सियासत-ए-इश्क़ (His political bride) Ch. 3

सियासत-ए-इश्क़ (His political bride) - Chapter 3

Posted by Jahnavi Sharma • Sep 02, 2026 09:47 PM

अपने पापा के खिलाफ जाने का फैसला सिया के लिए आसान नहीं था, लेकिन फिर भी जो हालात चल रहे थे उन्हें देखकर सिया ने रमेश काका की बात मानकर पृथक के घर जाना तय किया।

सिया अपने दुपट्टे में पेन ड्राइव बांधकर दौड़ रही थी। आज उसे अपने पापा से नहीं बल्कि उनकी पोजीशन से डर लग रहा था, जिसके बारे में बाकी लोग बात कर रहे थे। सिया आगे बढ़ ही रही थी कि तभी पीछे से तेज आवाज सुनाई दी।

“लड़की को कुछ नहीं होना चाहिए, उसे जिंदा पकड़ना है। याद रखना पेन ड्राइव उसके पास है।” वह रंजीत की आवाज थी, जो अपने आदमियों को सिया के पीछे जाने से पहले निर्देश दे रहा था।

सिया नंगे पांव दौड़े जा रही थी। उसका ड्रेस उसे भागने में मुश्किल पैदा कर रहा था। कानों में बार-बार रंजीत की आवाज गूंज रही थी, जब उसने उसे जिंदा पकड़ने और पेन ड्राइव का जिक्र किया था।

दौड़ते हुए सिया ने पीछे पलट कर देखा। कुछ आदमी हाथ में टॉर्च लिए उसके पीछे आ रहे थे।

“पापा ऐसे नहीं हो सकते हैं। हां, वह ऐसे नहीं हैं। जरूर इन लोगों ने किया है। अगर पापा को पता चला तो वह इन्हें सजा देंगे। फिलहाल मेरा इनसे बचाना ज्यादा जरूरी है।” सिया भागते हुए खुद को यह तसल्ली दे रही थी कि उसके पापा गलत नहीं हैं।

सिया मानवेंद्र पर यकीन करने की कोशिश कर ही रही थी कि तभी कुछ ऐसी आवाज आई, जिसने उसके यकीन को एक पल में तोड़ दिया था।

“वह ज्यादा दूर नहीं भाग पाई होगी, जल्दी ढूंढो उसे। मंत्री जी ने साफ कहा है कि पेन ड्राइव पहले चाहिए, रही बात लड़की की, तो रोने-धोने का दिखावा वह बाद में कर लेगी।”

इसी के साथ सिया को एक बड़ा झटका लगा। उसके भीतर कुछ टूट कर गिर गया था। क्या आज वह अपने पापा की बेटी नहीं रही थी? वह बस एक लड़की बन गई थी, जिसके पास पेन ड्राइव थी। इसी के साथ उसे एहसास हुआ कि मानवेंद्र जानते हैं कि उनके आदमी सिया के पीछे भाग रहे थे।

सच्चाई का एहसास होते ही वह अंदर ही अंदर टूट गई थी। वह झाड़ियों के पीछे छुप गई थी। खुद का रोना काबू करने के लिए उसने अपने मुंह को कसकर दोनों हाथों से दबा लिया था। उसे कांटे चुभ रहे थे, पर उससे ज्यादा तकलीफ उसे उनकी बातें सुनकर हो रही थी।

झाड़ियों में छुपा हुआ कुत्ता उसे देखकर भोंकने लगा था, जिसे देखकर सिया डर कर जोर से चिल्लाई।

“वह रही लड़की, जल्दी पकड़ो उसे!” इसी के साथ एक आदमी की आवाज आई।

उनसे बचकर भागने के चक्कर में उसका घुटना टकरा गया था। फिर भी उसने खुद को संभाला और भागने लगी। आज वह रुक नहीं सकती थी। सड़क के किनारे पहुंचकर सिया सांस लेने लगी। इसी दौरान उसकी नजर एक ऑटो ड्राइवर पर पड़ी, जो अपने ऑटो को रोक कर आराम कर रहा था।

