इक तेरी चाहत! - Chapter 3
बढ़ते है कहानी की ओर---
शाम के करीब साढ़े छह हो रहे थे , जब दबे पांव पंखुड़ी अपने कमरे में दाखिल हुई थी कि पूरे कमरे को बिखरा देख, उसे ज़्यादा हैरानी हुई नहीं थी कि किन्शुक कॉलेज से घर लौटने पर यहीं करता था । उसका सारा गुस्सा , पंखुड़ी द्वारा समेटे कमरे पर ही निकलता था ।
उसने एक बेबस सी नजर उसपर डाली , जो बेखबर औंधे मुंह बिस्तर पर लेटा आराम से सो रहा था । फिर आहिस्ते से खाने की थाली को उठाया , शायद खाना खा कर सो गया था वह ।
थाली को वहीं टेबल पर रखते हुए उसने आहिस्ते - आहिस्ते बिखरा कमरा दोबारा समेट दिया था । हर चीज को उसकी अपनी सही जगह पर रखते हुए पंखुड़ी फिर बिस्तर किनारे बैठ कर उसे देखने लगी । सोते हुए ही शांत सा लगता था वह , वरना जब से वह इस घर में बहू बन कर आई थी , तब से ही वह उसे गुस्से में देख रहीं थी । ना जाने किस बात का गुस्सा था , ना जाने किस बात की शिकायत थी ।
शादी तो उसकी भी घर वालों की मर्जी से हुई है , तो क्या उसने ऐसे प्रतिक्रिया दी .. ? नहीं .. नहीं दी .. बल्कि इस रिश्ते को अपनाया , दिल से ।
किन्शुक के पिता जयकिशन जी और पंखुड़ी के पिता नित्यानंद जी काफी सालों से अच्छे मित्र थे । उनके घरों के बीच बस चार गली का फासला था जबकि दिलों में जरा नहीं । जयकिशन जी , नित्यानंद जी को अपने सगे भाई से भी बढ़कर मानते थे । हर सुख में , दुख में वह हमेशा साथ खड़े होते थे ।
नित्यानंद जी को अक्सर अपनी बेटी पंखुड़ी की चिंता होती थी और जैसे - जैसे वह बड़ी होती जा रहीं थी उनकी अपनी बेटी के प्रति यह चिंता बढ़ती ही जा रहीं थी । उन्हें लगता था कि उनकी भोली - भाली बच्ची , दुनिया की चालाकियों के बीच कैसे जी पाएगी । पंखुड़ी स्वभाव से सीधी , कम बोलने वाली और जल्दी विश्वास कर लेने वाली थी । नित्यानंद जी को डर था कि कहीं उसकी मासूमियत ही उसके लिए किसी मुश्किल का कारण ना बन जाए ।
और रहीं कसर नित्यानंद की मां यानी पंखुड़ी की दादी ने पूरी कर दी थी , उनकी ओर चिंता बढ़ा कर की एक रोज उन्होंने उसे अपने पास बुलाया और जैसे फरमान सुना दिया कि बेटी बड़ी हो गई है , अब जितनी जल्दी अपने घर की हो जाएं , सही रहेगा ।
यह बात उन्होंने अपने मित्र जयकिशन को बताई तो उन्होंने फ़ौरन ही पंखुड़ी का हाथ अपने छोटे बेटे किन्शुक के लिए मांग लिया था कि वह तो काफी वक्त से यहीं चाहते थे । उन्हें पंखुड़ी बहुत पसंद थी और यह उनकी दिली इच्छा था कि वह उनके घर की बहू बने ।
और बस फिर क्या था , जयकिशन की बात सुनकर नित्यानंद की जैसे हर चिंता खत्म हो गई थी । जाने पहचाने लोग थे । उनकी मासूम सी बेटी का गुजारा हो जायेगा । यह सोचकर ही उन्होंने हां कर दी थी और फिर एक हफ्ते में रिश्ता पक्का , सगाई और फिर शादी भी हो गई थी ।
