाद दिया फिर बुआ जी के भी प्रणाम किया। सदा ख़ुश रहो....
तभी अर्जुन भी वहाँ आ पहुँचा।
अर्जुन:"भाई, चलें?"
बुआ जी: [हाथ पर हाथ मारते हुए] "कहाँ चले? पहले नाश्ता तो कर लो!"
अर्जुन: [मुस्कुराते हुए] "हाँ मेरी प्यारी माँ पहले पेट पूजा फिर काम दूजा।"
फिर भी दोनों भाइयों ने जल्दी-जल्दी नाश्ता किया। राम ने अम्मा से पूछा।
[भौंहें उठा कर पूछते हुए]
राम: "अम्मा, बाबू जी गए क्या?"
अम्मा: "हाँ बेटा, तुम्हारे बाबू जी तो बड़े भाई साहेब के साथ ही जल्दी ही निकल गए थे। तुम जा रहे हो ना?"
राम:" क़्या ताऊ जी भी गए है। लम्बी सास लेते हुऐ तो अम्मा, अब हम भी निकल जाते है। "
राम और अर्जुन हवेली से बाहर निकले, गाड़ी की तरफ बढ़ते हुए।
अर्जुन:[माथे पर हाथ मारते हुए] "यार, वो जो चल बसे ना... मामा जी के दोस्त... उन का नाम क्या था यार? याद ही नहीं आ रहा।"
राम रुका, एक पल सोचा।
माथे पर हल्की सिलवट, याद करने की कोशिश में
राम:"रघुनाथ शर्मा जी। बाबूजी के बचपन के दोस्त थे।"
अर्जुन: "हाँ हाँ, वही। कुछ हों झोल है उस मे कुछ समझ नहीं आ रहा। खैर चलो भाई, ग्यारह बजे पहुँचना है।"
दोनों गाड़ी में बैठे, और हवेली के बड़े फाटक से बाहर निकल गए।
राम गाड़ी चलते हुऐ सामने ही देखते हुऐ बोला क़्या झोल लगा रहा है तुम की उस मे....
अर्जुन:- कुछ सोचते हुऐ पता नहीं भाई पर कुछ के गड़बड़ है। हम ने अपने आदमी लगाए हुऐ है। पता चल जायगे।
राम के चेहरे पर कोई एक्सप्रेशन नहीं थे वह बोला ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा जो भी हो हमें बताना।
अर्जुन हम्म भाई आप को तो सब से पहले बताएंगे। वैसे भी यूपी में कुछ हो और आप को पता ना चले ऐसा तो हो ही नहीं सकता बोलते हुए वह हल्का सा मुस्कुरा दिया।
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एक तरफ श्रीधा अपनी खोई हुई पायल और एक अनजान एहसास में उलझी है, दूसरी तरफ राम महादेव से उसी लड़की से न मिलने की अर्ज़ी कर चुका है। और क़्या आज दोनों की राहें टकराने वाली हैं। क्या आज आख़िरकार राम को मिलेगी उसकी छम-छम?
आप का एक कमेंट मेरे लिए अवार्ड से कम नहीं है .
अगर ठाकुर राम प्रताप सिंह की ये कहानी आप को पसंद आ रही है ,तो
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ज़रूर कीजिये .
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To be counties......
PRIY@NKA BAGANI.....