“भैया! भैया, प्लीज मुझे जोधपुर रोड जाना है, मेरी हेल्प कीजिए।” सिया ने रोते हुए उसके सामने हाथ जोड़ लिए थे।

ऑटो ड्राइवर ने एक नजर सिया की तरफ देखा। वह ठीक नजर नहीं आ रही थी। उसके कपड़े मिट्टी से सन गए थे और कुछ जगह से फटे हुए भी थे। बाल बिखरे हुए थे, आंखों में आंसू थे और हाथों में खून लगा था।

“मैडम, यह क्या हालत है आपकी? आपको...” ऑटो ड्राइवर उसे समझाने लगा, पर सिया के पास इतना टाइम नहीं था।

वह जल्दी से बोली, “मुझे अभी जाना है, प्लीज मेरी हेल्प कीजिए। मैं आपको डबल फेयर दे दूंगी।”

“रात को 2:00 बजे आपको जोधपुर रोड जाना है, कहीं पुलिस-पुलिस का मामला तो नहीं है ना?” वह घबरा गया था।

उसे सिया जिस हालत में मिली थी, उसके बाद कोई भी उसे सीधे अपने ऑटो में बिठाने से घबरा जाता।

ऑटो ड्राइवर की आड़ में वह छुप तो गई थी, लेकिन ज्यादा देर तक नहीं छुप सकती थी। सिया ने झूठ बोलने की कोशिश की, “घर पर झगड़ा हो गया है।”

अभी भी उसे सिया की बात पर यकीन नहीं हो रहा था। सिया ने घबरा कर दूसरी तरफ देखा, तो उसे गाड़ियों की रोशनी सड़क पर आई हुई दिखाई दी।

“जल्दी कीजिए भैया, अगर आप मुझे नहीं लेकर गए तो वह लोग मुझे मार देंगे।” आखिरकार सिया के मुंह से सच निकल ही गया था और वह जल्दी से गाड़ी में बैठ गई थी।

ऑटो ड्राइवर के चेहरे का रंग बदल गया था। वह गरीब आदमी था, लेकिन सिया की आंखों में छुपे डर को महसूस कर सकता था।

उसने जल्दी से ऑटो स्टार्ट किया और पीछे की तरफ झांक कर देखा। कई गाड़ियां और लोग उसके पीछे आ रहे थे, लेकिन वह कुछ पल के लिए रुक गए थे। शायद वह उसे वहां पर ढूंढ रहे थे, उन्हें ऑटो ड्राइवर पर शक नहीं हुआ।

आखिरकार सिया ने राहत की सांस ली, लेकिन वह राहत कुछ ही देर की थी।

“जोधपुर रोड पर आपको कहां जाना है मैडम?” ऑटो ड्राइवर ने पूछा।

सिया ने रमेश काका का दिया हुआ कागज खोलकर देखा और जवाब में बोली, “पुरानी पत्थर फैक्ट्री के पास।”

ऑटो ड्राइवर चुप हो गया था। सिया को समझ नहीं आया कि अचानक उसके चेहरे के भाव बदल क्यों गए थे। सिया ने घबराकर पूछा, “क्या हुआ? आप कुछ बोल क्यों नहीं रहे?”

“वहां आज रात राठौड़ साहब की कोई रैली वगैरह है। बहुत सारे पुलिस और लोग होने वाले हैं, आप वहां क्यों जाना चाहती हैं?” ऑटो ड्राइवर ने बताया।

सिया के पास कोई जवाब नहीं था। वह जिसे राठौड़ साहब कह रहा था, वह पृथक सिंह राठौड़ था। उसने फोन पर, समाचारों में और अपने पापा के मुंह से यह नाम काफी बार सुना था। उसके पापा यही कहते थे कि वह आदमी बहुत खतरनाक है, युवाओं को भड़काता है, जनता को झूठ बोलता है और सत्ता को पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। सिया ने हमेशा अपने पापा की बात मानी थी।

