Daddy Obsession - Chapter 1
रात के ठीक आठ बजे...
शहर के सबसे आलीशान फाइव-स्टार होटल "द इम्पीरियल क्राउन" की ऊपरी मंज़िल रोशनी से जगमगा रही थी। शीशे की ऊँची दीवारों से पूरा शहर नीचे तारों की तरह चमकता दिखाई दे रहा था।
आज यहाँ देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों की प्राइवेट बिजनेस पार्टी रखी गई थी।
महँगे सूट, विदेशी परफ्यूम की खुशबू, हाथों में क्रिस्टल ग्लास और करोड़ों के सौदों पर चलती धीमी आवाज़ों वाली बातचीत...
लेकिन जैसे ही हॉल का मुख्य दरवाज़ा खुला...
पूरा माहौल कुछ पल के लिए थम गया।
टक... टक... टक...
काले चमचमाते इटैलियन जूतों की आवाज़ संगमरमर के फर्श पर गूँज उठी।
करीब छह फीट लंबा, चौड़े कंधे, गठीला शरीर...
ब्लैक थ्री-पीस सूट उसके शरीर पर ऐसे फिट था जैसे खास उसी के लिए बनाया गया हो।
हल्की सफेद होती दाढ़ी उसे उम्रदराज़ नहीं, बल्कि और भी प्रभावशाली बना रही थी।
घने बाल करीने से पीछे सेट थे।
तेज़ जबड़ा...
बर्फ जैसी ठंडी आँखें...
चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं।
उम्र पचास की थी...
लेकिन उसे देखकर कोई भी पहली नज़र में चालीस से ज़्यादा का नहीं कह सकता था।
वह था...
अमर सिंह राजपूत।
भारत की सबसे बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर और डिफेंस टेक्नोलॉजी कंपनी राजपूत ग्लोबल इंडस्ट्रीज़ का मालिक।
कहते थे—
अगर अमर सिंह राजपूत किसी डील में उतर जाए...
तो सामने वाली कंपनी या तो बिक जाती है...
या फिर बाज़ार से गायब हो जाती है।
उसके बारे में एक और बात मशहूर थी।
वह किसी से ऊँची आवाज़ में बात नहीं करता...
क्योंकि उसे कभी उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
उसकी धीमी आवाज़ ही लोगों के लिए आदेश होती थी।
हॉल में मौजूद कई लोग तुरंत अपनी-अपनी जगह से उठ खड़े हुए।
"गुड ईवनिंग, मिस्टर राजपूत।"
"सर..."
"वेलकम..."
अमर ने किसी की ओर देखा तक नहीं।
बस हल्का-सा सिर हिलाया और सीधे आगे बढ़ गया।
उसका पर्सनल असिस्टेंट विकास हमेशा की तरह दो कदम पीछे चल रहा था।
अमर ने बिना उसकी तरफ देखे धीमे स्वर में कहा,
"कल सुबह नौ बजे दुबई वाली मीटिंग फिक्स रहे।"
"जी सर।"
"और वर्मा ग्रुप..."
विकास तुरंत समझ गया।
"उनका प्रपोज़ल रिजेक्ट कर दिया गया है, सर।"
"अच्छा।"
बस एक शब्द...
और बात वहीं खत्म।
तभी पार्टी के होस्ट, मशहूर उद्योगपति राघव मल्होत्रा, मुस्कुराते हुए उनकी तरफ बढ़े।
"आख़िरकार आप आ ही गए, अमर! मुझे लगा आज भी हमेशा की तरह कोई बहाना बना देंगे।"
अमर ने हाथ मिलाया।
"मैं बेकार की जगहों पर नहीं जाता।"
राघव हल्का-सा हँस पड़ा।
"मतलब मेरी पार्टी बेकार नहीं है?"
"अभी तक नहीं।"
इतना कहकर अमर ने पास से गुजरते वेटर की ट्रे से सिर्फ़ मिनरल वॉटर का गिलास उठा लिया।
राघव उसे देखता रह गया।
"तुम्हारी यही आदत मुझे पसंद है... बाकी लोग यहाँ शराब के लिए आते हैं और तुम पानी पीने।"
अमर ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसकी निगाहें पूरे हॉल का एक बार जायज़ा ले रही थीं।
जैसे वह लोगों को नहीं...
