The Queen's Choice - Chapter 3
क्षणिक मौन होकर आत्रेयी पुनः आगे बोलने लगी
आत्रेयी - जब आप अठारह बर्षीय होगें एंव प्रत्येक दायित्व- कर्तव्य ग्रहण करने के योग्य हो जायेगें तब आपको सकल दायित्व दिये जायेगें एंव हमारा राज्य शीघ्र विपदा से मुक्त हो जायेगा, समझे आप हमारी बातें? (अतीक्ष जो की एकाग्रता से उसकी बातें सुने जा रहा था उसके इस प्रश्न पर उसने हा में सर हिलाया तो वो आगे बोली) तो हमारी इतनी सारी बातों का अर्थ ये है के आपको इतना बिचलीत होने की आवश्यकता नहीं है, बिचलीत होने से कुछ नहीं होगा केवल आपसे आपका बाल्यकाल लुप्त हो जायेगा हमें ये कदापि नहीं चाहते, इस समय आपकी सब कुछ सीखने की, समझ ने की, खेलने की आयु है,, तो इस आयु का इस बाल्यकाल का लाभ उठाये,, समझे राजकुमार अतीक्ष,
आत्रेयी की बातें सुन और समझ अतीक्ष चहरा ऊपर कर सस्मितके संग बोला "हम समझ गयें ज्येष्ठा हमें क्षमा करें हमारे कारण आपको असुविधा हुइ " इसपर आत्रेयी ने उसके बालों को सहला कर कहा "ठीक है हमे असुविधा नहीं हुइ,"
ये सुनकर अतीक्ष पुनः उसके गले लग गया और कहने लगा "आपका धन्यवाद हमें समझने के हेतु आप अत्यंत अच्छी हो आपसे अच्छा कोई नहीं" इतना बोल उसने अपने छोटे छोटे हाथों से आत्रेयी को कसके पकड़ लिया,,
उसे पकड़े आत्रेयी ने आखें बंद कर लिया अतीक्ष की बातें उसके कानों में गुंज रही थी, यशवशं की कही बातें अविराम उसके मस्तिष्क में घुमें जारही थी, वो स्वयं के बिचारों में उलझनें लगी, स्वयं से कुछ कह कर वो अपने बिचारें से बाहर आई, सम्भवतः उसे जो निर्णय लेना था उसने ले लिया,, अव बस उसे महाराज के सम्मुख जाकर ये कहना है,ये सोचते हुये वो मन में कहने लगी "अव किसी को चितिंत होने की आवश्यकता नहीं, ना अतीक्ष को ना पिताश्री को अव हमें जो करना चाहिये हम वो करेंगे",,
स्वयं से ये कह कर और समझ कर वो उस्से अलग हुई और अतीक्ष को चहरे को छुकर बोली "तो पुनः ऐसी नहीं करेंगे आप ठीक है" (उसके प्रश्न पर अतीक्ष ने शीष हिलाया तो वो आगे बोली) हमसे जो सम्भव होगा हम वो सब करेगें चाहे वो जो भी कुछ करना हो उसकी बात पर अतीक्ष ने पलकें झपकाई,
क्षणिक समय के पश्चात, आत्रेयी अभी अपने कक्ष में बैसे ही अपने बिचारों में डुवी बैठी है, इतने क्षण बैठे रहने के बाद वो अपनी जगह से उठी और द्वार की ओढ़ बढ़ गई,,
_______________________
महाराज यशवशं के समक्ष खड़े महामंत्री चंद्रशेखर कुछ कह रहे थे परन्तु महाराज मौन खड़े थे, उन्हें देख महामंत्री चंद्रशेखर कहने लगे "तो क्या आपको ये सौदा स्वीकार है?" ये प्रश्न सुन अपने बिचारों में मग्न महाराज बोले "अब सब राजकुमारी आत्रेयी पर निर्भर करता है " ये सुन महामंत्री चंद्रशेखर ढृढ़ दृष्टि से उन्हें देखने लगे ,,
उसी क्षण दोनों के कानों से एक स्वर आई "पिताश्री" ये सुन यशवशं ने दृष्टि घुमाये देखा आत्रेयी खड़ी थी, उसे देख महाराज का प्रतिक्षा का अंत हुआ, परन्तु व्याकुल वो अब भी है के वो क्या कहेंगी, वो उसे देख बोले "आओं पुत्री" ये सुन आत्रेयी उनके निकट आते हुये हाथ जोड़ बोली "प्रणाम पिताश्री, प्रणाम महामंत्री" इसपर महामंत्री ने भी कहा "प्रणाम राजकुमारी, (एंव महाराज के समक्ष हो कर बोले) महाराज आपकी आज्ञा हो तो हम जाये"