अगर रमेश काका ने मरते वक्त उस आदमी का नाम नहीं लिया होता, तो सिया उसके पास जाने के बारे में सोचती तक नहीं।

“वह मेरे पापा का दुश्मन है।” सिया ने थूक निगला। यह कहते हुए उसे कितनी तकलीफ हो रही थी, यह उसके शब्दों से जाहिर हो रहा था।

“परिवार के दुश्मन के पास जा रही हैं, तो कोई कारण ही रहा होगा। कई बार जो सच सामने से दिखता है, वह असल में सच नहीं होता है।” ऑटो ड्राइवर ने जवाब दिया।

सिया आगे कुछ नहीं बोली। धीरे-धीरे वह आगे बढ़ रहे थे। वह हवेलियां और रोशनी पीछे छूट गई थी। आगे की सड़कें सुनसान होने लगी थीं। कहीं-कहीं पर पुलिस की जीप खड़ी थी, उन्हें देखकर सिया डर से सिकुड़ी जा रही थी। उसे यह डर लग रहा था कि कहीं कोई उसे पहचान ना ले। उसने चुपके से पेन ड्राइव निकाल कर देखा।

सिया मन ही मन बोली, “क्या इसमें सचमुच कुछ ऐसा है जो पापा को लोगों के सामने गिरा सकता है? और अगर इसमें पापा के खिलाफ कुछ था, तो उन्होंने अपने पास कमरे में क्यों रखा था? उन्होंने इसे किसी सेफ जगह पर क्यों नहीं छुपाया? हो सकता है कि उन्हें फंसाया जा रहा हो, पर वह आदमी ऐसा क्यों बोल रहे थे कि पापा जानते हैं कि वह मेरे पीछे आ रहे हैं?”

सिया बुरी तरह कंफ्यूज हो गई थी। उसके अंदर की मासूमियत आज भी जिंदा थी, जो अपने पापा पर भरोसा करती थी। अचानक ऑटो रुका, तो सिया को होश आया।

“मैडम, आगे रास्ता बंद है। रैली की वजह से बैरिकेड्स लगाए हुए हैं।” ऑटो ड्राइवर ने बताया।

सिया ने ऑटो से बाहर झांक कर देखा। थोड़ी ही दूरी पर लोगों की भीड़, झंडे और हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी। पुलिस और निजी सुरक्षाकर्मी खड़े थे। वहां उनके नारों की आवाज सुनाई दे रही थी।

सिया समझ गई थी कि उसे यहां पर उतरना पड़ेगा। उसने अपने कानों से एक झुमका उतारा और ऑटो ड्राइवर की तरफ बढ़ाकर कहा, “मेरे पास पैसे नहीं हैं, आप इसे रख लीजिए।”

“यह क्या कर रही हैं आप मैडम? मेरी बेटी की तरह हैं आप और मुसीबत में मदद करनी चाहिए, बस अपना ख्याल रखिएगा।” ऑटो ड्राइवर ने वह लेने से साफ इनकार कर दिया था।

उसे देखकर सिया कह सकती थी कि आज भी इंसानियत जिंदा थी। उसकी आंखें नम हो गई थीं। वह धीरे से बोली, “थैंक यू भैया।”

सिया ऑटो से उतर आई थी। आगे का रास्ता उसे अकेले तय करना था। जैसे ही वह नीचे उतरी, उसके घुटनों में दर्द होने लगा। उसने अपने कपड़ों को संभाला और भीड़ की तरफ बढ़ दी थी। उसके लिए एक-एक कदम उठाना मुश्किल साबित हो रहा था। उसके पापा की आवाज, रमेश काका की आखिरी बातें और रंजीत की धमकियां उसके दिमाग में गूंज रही थीं।

आगे पहुंचकर उसने देखा, मंच पर कोई नहीं था। लोग इंतजार कर रहे थे, तभी भीड़ में से किसी ने कहा, “राठौड़ साहब बस आने ही वाले हैं।”

