The Billionaire's Promise - Chapter 1
दिल्ली...
बारिश की हल्की-हल्की बूंदें शहर की सड़कों को भिगो रही थीं। शाम के सात बज चुके थे। एयरपोर्ट से निकलती एक काली लग्ज़री कैब तेज़ी से साउथ दिल्ली की ओर बढ़ रही थी।
कैब की खिड़की से बाहर देखते हुए एक लड़की के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान थी।
वह थी...
अन्विका राजवंशी।
पच्चीस साल की अन्विका, राजवंशी ग्रुप की क्रिएटिव डायरेक्टर। पिछले आठ महीनों से वह इटली में कंपनी के सबसे बड़े लग्ज़री होटल प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी। उस प्रोजेक्ट की सफलता के बाद विदेशी कंपनियाँ भी उसके साथ काम करना चाहती थीं।
लेकिन आज...
वह किसी बिज़नेस डील की वजह से खुश नहीं थी।
आज वह अपने घर लौट रही थी...
अपने परिवार के पास...
और सबसे बढ़कर...
उस इंसान के पास, जिसके साथ उसने पूरी ज़िंदगी बिताने के सपने देखे थे।
करण मल्होत्रा।
उसने मुस्कुराते हुए मोबाइल निकाला और करण को वीडियो कॉल की।
रिंग गई...
फिर दूसरी...
फिर तीसरी...
लेकिन कॉल रिसीव नहीं हुई।
अन्विका ने हँसते हुए खुद से कहा,
"मिस्टर बिज़ी... अब घर पहुँचकर ही हिसाब लूँगी।"
उसी समय उसकी बड़ी बहन शनाया का मैसेज आया—
"जल्दी घर आओ। सब तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं।"
अन्विका ने जवाब दिया—
"दस मिनट।"
उसने बैग में रखा छोटा-सा डिब्बा निकाला।
उसके अंदर एक खूबसूरत डायमंड रिंग थी।
आज उसने तय किया था...
अगर करण ने पहले प्रपोज़ नहीं किया...
तो वह खुद कर देगी।
कैब राजवंशी मेंशन के बाहर रुकी।
जैसे ही अन्विका उतरी, उसकी नज़र पूरे घर पर गई।
पूरा बंगला रोशनी से जगमगा रहा था।
फूलों की सजावट...
महँगी गाड़ियाँ...
अंदर से आती हँसी की आवाज़ें...
वह मुस्कुरा उठी।
"लगता है मेरे लिए सरप्राइज़ रखा है।"
गार्ड ने झुककर सलाम किया।
"वेलकम होम, मैम।"
अन्विका तेज़ कदमों से अंदर चली गई।
लेकिन जैसे ही वह ड्रॉइंग रूम के दरवाज़े तक पहुँची...
उसकी मुस्कान अचानक गायब हो गई।
अंदर...
करीब पचास लोग मौजूद थे।
रिश्तेदार...
बिज़नेस पार्टनर्स...
मीडिया...
और बीचों-बीच सजा हुआ स्टेज।
उस स्टेज पर दो लोग खड़े थे।
पहला...
करण।
दूसरी...
शनाया।
दोनों के गले में फूलों की मालाएँ थीं।
करण ने प्यार से शनाया का हाथ थाम रखा था।
अन्विका की साँस जैसे रुक गई।
"ये... क्या..."
उसी समय एंकर की आवाज़ पूरे हॉल में गूँजी—
"आइए, तालियों की गड़गड़ाहट के साथ स्वागत कीजिए... मिस शनाया राजवंशी और मिस्टर करण मल्होत्रा की सगाई का!"
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।
लेकिन...
अन्विका के कानों में सिर्फ़ एक आवाज़ गूँज रही थी।
सगाई...?
उसके हाथ से रिंग वाला डिब्बा नीचे गिर गया।
काँच की तरह उसका दिल भी बिखर गया।
शोर सुनकर सबकी नज़र उसकी तरफ़ गई।
शनाया ने मुस्कुराते हुए कहा,
"अरे अन्वी... तुम आ गई।"
करण ने भी उसे देखा...
लेकिन उसके चेहरे पर न शर्म थी...
न पछतावा...
बस ठंडापन।
अन्विका लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ी।
"करण... ये सब मज़ाक है ना?"
करण चुप रहा।
"कुछ बोलो..."
इस बार जवाब शनाया ने दिया।
"मज़ाक नहीं है, अन्विका। आज हमारी सगाई है।"
"हमारी...?"
अन्विका की आँखों से आँसू छलक पड़े।
"लेकिन करण... तुम तो..."
करण ने उसकी बात काट दी।
"जो था... वो अब नहीं है।"
ये सुनते ही पूरा हॉल जैसे उसके चारों ओर घूमने लगा।
"चार साल..."
अन्विका की आवाज़ काँप रही थी।
"चार साल से तुम मेरे साथ थे..."
