हसीन चेहरा - Chapter 2
चाय सर्व करते हुए भाभी ने गौर से उस का चेहरा देखा।
"नगीन ज़रा बात सुनना ।" वह उसे साथ लिए अम्मी की तरफ आई। उन्होंने दरवाजा बन्द किया। अम्मी पहले से वहां मौजूद थी।
"नगीन चन्दा! क्या बात है कोई बात हुई है असद से?" उन्होंने नर्मी से उस का हाथ थामा। उन के पूछने पर वह फूट फूट कर रोने लगी। उस के रोने पर अम्मी परीशान हो गयीं।
"नगीन बेटा! सब खैरियत है ना?" उन के ज़हन में हजारों अन्देशे सरसराने लगे ।
"नहीं है खैरियत । बोझ थी ना मैं आप पर आप ने उतार कर फेंक दिया।" आंसू साफ करते हुए वह बोली।
जब कि दूसरी तरफ वह हैरान रह गयीं।
"यह क्या कह रही है तू?"
"ठीक कह रही हूं मैं उस शख़्स में क्या देखा आपने वह मेरे काबिल है। बेटियां क्या इतनी बोझ होती हैं। आप मां हो कर बेटी की ख़्वाहिश नहीं समझ सकीं। मेरे सब ख़्वाब आप ने चकना चूर कर दिए। सब मिट्टी में मिला दिया आप ने।"
"नगीन चन्दा! ऐसे नहीं कहते मां बाप हमेशा अच्छा ही सोचते हैं बच्चों के लिए।" भाभी ने उसे पुचकारा ।
"आखिर मुझ में क्या कमी थी जो मुझ को इस तरह उस शख्स के हाथ पकड़ा दिया। जिस को देखना भी मुझे कबूल नहीं। नफरत है मुझे उस से उसकी सूरत से।"
"बस करो नगीन बहोत बोल लिया तुम ने यह कोई खेल तमाशा नहीं है शादी हुई है तुम्हारी। अब जो भी है कम्प्रोमाइज़ करने की कोशिश करो। अशद दिल का बहुत अच्छा है। बहुत ख्याल रखेगा वह तुम्हारा। इज्ज़त देगा तुम्हे।" अम्मी ने उसे समझाने की कोशिश की।
"नहीं रखना मुझे उस अच्छे इंसान के साथ में वहां नहीं जाऊंगी !
तो फिर मेरी एक बात गौर से सुन लो । अगर तुम ने कोई ऐसी वैसी हरकत की तो तुम मेरा मरा मुन्ह देखोगी।" वह खामोश निगाहों से अपनी अम्मी को देखे गई।
अगले दिन नगीन बुरी तरह रोते हुए वह वापस गई थी।
""मुझे उस के साथ इतनी सख्ती से पेश नहीं आना चाहिए था।" अम्मी ने खुद को मलामत की।
"न जाने अब क्या कर डाले।" जाते हुए जो उस की आंखों में नफरत थी उसने उन्हें दहला दिया ।
"अम्मी क्या बात है आप कुछ परीशान हैं?" राफेआ कमरे में आई तो सास को परीशान देख कर उन से पूछा।
"वह अस्ल में नगीन की वजह से दिल परीशान है।"
"अरे अम्मी आप फिक्र न करें। वह बेवकूफ नहीं है। वह ऐसा कुछ नहीं करेगी जैसा आप सोच रही हैं। उस ने उन्हें मुतमइन करना चाहा ।
"आप फिक्र न करें अशद उसे संभाल लगा। अल्लाह ने चाहा तो सब ठीक होगा।"
सुबह वह चुप चाप गाड़ी में आ बैठी और फिर तमाम रास्ता खामोश बैठी रही , असद ने उसे तिरछे नजर से उसे देखता रहा !
घर पहुंच कर गाड़ी से उत्तर कर वह असद के पीछे चली आई।उसे देखते ही उस की सास ने मुहब्बत से उसका माथा चूमा, जब कि सुसर ने शफ्कत से उस के सर पर हाथ रखा।
उसकी दो नंदे थी और दोनों शादीशुदा। दूसरे लफ्जों में अव उस घर पर उस का राज था।
"हाए भाभी पता है आप के बगैर तो घर कितना उदास सा हो गया था। आप के आने से कितना रौशन हो गया है।" उस की छोटी नन्द रिदा ने उसका हाथ पकड़ मुस्कुराते हुए कहा !
