जीने के लिए Ch. 1

बाल्यस्मृति

Posted by Storymania Classic Hindi • Sep 03, 2026 06:45 AM

१

बाल्यस्मृति

“चाचा, पालागी; चाची, पालागी”—सुचित सिंह ने लौटू सिंह और उनकी स्त्री का पैर छूकर कहा।

“खुश रहो, बच्चा सुचित, कहो, कुशल-आनंद से तो रहे?”—लौटू सिंह ने स्नेहभरी दृष्टि से देखते हुए अपने भतीजे को आशीर्वाद दिया।

“सब आनंद है, चाचा!”

“कलकत्ता का हाल-चाल क्या है? रोजी-रोजगार तो ठीक है न? तुम्हारी कुछ तरक्की हुई भैया?”

“हाँ, तीन साल बाद अबकी एक रुपया बढ़ा। चावल-दाल महँगा है, इसलिए महँगाई का दो रुपया और मिलता है। क्या पूछते हैं, चाचा, यहाँ रामपुर में क्या दुनिया-जहान की खबर मिलती है। कलकत्ता में रोज संसार भर की खबर आती है, और कागज छप-छपकर दो-दो, चार-चार पैसे में बिकता है। आजकल दो बादशाहतों में कचवाबध लड़ाई हो रही है। रूस, जापान दो बड़े-बड़े बादशाह आपस में जूझ रहे हैं।”

“कहो बाबू, यह कहाँ से दो नई बादशाहतें पैदा हुई हैं? आज तक हमने उनका नाम भी नहीं सुना। हम तो जानते थे कि उदय से अस्त तक अंग्रेज-बहादुर का ही राज है!”

“नहीं, चाचा, दुनिया में और भी बादशाहतें हैं। रूम-सूम, चीन-बिल्लाइत, जर्मनी-फ्रांस—कुल अठारह बादशाहतें। कलकत्ता में सब बादशाहतों के आदमी रहते हैं। जापान और रूस की बड़ी बादशाहतें हैं। और क्या कहें, चाचा, मुझको तो जानते ही हो, घर में पढ़ने-लिखने का बेशी मौका नहीं मिला। पुलिस में भरती होकर भी अधिक नहीं सीखा। लेकिन मेरी ड्यूटी चौरस्ते पर रहती है। पास में एक तमोली की दूकान है। है तो तमोली, लेकिन रोज दो पैसे का कागज मँगाता है। मैं कहता हूँ—‘कहो सुमंगल! क्या खबर है?’ वह रोज रूस-जापान की खबर सुनाता है। सुन-सुनकर अचरज होता है।”

“ऐसा! क्या खबर सुनाता है?”

“बन्दूक की लड़ाई, तोप की लड़ाई, यह तो सुनते ही आ रहे हैं। वहाँ समुन्दर की लड़ाई भी बड़े जोर से हो रही है। समुन्दर में जहाज नाव की तरह लकड़ी का नहीं होता, सब लोहे का होता है। उस पर बड़ी-बड़ी तोपें लगी रहती हैं। बाहर का लोहा चार अंगुल मोटा होता है, मजाल है, तोप के गोले का असर हो। तोप का गोला! यदि एक गोला रामपुर पर पड़े, तो डेढ़ सौ घर में से किसी घर के ऊपर न एक खपड़ा बचे, न एक प्राणी।”

“उसका लोहा बड़ा जबर्दस्त है न बाबू, और कितनी अकिल! अकिल का तो सब खेल है।”