करण ने गहरी साँस ली।
"हाँ... लेकिन इंसान की भावनाएँ बदल जाती हैं।"
"तो एक बार बता देते..."
"मैं तुम्हें दुखी नहीं करना चाहता था।"
अन्विका हँस पड़ी।
ऐसी हँसी...
जिसमें दर्द था।
"दुखी नहीं करना चाहते थे...?"
उसने पूरे हॉल की ओर हाथ फैलाया।
"और ये क्या है?"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
तभी उसके पिता महेंद्र राजवंशी आगे आए।
"अन्विका... तमाशा मत बनाओ।"
वह हैरानी से उन्हें देखने लगी।
"पापा... आपको सब पता था?"
महेंद्र ने नज़रें फेर लीं।
"हाँ।"
बस एक शब्द...
और अन्विका का आख़िरी सहारा भी टूट गया।
"मम्मी...?"
उसकी माँ सुनीता बोलीं,
"बेटा... करण और शनाया एक-दूसरे को चाहते हैं। हमें उनकी खुशी देखनी थी।"
"और मेरी...?"
किसी के पास जवाब नहीं था।
अन्विका ने शनाया की तरफ़ देखा।
"दीदी... मैंने आपको अपनी हर बात बताई... अपने हर सपने में आपको शामिल किया... आपने ही..."
शनाया ने बिना शर्म के कहा,
"प्यार और बिज़नेस... दोनों में जो जीत जाए, वही सही होता है।"
ये शब्द तीर की तरह अन्विका के दिल में उतर गए।
करण धीरे से बोला,
"अन्विका... आगे बढ़ जाओ।"
वह कुछ पल उसे देखती रही।
फिर अपने आँसू पोंछे।
और धीमी आवाज़ में बोली—
"ठीक है..."
सबको लगा...
वह हार मान गई।
लेकिन अगले ही पल उसने करण की उँगली से सगाई की अंगूठी उतारी...
उसे उसकी हथेली पर रख दिया...
और बोली—
"आज के बाद...
तुम मेरे लिए मर चुके हो।"
पूरा हॉल स्तब्ध रह गया।
वह मुड़ी...
और बिना पीछे देखे बाहर निकल गई।
अन्विका बिना पीछे देखे राजवंशी मेंशन से बाहर निकल आई।
उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।
आज सिर्फ़ उसका प्यार नहीं टूटा था...
उसका अपने परिवार पर भरोसा भी टूट चुका था।
बारिश अब तेज़ हो चुकी थी।
ठंडी हवाएँ उसके चेहरे से टकरा रही थीं, लेकिन उसके अंदर जो तूफ़ान चल रहा था, उसके सामने ये बारिश कुछ भी नहीं थी।
उसने काँपते हाथों से मोबाइल निकाला।
स्क्रीन पर करण की मुस्कुराती हुई तस्वीर वॉलपेपर बनी हुई थी।
चार साल पहले...
कॉलेज फेस्ट में दोनों की पहली मुलाकात हुई थी।
पहली कॉफी...
पहली लॉन्ग ड्राइव...
पहला "आई लव यू"...
हर याद उसकी आँखों के सामने घूमने लगी।
"सब झूठ था..."
उसने बुदबुदाते हुए तस्वीर डिलीट कर दी।
फिर एक-एक करके करण की सारी तस्वीरें...
सारे चैट...
सारे वीडियो...
सब मिटा दिए।
लेकिन यादें...
वो कैसे मिटतीं?
अचानक उसका फोन बज उठा।
स्क्रीन पर नाम चमक रहा था—
करण मल्होत्रा।
कुछ पल तक वह स्क्रीन को देखती रही।
फिर कॉल रिसीव कर ली।
"अन्विका..."
करण की आवाज़ आई।
"तुम ठीक हो?"
अन्विका हँस पड़ी।
"वाह... अभी भी मेरी फ़िक्र है?"
"मैं सिर्फ़..."
"बस!"
उसने बीच में ही रोक दिया।
"आज के बाद मुझे कॉल मत करना।"
"मेरी बात तो सुनो..."
"चार साल तक सुनती रही हूँ। अब नहीं।"
"आई एम सॉरी..."
"तुम्हारा सॉरी मेरे चार साल वापस ला सकता है?"
दूसरी तरफ़ सन्नाटा छा गया।
अन्विका ने बिना कुछ कहे कॉल काट दिया।
अगले ही पल उसने उसका नंबर भी ब्लॉक कर दिया।
वह सड़क किनारे बने एक बस स्टॉप पर जाकर बैठ गई।
बारिश की वजह से वहाँ कोई नहीं था।
उसका मेकअप बह चुका था।
कपड़े भीग चुके थे।
लेकिन उसे किसी चीज़ की परवाह नहीं थी।
उसी समय...