वक्त की कमी की वजह से शादी में ज़्यादा तामझाम किया नहीं गया था । एक सादा सी शादी थी , जो कि मंदिर में हुई थी । पंखुड़ी तो नहीं मगर किन्शुक इस शादी के ख़िलाफ़ था कि वह इतनी जल्दी शादी जैसे रिश्ते में बंध कर अपना सपना चकनाचूर नहीं करना चाहता था । उसने बार - बार मना किया मगर जयकिशन जी ने उसकी एक ना सुनी कि वह अपने मित्र को पहले ही वादा कर चुके थे । और फिर उनका मानना था कि वह तो लड़का था , शादी के बाद उसकी पढ़ाई पर क्या ही फर्क पड़ेगा । सो उसकी दी हर दलील को उन्होंने दरकिनार करते हुए आखिर में उसकी शादी पंखुड़ी से करवा ही दी थी ।
पंखुड़ी का हाथ कब किन्शुक के बालों में चला गया था , उसे खुद पता नहीं चला था । उसकी उंगलियां हल्के - हल्के उसकी पेशानी को छू रहीं थी । जबकि नींद में ही जब किन्शुक ने एक नर्म सा स्पर्श महसूस किया , उसने झट से अपनी आंखे खोल दी थी ।
पंखुड़ी तो बस अपने ख्यालों में खोई थी जब अचानक ही उसे अपनी कलाई पर एक तेज दर्द महसूस हुआ था । अपने होश - ओ - हवास में आते हुए उसने किन्शुक को देखा , जो खा जाने वाली नज़रों से उसे घूर रहा था । वह एकदम ही घबरा सी गई ।
उसकी कलाई को मोड़ते हुए वह उसपर चीखा था - " त... तुम यह क्या करने की कोशिश कर रहीं थी .. ? "
" म... मैं ... कुछ भी नहीं , जी । मैं तो बस.... "
" मै नींद में था इसलिए मेरा फ़ायदा उठाना चाहती थी ना तुम ।"
" ऐ जी.... ऐसा कुछ भी नहीं है । " पंखुड़ी ने उसे समझाना चाहा था , मगर उसकी बात आसानी से समझ ले , वह किन्शुक थोड़ा ही था । उसे ख़ुद से दूर धक्का देते हुए वह बिस्तर से निकला और उसकी तरफ उंगली दिखा, अपने दांत पिसता हुआ बोला - " खबरदार... अगर दोबारा मेरे करीब आई तो... चांटे खाओगी तुम मुझसे । और मै मार दूंगा । "
उसकी धमकी पर पंखुड़ी ने घबरा कर अपने दोनो गालों पर हाथ रख लिया था कि उसे डर था कहीं अभी ही किन्शुक उसपर हाथ ही ना उठा दे । पैरो में चप्पल फंसाते हुए किन्शुक जल्दबाजी में कमरे से निकल गया था जबकि पीछे वह कुछ सवाल छोड़ गया जिसका जवाब जानने के लिए वह सीधा नीता के कमरे में घुस आई थी । उसके एकदम से आने से नीता चौक पड़ी थी ।
" जीजी , मुझे कुछ पूछना है आपसे । " पंखुड़ी उसके कान में फुसफुसाते हुए बोली तो नीता ने हामी में सिर हिला दिया - " हां , पूछो क्या पूछना है । "
" यह जब सो रहे थे , मेरा हाथ उनके बालों में चला गया था । तब यह एकदम उठे और बोले कि मैं इनका नींद में फायदा उठा रहीं हूं । तो मुझे पूछना था कि यह नींद में फायदा उठाने का क्या मतलब होता है .. ? "
उसका सवाल सुन नीता कुछ पल के लिए उसे देखती ही रह गई । पंखुड़ी की आँखों में सचमुच अनजान सा सवाल था और जवाब जानने की जिज्ञासा । वो वाकई भोली थी , नीता ने सोचा था फिर हल्का सा मुस्कुरा कर, अपना सिर ना में हिलाते हुए वह बोली - " इसका मतलब कुछ नहीं होता । वह कह रहा था कि तुमने उसकी नींद तोड़ दी । "
" ओह् अच्छा यह बात थी । " नीता की बातो पर यकीन करते हुए वह मुस्कुरा दी और वापस उसके कमरे से बाहर निकल गई जबकि नीता बुदबुदाते हुए बोली - " बताऊंगी तो फिर भी इसे कुछ समझ आने से रहा । आहिस्ते - आहिस्ते अपने आप ही समझ जायेगी हर चीज । "
क्रमशः
आज का भाग कैसा लगा कॉमेंट्स में जरुर बताएं बाकी पढ़ते रहें यह कहानी ❤️