“हाँ, चाचा, समुन्दर में पानी के ऊपर-ऊपर दोनों ओर जहाजों की तोपें चलती हैं। समुन्दर के भीतर भी लड़ाई होती है। जापान बड़ा हुसियार है। हुसियारी में तो वह अंग्रेज, रूस सबका कान काटता है। उसने एक पनडुब्बी जहाज निकाला है, और पानी के भीतर चलने वाली बारूद भी। जहाँ रूस के दो-चार जहाजों को देखा कि वह अपनी पनडुब्बी छोड़ देता है। उसमें सिर्फ पाँच आदमी बैठते हैं, और वह पानी के भीतर-भीतर जाती है। ऊपर-ऊपर चले तब न दिखाई पड़े! बस यही समझो कि दस कोस से पानी के भीतर ही भीतर चली आती है, और जहाँ रूस के पाँच-छै जहाज खड़े मिले, वहीं आकर ऊपर उतर आती है। फिर लगते हैं आगे-पीछे, दाहिने-बाएँ गोले छूटने। क्या किसी को सँभलने का मौका मिलता है? चुटकी बजाते-बजाते सब डूब जाते हैं।”

“ऐसा युद्ध तो कथा-पुरान कहीं पर नहीं सुना। और वह पाँच जने जो पनडुब्बी के भीतर रहते हैं?”

“वे तो जीव संकलप करके आते ही हैं। जापान की एक पनडुब्बी और रूस के पाँच जहाज—और हरेक जहाज में हजार-हजार सिपाही!”

“एक-एक जहाज में हजार-हजार सिपाही!”

“अरे, वह जहाज क्या नाव है? एक-एक जहाज में दो-दो गाँव बस सकते हैं! कलकत्ता में, खिदिरपुर में बड़े-बड़े जहाज आते हैं। मैंने देखा है, चाचा, वह देखने ही से बनता है; यहाँ कहने से कौन विश्वास करेगा?”

“तो बाबू, कौन जीतता है?”

“जापान। समुन्दर में उसने रूस को हरा दिया, अब तो धरती पर लड़ाई है। वहाँ भी रूस भागता जा रहा है, और जापान खदेड़ रहा है। कलकत्ता में लोग जापान की जीत से बड़े खुश हैं।”

“काहे बाबू?”

“जापान भी हिंदुस्तानियों की ही तरह काला आदमी है, और रूस है गोरा; इसीलिए हिंदुस्तानी लोग बड़े खुश हैं। कहते हैं—देखो, गोरे लोग समझते थे कि काले आदमी कायर होते हैं। कायर तो नहीं होते, किन्तु क्या करें! अंग्रेजों के अधीन हैं; अब वे जो कहें, सो ही न सच! लेकिन, शाबाश जापान! उसने काले लोगों की लाज रख ली।”

“अच्छा तो बाबू, जापान काला आदमी है?”

“हाँ, कलकत्ता में मैंने देखा है। जापानी ठीक नेपाली लोगों की तरह होते हैं। तुम तो चाचा, बाबा पशुपतिनाथ का दर्शन कर आए हो न?”

“हाँ, बाबू, नेपाली हम लोगों से थोड़ा नाटे होते हैं, और मुँह पर उनके मूँछ-दाढ़ी कुछ कम होती है।”

“ठीक वैसे ही। लड़ाई खतम होने को है। कलकत्ता से जब मैं चला, तब वह आखिर पर पहुँची हुई थी। अंग्रेज और दूसरे लोग सुलह करवाने में लगे हैं।”

लौटू सिंह ने सुचित सिंह की बातों को बड़े गौर से सुना। सुचित लौटू सिंह के बड़े भाई के चार लड़कों में से सबसे छोटे थे।