"निदा बेटा! भाभी थकी होंगी आराम करने दो बाकी बातें कल कर लेना।" उन के इस तरह कहने पर वह शुक्र का कलमा पढ़ती वहां से भागी थी।
वह अहद की वजह से भी वहां से उठना चाह रही थी। जो सामने बैठा पलक झपके बगैर उसे देखे जा रहा था।
उस ने भारी बुन्दे नोच कर उतारे उसने निहायत बेदर्दी से बालों में से पिने निकालीं तभी अहद ने कमरे में कदम रखा। एक लम्हे को उस का हाथ रुका और एक बार फिर से उस के हाथ चलने लगे। वह धीरे से चलता हुआ उस के सामने रुक गया ।
"क्यों इतनी बेदर्दी से बालों को खराब कर रही हो? यह काम आराम से भी तो किया जा सकता है।" नर्मी से उस का हाथ पकड़ कर उसने पिनें खुद से निकालना शुरु कर दीं। थोड़ी ही देर में उस ने वह काम कर दिया। नगीन को उसकी नज़रों से उलझन सी हुई तो वह वहां से उठी थी। अहद ने मुस्कुराती नज़रों से उसे देखा। चन्द लम्हे वह बेमकसद अलमारी खोले खड़ी रही।
"अब क्या मसअला है आखिर मैंने क्या किया है?" मुस्कुराती नज़रों से उसने पूछा !
आप कुछ ओर नहीं कर सकते , वह उसे अपनी बात समझा नहीं पा रही थी ,
अच्छा क्या करूं उसका दिल कर रहा था उसे तंग करने का
आप कुछ भी करें मगर मुझे तंग न करे प्लीज, ना गवरी से कहते वो वॉशरूम चली गई वह बाहर निकली तो वह कमरे में नहीं था !
खामोशी से उसने कम्बल उठाया और सोफे पर लेट गई। परसों भी कमर अकड़ गई थी। एक तरफ सोए हुए कम्बल खुद पर लपेटे हुए उस की नज़र सामने पड़ी ।
"बड़ी सी तस्वीर में उसे लगा वह मुस्कुरा रहा है। एक तो पता नहीं किस जाहिल ने बिल्कुल सामने लगा दिया । उस ने नफरत से सोचा और चेहरा दूसरी तरफ मोड़ लिया। वह बहुत नर्म मिज़ाज था और सीधा सादा इन्सान इन दो दिनों में तो उसे इतना अन्दाजा हो गया था।
"लेकिन उस के बावुजूद मुझे उस से नफरत है और मुझे नहीं रहना।" इन्हीं सोचो में घिरी वह कब सो गई पता नहीं चला था ।
सुबह उस की आंख बहुत जल्दी खुल गई थी और बहुत कोशिशों के बाद उसे नीन्द नहीं आ रही थी। उस ने तकिया पटखा और कम्बल हटा कर उठ खड़ी हुई। बाहर निकलते हुए उस ने एक नज़र सोए हुए अहदं पर डाली। वह गहरी नीन्द में था। वह दरवाजा खोल कर बाहर आ गई। हर तरफ खामोशी थी, फिर कुछ सोच कर वह वापस कमरे में आ गई और खामोशी से सोफे पर बैठ गई। उस ने सोए हुए अहद को गौर से देखे हुए नतीजा निकाला।
"अजीब शख्स है कोई शिकवा नहीं न ही उस के र्वय्ये पर कोई शिकायत ।" वह उसे देख कर रह गई। वह सोचों में घिरी हुई थी जब दरवाजे पर दस्तक हुई। उस ने. दरवाजा खोला तो निदा खड़ी थी हंसती हुई।
"हैलो भाभी! आप उठ गयीं।"
"भाई शायद सो रहे हैं। आप उन्हें जगा दें मैं आप का नाश्ता लाती हूं।" इतना कह कर निदा दरवाजे से ही पलट गई ,
"अब जगाऊं कैसे?" उसने अहद की तरफ कदम बढ़ाते हुए मन ही मन सोचा !
To be continued