राजा और रूरू 2
राजसभा किसी विशाल गुफा की भाँति थी, जहाँ दमघोंटू गर्मी और निराशा से भरी फुसफुसाहटें तैर रही थीं। सभा भवन की भव्यता किसी का भी साहस तोड़ने के लिए पर्याप्त थी। सिर के ऊपर सफेद संगमरमर के ऊंचे मेहराब (arches) आकाश को छूते प्रतीत होते थे, जिन पर सोने और नीलम की बारीक कारीगरी की गई थी। फर्श इतना चमकदार था कि उस पर चलते हुए व्यक्ति को अपना प्रतिबिंब (अक्स) दिख सकता था। हॉल के किनारों पर लगे विशाल स्तंभों पर व्याल और हाथियों की मूर्तियाँ उत्कीर्ण थीं, जो अपनी पत्थर की आँखों से न्याय की गुहार लगाने आए लोगों को घूर रही थीं। ऊंची रोशनदानों से आती धूप की किरणें धूल के कणों के साथ मिलकर एक धुंधली परत बना रही थीं, जिससे ऐसा प्रतीत होता था मानो पूरा दरबार किसी पुराने रहस्यमय जाल में लिपटा हो।
वहाँ सैकड़ों लोग एकत्रित थे—वे किसान जिनकी भूमि सूखे से गई थी, वे व्यापारी जिन्हें युद्ध के करों (taxes) ने निचोड़ दिया था, और वे माताएँ जिन्होंने अपने उन शिशुओं को छाती से लगा रखा था जो इतने दुर्बल थे कि रो भी नहीं पा रहे थे।
तभी, विशाल द्वार खुले। वह आवाज़ कोई धमाका नहीं थी, बल्कि पत्थर पर लकड़ी के रगड़ने की एक धीमी सी आवाज़ थी।
उद्घोषक ने नाम की घोषणा की: "अश्वपति! गजपति! नरपति! महारथी! अतिरथी! शाल्वाधीश महाराज दुष्यंत पधार रहे हैं......।" उसने अपने सुनहरे राजदंड को संगमरमर के फर्श पर तीन बार पटका। ठक। ठक। ठक।
फुसफुसाहटें तुरंत शांत हो गईं। पूरे हॉल में ऐसा गहरा सन्नाटा छा गया कि ऊंची खिड़कियों पर फड़फड़ाते एक पक्षी की आवाज़ भी बादलों के गरजने जैसी सुनाई देने लगी।
महाराज दुष्यंत प्रकाश में कदम रखते हुए आगे आए।
पीछे के आँगन की चकाचौंध भरी रोशनी के सामने उनका व्यक्तित्व गहरे नीले और सुनहरे रंग की एक डरावनी छाया जैसा लग रहा था। जब वे गलियारे से आगे बढ़े, तो उनके तेज ने उस पूरे स्थान को एक शिकारी के अहंकार से भर दिया। वे लंबे थे—झुके हुए लोगों को तो वे अलौकिक रूप से विशाल लग रहे थे। उनके कंधे चौड़े थे, जिन पर उनकी कढ़ाई वाली अंगरखा किसी कवच की तरह टिकी थी। उनकी त्वचा गहरी चमक भरी श्यामली वर्ण/रंग की है और उनकी मांसपेशियाँ (muscles) हर कदम पर सख्त हो जाती हैं।
उनके पास किसी विलासी राजा जैसा कोमल शरीर नहीं था; उनकी कमर छरहरी और सख्त थी, जिस पर सोने के धागों से बुना हुआ एक पटका बंधा था, जिसमें म्यान लटकी थी। उनका हर कदम नपा-तुला था, एक धीमी गति के शिकार पर झपटने जैसा, जिससे ऐसा लगता था मानो संगमरमर का फर्श उनके वजन से अभी टूट जाएगा।
उनकी आभा (aura) किसी ठंडी लहर की तरह थी। यह एक शारीरिक दबाव था, एक ऐसा बोझ जो कमरे में मौजूद हर व्यक्ति के सीने में जम गया था, जिससे गहरी साँस लेना भी किसी अपराध जैसा महसूस होने लगा। दुष्यंत से किसी क्रोधी व्यक्ति की गर्मी नहीं निकलती थी; उनसे एक ग्लेशियर जैसी कुचल देने वाली ठंडक का अहसास होता था। उन्होंने भीड़ को अपनी प्रजा के रूप में नहीं, बल्कि बाधाओं के एक समूह के रूप में देखा।