लौटू सिंह के बाप के पास चार एकड़ खेत था। बाप के मरने पर जब दोनों भाई अलग हो गए, तो एक-एक के हिस्से में दो-दो एकड़ खेत आया। बड़े भाई दुक्खी सिंह का परिवार बड़ा था—चार लड़के और चार लड़कियाँ। बड़ी गरीबी थी। लेकिन अब चारों के चारों लड़के कलकत्ता में नौकरी करते हैं। तीन पुलिस में, एक पैटमैन। अब दो कौर अन्न के लिए उनको कोई तकलीफ नहीं। पहिले बाप की गरीबी के कारण मुश्किल से बड़े लड़के की शादी हो पाई थी; और वह भी न हो पाती, यदि एक बहन को देकर ब्याह का इन्तिजाम न किया गया होता। लौटू सिंह की शादी न कोई करने आया और न बाप की ओर से कोई उतनी कोशिश ही हुई। लौटू सिंह अलग हो गए। उनके पास दो एकड़ खेत था, बेचने पर दो सौ रुपया मिलता। उतने खेत से उनका अपना काम भी नहीं चलता। वह एक साहू के पास प्यादा का काम करते थे। खाना, साल में दो जोड़ा कपड़ा और रुपया महीना—यही तनखाह थी। सूद के तकाजा के लिए लोगों के पास उन्हें जाना पड़ता था और शील-संकोच दिखलाने के लिए महीने में एक-डेढ़ और उन्हें ऊपर से मिल जाते थे। लौटू सिंह नकद रुपये में से एक पैसा भी खर्च नहीं करते थे। साहू के यहाँ सूद की दर बड़ी कड़ी थी। डेढ़-दो रुपया सैकड़ा (माहवार) से कम पर वह कर्ज देते न थे। साहू उधार वसूल करने में बड़े कड़े थे। जहाँ वादा से बेवादा हुआ कि झट नालिश हुई। दस-बारह साल नौकरी करने के बाद, चालीस साल की उम्र में तीन सौ रुपया दे, लौटू सिंह ने आठ साल की लड़की राधा को मोल लेकर शादी की।

अट्ठारह बरस के हो जाने पर भी जब घर में लड़का नहीं हुआ, तो उन्हें बड़ी चिंता हुई—निर्वंश हो जाने की चिंता उतनी नहीं, जितना कि यह खयाल करके कि बुढ़ापे में नाव कौन खेवेगा। दोनों प्राणियों ने बड़ी-बड़ी मिन्नतें मानीं। गाजी मियाँ को मलीदा और मसानी माई को सुअर का छौना माना गया। तब जाकर, इक्यावन बरस की उम्र में, लौटू सिंह के लड़का पैदा हुआ। नाम रक्खा गया देवराज। लौटू सिंह के वंश में पढ़ने-लिखने का रिवाज नहीं था, लेकिन साहू के लड़कों को पढ़ते-लिखते देखकर उनका भी मन ललचाया।

देवराज इस समय पाठशाला की दूसरी श्रेणी में पढ़ता था, और सदा अपने दर्जे में अव्वल रहा करता था। जापान और रूस का नाम उसने भी सुन रखा था, लेकिन उसके लिए युद्ध का समाचार उड़ती खबर थी। अध्यापकों की प्रथम तो तनख्वाह ही सात-आठ रुपये होती थी, जिससे तीन रुपये का अखबार लेना उनके लिए आसान काम न था। फिर उनको अखबार पढ़ने का कोई शौक भी न था। अपने पिता के बगल में बैठा देवराज सुचित सिंह की बातों को बड़े गौर से सुन रहा था। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह रूस-जापान के युद्ध के सम्बन्ध में बाप-माँ से अधिक जान सकता था।

सुचित सिंह का कायदा था कि जब घर आते, तो चाचा के लिए भी कोई न कोई भेंट की चीज लेते आते। अबकी बार उन्होंने दो नारियल भेंट किए। बातचीत के बाद सुचित सिंह चले गए; लौटू सिंह ने गँड़ासे से नारियल को काटा। ताजी गरी थी। एक टुकड़ा देवराज की तरफ बढ़ाते हुए कहा—“बचवा, देखो ज्यादा न खाना, नहीं तो पेट में दर्द होगा।”

पार्वती खेलने गई थी। उसके लिए एक टुकड़ा रखकर लौटू सिंह ने बाकी नारियल राधा को देकर कह दिया कि बच्चों को ज्यादा मत देना।

100%