सिया भीड़ के किनारे रुक गई थी। उसे लगा कि वह किसी ऐसे दरवाजे पर खड़ी है, जिसके बाद वह अपनी पुरानी जिंदगी में कभी नहीं लौट पाएगी।

भीड़ के किनारे खड़े होकर उसने अपने हाथों की तरफ देखा। उसे चोट लगी थी, पर अब वह दर्द पूरी तरह शून्य सा पड़ गया था। रमेश काका की आखिरी आवाज अभी भी उसके दिमाग में घूम रही थी। वह यही चाहती थी कि काश यह एक डरावना बुरा सपना हो, वह आंखें खोले और उसके पापा के जन्मदिन का केक उसके सामने हो, उसकी मां उसे डांट रही हो।

लेकिन यह उसके भ्रम के अलावा और कोई नहीं था। भीड़ में पृथक के नाम की गूंजती आवाज ने उसे होश में ला दिया था।

सिया ने चारों तरफ देखा। कुछ गरीब मजदूर थे, कुछ कॉलेज के लड़के, कुछ औरतें जिनकी आंखों में उम्मीद थी। वह सब पृथक का नाम ऐसे पुकार रहे थे, जैसे वह उनकी आखिरी उम्मीद हो। सिया को यह अजीब लग रहा था। उसके घर से जनता हमेशा दूर रहती थी। लोग आते थे, आशीर्वाद देते थे, फोटो खिंचवाकर चले जाते थे। यहां का माहौल पूरी तरह अलग था, जो सच्चाई के करीब था।

“मानवेंद्र सिंह मुर्दाबाद, मुर्दाबाद!” भीड़ में नारे लगने लगे थे, जिसे सुनकर सिया का दिल जोर से धड़कने लगा था।

उसने अपने कानों को बंद करना चाहा। ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसके पापा पर नहीं, सीधे उस पर इल्जाम लगा रहा था। वह भीड़ में चिल्ला कर यह कहना चाहती थी कि उसके पापा बुरे नहीं हैं, पर कुछ घंटे पहले भी उसकी दुनिया पूरी तरह बदल गई थी।

“अगर पापा निर्दोष है तो मैं उन्हें बचाऊंगी और अगर वह कसूरवार हैं तो...” सिया आगे की लाइन बोल तक नहीं पा रही थी। उसके पापा के खिलाफ खड़ा होना उसके लिए सच में मुश्किल था।

सिया ने खुद को मजबूत किया और अपने कदम आगे बढ़ाना ही चाहा कि किसी ने उसके हाथ को कसकर पकड़ लिया था। उसने पीछे पलट कर देखा, तो रंजीत साक्षात मौत की तरह उसके पीछे खड़ा था।

“भगाना बंद कीजिए सिया बिटिया, मंत्री जी बहुत परेशान हैं। घर चलिए।” रंजीत ने तिरछी मुस्कुराहट के साथ कहा और इसी के साथ सिया का लिया गया फैसला उसके लिए सबसे बड़ी गलती साबित होने वाला था।

उसका दिल इस वक्त फटकर बाहर आने को तैयार था। वह हार नहीं मानना चाहती थी। सिया ने अपने डर को काबू किया और भीड़ में जोर से चिल्लाई;

“पृथक सिंह राठौड़...”

अचानक भीड़ शांत हो गई थी और मंच की अंधेरी सीढ़ियों पर एक साया आकर ठहर गया था। वह कोई और नहीं, खुद पृथक था।

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भाई, सिया ने आज सच में हिम्मत दिखाई होगी, लेकिन यह हिम्मत कितनी कामयाब होगी, यह पृथक पर डिपेंड करता है। फाइनल हमारे हीरो की एंट्री हो गई है। जो हीरो है या विलेन, वह आपको समझ आ जाएगा। पढ़कर समीक्षा कर दीजिएगा। अगले पार्ट पर मिलते हैं।

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