सभा की प्रतिक्रिया अत्यंत भयावह थी। किनारे पर खड़े सैनिकों की कतारें सीधी तन गईं, उनकी आँखें दूर की दीवारों पर टिकी थीं, वे राजा से नजरें मिलाने के विचार मात्र से आतंकित थे। वृद्ध महामंत्री ने महसूस किया कि उनके घुटने जवाब दे रहे हैं, और उनकी उंगलियाँ रेशमी वस्त्रों पर थरथरा रही थीं।
साधारण लोग, जो कुछ ही देर पहले अपनी शिकायतें दोहरा रहे थे, अब अपने माथे झुकाए हुए थे। उन्होंने ऊपर नहीं देखा। वे सहज रूप से जानते थे कि दुष्यंत की नज़र में आने का अर्थ है—मिट जाना। उनके (दुष्यंत) लिए, कोई शिकायत करना कमजोरी स्वीकार करना था, और कमजोरी एक ऐसा अपराध था जिसे वे कभी क्षमा नहीं करते थे।
दुष्यंत ऊँचे सिंहासन के पास पहुँचे। वे सीढ़ियों पर चढ़े, उनका हाथ अपनी तलवार की मूठ पर किसी प्रेमी के स्पर्श की तरह टिका था।
ऊपर पहुँचकर, वे मुड़े। उनके माथे पर लगा श्वेत तिलक—जो संरक्षक (विष्णु) का प्रतीक 'U' था—एक क्रूर विडंबना जैसा लग रहा था। उस क्षण में, वे किसी राजा के बजाय पाताल लोक के किसी देवता की तरह लग रहे थे जो दिन के उजाले में भटक कर यहाँ आ गया हो।
वे तुरंत नहीं बैठे। वे एक लंबे, कष्टदायी मिनट तक वहीं खड़े रहे, उनकी गहरी, काली आँखें झुके हुए सिरों के समुद्र को जाँच रही थीं। उन्होंने सन्नाटे को तब तक खिंचने दिया जब तक कि वह लोगों के कानों में एक चीख न बन गया।
"आरंभ करो," उन्होंने कहा।
उनकी आवाज़ धीमी थी, मखमल जैसी कोमल लेकिन कठोर, जो हॉल के सबसे दूर के कोनों तक गूँज गई। उसमें कोई आमंत्रण नहीं था, दया का कोई वादा नहीं था। यह महज़ एक जाल के बंद होने की आवाज़ थी।
पहला याचिकाकर्ता, एक थरथराता हुआ अनाज व्यापारी, अपने हाथों और घुटनों के बल रेंगता हुआ आगे आया। उस आदमी का माथा पसीने से तर था, उसकी आवाज़ राजा के उस विशाल, दमनकारी सन्नाटे के सामने एक दयनीय चीख जैसी लग रही थी।
"बोलो," दुष्यंत फुसफुसाए, उनकी आँखें सिकुड़ गईं। "और प्रार्थना करो कि तुम्हारे शब्द उस हवा के योग्य हों जिसे तुम उन्हें बोलने में बर्बाद कर रहे हो।"
दोपहर तक सभा की व्यवस्था स्थिर हो चुकी थी। याचिकाएँ समाप्त हो चुकी थीं। दंड दिए जा चुके थे। शांति पुनः स्थापित हो गया था।
महाराज दुष्यंत सिंहासन पर तनकर बैठे थे, उनकी एक भुजा सिंह की आकृति वाले हत्थे पर हल्के से टिकी थी। वह इस प्रकार सुन रहे थे मानो सुबह की किसी भी घटना ने उनके शासन की लय में कोई व्यवधान न डाला हो।
महामंत्री आगे बढ़े। वे एक वृद्ध व्यक्ति थे, जो अपने शब्दों और अपनी साँसों, दोनों के प्रति सावधान रहते थे। दुष्यंत के अधीन बिताए वर्षों ने उन्हें सिखा दिया था कि सटीकता ही जीवित रहने का एकमात्र मार्ग है।
