आवेश 1
एक कमरे में
सुबह की किरणें आधे खुले परदों से छनकर कमरे के फर्श पर सुनहरी धारियाँ बिखेर रही थीं।
आईने के सामने, शान्तनु शर्मा — जिसे सब प्यार से शान कहते हैं — अपनी सफ़ेद कॉटन की शर्ट के बटन लगा रहा था। करीब छह फुट लंबा, चौड़े कंधे, गेहुँआ रंग, और गहरी भूरी आँखें जिनमें हमेशा हल्की-सी शरारत तैरती रहती थी। उसके बाल हल्के-से बिखरे हुए थे, जैसे अभी-अभी नहाकर आया हो।
पीछे से अचानक एक गर्माहट भरी बाँहों ने उसे थाम लिया।
“गुड मॉर्निंग कहे बिना जा रहे हो?” — आवाज़ धृति की थी, नींद-भरी फुसफुसाहट के साथ।
धृति, उसकी पत्नी, उससे लगभग पाँच इंच छोटी, पतली कद-काठी की, गोरी-गुलाबी रंगत और आँखें बादामी आकार की हल्की हेज़ल रंग की थी। उसके घने, कमर तक आते काले बाल सुबह की रोशनी में चमक रहे थे। आज उसने हल्के नीले रंग का कॉटन नाईट सूट पहना था, बाल बस उँगलियों से सँवारे हुए। उसके चेहरे पर नींद और मुस्कान का प्यारा सा मिश्रण था।
वो मुस्कुराया, ज़रा सा मुड़कर उसके होंठों के कोने पर एक किस कर लिया। “गुड मॉर्निंग, मिसेज़ शान्तनु शर्मा।”
धृति हँस पड़ी, उसकी पकड़ और कसते हुए। “अब ठीक है। अब जाओ अपनी बहुत ज़रूरी मीटिंग्स में।”
इस बार शान ने उसे ढंग से किस किया जब तक उसने हँसते हुए उसके कंधे पर हल्के से मारा नहीं। “लेट हो जाओगे,” उसने कहा, लेकिन उसके चेहरे का ब्लश तो कुछ और ही बता रहा था।
शादी को बस एक साल हुआ था, लेकिन शान ने मोमेंट्स बनाने की कला में महारत पा ली थी — चाय बनाते समय एक किस, बाज़ार जाते वक्त उसका हाथ हल्के से छू लेना, या खाने की मेज़ पर मम्मी-पापा की बातचीत के बीच उसे टीज़िंग स्माइल पास करना।
श्रवण जी और तुलसी जी, धृति को अपनी बेटी की तरह चाहते थे। उन्होंने शान और अपने छोटे बेटे साहिल की परवरिश बड़े प्यार और सख़्ती के संतुलन से की थी। अब, अपने बेटे को उसकी पत्नी के साथ देखकर, वे अक्सर संतोष-भरी नज़रों से एक-दूसरे को देखते। ।
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एक शाम
तुलसी जी रसोई में पुराने गीत गुनगुनाती हुई, श्रवण जी अख़बार ऊँची आवाज़ में पढ़ते हुए, और धृति फर्श पर पालथी मारकर बैठी थी, जबकि शान उसके सब्ज़ी काटने के अनाड़ीपन पर हँसी-मज़ाक कर रहा था।
थोड़ी देर बाद, धृति, तुलसी जी की अलमारी से एक पुरानी रेसिपी की किताब पलट रही थी। “माँ, आप जैसा बैंगन का भरता मैंने कभी नहीं खाया। अगले हफ़्ते मुझे सिखाएँगी?”
तुलसी जी मुस्कुराईं। “ज़रूर, बेटा। अब ये तुम्हारी विरासत भी है।”
धृति की आँखें चमक उठीं। “बिलकुल! मुझे हमेशा से इंडियन ट्रेडिशन पसंद रहे हैं, लेकिन शहर में पली-बढ़ी हूँ… गाँव का असली स्वाद कभी नहीं मिला। मैंने न खेत देखे, न पेड़ के नीचे मिट्टी के घड़े से पानी पिया, न किसी मेले में घूमी। सब बस सुना-सुनाया।”
कमरे से बाहर आकर धृति ने कुशन उठाकर शान की तरफ़ फेंका। “इसीलिए हमें तुम्हारे गाँव जाना चाहिए — तुम्हारा पुश्तैनी घर। मैं देखना चाहती हूँ… हमारी रूट्स।”
“हमारी रूट्स?” शान ने कुशन कैच करके कुर्सी पर पीछे टिकते हुए कहा। “वहाँ बस पुराने घर और कुछ भेड़-बकरियाँ होंगी। एक घंटे में बोर हो जाओगी।”
“ऐसा कुछ नहीं होगा,” उसने ज़िद से कहा। “वहाँ इतिहास होगा, लोग होंगे जो तुम्हारे परिवार को याद करते होंगे… कहानियाँ जो यहाँ किसी ने तुम्हें नहीं सुनाईं। शान, तुम्हें जानना नहीं है?”