उनकी नीयत पढ़ रहा हो।
कुछ देर दोनों बिजनेस की बातें करते रहे।
नई परियोजनाएँ...
विदेशी निवेश...
सरकारी टेंडर...
अरबों के आँकड़े ऐसे निकल रहे थे जैसे कोई किराने का हिसाब हो।
फिर अचानक...
राघव ने हल्की मुस्कान के साथ अपनी उँगलियाँ चटकाईं।
कुछ ही सेकंड बाद...
लाल रंग के बेहद महँगे गाउन में एक बेहद खूबसूरत युवती उनकी ओर बढ़ी।
उसके चेहरे पर आत्मविश्वास था।
वह साफ़ समझ रही थी कि उसे किसके सामने भेजा जा रहा है।
राघव मुस्कुराया।
"अमर... बिजनेस की बातें बहुत हो गईं।"
उसने लड़की की तरफ इशारा किया।
"रिया..."
लड़की ने मुस्कुराकर सिर झुकाया।
"आज की रात तुम्हारी कंपनी रहेगी। तुम चाहो तो इसे शहर घुमा सकते हो... या फिर..."
राघव ने आँख दबाते हुए बात अधूरी छोड़ दी।
"थोड़ा एंजॉय भी कर सकते हो।"
आसपास खड़े दो-तीन बिजनेसमैन मुस्कुराने लगे।
जैसे यह उनके लिए बिल्कुल सामान्य बात हो।
रिया भी हल्की मुस्कान के साथ अमर की ओर बढ़ी।
"गुड ईवनिंग, मिस्टर राजपूत।"
उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
लेकिन...
अमर ने उसका हाथ नहीं थामा।
उसकी ठंडी नज़र बस एक पल लड़की के चेहरे पर गई...
फिर वापस राघव पर टिक गई।
पूरे हॉल में एक अजीब-सी खामोशी फैल गई।
राघव ने हँसते हुए कहा,
"अरे यार... इतनी भी क्या सख्ती? लड़की सिर्फ़ तुम्हारा साथ देने आई है।"
अमर ने बिना किसी भाव के पानी का एक घूँट पिया।
फिर बहुत शांत आवाज़ में बोला,
"ज़रूरत नहीं है।"
बस तीन शब्द।
ना गुस्सा...
ना नाराज़गी...
ना कोई सफाई।
रिया के चेहरे की मुस्कान हल्की पड़ गई।
राघव ने माहौल हल्का करने की कोशिश की।
"कम ऑन, अमर। ज़िंदगी सिर्फ़ बैलेंस शीट नहीं होती। कभी-कभी इंसान को रिलैक्स भी करना चाहिए।"
अमर की आँखें एक पल के लिए उसकी आँखों से मिलीं।
"मैं अपना समय खरीदता हूँ..."
उसने धीमे स्वर में कहा।
"उसे बर्बाद नहीं करता।"
इतना कहकर उसने गिलास पास की मेज़ पर रख दिया।
रिया अब भी वहीं खड़ी थी।
अमर ने उसकी तरफ देखकर सिर्फ़ इतना कहा,
"आप जा सकती हैं।"
उसकी आवाज़ में अपमान नहीं था...
लेकिन दूरी साफ़ महसूस हो रही थी।
रिया चुपचाप वहाँ से चली गई।
राघव ने हैरानी से अमर को देखा।
"पचास साल की उम्र में भी... न शराब, न औरतें, न कोई स्कैंडल। कभी सोचा है लोग तुम्हें क्या समझते हैं?"
अमर के चेहरे पर पहली बार हल्की-सी मुस्कान आई।
लेकिन वह मुस्कान भी ठंडी थी।
"लोग क्या समझते हैं..."