महाराज ने इसपर बस एक शब्द में कहा "अबश्य" इतना सुन महामंत्री सर झुकाये चले गये उनके जाने के पश्चात महाराज आत्रेयी से प्रश्न करने लगे "तो क्या निर्णय लिया आपने? " ये प्रश्न सुन आत्रेयी कुछ क्षणों तक मौन रह एंव गभीर श्वास लेकर बोली "हमें स्वीकार है" उसके ये तीन शब्दों का उत्तर सुन महाराज का चहरा भावहीन हो गया, वो भलिभातिँ के आत्रेयी राज्य के सुरक्षा के हेतु कुछ भी कर सकती है,, कुछ क्षण मौन रह कर महाराज बोले, "हमें जानते है उद्दयन गढ़ की सुरक्षा के लिये प्रजा की सुरक्षा के हेतु आपसे जो सम्भव होगा आप बही करेंगे आपने जो निर्णय लिया सोच बिचार के पश्चात ही लिया होगा, आज से दो दिबस पश्चात आपको केशम्भभुमि के हेतु प्रस्थान होना है"
इतना बोल वो मौन होगये उनकी बात समझते एंव मानते हुये आत्रेयी ने शीष झुकाये कहा "जी पिताश्री", ये सुन उसे देखते वो पुन एकबार कहने लगे, "पुत्री आपको केशम्भभुमि के चार युवराजों में किसी एक को अपना जीवनसाथी चुनना होगा, एवं...... आपकी सुरक्षा आपसे बेहतर अन्य कोई नहीं कर सकता.... हमें अन्य कुछ नहीं कहना पुत्री अब आप जा सकती है " उनकी बातें सुन एंव समझते हुये आत्रेयी ने कहा "जी पिताश्री हम समझ गऐ"
इतना बोल आत्रेयी सर झुकाये आज्ञा लेकर चली गई,महाराज ढृढ़ दृष्टि से उसे जाते देखते रहे,,
___________________
घने बन के मध्मम माटी पर गिड़े सुखे पत्र की खड़खड़ाती आवाज अचानक तेज होगई, बातास के गति को मोड़ चिड़ते हुये दो घोड़े बेहद फुर्ती और तेजी से आगे बढ़ रहे थे, दोनों घोड़े दिखने में राजकीय लग रहें थे एक काला रंग का एवंं दुसरे का रंग माटी सा गभीर भुरा, इन दो राजकीय घोड़े को चलाने बाले दोनों शख्स के बेशभुशा अत्यंत सधारण है दोनों ने ही अपने मुखो को कपड़े से ढक रखा है दोनों की केबल आखें दिख रही है, दोनों की ही दृष्टि बिल्कुल स्थित थी,, तेजी से बढ़ते हुये काला घोड़ा जरा आगे बढ़ गया , ये देख उसका घुड़सवार हवा को चिड़ती आवाज में बोला "ज्येष्ठ देख रहे है न आप हम आपसे आगे बढ़ रहे है"
ये कहते हुये उसका ध्यान सामने की ओढ़ से हट अपने ज्येष्ठ की भातिं चला, जिस्से उसके घोड़े का संतुलन जरा बिगरने को था ये देख उसका ज्येष्ठ कुछ कहने को हुआ परन्तु उसके कहने से पुर्व ही उसने अपने घोड़े के सम्हाल पकड़ मजबूत कर लिया एंव बोला "हम जानते है ज्येष्ठ आप यही कहते ना के हमें स्वंय लक्ष्य से ध्यान को कदापि हटाना नहीं चाहिये"उसकी बात सुन उसका ज्येष्ठ उसी क्षण कुछ बोला नहीं अपितु उसने अपने घोड़े को रोक लिया एवं अपने हाथ में पकड़े धनुष को ऊपर किया एंव वायु के प्रभाव को आभास कर एंव स्वंय के दृष्टि को स्थित रख एकाएक दुसरी तरह हवा में तीर छोड़ा, तीर लगते ही एक आवाज आई परन्तु इस प्रकार वायु में तीर छोड़ने का अर्थ उसका अनुज समझ नहीं पाया तो वो असमझता से प्रश्न करने लगा "ज्येष्ठ आपने उस दिशा में तीर क्यों फेका? जवकी उस ओढ़ तो कुछ है..... " वो बात सम्पूर्ण करता उसके पुर्व ही वो बोला,,
क्रमश....
(कृपया रेटिंग कमेंट देकर जाये )