वो थोड़ा रुका, उसकी आँखों की चमक देखते हुए। सच तो यह था कि उसने कभी इस बारे में सोचा ही नहीं था। माँ, पापा और साहिल ही उसकी पूरी दुनिया थे। फिर भी, यह ख़याल मन में कहीं अटक गया।
धृति — “और हाँ, साहिल को भी साथ ले चलेंगे। उसके बिना मन नहीं लगेगा।”
शान — “वाह! वो साथ होता है तो घर सर पर उठा लेते हो दोनों, उसके साथ बनती नहीं है… लेकिन उसके बिना मन नहीं लगेगा।” (उसकी बात पर धृति ने मुँह बना लिया) “ठीक है। वो अपनी कॉलेज ट्रिप से वापस आ जाए, उसके बाद चलेंगे।”
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अगली शाम
सब साथ खाने बैठे थे। श्रवण जी जब गिलास में पानी डाल रहे थे, शान ने सहजता से पूछा, “बाबा, हमारा गाँव कौन-सा है?”
सवाल ने हवा को थाम लिया। श्रवण जी का हाथ आधे में ही रुक गया। तुलसी जी ने थाली से नज़र उठाई। साहिल ने भी चुपचाप शान की तरफ़ देखा।
“क्यों?” श्रवण जी ने पूछा।
शान से पहले धृति बोल पड़ी, “हम सोच रहे थे कि वहाँ घूमने चलें! बस एक वीकेंड के लिए। मज़ा आएगा।”
तुलसी जी की मुस्कान मुरझा गई। “वो गाँव घूमने के लिए नहीं है, बेटा। वहाँ… वो जगह सेफ़ नहीं है।”
“क्यों?” धृति ने पूछा।
तुलसी जी ने थोड़ा डरते हुए कहा, “वो गाँव शापित है, वहाँ एक भूत है।”
शान हँस पड़ा। “अरे मा, हर गाँव की अपनी भूतों वाली कहानियाँ होती हैं।”
“ये कहानी नहीं है,” श्रवण जी ने धीमे, लेकिन सख़्त स्वर में कहा। “वहाँ बहुत कुछ हुआ था। और कुछ ताक़तें अब भी वहाँ हैं। हम एक वजह से वहाँ से निकले थे।”
“मुझे ऐसे अंधविश्वासों से डर नहीं लगता,” शान ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा। “और फिर, वो हमारा ही गाँव है।”
श्रवण जी की आँखें गहरी हो गईं। “यही वजह है कि तुम्हें सावधान रहना चाहिए। और कभी-कभी, वो चीज़ें वापस बुला लेती हैं जिन्हें तुम नहीं मिलना चाहोगे।”
इन रहस्यमयी शब्दों ने कमरे में एक अजीब-सी लहर फैला दी।
आख़िरकार उन दोनों के बहुत ज़िद करने पर, श्रवण जी ने आह भरी, गाँव का नाम — कुंडपुर — और वहाँ जाने का रास्ता बताया। उनकी आख़िरी चेतावनी कड़ी और साफ़ थी: “दिन में जाओ। सूरज ढलने से पहले लौट आना। चाहे जो हो।”
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दो हफ़्ते बाद
हल्की-सी ठंडी, लेकिन खिली-खिली धूप में, शान, धृति और साहिल हल्का सामान लेकर निकल पड़े।
साहिल — 23 साल का, दुबला-पतला लेकिन एथलेटिक, गेहुँआ रंग, चेहरे पर हमेशा हल्की दाढ़ी और शरारती मुस्कान रहती थी। कॉलेज के स्पोर्ट्स क्लब में होने की वजह से उसका हाव-भाव फुर्तीला था। उसकी गहरी आँखों में हमेशा कोई न कोई मज़ाक पलता रहता था, और बाल हल्के बिखरे रहते, जैसे समय ही न मिला हो उन्हें सँवारने का।
धृति और साहिल पूरे रास्ते उत्साह से भरे रहे — खिड़की से झुककर खेतों को देखना, पीतल के घड़े उठाए औरतों को हाथ हिलाना, बार-बार तस्वीरें लेना।
“ये तो कमाल है,” धृति ने दसवीं बार कहा।
“भाभी, अब मेरी इतनी भी तारीफ़ मत करो।” — साहिल ने हँसते हुए कहा, जिस पर धृति ने नकली गुस्से में आँखें घुमाईं। शान बस मुस्कुरा रहा था।
लेकिन जैसे-जैसे वे कुंडपुर के क़रीब पहुँचे…
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क्या हुआ कुंडपुर पहुंचते ही?
आगे जानने के लिए पढ़ते रहिए हमारी कहानी - ✨आवेश✨!
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