"महाराज," उन्होंने गहरा झुककर प्रणाम करते हुए कहा, "एक निमंत्रण आया है।"
दुष्यंत की दृष्टि उनकी ओर मुड़ी।
"एक सामूहिक निमंत्रण," महामंत्री ने अपनी बात जारी रखी। "कलिंग, अवंती, मालव और वत्स राज्यों की ओर से। शाल्व को पाँचवें राज्य के रूप में नामित किया गया है।"
सभा में एक फुसफुसाहट की लहर दौड़ गई। पाँच राज्य। संयुक्त संधियाँ दुर्लभ थीं। खतरनाक भी और लाभदायक भी।
"उद्देश्य?" दुष्यंत ने पूछा।
"शांति और व्यापार," महामंत्री ने उत्तर दिया। "साझा मार्ग। कम आयात शुल्क। आपसी सैन्य अनाक्रमण।"
उन्होंने एक नपी-तुली साँस ली और आगे कहा, "शाल्व के राजकोष को होने वाला अनुमानित लाभ काफी बड़ा है। केवल अनाज का आयात ही तीन वर्षों के लिए दामों को स्थिर कर देगा। लोहे तक पहुँच, बिना विस्तार के हमारे शस्त्रागार को मजबूत कर देगी।"
दुष्यंत बिना किसी भाव के सुनते रहे। लाभ उन्हें आकर्षित करता था, लेकिन स्थिरता उन्हें अधिक प्रिय थी।
"और निमंत्रक/यजमान?" उन्होंने पूछा।
"कलिंग, महाराज। उनकी राजधानी।"
दुष्यंत ने अपनी उंगली सिंहासन के हत्थे पर एक बार पटकी।
"एक ही कक्ष में पाँच राजा," उन्होंने धीमे स्वर में कहा। "इतने सारे शासक किसी डर के बिना एकत्र नहीं होते।"
"सत्य है," महामंत्री सहमत हुए। "किंतु भय दुधारी तलवार है। अस्वीकार करना हमें अलग-थलग कर देगा।"
अलगाव विद्रोह को जन्म देता है। दुष्यंत यह जानता था।
"कब?" उसने पूछा।
"सभा सात दिनों में शुरू होगी। यात्रा कल से ही प्रारंभ करनी होगी।"
दुष्यंत ने एक बार सिर हिलाया और कहा, "हम कल प्रातः प्रस्थान करेंगे।"
दरबार में राहत की एक लहर दौड़ी, जिसे तुरंत दबा दिया गया।
महाराज अपने सेनापति (सुमंत्र) की ओर मुड़े, "सेनापति।" वह व्यक्ति तुरंत आगे बढ़ा, उसका कवच चमक रहा था और मुद्रा एकदम सख्त थी।
"तुम हमारे साथ चलोगे," महाराज ने कहा। "रक्षकों का चयन करो।"
सेनापति सुमंत्र आधे पल के लिए हिचकिचाया, फिर झुककर बोला, "जैसी आपकी आज्ञा।"
महामंत्री ने धीरे से साँस छोड़ी। "हम सारी व्यवस्थाएँ कर देंगे।"
"सुनिश्चित करना कि तुम कर लो," दुष्यंत ने उत्तर दिया। "यदि यह संधि विफल होती है, तो इसका कारण शाल्व नहीं होगा।"
पूरे दरबार ने एक साथ झुककर अभिवादन किया।
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अगले दिन
सुबह सुबह शाल्व के द्वार खुल गए।
महाराज, कुछ मंत्री, सेनापति और मुट्ठी भर सैनिक पीले आकाश के नीचे बाहर निकल रहे थे। नगर ने बंद दरवाजों और झरोखों के पीछे से उन्हें देखा, वे चयन नहीं कर पा रहे थे कि वे राहत महसूस करें या भय।
दुष्यंत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह शायद ही कभी ऐसा करते थे।
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