सड़क के दूसरी तरफ़ एक काली Rolls-Royce Phantom आकर रुकी।
कार का दरवाज़ा खुला।
करीब छह फ़ुट दो इंच लंबा एक आदमी बाहर उतरा।
काले सूट में...
चेहरे पर अजीब-सी शांति...
और आँखों में ऐसी गहराई, जिसमें किसी का भी राज़ छिप सकता था।
उस आदमी ने दूर बैठी अन्विका को देखा।
"सर..."
उसके साथ खड़े असिस्टेंट कबीर ने कहा—
"बारिश बहुत तेज़ है। हमें निकलना चाहिए।"
लेकिन उस आदमी की नज़रें अभी भी अन्विका पर टिकी थीं।
"क्यों रो रही है?"
कबीर ने हल्की नज़र डालकर कहा,
"शायद किसी का ब्रेकअप हुआ होगा।"
उस आदमी ने कुछ नहीं कहा।
बस कार की तरफ़ बढ़ गया।
वह था...
आरिज़ राठौर।
राठौर ग्लोबल होल्डिंग्स का असली उत्तराधिकारी...
लेकिन पूरी दुनिया उसे सिर्फ़ एक साधारण निवेशक समझती थी।
उसकी असली पहचान...
बहुत कम लोगों को पता थी।
जैसे ही कार आगे बढ़ी...
अन्विका अचानक उठी।
उसका सिर चकराया।
दो दिन से लगातार यात्रा और मानसिक तनाव की वजह से उसके कदम लड़खड़ा गए।
उसी समय तेज़ रफ़्तार से आती एक बाइक उसकी तरफ़ बढ़ी।
"मैडम...!"
किसी ने ज़ोर से चिल्लाया।
अन्विका ने मुड़कर देखा...
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
उसी पल...
एक मज़बूत हाथ ने उसकी कलाई पकड़कर उसे अपनी तरफ़ खींच लिया।
बाइक हवा की तरह उनके सामने से निकल गई।
अन्विका सीधे उस अनजान आदमी की बाँहों में आ गिरी।
कुछ सेकंड...
दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए।
बारिश की बूँदें दोनों के चेहरों पर गिर रही थीं।
अन्विका ने पहली बार उसकी आँखों में देखा।
न जाने क्यों...
उन आँखों में एक अजीब-सी शांति थी।
जैसे कोई कह रहा हो—
"अब तुम सुरक्षित हो।"
"आर यू ओके?"
उस आदमी की गहरी आवाज़ सुनकर अन्विका होश में आई।
वह तुरंत उससे अलग हो गई।
"थ... थैंक यू।"
"तुम्हें अस्पताल जाना चाहिए।"
"नहीं... मैं ठीक हूँ।"
आरिज़ ने गौर से उसका चेहरा देखा।
उसकी आँखें सूजी हुई थीं।
ऐसा साफ़ लग रहा था कि वह बहुत देर से रो रही थी।
लेकिन उसने कोई सवाल नहीं किया।
वह दूसरों के ज़ख्म कुरेदने वालों में से नहीं था।
"कबीर।"
"जी सर।"
"मैडम के लिए छाता लाओ।"
कबीर ने तुरंत छाता आगे बढ़ा दिया।
अन्विका ने मना करना चाहा।
"ज़रूरत नहीं है।"
आरिज़ ने शांत स्वर में कहा,
"बारिश में भीगने से दर्द कम नहीं होता... सिर्फ़ बुखार बढ़ जाता है।"
ये सुनकर अन्विका कुछ पल के लिए चुप रह गई।
कितनी अजीब बात थी...
आज पूरे परिवार ने उसकी हालत नहीं समझी...
और एक अनजान इंसान उसकी आँखों का दर्द पढ़ गया।
उसने धीरे से छाता ले लिया।
"धन्यवाद।"
आरिज़ ने हल्की-सी सिर हिलाया और वापस कार की ओर बढ़ गया।
कार का दरवाज़ा बंद हुआ...
और कुछ ही सेकंड में वह वहाँ से चली गई।
अन्विका देर तक उसी जाती हुई कार को देखती रही।
उसे नहीं पता था...
कि अभी-अभी जिससे उसकी मुलाक़ात हुई है...
वही आदमी आने वाले दिनों में उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सहारा बनने वाला है।
और दूसरी तरफ़...
कार के अंदर बैठा आरिज़ भी खिड़की से बाहर देख रहा था।
कबीर मुस्कुराया।
"सर... आपने किसी अजनबी की इतनी फ़िक्र पहली बार की है।"
आरिज़ ने बिना उसकी तरफ़ देखे जवाब दिया—
"कुछ लोग पहली नज़र में अजनबी नहीं लगते..."
कबीर हैरान होकर उसे देखने लगा।
आरिज़ ने आँखें बंद कर लीं।
उसे अंदाज़ा भी नहीं था...
कि किस्मत ने उसकी ज़िंदगी की सबसे मुश्किल कहानी का पहला पन्ना खोल दिया था।
To be continue
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