उसने अपना कोट ठीक करते हुए कहा,
"उससे मेरे मुनाफ़े पर कोई फर्क नहीं पड़ता।"
यह कहकर वह मुड़ा और हॉल के एक शांत कोने की ओर बढ़ गया।
उसके पीछे खड़े लोग उसे जाते हुए देखते रहे।
कई लोगों के मन में एक ही सवाल था—
इतना ताकतवर...
इतना अमीर...
इतना आकर्षक आदमी...
फिर भी हर बार ऐसी पेशकश ठुकरा क्यों देता है?
लेकिन उस सवाल का जवाब...
अमर सिंह राजपूत ने आज तक किसी को नहीं बताया था।
अमर ने अपनी कलाई पर बंधी महँगी स्विस घड़ी पर एक नज़र डाली।
"विकास... चलो।"
"जी, सर।"
दोनों बाहर निकलने के लिए मुड़े ही थे कि तभी भीड़ को चीरती हुई एक लंबी, बेहद आकर्षक युवती तेज़ क़दमों से उनकी ओर बढ़ी।
उसकी उम्र मुश्किल से पच्चीस-छब्बीस साल रही होगी।
काले रंग की चमकदार ड्रेस उसके शरीर पर बिल्कुल फिट थी। खुले बाल, लाल लिपस्टिक और चेहरे पर ऐसा आत्मविश्वास मानो उसे यकीन हो कि दुनिया का कोई भी पुरुष उसे मना नहीं कर सकता था।
वह सीधे अमर के सामने आकर रुक गई।
विकास तुरंत सतर्क हो गया।
"मैडम, रास्ता छोड़िए।"
लेकिन लड़की ने उसकी बात अनसुनी कर दी।
उसकी निगाहें सिर्फ़ अमर पर टिकी थीं।
"मिस्टर अमर सिंह राजपूत..."
उसके होंठों पर हल्की मुस्कान उभरी।
"सुना है... आज तक किसी औरत ने आपको अपनी तरफ़ देखने पर मजबूर नहीं किया।"
अमर की आँखों में कोई बदलाव नहीं आया।
वह बस शांत खड़ा रहा।
अगले ही पल...
लड़की ने बिना किसी झिझक के अपने कंधों से जैकेट उतारकर एक तरफ़ गिरा दी।
आसपास खड़े लोगों की साँसें जैसे थम गईं।
कई लोगों ने आश्चर्य से एक-दूसरे की ओर देखा।
हॉल में अचानक फुसफुसाहट शुरू हो गई।
"ये क्या कर रही है?"
"लगता है अमर राजपूत को चुनौती दे रही है..."
लड़की एक कदम और आगे बढ़ी।
उसकी आवाज़ धीमी लेकिन साफ़ थी।
"आज की रात... मैं खुद को आपके हवाले करती हूँ।"
विकास का चेहरा सख्त हो गया।
वह आगे बढ़ने ही वाला था कि अमर ने हल्के से हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
अमर ने लड़की की ओर देखा।
न उसके चेहरे पर लालच था...
न हैरानी...
न आकर्षण।
सिर्फ़ वैसी ही ठंडी, स्थिर नज़र।
कुछ सेकंड तक दोनों के बीच सन्नाटा पसरा रहा।
फिर अमर ने अपना कोट सीधा किया और बेहद शांत स्वर में कहा,
"अपने आत्मसम्मान की कीमत कभी किसी की स्वीकृति मत बनाइए।"
उसकी आवाज़ ऊँची नहीं थी...
लेकिन पूरे हॉल में साफ़ सुनाई दी।
लड़की के चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।
अमर ने बिना एक पल और रुके विकास की ओर देखा।
"चलो।"
"जी, सर।"
दोनों धीमे क़दमों से बाहर निकल गए।
पीछे पूरा हॉल अब भी उसी दिशा में देख रहा था।
किसी को समझ नहीं आ रहा था कि करोड़ों की दौलत, ताक़त और रुतबे वाला आदमी, जिसके सामने लोग खुद अवसर लेकर आते थे... वह हर बार इतनी आसानी से मुड़कर चला कैसे जाता था।
कोई उसका कारण नहीं जानता था—
और अमर सिंह राजपूत भी उसे किसी को बताने वाला नहीं था।